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उ॒द्गा॒तेव॑ शकुने॒ साम॑ गायसि ब्रह्मपु॒त्रइ॑व॒ सव॑नेषु शंससि।

वृषे॑व वा॒जी शिशु॑मतीर॒पीत्या॑ स॒र्वतो॑ नः॒ शकुने भ॒द्रमा व॑द वि॒श्वतो॑ नः॒ शकुने॒ पुण्य॒मा व॑द॥५२॥ ऋ॰ २।८।१२।२

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल प्रार्थना

महर्षि दयानन्द व्याख्या : व्याख्यान—हे “शकुने” सर्वशक्तिमन्नीश्वर! आप साम को सदा गाते हो, वैसे ही हमारे हृदय में सब विद्या का प्रकाशित गान करो। जैसे यज्ञ में महापण्डित सामगान करता है, वैसे आप भी हम लोगों के बीच में सामादि विद्या का गान (प्रकाश)कीजिए। “ब्रह्मपुत्र इव” आप कृपा से सवन (पदार्थ-विद्याओं)की “शंससि” प्रशंसा करते हो, वैसे हमको भी यथावत् प्रशंसित करो। जैसे “ब्रह्मपुत्र इव” वेदों का वेत्ता विज्ञान से सब पदार्थों की प्रशंसा करता है, वैसे आप भी हमपर कृपा कीजिए। आप “वृषेव वाजी” सर्वशक्ति का सेचन करने और अन्नादि पदार्थों के दाता तथा महाबलवान् और वेगवान् होने से वाजी हो। जैसाकि वृषभ की नाईं आप उत्तम गुण और उत्तम पदार्थों की वृष्टि करनेवाले हो, वैसे हमपर उनकी वृष्टि करो। “शिशुमतीः” हम लोग आपकी कृपा से उत्तम-उत्तम शिशु (सन्तानादि)को “अपीत्य” प्राप्त होके आपको ही भजें। “आ सर्वतो नः शकुने” हे शकुने! सर्वसामर्थ्यवान् ईश्वर! सब ठिकानों से हमारे लिए “भद्रम्” कल्याण को “आ वद” अच्छे प्रकार कहो, अर्थात् कल्याण की ही आज्ञा और कथन करो, जिससे अकल्याण की बात भी कभी हम न सुनें। “विश्वतो नः शकुने” हे सबको सुख देनेवाले ईश्वर! सब जगत् के लिए “पुण्यम्” धर्मात्मक कर्म करने का “आ वद” उपदेश कर, जिससे कोई मनुष्य अधर्म करने की इच्छा भी न करे और सब ठिकानों में सत्यधर्म की प्रवृत्ति हो॥