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आ॒वदँ॒स्त्वं श॑कुने भ॒द्रमा व॑द तू॒ष्णीमासी॑नः सुम॒तिं चि॑किद्धि नः।

यदु॒त्पत॒न् वद॑सि कर्क॒रिर्य॑था बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑॥५३॥ ऋ॰ २।८।१२।३

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल प्रार्थना

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “आवदंस्त्वं शकुने” हे शकुने! जगदीश्वर! आप सब ”भद्रम्” कल्याण का भी कल्याण, अर्थात् व्यावहारिक सुख के भी ऊपर मोक्ष-सुख का निरन्तर उपदेश सब जीवों को कीजिए। “तूष्णीमासीनः” हे अन्तर्यामिन्! हमारे हृदय में सदा स्थिर हो मौनरूप से ही “सुमतिम्” सर्वोत्तम ज्ञान देओ। “चिकिद्धि नः” कृपा से हमको अपने रहने के लिए घर ही बनाओ और आपकी परमविद्या को हम प्राप्त हों। “यदुत्पतन्” उत्तम व्यवहार में पहुँचाते हुए आपका यथा=जिस प्रकार से “कर्करिर्वदसि” कर्त्तव्य कर्म, धर्म को ही अत्यन्त पुरुषार्थ से करो, अकर्त्तव्य दुष्ट कर्म मत करो, ऐसा उपदेश है कि पुरुषार्थ, अर्थात् यथायोग्य उद्यम को कभी कोई मत छोड़ो। जैसे “बृहद्वदेम विदथे” विज्ञानादि यज्ञ वा धर्मयुक्त युद्धों में “सुवीराः” अत्यन्त शूरवीर होके “बृहत्” (सबसे बड़े)आप जो परब्रह्म उन “वदेम” आपकी स्तुति, आपका उपदेश, आपकी प्रार्थना और उपासना तथा आपका यह बड़ा, अखण्ड साम्राज्य और सब मनुष्यों का हित सर्वदा कहें, सुनें और आपके अनुग्रह से परमानन्द को भोगें॥५२॥ ५३॥

ओम् महाराजाधिराजाय परमात्मने नमो नमः॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां महाविदुषां श्रीयुतविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिना विरचित आर्याभिविनये प्रथमः प्रकाशः पूर्तिमागमत्।

समाप्तोऽयं प्रथमः प्रकाशः॥