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शं नो॒ वातः॑ पवता॒ᳬ शं न॑स्तपतु॒ सूर्यः॑।

शं नः॒ कनि॑क्रदद् दे॒वः प॒र्जन्यो॑ऽ अ॒भि व॑र्षतु॥ २२॥ यजु॰ ३६।१०॥

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल प्रार्थना

महर्षि दयानन्द व्याख्या : हे सर्वनियन्तः! हमारे लिए सुखकारक, सुगन्ध, शीतल और मन्द-मन्द वायु सदैव चले। एवं, सूर्य भी सुखकारक ही तपे। तथा मेघ भी सुख का शब्द लिये, अर्थात् गर्जनपूर्वक सदैव काल-काल में सुखकारक वर्षे, जिससे आपके कृपापात्र हम लोग सुखानन्द ही में सदा रहें॥२२॥