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Choose Sutra

अधर्म

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : जिसका स्वरूप ईश्वर की आज्ञा को छोड़कर और पक्षपात सहित अन्यायी होके बिना परीक्षा करके अपना ही हित करना है, जो अविद्या, हठ, अभिमान, क्रूरतादि दोषयुक्त होने के कारण वेद विद्या से विरुद्ध है, और सब मनुष्यों को छोड़ने योग्य है, इससे यह 'अधर्म' कहलाता है।