In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ओ३म्
उपदेश मञ्जरी
प्रथम उपदेश
(ईश्वर-सिद्धि-विषयक)
[स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पूना बुधवार पेठ में भिड़े के बाड़े में तारीख ४ जौलाई सन् १८७५ के दिन रात्रि समय में जो व्याख्यान दिया था, उसका सारांश निम्नलिखित है—]
ओ३म् शन्नो मित्रः शं वरुणः शन्नो भवत्वर्यमा।
शन्न इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः॥१
नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। [ऋतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद् वक्तारमवतु। अवतु माम्। अवतु वक्तावरम्॥]२
[इत्यादि३ पाठ स्वामीजी ने प्रथम कहा—]
‘ओ३म्’ यह ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट नाम है, क्योंकि इसमें उसके सब गुणों का समावेश होता है।
प्रथम हमें ईश्वर की सिद्धि करनी चाहिए, उसके पश्चात् धर्म-प्रबन्ध का वर्णन करना योग्य है, क्योंकि “सति कुड्ये चित्रम्” इस न्याय से जब तक ईश्वर की सिद्धि नहीं होती तब तक धर्म-व्याख्यान करने का अवकाश नहीं है।
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरᳬशुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥४
न तस्य कार्यं करणं च [विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते।]
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च१॥
[ये वाक्य कहकर स्वामीजी ने इनकी व्याख्या की।]
मूर्त्त देवताओं में ये गुण नहीं लगते। इसलिए मूर्त्ति-पूजा निषिद्ध है। इस पर कोई ऐसी शङ्का करते हैं कि रावणादिकों के सदृश दुष्टों का पराभव करने के लिए, भक्तों को मुक्ति देने के अर्थ [ईश्वर को] अवतार लेना चाहिए; परन्तु ईश्वर सर्वशक्तिमान् है; इससे अवतार की आवश्यकता दूर होती है, क्योंकि इच्छा मात्र से वह रावण [जैसों] का नाश तो कर सकता था। इसी प्रकार भक्तों को उपासना करने के लिए ईश्वर का कुछ आकार होना चाहिए, ऐसा भी बहुत से लोग कहते हैं; परन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि शरीर-स्थित जो जीव है, वह भी आकार-रहित है, यह सब कोई मानते हैं अर्थात् वैसा आकार न होते भी हम परस्पर एक दूसरे को पहिचानते हैं, और प्रत्यक्ष कभी न देखते हुए भी केवल गुणानुवादों ही से सद्भावना और पूज्यबुद्धि [अदृष्ट] मनुष्य के विषय में रखते हैं। उसी प्रकार ईश्वर के सम्बन्ध में नहीं हो सकता, यह कहना ठीक नहीं है। इसके सिवाय मन का आकार नहीं है, मन द्वारा परमेश्वर ग्राह्य है, उसे जड़ेन्द्रिय-ग्राह्यता लगाना यह अप्रयोजक है।
श्रीकृष्णजी एक भद्र पुरुष थे। उनका महाभारत में उत्तम वर्णन किया हुआ है, परन्तु भागवत में उन्हें सब प्रकार के दोष लगाकार उनके दुर्गुणों का ढिंढोरा पीटा है।
ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। इस शक्तिमान् का अर्थ क्या है? “कर्तुम-कर्तुमन्यथा कर्तुम्” ऐसी शक्ति से तात्पर्य नहीं है; किन्तु सर्वशक्तिमान् का अर्थ न्याय न छोड़ते हुए काम करने की शक्ति रखना, यही सर्वशक्तिमान् से तात्पर्य है। कोई-कोई कहते हैं कि ईश्वर ने अपना बेटा पाप-मोचनार्थ जगत् में भेजा, कोई कहते हैं कि पैगम्बर को उपदेशार्थ भेजा, सो यह सब कुछ करने की परमेश्वर को कुछ भी आवश्यकता न थी; क्योंकि वह सर्वशक्तिमान् है।
बल, ज्ञान और क्रिया ये सब शक्ति के प्रकार हैं। बल, ज्ञान और क्रिया अनन्त होकर स्वाभाविक भी हैं। ईश्वर का आदि कारण नहीं है। आदि कारण मानने पर अनवस्था-प्रसंग आता है। निरीश्वरवाद की उत्पत्ति सांख्यशास्त्र से हुई प्रतीत होती है, परन्तु सांख्य-शास्त्रकार कपिल मुनि निरीश्वरवादी न थे। उनके सूत्रों का आधार लेकर कपिल निरीश्वरवादी थे, ऐसा कोई कहते हैं; परन्तु उन के सूत्रों का अर्थ ठीक-ठीक नहीं किया जाता। वे सूत्र निम्नलिखित हैं—
ईश्वरासिद्धेः। मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः।
उभयथाप्यसत्करत्वम्। मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासादिसिद्धस्य वा।१ इत्यादि।
परन्तु सूत्रसाहयर्च से विचार करने पर ईश्वर एक ही है, दूसरा ईश्वर नहीं है, ऐसा भगवान् कपिल मानते थे, क्योंकि ‘पुरुष है’ ऐसा उनका सिद्धान्त था। वही पुरुष सहस्र-शीर्षादि सूक्तों२ में वर्णन किया हुआ है। उसी के सम्बन्ध से वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्३ इत्यादि कहा हुआ है।
प्रमाण बहुत प्रकार के हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द इत्यादि। भिन्न-भिन्न शास्त्रकार प्रमाणों की भिन्न-भिन्न संख्या मानते हैं।
मीमांसा-शास्त्रकार जैमिनिजी दो प्रमाण मानते हैं। गौतम न्याय-शास्त्रकार आठ, कोई-कोई अन्य न्याय-शास्त्रकार चार, पतञ्जलि योग-शास्त्रकार तीन प्रमाण, सांख्य-शास्त्रकार तीन, वेदान्त ने तो छः प्रमाण स्वीकार किए हैं। परन्तु भिन्न-भिन्न संख्या मानना, यह उस-उस शास्त्रकार के विषयानुरूप है। सारे प्रमाणों का अन्तर्भाव करके तीन प्रमाण अवशिष्ट रहते हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द।
इन तीन प्रमाणों को लापिका४ कर ईश्वरसिद्धि-विषयक प्रयत्न करते समय प्रत्यक्ष की लापिका करने से पूर्व अनुमान की लापिका करनी चाहिए, क्योंकि प्रत्यक्ष का ज्ञान बहुत ही संकुचित और क्षुद्र है। एक व्यक्ति के इन्द्रिय द्वारा कितना ज्ञान हो सकता है? अर्थात् बहुत ही थोड़ा हो सकता है। इससे प्रत्यक्ष को एक ओर रख-कर शास्त्रीय विषयों में अनुमान प्रमाण ही विशेष गिना गया है। व्यवहार के लिए अनुमान आवश्यक है। अनुमान के विना भविष्य के व्यवहारों के विषय में हमारा जो दृढ़ निश्चय रहा है, वह निरर्थक होगा। कल सूर्य उदय होगा, यह प्रत्यक्ष नहीं तथापि इस विषय में किसी के मन में तिलमात्र की भी शङ्का नहीं होती। अब [इस] अनुमान के तीन प्रकार हैं—शेषवत्, पूर्ववत् और सामान्यतोदृष्टम्। पूर्ववत् अर्थात् कारण से कार्य का अनुमान, शेषवत् अर्थात् कार्य से कारण का अनुमान, सामान्यतोदृष्टम् अर्थात् संसार में जिस प्रकार की व्यवस्था दिखाई देती है उस पर से जो अनुमान होता है, वह।
इन तीनों अनुमानों की लापिका करने से ईश्वर=परम पुरुष=सनातनब्रह्म सब पदार्थों का बीज [है] ऐसा सिद्ध होता है। रचनारूपी कार्य दीखता है, इस पर से अनुमान होता है कि इस [सृष्टि] का रचने वाला अवश्य कोई है। पञ्चभूतों की सृष्टि से आप ही आप रची हुई नहीं है, क्योंकि व्यवहार में घर का सामान विद्यमान होने ही से केवल घर नहीं बन जाता, यह हमारा, देखा हुआ अनुभव सर्वत्र है। साथ ही साथ [पञ्चभूतों का] ‘मिश्रण’ नियमित प्रमाण से विशिष्ट कार्य उत्पन्न होने की ही सुगमता के लिए कभी भी आप स्वयं घटित नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि सृष्टि की व्यवस्था जो हम देखते हैं, उसका उत्पादक और नियन्ता ऐसा कोई श्रेष्ठ पुरुष अवश्य होना चाहिए।
अब किसी को यह अपेक्षा लगे कि ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्ष ही प्रमाण होना चाहिए, तो उसका विचार यूं है कि प्रत्यक्ष रीति से गुण का ज्ञान होता है। गुण का अधिकरण जो गुणी द्रव्य है उसका ज्ञान प्रत्यक्ष रीति से नहीं होता। इसी प्रकार ईश्वर-सम्बन्धी गुण का ज्ञान चेतन और अचेतन सृष्टि द्वारा प्रत्यक्ष होता है। इसी पर से ईश्वर-सम्बन्धी गुण का अधिकरण जो ईश्वर है, उसका ज्ञान होता है, ऐसा समझना चाहिए।
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥१
हिरण्यगर्भ का अर्थ शालिग्राम की बटिया नहीं है, किन्तु हिरण्य अर्थात् “ज्योति जिस के उदर में है, वह ज्योतिरूप परमात्मा” ऐसा अर्थ है। मूर्तिपूजा का पागलपन लोगों में फैला हुआ है। इसका क्या उपाय करना चाहिए? यह एक प्रकार की जबरदस्ती है। मूर्ति का आडम्बर जैनियों से हिन्दू लोगों ने लिया है।
यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमा१ परमात्मा२॥
वह अमृत है और वही सब के उपासना करने योग्य है। उससे जो भिन्न है वह सब झूठा है, वह अपना आधार (मान्य)नहीं है।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥