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महर्षि दयानन्द व्याख्या : द्वितीय उपदेश
[ईश्वर-सिद्धि पर शंका-समाधान]
[मंगलवार ६ जौलाई १८७५ के दिन, श्री १०८ दयानन्द सरस्वतीजी के ईश्वर-विषयक व्याख्यान पर हुए वाद-विवाद का सारांश]
१ प्रश्न—कार्य और कारण भिन्न-भिन्न हैं या और किस प्रकार के?
उत्तर—कहीं-कहीं अभिन्न हैं और कहीं-कहीं भिन्न भी हैं। उदाहरण—मृत्तिका से बना हुआ घट मृत्तिका ही रहता है, परन्तु मांस-शोणित से नख उत्पन्न होते हैं तथापि मांस और शोणित ये नख नहीं है। इसी प्रकार मकड़ी के पेट से जाला उत्पन्न होता है, परन्तु इससे मकड़ी जाला नहीं होती।
गोमयाज्जायते वृश्चिकः।
[अर्थात्—गोबर से बिच्छू उत्पन्न होता है।] तो भी गोबर और बिच्छू क्या कभी एक हो सकते हैं? सर्वशक्तिमत्त्व चैतन्य में [और] चैतन्य पर सर्वशक्तित्व है अर्थात् सामर्थ्य के योग से चैतन्य निमित्त कारण होता है। इस स्थल पर जड़-पदार्थ जो विश्व का उपादान कारण है वह और निमित्त कारण चैतन्य एक नहीं है। अब—
एकमेवाद्वितीयम्१
ऐसी श्रुति है। उसका अर्थ करने में इस उपर्युक्त व्यवस्था से कुछ आपत्ति नहीं आती। कारण, [इसका अर्थ] अद्वितीय अर्थात् ईश्वर ही उपादान हुआ ऐसा नहीं है। कारण, भेद तीन प्रकार का होता है। कभी-कभी स्वजातीय भेद रहता है तो कभी-कभी विजातीय और कभी स्वगत भेद होता है। अब ‘अद्वितीय’ है अर्थात् ‘सब जो कुछ है वह ईश्वर ही है’ ऐसा अर्थ आधुनिक वेदान्त में लेते हैं। परन्तु यह उपयोगी (=ठीक)नहीं, किन्तु अद्वितीय का अर्थ दूसरा ईश्वर नहीं, अर्थात् एक ही ईश्वर है और संयुक्त नहीं है, यही अर्थ है। अब—
ईश्वरः सर्वसृष्टिं प्राविशत्।
ऐसे अर्थ की श्रुति है१, तो अब उसका अर्थ किस प्रकार करना चाहिए? अथवा—
सर्वं खल्विदं ब्रह्म।२
इस वाक्य का अर्थ कैसे करें? आधुनिक वेदान्ती ‘इदं विश्वं’ ऐसा मानकर उस शब्द का अन्वय ‘सर्व’ इसकी ओर करते हैं, परन्तु साहचर्य अर्थात् ग्रन्थ के पिछले अभिप्राय की ओर दृष्टि देने से ‘इदं’ शब्द का अन्वय ‘ब्रह्म’ शब्द की ओर करना पड़ता है [जैसे] “इदं सर्वं घृतम्” अर्थात् यह बिल्कुल घी है, तेल मिश्रित नहीं, ऐसा सर्व शब्द का अर्थ है। ऐसा अर्थ करने से ऊपर के हमारे कहे अनुसार श्रुति का अर्थ होने से [कोई] कठिनाई नहीं रहती।
“नाना वस्तु ब्रह्मणि” अथवा बृहदारण्यकोपनिषद् में “य आत्मनि तिष्ठन् आ [त्मनोऽन्तरो यमा] त्मा न वेद”३ अथवा “यस्य आत्मा शरीरम्”४ इस वाक्य के अर्थ के विषय में आपत्ति आयेगी, इसका विचार करना चाहिए। एक ही शरीर के स्थान में व्यापक और व्याप्य इन दोनों धर्मों की योजना नहीं करते बनती। गृह आकाश में स्थित है और आकाश यह व्यापक है गृह व्याप्य है। इसलिए आकाश और गृह ये एक ही हैं वा अभिन्न हैं, ऐसा अनुमान निकालते नहीं आता। इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा ये अभिन्न हैं ऐसा कहने का अवकाश नहीं रहता।
अहं ब्रह्मास्मि।५
इस वाक्य का अर्थ किया जाय तो यह अत्यन्त प्रीति का [द्योतक] उदाहरण है, यही लौकिक दृष्टान्त पर से स्पष्ट होता है। जैसे ‘मेरा मित्र मैं ही हूँ’ ऐसा कहते हैं, परन्तु मैं और मेरा मित्र, इन दोनों की सर्वथैव अभिन्नता है ऐसा फलितार्थ नहीं होता।
समाधिस्थ होते समय ‘तत्त्वमसि१’ ऐसा मुनि लोग कह गए, परन्तु साहचर्य की ओर ध्यान देने से मुनियों का यह भाषण ‘जीवात्मा और परमात्मा अभिन्न है’ इस मत का पोषक नहीं होता, क्योंकि इसी वचन के पूर्व भाग में इस सारे स्थूल और सूक्ष्म जगत् में कारण सम्बन्ध से परमात्मा का ऐतदात्म्य [कथित] है। परमात्मा का आत्मा दूसरा नहीं, ‘स आत्मा’२ वही आत्मा है ‘तदन्तर्यामि त्वमसि’ जो सब जगत् का आत्मा वह तेरा ही है। इसलिए जीवात्मा और परमात्मा इनके बीच परस्पर सेव्य-सेवक, व्याप्य-व्यापक, आधाराधेय ये सम्बन्ध ठीक जमते हैं। ऐतरेयोपनिषद् में—
प्रज्ञानं ब्रह्म३
ऐसा वाक्य है। उसके महावाक्य-विवरण में—
प्रज्ञानमानन्दं ब्रह्म४
ऐसा विस्तार किया हुआ है, फिर भी परमेश्वर ही सृष्टि बना, ऐसा अर्थ “तत् सृष्टिं प्राविशत्”५ इस वाक्य पर से करने पर कार्य कारण की अभिन्नता होती है। यदि ईश्वर ज्ञानी है तो अविद्या माया आदिकों के अधीन होकर सृष्ट्युत्पत्ति का कारण हुआ, ऐसा कहने में ‘उसको भ्रान्ति हुई’ ऐसा प्रतिपादन करना पड़ता है। [जहां] देश, काल, वस्तु [का] परिच्छेद है वहां भ्रान्ति है, यही भ्रान्ति ब्रह्म को हुई, यह मानने से ब्रह्म का ज्ञान अनित्य ठहरता है। [अतः] यह विचारणीय वार्ता है।
इसी तरह ‘जीव-भावना’ भ्रान्ति का परिणाम है। भ्रान्ति दूर होने से जीव ब्रह्म होता है, ऐसी समझ ठीक नहीं, क्योंकि भ्रान्ति परमात्मा में सम्भव नहीं। आधुनिक वेदान्त के अनुसार मुक्ति को स्वीकार करने पर ब्रह्म को अनिर्मोक्ष-प्रसंग आता है। और जीव ब्रह्म को यदि एक कहें तो जीव में ब्रह्म के गुण नहीं हैं, जीव को अपरिमित ज्ञान और सामर्थ्य नहीं। यदि हम ब्रह्म बन जावें तो हम जगत् भी रच लेवें। इस से पुनः इस बार ऐसा कहना आवश्यक हुआ कि विश्व जड़, ब्रह्म चेतन है और इनका आधाराधेय, सेव्य-सेवक, व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है।
“सुखमस्वाप्सम्” इस अनुभव की योजना करते बनती है क्योंकि चैतन्य यह नित्य ज्ञानी है। तैत्तिरीयोपनिषद् में आनन्दमय कोश के अवयव वर्णन किए हुए हैं।
सारांश—जीव ब्रह्म नहीं, जगत् ब्रह्म नहीं। इस स्थल पर कार्य कारण भिन्न-भिन्न हैं। यही प्रकार सत्य है, परन्तु अखिल सजीव और निर्जीव पदार्थ ईश्वर ने अपने सामर्थ्य से निर्माण किए। वह सामर्थ्य उसी के पास सदा रहता है, इस तात्पर्य से भेद नहीं आता।
२ प्रश्न—तुम कहते हो कि अवतार नहीं हुए, तो ईश्वर को सगुण वा निर्गुण क्यों मानते हो?
उत्तर—प्राकृत जनों में सगुण अर्थात् अवतार और निर्गुण अर्थात् परब्रह्म ऐसा अर्थ करके इस सम्बन्ध से वाद चलता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है। “स पर्यगात्”२ श्रुति पर से अवतार का होना बिल्कुल ही नहीं सम्भव होता। “कविः, मनीषी”३ “एको देवः४-निर्गुणश्च” ऐसे-ऐसे श्रुति वाक्य हैं, इन से ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों है। ज्ञान, शक्ति, आनन्द इन गुणों के सहित होने से वह सगुण है, परन्तु जड़ के गुण उसमें नहीं हैं। इन गुणों के सम्बन्ध [अभाव] से वह निर्गुण है। प्रथम जो मैंने श्रुति कही उसके साहचर्य की ओर ध्यान देने से यह अर्थ निकलता है।
३ प्रश्न—प्रार्थना क्यों करनी चाहिए, ईश्वर सर्वज्ञ है और सर्वशक्तिमान् भी है तो उसे हमारे मन की बात विदित है और उसने हमें इस प्रकार कैसे उत्पन्न किया कि हम पाप करें, फिर इस प्रकार की पाप-विषयिणी प्रवृत्ति हम में रखकर भी हमारे पाप का दण्ड देता है, तो ईश्वर न्यायी कैसा?
उत्तर—हमारे माता-पिता ईश्वर के बनाए हुए पदार्थ लेकर हमें पालते हैं तो भी वे हम पर बड़े उपकार करते हैं। इन उपकारों का स्मरण करना हमारा धर्म है, ऐसा हम स्वीकार करते हैं। फिर जब ईश्वर ने सृष्टि उत्पन्न की तो उसके असंख्य उपकारों को हमें अवश्य स्मरण करना चाहिए। द्वितीय—कृतज्ञता दिखलाने वालों का मन स्वतः प्रसन्न और शान्त होता है। तृतीय—परमेश्वर की शरण जाने से आत्मा निर्मल होता है। चतुर्थ—प्रार्थना से पश्चात्ताप होता है और आगे को पाप-वासना का बल घटता जाता है। पञ्चम-सत्यता और प्रेम हम में दृढ़ होते जाते हैं। षष्ठ-स्तुति अर्थात् यथार्थ वर्णन, ईश्वरस्तुति करने से अपनी प्रीति बढ़ती है क्योंकि ज्यों-ज्यों उसके गुण समझ में आते जाते हैं, त्यों-त्यों प्रीति अधिक दृढ़ होती जाती है।
फिर भी यह है कि उपासना के द्वारा आत्मा में सुख का प्रादुर्भाव होता है। इस उपाय को छोड़ पापनाशन करने के लिए अन्य उपाय नहीं है। काशी जाने से हमारे पाप दूर होंगे यह समझ, अथवा तोबा करने से पाप छूटना, किंवा हमारे पाप का भार अमुक भद्र पुरुष लेकर सूली चढ़ गया इत्यादि अन्य लोगों की सारी समझ अप्रशस्त है अर्थात् भूल पर है। उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है, विवेकी होने से क्षणिक (नाशवान्)वस्तुओं से शोक और आनन्द ये दोनों नहीं होते। अब ईश्वर ने जीव स्वतन्त्र किया, इसलिए उससे पाप भी होता है, यदि उसे परतन्त्र किया जाता तो वह केवल जड़ पदार्थवत् बना रहता। जीव के स्वातन्त्र्य से ब्रह्म की सर्वज्ञता में कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि इन दोनों में परस्पर सम्बन्ध नहीं है। बच्चे को खुला छोड़ा जाय तो वह चोट लगा लेवेगा, यह सोच माता बालक को बांधे नहीं रखती। तो भी बालक दंगा, धूम, फसाद अवश्य करेगा, यह ज्ञान माता को रहता ही है। इस लौकिक उदाहरण पर से ब्रह्म की सर्वज्ञता से जीव के स्वातन्त्र्य में कुछ भी आपत्ति नहीं आती। ज्ञान के विषय में स्वतन्त्रता उसकी है, उसी तरह आचरण के विषय में उससे दिए हुए सामर्थ्य की मर्यादा में स्वतन्त्रता मनुष्य की है। यदि ऐसी स्वतन्त्रता न होती तो जो सुखोपभोग आज हो रहा है वह न होता और जीव-सृष्टि की उत्पत्ति व्यर्थ हुई होती।