In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : चतुर्दश उपदेश
नित्यकर्म और मुक्ति
प्रत्येक स्त्री और पुरुष के जो प्रतिदिन के कर्त्तव्य हैं, उनको आह्निक कर्म कहते हैं। धर्म-सम्बन्धी जो कर्त्तव्य हैं वे नित्यकर्म हैं। वे कर्म किसको, किस प्रकार और कहां तक करने चाहिए और किसको न करने चाहिए, इस विषय पर विचार किया जाता है। बालक मूर्ख और छोटा होने के कारण माता-पिता के अधीन रहता है। ८ वर्ष की अवस्था तक उसमें धर्म-सम्बन्धी काम करने की योग्यता नहीं होती। इसलिए हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत)होने से पहले बालकों के लिए नित्यकर्म का विधान नहीं किया है। इस प्रकार वर्ण, आश्रम, विद्या, आयु और शारीरिक बल इत्यादि के अनुसार शास्त्रों ने नित्यकर्म की व्यवस्था की है। धर्मानुष्ठान के सम्बन्ध में नित्यकर्म निम्नलिखित हैं—
१. ब्रह्मयज्ञ—जो वेदों के पाठन-पाठन द्वारा होता है। ‘ब्रह्म’ शब्द का अर्थ विद्या, वेद और परमात्मा तीनों के हैं। ‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ विचार है। इसलिए ‘ब्रह्मयज्ञ’ का अर्थ वेदों का विचार या परमात्मा का विचार हुआ। ब्रह्मयज्ञ के ठीक अर्थों को मन में जगह देकर यह स्पष्ट मालूम होता है कि आजकल जिस रीति पर ब्रह्मयज्ञ किया जाता है, वह निष्फल है। और फिर यह आक्षेप मन में कभी स्थान न पावेगा कि आधुनिक ब्रह्मयज्ञ शास्त्र के अनुसार नहीं है।
२. देवयज्ञ—“यदग्नौ हूयते स देवयज्ञः” जो अग्नि में होम किया जाता है, वह देवयज्ञ है। कोई लोग देवयज्ञ का अभिप्राय देवताओं की पूजा समझते हैं, परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों और मनुस्मृति के देखने से मालूम होता है कि इस देवयज्ञ का ठीक अभिप्राय होम अर्थात् अग्निहोत्र है। अग्नि दो प्रकार की है, एक जठराग्नि और दूसरी भौतिकाग्नि। कोई लोग कहते हैं—
‘होमैर्देवान् यथाविधि अर्चयेत्।’ (द्र॰ मनु ३।८१)होम से विद्वानों का यथाविधि सत्कार करना चाहिए।
होम शब्द के पारिभाषिक अर्थ कभी-कभी दान और आदान के भी हो जाते हैं। फिर भी कोई मनुष्य किसी प्रकार मूर्ति-पूजा को देवयज्ञ में शामिल नहीं कर सकता।
३. पितृयज्ञ—“[यस्मिन्] पितृभ्यो ददाति स पितृयज्ञः।” जिसमें पितरों को दिया जावे अर्थात् उनकी सेवा की जावे, उसे पितृयज्ञ कहते हैं। यहाँ पर पितृ शब्द के अर्थ पर विचार करना चाहिए।
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तैर्न च बन्धुभिः।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान्॥१
सुनीति, धर्म, सचाई और सच्चरित्रता आदि गुणों से युक्त अत्यन्त सहिष्णु, महात्मा जो प्राचीन ऋषि हुए हैं उन्हीं को अपने तपोबल के प्रभाव से वसु, रुद्र और आदित्य आदि की पदवियां मिला करती थीं। ऐसे ऋषि सच्चे पितर होते थे और उनका आदर-सत्कार करना पितृयज्ञ कहलाता था। २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्य धारण करने वाला वसु, ३६ वर्ष तक रुद्र और ४८ वर्ष तक रहने वाला आदित्य कहलाता था। छान्दोग्य-उपनिषद् में प्रातः, मध्याह्न और सांयकाल के लिए ३ सवन बतलाये गये हैं, जो तीनों प्रकार के ब्रह्मचारियों से सम्बन्ध रखते हैं। इन सबके तात्पर्य पर विचार करने से मालूम होता है कि विद्या के द्वारा आत्मिक जन्म देने वाला ही पिता कहलाता है और ऋषि मन्त्रद्रष्टा को कहते हैं।
आजकल पितृयज्ञ कहने से जो मृतकों का श्राद्ध, और तर्पण समझा जाता है वह ठीक नहीं है क्योंकि मनुजी ने भी कहा है कि श्रद्धा से जो काम किया जाता है उसे श्राद्ध कहते हैं और तृप्ति का नाम तर्पण है। इन सब अर्थों और प्रयोगों पर विचार करने से मालूम होता है कि आजकल देवयज्ञ और पितृयज्ञ की जो व्याख्या की जाती है, वह कवियों की अत्युक्ति ही है। भला सोचिए कि कवियों की अत्युक्ति से यथार्थ तत्त्व कैसे जाना जा सकता है? विद्या-सत्कार अर्थात् ऋषि-सत्कार और पितृ-सत्कार अर्थात् विद्वानों के सत्कार को पितृयज्ञ मानना चाहिए। श्रद्धा के विना जो किया जाता है वह धर्म-कर्म अर्थात् श्राद्ध नहीं होता। मनुजी ने कहा—
पाषण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकाञ्छठान्।
हैतुकान् बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्॥१
पाखण्डी, वेदों की आज्ञा के विरुद्ध चलने वाले, विडालवृत्ति वाले, हठी, बकवादी और बगुलाभक्त मनुष्यों का वाणी से भी सत्कार नहीं करना चाहिए।
वेदविहित पितरों की सेवा-शुश्रूषा छोड़कर समुद्र, पहाड़, नदी और वृक्षों का तर्पण करना और इसे श्राद्ध मानना, भला पाखण्ड नहीं तो और क्या है? प्राचीन पद्धति ही यदि लेनी थी, तो ऋषियों की पद्धति स्वीकार करते।
४. भूतयज्ञ—“यो भूतेभ्यः क्रियते स भूतयज्ञः।” जो प्राणियों को भाग दिया जाता है, उसे भूतयज्ञ कहते हैं। इस विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, साधारण प्राणियों का पालन करना भूतयज्ञ है।
५. अतिथि यज्ञ—मनुजी लिखते हैं—
अनित्या हि स्थितिर्यस्य सोऽतिथिः सद्भिरुच्यते।२
जिसके आगमन की कोई नियत तिथि न हो और स्थिति भी जिसकी अनियत हो, वह अतिथि कहलाता है। अतिथियज्ञ का अधिकारी वही है, जो विद्वान् हो एवं जिसका आना, जाना और ठहरना अनियत हो, वह चाहे किसी वर्ण का हो [उसकी सेवा करना] यह एक श्रेष्ठ कर्म है।
अब पुनः ब्रह्मयज्ञ पर विचार करना चाहिए। इस यज्ञ के सम्बन्ध में सन्ध्योपासना अवश्य करनी चाहिए। इसके विषय में एक सन्ध्योपनिषद् है, इस पुस्तक में विशेष व्याख्या की गई है। इस उपासना का अधिकार यदि योग्य अवस्था हो तो लड़के-लड़कियों को बराबर है। दिन और रात की सन्धि के समय में यह उपासना अवश्य करनी चाहिए। ऐसा सन्धि समय सायं प्रातः दो समय आता है, तीन वार नहीं होता। इसलिए दोपहर की सन्ध्या कदापि नहीं हो सकती। सामब्राह्मण और यजुर्वेद का ब्राह्मण देख लीजिए—
तस्मादहोरात्रस्य संयोगे संन्ध्यामुपासीत।३
दिन और रात की सन्धि के समय सन्ध्योपासना करनी चाहिए।
उद्यन्तमस्तं यन्तमादित्यमभिध्यायेत्।१
सूर्य के उदय और अस्त होने पर संध्या करनी चाहिए। इन प्रमाणों से केवल दो संध्या ही सिद्ध होती हैं। संध्योपासना में गायत्री महामन्त्र के अर्थ पर [विचार] करना चाहिए। इस मन्त्र में सारे विश्व को उत्पन्न करने वाले परमात्मा का जो उत्तम तेज है उसका ध्यान करने से बुद्धि की मलिनता दूर हो जाती है और धर्माचरण में श्रद्धा और योग्यता उत्पन्न होती है। दूसरे किसी मत में प्रार्थना के मन्त्रों की ऐसी गहराई और सचाई नहीं है। ईसाई लोगों की प्रार्थना के मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है कि—“हे परमेश्वर! हमको प्रतिदिन रोटी खाने को दे।” इसकी अपेक्षा इस आर्यों के महामन्त्र का अर्थ कैसा गम्भीर है। आधुनिक समय में जो-जो मत निकले हैं, उनकी प्रार्थना के मन्त्र इस महामन्त्र के सामने कैसे तुच्छ हैं। इस पर प्रत्येक बुद्धिमान् को विचार करना चाहिए। संध्योपासना सदा सायं-प्रातः इन दो कालों में ही करनी चाहिए। इन दोनों कालों में मनोवृत्ति की स्थिरता में प्राकृतिक सहायता मिलती है। सूतकर्ि में सन्ध्या अवश्य करनी चाहिए, अनध्याय नहीं करना चाहिए। इस विषय में मनुजी लिखते हैं—
वेदोपकरणे चैव स्याध्याये चैव नैत्यके।
न निरोधोस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि॥२
वेद-पाठ, नित्यकर्म और होम मन्त्रों में अनध्याय नहीं है।
नित्यकर्म का अभिप्राय यह है कि अपने मन का लक्ष्य परमेश्वर को बनाया जावे, इसलिए प्रत्येक कर्म की समाप्ति पर यह कहा जाता है कि मैं इस कर्म का या इसके फल को परमेश्वर के अर्पण करता हूँ। यहां तक नित्यकर्म का विधान हुआ।
[मुक्ति-विषय]
अब आगे मुक्ति के विषय में थोड़ा-सा विचार किया जाता है। मुक्ति शब्द का अर्थ छूटना है। यहां प्रश्न होता है, किससे छूटना? उत्तर स्पष्ट है कि दुःख अर्थात् बन्धन से छूटना मुक्ति है। जहां बन्धन नहीं वहां मुक्ति भी नहीं। जीवात्मा बद्ध है, इसलिए इसको मुक्ति की आवश्यकता है। ईश्वर सदा मुक्त है अर्थात् बन्धन से पृथक् है, इसलिए उसको मुक्त-स्वभाव कहते हैं। मुक्ति का अधिकारी होना बड़ा ही कठिन काम है। मुक्ति की दशा में नित्य सुख का अनुभव होता है। आजकल तो लोग यह समझते हैं कि सस्ती भाजी की तरह मनमाने कामों से मुक्ति मिलती है, परन्तु यह मूर्खतापन की समझ है। मुक्ति के मनमाने चार भेद जो लोग बतलाते हैं वे ये हैं—सायुज्य, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्य। ये सब कल्पित है। वेदादि शास्त्रों में मुक्ति के ये भेद कहीं नहीं लिखे। प्रत्युत उनमें एक ही प्रकार की मुक्ति बतलाई है। यजुर्वेद में लिखा है—
तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।१
“उस परमात्मा को जानकर ही मृत्यु को जीत सकते हैं, दूसरा और कोई मार्ग नहीं है।” इससे स्पष्ट सिद्ध है कि मुक्ति का मार्ग एक है और वह केवल परमेश्वर का ज्ञान है। इस पर प्रश्न होगा कि वह परमेश्वर कैसा है?
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।२
“उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति या पैमाना)नहीं है, जिसका कि यश बड़ा है।” फिर तवल्कार और बृहदारण्यक उपनिषद् को भी देखना चाहिए, जिनमें बतलाया है कि जीवात्मा के भीतर भी वह परमात्मा व्यापक है तथा उसे वाणी-मन, आँख, कान और प्राणों को भी अपने-अपने कामों में लगाने वाला माना है और उसे एक तथा अद्वितीय माना है। इन सब प्रमाणों पर विचार करने से सिद्ध होता है कि परमेश्वर के ज्ञान के विना मुक्ति पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। वह परमेश्वर अरूप, अनादि तथा अनन्त है। वही ब्रह्म सबसे बड़ा और सबका सहारा है। आजकल की मुक्ति तो यह समझी जाती है कि जीव और परमात्मा एक ही है, बस यह ज्ञान होना ही मुक्ति है। यह आजकल के वेदान्तियों का मत है; किन्तु यह सच्चा वेदान्त नहीं है और न वेदों का सिद्धान्त है। इस बात की पड़ताल करने पर कि षट् दर्शनों के प्रणेताओं की मुक्ति के विषय में क्या सम्मति है—इसका तत्त्व मालूम हो जायगा। पहले जैमिनिकृत पूर्वमीमांसा में यह कहा है कि धर्म अर्थात् यज्ञ से मुक्ति मिलती है और वहां “यज्ञो वै विष्णुः”१ इत्यादि शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण भी दिए हैं। इस पर विचार कीजिए।
फिर कणाद मुनि ने वैशेषिक दर्शन में कहा है कि तत्त्वज्ञान से मुक्ति होती है।२ न्यायदर्शन के रचयिता गौतम ने अत्यन्त दुःख-निवृत्ति को मुक्ति माना है।३ मिथ्याज्ञान के दूर होने से बुद्धि, वाक् और शरीर शुद्ध होते और इनकी शुद्धि से यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है, वही मुक्ति की अवस्था है। योगशास्त्र के कर्ता पतञ्जलि मानते हैं कि चित्तवृत्तियों का निरोध करने से शान्ति और ज्ञान प्राप्त होते हैं और इससे कैवल्य (मोक्ष)की प्राप्ति होती है। सांख्यशास्त्र के प्रणेता महामुनि कपिल कहते हैं कि तीन प्रकार के दुःखों की [अत्यन्त] निवृत्ति होनी ही परम पुरुषार्थ (मुक्ति)है।४ अब देखिए कि उत्तर मीमांसा अर्थात् वेदान्तदर्शन के रचयिता वादरायण (व्यास)क्या कहते हैं—
अविभागेन दृष्टत्वात्॥५
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः॥६
अभावं बादरिराह ह्येवम्॥७
[भावं जैमिनिर्विकल्पामननात्॥८
द्वादशाहवदुभयविधं वादरायणोऽतः॥९]
व्यास के मत से मुक्ति की दशा में अभाव और भाव दोनों रहते हैं। मुक्त जीवात्मा का परमेश्वर के साथ व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध रहता है। दोनों एक अर्थात् जीवात्मा का अभाव कभी नहीं होता।
भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च॥१
परमेश्वर के ज्ञान, सामर्थ्य और कुछ आनन्द जीवात्मा को प्राप्त होते हैं।
ईश्वर का आनन्द असीम है वैसा आनन्द मुक्त-जीवात्मा को हो ही नहीं सकता। जीव ब्रह्म में अभेद मानने से धर्मानुष्ठान के सब साधन योग, तप और उपासना आदि सब निष्फल हो जायेंगे, इसलिए परमात्मा और जीवात्मा को एक मानना ठीक नहीं है। व्यापक और व्याप्य, सेव्य और सेवक आदि सम्बन्ध ईश्वर और जीव में वर्त्तमान रहता है और यही सम्बन्ध जीवात्मा के जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारे का कारण होता है।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥