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महर्षि दयानन्द व्याख्या : त्रयोदश उपदेश
इतिहास
सुधन्वा राजा के साथ जो बौद्धमत का अनुयायी था, शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ। इसमें प्रतिज्ञा यह हुई थी कि यदि शंकराचार्य पराजित हुए, तो उन्हें बौद्धमत स्वीकार करना होगा। बौद्ध पण्डित वेदों की निन्दा करते हुए कहते हैं कि वेदों के बनाने वाले भाण्ड, धूर्त और राक्षस हैं। [इस प्रकार के] झूठे दोष वेदों पर लगाते हैं। यदि महीधर की तरह वेदों का अर्थ किया जावे, तो बौद्धों के आक्षेपों को अवकाश मिलता है। ‘गभ’ शब्द को ‘भग’ से बदल कर महीधर ने अर्थ का अनर्थ कर दिया है। शतपथ ब्राह्मण में इसके अर्थ प्रजा, राष्ट्र या श्री के किए हैं। शोक है कि आजकल के शास्त्री लोग भी महीधर के अर्थों को मानते हैं। अश्व शब्द के अर्थ शतपथ के प्रमाण से यदि ‘अग्नि’ के किए जावें जिसको कि महीधर ने गन्देपन में घसीटा है, तो बौद्धों के आक्षेप वेदों पर से दूर हो जाते हैं और यदि हठ से महीधर जैसे अनार्य टीकाकार का पक्ष किया जावे तो बौद्ध लोगों के आक्षेप कैसे दूर हो सकते हैं? बुद्धिमानों को इस पर विचार करना चाहिए क्योंकि महीधर के जैसे मनमाने अर्थ करने के कारण वेद [और] ईश्वर से विमुख तीर्थंकर और केवल स्वभाव को मानने वाले मत पैदा हो गए।
सुधन्वा राजा शास्त्रार्थ में हार गया और उसने वेद-मत को स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात् शंकराचार्य बुद्ध गयार्ि में गए, वहां का राजा कट्टर बौद्ध था, वर्णाश्रम व्यवस्था को यह राजा नहीं मानता था। इस राजा को भी जीतकर शंकराचार्य ने वैदिक धर्म का अनुयायी बनाया। बौद्धमत का अब ह्रास होने लगा। अब इसका कुछ आकार बदलकर जैनमत का प्रारम्भ हुआ। जैन लोग केवल युक्तिवादी थे और कृमि-कीटों के रक्षक होने के कारण मनुष्यों पर वे अधिक दया का प्रयोग नहीं करते थे। बुद्ध और जैन मतों के फैलने से क्षात्रधर्म को बहुत हानि पहुँची।
अतः पश्चात् विक्रम, भर्तृहरि, शालिवाहन और भोज आदि बहुत से राजा हुए। इसी समय में कालिदास पण्डित हुआ। ग्वालियर में भिंड नामी नगर में मिश्र लोग रहते हैं, उनके पास संजीवनी नामक एक पुस्तक है, उसमें महाभारत के विषय में ऐसा लिखा है कि व्यास ने पहले एक हजार श्लोक बनाए, फिर उसके बाद व्यास के शिष्यों ने एक हजार के ६ हजार कर दिए। इसके बाद फिर भरती पर भरती होती चली गई। जिस समय जैन मत उन्नति पर था, उस समय केवल ब्रह्मवैवर्त्त और वायु पुराण आदि दो तीन पुराण मालूम थे। आजकल कहने को तो केवल १८ ही पुराण हैं, किन्तु यह निश्चय करना कठिन है कि वास्तव में कितने पुराण हैं और इनमें क्या-क्या धर-घसीटा है। यावनी भाषा न बोले, जैन मन्दिर में न जावे इस प्रकर कट्टरपन के सैंकड़ों श्लोक बन गए हैं। हवन या उपासना करने के स्थान, जिनका नाम देवालय या देवस्थान था, अब मूर्तियों के स्थान बन गए। लोग ईश्वर के स्थान में मन्दिरों में रखी मूर्तियों की पूजा करने लगे। जैनियों के मन्दिरों की मूर्तियों को भी देवता समझकर पूजने लगे और जैनियों के देवालयों में मूर्तियां बिठाकर गपोड़े हांकने लगे और भांति-भांति के हथकण्डों से लोगों को मूर्तियों का चमत्कार दिखाने लगे। लोग भी आजकल की भांति चतुर न थे, इसलिए पुजारियों के फन्दे में फंसने लगे।
जब पुजारी, वैरागी और गोसाई आदि का जोर बढ़ चला, तब यह कहने लगे कि १८ पुराण सत्यवती-सुत व्यास ने बनाए हैं। इस प्रकार अनार्ष ग्रन्थों का प्रचार और आर्ष ग्रन्थों का लोप होता गया। जड़ मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा करने लगे और प्रतिष्ठामयूख और प्रतिष्ठाभास्कर आदि ग्रन्थ बना डाले, जिनमें प्राण-प्रतिष्ठा के मन्त्रों के नमूने देखिए—
“प्राणा इहागच्छन्तु इह तिष्ठन्तु,
इन्द्रियाणीहागच्छन्तु इह तिष्ठन्तु”
इस प्राण-प्रतिष्ठा के गपोड़े को आर्य शास्त्रों से सहारा कहां मिल सकता है? चारों वेदों की संहिता में कहीं एक मन्त्र भी प्राणप्रतिष्ठा का नहीं मिलता। इस प्रकार के कल्पित ग्रन्थ पौराणिक समय में लोगां ने गढ़ लिए और कहने लगे कि प्राण-प्रतिष्ठा से मूर्ति में पूजा का अधिकार पैदा हो जाता है। मालूम होता है कि यह मूर्ति-पूजा जैन मत वालों से हममें घुस गई है और इसको सहारा देने के लिए पुराणों में इसका वर्णन किया गया है।
अवतारों का वर्णन भी पुराणों में ही मिलता है। हरिवंश में नृसिंहावतार की कथा है। अवतारों की कथाओं और मूर्ति-पूजा के प्रचार से लोगों की मननशक्ति दूर होकर मन का झुकाव कर्म-मार्ग की तरफ हो गया। मनमाने व्रत, उपवास, उद्यापन आदि लोग करते हैं। ऐसे कामों से शारीरिक स्वास्थ्य की हानि और रोगों की वृद्धि होती है; इसके अतिरिक्त इन बखेड़ों से शैव, वैष्णव, बल्लभाचारी और रामानुजी आदि अनेक प्रकार के सम्प्रदाय उत्पन्न होकर आपस में विरोध बढ़ता गया और जड़ मूर्तियों के आगे बाल-भोग रखने, उन्हें सुलाने और रामलीला करने आदि बालक्रीड़ाओं से वैदिक धर्म की निन्दा होती है और देश के प्रत्येक प्रान्त में पाप की वृद्धि होती है। ऐसी और भी बहुत-सी हानियां मूर्तिपूजा से होती हैं। मन्दिरों में पुजारी लोग वैसा ही प्रसाद देते हैं, जैसी कि उनको दक्षिणा मिलती है। इसलिए मन्दिर क्या हैं मानो सेठ लोगों की दुकानें हैं। पुजारी लोग अपने स्वार्थ के लिए आलस्य और मूर्खता को बढ़ाने वाले बहुत-से नये वाक्य बनाकर लोगों को फंसाते हैं। बहुत-से वाक्यों को अपनी इच्छा के अनुसार जोड़-मेल कर दिया है। कहते हैं कि—
पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यम्। दन्तकटाकटेति किं कर्त्तव्यम्॥
प्रातःकाले शिवं दृष्ट्वा सर्वं पापं विनश्यति॥
(१)पढ़कर भी जब मर जाना है तो दांत कटाकट करने की क्या आवश्यकता है?
(२)यदि प्रातःकाल उठकर शिवलिंग का दर्शन करे तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।
वाह! क्या पुरुषार्थ है। ज्ञान के विना भोग, पुरुषार्थ और आनन्द नहीं है; परन्तु जहां ऊपर कही हुई भांति पुरुषार्थ की समझ है तो वहां भागवत जैसे पुराणों का जोर क्यों न होगा। यथार्थ विद्याओं के पठन पाठन को एक तरफ हटाकर पुराणों के केवल सुनने में सारे माहात्म्य लाकर धर दिए हैं। प्रत्येक पुराण की समाप्ति पर उसके सुनने से क्या-क्या लाभ होंगे, इसके मनमाने फल वर्णन किये हैं।
इस प्रकार धर्मबुद्धि बिगड़ जाने से लोग निर्बल और कायर हो गए। तभी तो ऐसी भ्रान्ति में फंस गए कि नवग्रहों से हमारी हानि होगी। इसी आधार पर फलित ज्योतिष का आडम्बर फैलाकर तदनुसार नव ग्रहों के जप के मन्त्र बनाए गए। इन मन्त्रों के अर्थों का इन कामों के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं, जिनके करते समय कि उनका प्रयोग किया जाता है, इस विषय पर कभी किसी ने विचार नहीं किया। उदाहरण के लिये एक ही ‘शन्नो देवी’ मन्त्र को देखिए। इसको शनैश्चर देवता का मन्त्र ठहराया है और ज्योतिषी जी महाराज ने अपना खेत पकाया है। इसी प्रकार सम्प्रदायी लोगों ने तन-मन-धन गोसाई जी के अर्पण कर ऐसे-ऐसे उपदेशों से भोले-भाले लोगों के मन भ्रष्ट कर दिए।
श्रोताओ! यहां भली-भांति विचार कीजिए कि प्रमाज्ञान क्या है और भ्रांतिज्ञान क्या है? देखिए जा वस्तु जैसी हो, उसका वैसा ही ज्ञान होना प्रमाज्ञान कहलाता है—
प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः।१
प्रमाणों से अर्थों की परीक्षा करना न्याय कहलाता है। इस वाक्य को कसौटी पर लगाकर सच-झूठ की परीक्षा कीजिए।
हमारे भाई शास्त्री लोग हठ करते हैं, यह हम सबका दुर्भाग्य है। हमारे भरत-खण्ड देश से वेदों का बहुत-सा धर्म लुप्त हो गया है और रहा-सहा हम लोगों के प्रमाद से नष्ट होता जा रहा है और उसकी जगह पाखण्ड, अनाचार और दम्भ बढ़ता जा रहा है। सदाचार और सच्चाई से हम लोग दूर होते जा रहे हैं, तभी तो हम सबकी दुर्दशा हो रही है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? सनातन आर्ष ग्रन्थ वेदादि को छोड़कर पुराणों में लिपट रहे हैं और उनकी कल्पित और असम्भव गाथाओं को अपना धर्म समझ रहे हैं। यदि मुझसे कोई पूछे कि इस पागलपन का कोई उपाय भी है या नहीं? तो मेरा उत्तर यह है कि यद्यपि रोग बहुत बढ़ा हुआ है, तथापि इसका उपाय हो सकता है। यदि परमात्मा की कृपा हुई तो रोग असाध्य नहीं है। वेद और ६ दर्शनों की सी प्राचीन पुस्तकों के भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवाद करके सब लोगों को जिससे अनायास प्राचीन विद्याओं का ज्ञान प्राप्त हो सके, ऐसा यत्न करना चाहिए और पढ़े लिखे विद्वान् लोगों को सच्चे धर्म का उपदेश करने की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए। और गांव-गांव में आर्यसमाज स्थापना करके तथा मूर्तिपूजादि अनाचारों को दूर करके एवं ब्रह्मचर्य से तप का सामर्थ्य बढ़ाकर सब वर्णों और आश्रमों के लोगों को चाहिए कि शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ावें तो सुगमता से शीघ्र लोगों की आंखें खुल जावेंगी और दुर्दशा दूर होकर सुदशा प्राप्त होगी। मेरे जैसे एक निर्बल मनुष्य के करने ये यह काम कैसे हो सकेगा, इसलिए आप सब बुद्धिमान् लोगों से आशा रखता हूँ कि आप मुझे इस शुभ कार्य में सहयोग देंगे।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥