Donation Appeal Download Our App
Choose Sutra

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥ ७॥

In Hindi:

पदपाठ : प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥

हिंदी में अर्थ : (प्रत्यक्षानुमानागमाः) प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम (प्रमाणानि) प्रमाण हैं॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “उनके विभाग और लक्षण ये हैं —

इनमें प्रत्यक्ष उसको कहते हैं कि जो चक्षु आदि इन्द्रिय और रूप आदि विषयों के सम्बन्ध से सत्यज्ञान उत्पन्न हो। जैसे दूर से देखने में सन्देह हुआ कि वह मनुष्य है वा कुछ और। फिर उसके समीप होने से निश्चय होता है कि वह मनुष्य ही है, इत्यादि प्रत्यक्ष व्यवहार है।

और जो किसी पदार्थ के चिह्न देखने से उसी पदार्थ का यथावत् ज्ञान होता हो वह अनुमान कहाता है। जैसे किसी के पुत्र को देखने से ज्ञान होता है कि इसके माता-पिता आदि हैं वा अवश्य थे, इत्यादि इसके उदाहरण हैं।

जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थ का निश्चय कराने वाला है। जैसे ज्ञान से मोक्ष होता है। यह आप्तों का उपदेश शब्दप्रमाण का उदाहरण है।” (ऋ० भू॰ वेदविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : इन्द्रियप्रणालिकया चित्तस्य बाह्यवस्तूपरागात्तद्विषया सामान्यविशेषात्मनोऽर्थस्य विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः प्रत्यक्षं प्रमाणम्। फलमविशिष्टः पौरुषेयश्चित्तवृत्तिबोधः। प्रतिसंवेदी पुरुष इत्युपरिष्टादुपपादयिष्यामः। अनुमेयस्य तुल्यजातीयेष्वनुवृत्तो भिन्नजातीयेभ्यो व्यावृत्तः सम्बन्धो यस्तद्विषया सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिरनुमानम्। यथा देशान्तरप्राप्तेर्गतिमच्चन्द्रतारकं चैत्रवत्, विन्धयश्चाप्राप्तिरगतिः। आप्तेन दृष्टोऽनुमितो वाऽर्थः परत्र स्वबोधसंक्रान्तये शब्देनोपदिश्यते। शब्दात्तदर्थविषया वृत्तिः श्रोतुरागमः। यस्याश्रद्धेयार्थो वक्ता न दृष्टानुमितार्थः स आगमः प्लवते। मूलवक्तरि तु दृष्टानुमितार्थे निर्विप्लवः स्यात्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (इन्द्रियप्रणालिकया) इन्द्रिय द्वारों से (चित्तस्य) चित्त का (बाह्यवस्तु) बाह्य वस्तु के साथ (उपरागात्) सम्बन्ध होने से (तद् विषया) उस बाह्य वस्तु को विषय बनाने वाली (सामान्यविशेषात्मनोऽर्थस्य) सामान्य और विशेष के मिले जुले धर्मों वाले पदार्थ में (विशेषावधारणप्रधाना) विशेष धर्म का प्रधान रूप से निश्चय कराने वाली (वृत्तिः) चित्त की वृत्ति (प्रत्यक्षं प्रमाणम्) प्रत्यक्ष प्रमाण है। पुरुष और चित्त के मेल से (पौरुषेयः) पुरुष द्वारा (चित्तवृत्तिबोधः) चित्त वृत्ति का बोध ही (फलमविशिष्टः) प्रमाण का फल है जिसे प्रमा भी कहा जाता है। (प्रतिसंवेदी पुरुष) प्रत्यक्ष ज्ञान का अनुभव करने वाला चेतन = पुरुष है (इति उपरिष्टात् उपपादयिष्यामः) यह आगे (योगसूत्र ४.२२ में) कहेंगे।

(अनुमेयस्य) अनुमान के साध्यरूप धर्मी का (तुल्यजातीयेषु) समान जाति वालों में (अनुवृत्तः) रहने वाला = पाया जाने वाला, और (भिन्नजातीयेभ्यः) भिन्न जाति वालों से (व्यावृत्तः) वियुक्त = पृथक् = अलग रहने वाला (यः सम्बन्धः) जो सम्बन्ध है (तद् विषया) उसे विषय बनाती हुई, विषय के = पदार्थ के (सामान्यावधारणप्रधाना) सामान्य धर्मों को प्रधान रूप से निश्चय कराने वाली (वृत्तिः) चित्त की वृत्ति (अनुमानम्) अनुमान प्रमाण है। (यथा) जैसे (चन्द्रतारकम्) चन्द्र और तारे (देशान्तरप्राप्तेः) देशान्तर प्राप्ति होने से = अर्थात् एक स्थान में देख, पुनः कालान्तर में दूसरे स्थान में देखने से (गतिमत्) गति वाले हैं (चैत्रवत्) चैत्र नामक पुरुष की भाँति। (अप्राप्तिः) जो देशान्तर को प्राप्त नहीं होता (अगतिः) वह गति वाला भी नहीं होता जैसे (विन्धयः) विन्ध्याचल पर्वत।

(आप्तेन) आप्त = यथार्थ वक्ता, विद्वान् के द्वारा (दृष्टोऽनुमितो वार्थः) प्रत्यक्ष और अनुमान से जाना हुआ पदार्थ अथवा विषय (परत्र स्वबोधसंक्रान्तये) दूसरे पुरुषों में अपने ज्ञान को प्रदान करने के लिए (शब्देनोपदिश्यते) शब्द के द्वारा उपदेश किया जाता है। और उन (शब्दात्) शब्दों से (तदर्थविषया) उस पदार्थ अथवा विषय के अर्थ को विषय बनाने वाली (श्रोतुः वृत्तिः) श्रोता की जो वृत्ति है वह (आगमः) आगम प्रमाण है। (यस्य वक्ता) जिस आगम का वक्ता (अश्रद्धेयार्थः) श्रद्धा के योग्य नहीं हैं, क्योंकि (न दृष्टानुमितार्थः) जिस पदार्थ या विषय को वक्ता ने स्वयं न प्रत्यक्ष किया और न अनुमान से जाना हो, (स आगमः प्लवते) वह आगम प्रमाण से च्युत हो जाता है = गिर जाता है। (मूलवक्तरि तु) मूल वक्ता के द्वारा वचन = उपदेश, (दृष्टानुमितार्थे) जिसने पदार्थ अथवा विषय को प्रत्यक्ष अथवा अनुमान द्वारा जाना है; (निर्विप्लवः स्यात्) प्रमाण कोटि से नहीं गिरता अर्थात् अबाधित होता है ॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने प्रमाण वृत्ति के तीन भेद बताये है — प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम।

प्रत्यक्ष प्रमाण :— ज्ञानेन्द्रिय रूप प्रणाली के द्वारा चित्त का बाह्य पदार्थों = विषयों के साथ सम्बन्ध बनता है, जिससे चित्त में उस पदार्थ विषयक वृत्ति बनती है। उस पदार्थ के कुछ सामान्य धर्म होते हैं, और कुछ विशेष धर्म होते हैं। चित्त में पदार्थ के विशेष धर्मों की प्रधानता के कारण जो वृत्ति बनती है, उसे प्रत्यक्ष प्रमाण नामक वृत्ति कहा जाता है। जैसे किसी ने शाम के समय देखा कि खम्बा है या मनुष्य है। दोनों में ऊचाई, मोटाई रूप सामान्य धर्म समान हैं; जबकि सरलता, स्थिरता आदि खम्बे में पाये जाने वाले विशेष धर्मों या शिर, हाथ, पाँव, गति आदि मनुष्य में पाये जाने वाले विशेष धर्मों के निश्चय से यह “खम्बा है मनुष्य नहीं” अथवा “यह मनुष्य है खम्बा नहीं” प्रत्यक्ष प्रमाण का उदाहरण है। इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाण रूप वृत्ति में पदार्थ के सामान्य और विशेष धर्मों का ज्ञान होता है, परन्तु प्रधानता से विशेष धर्मों का ही ज्ञान होने से इस वृत्ति को प्रत्यक्ष प्रमाण वृत्ति कहा जाता है; क्योंकि विशेष धर्मों के द्वारा ही विभिन्न पदार्थों का भिन्न-भिन्न ज्ञान निश्चयात्मक रूप से होता है।

महर्षि गौतम ने न्याय दर्शन १.१.४ में प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण करते हुए कहा है — “इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षं”। अर्थात् चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों तथा रूप आदि अर्थों के संयोग से उत्पन्न हुआ ज्ञान, जो अव्यपदेश्यम् अर्थात् शब्द व्यवहार करने के अयोग्य, अव्यभिचारि अर्थात् भ्रम से रहित और व्यवसायात्मकम् अर्थात् निश्चय रूप हो, उसे प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। महर्षि व्यास ने यहाँ “व्यपदेश्यम्” अर्थात् शाब्दिक ज्ञान का निषेध करने हेतु “अर्थस्य” पद को और “अव्यभिचारि” और “व्यवसायात्मकम्” के लिए “विशेषावधारणप्रधाना” कहा है।

यहाँ यह जानना चाहिए कि चित्त, जड़ होने से, स्वतः किसी पदार्थ का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। यह चेतन पुरुष की सन्निधि में, चेतन पुरुष की प्रेरणा से ही, इन्द्रियों द्वारा शब्दादि विषयों को ग्रहण करता है। चित्त ही विभिन्न वृत्तियों के रूप वाला होता है, तथा पुरुष उन वृत्तियों को यथार्थ रूप से ग्रहण करने वाला है अतः महर्षि व्यास ने “फलमविशिष्टः पौरुषेयश्चित्तवृत्तिबोधः” कहा है। अर्थात् पुरुष द्वारा चित्त वृत्ति का बोध ही प्रमाण का फल है। इसी तथ्य को महर्षि पतञ्जलि ने “वृत्तिसारूप्यमितरत्र” (योग० १.४) तथा “चित्तेरप्रतिसंङ्क्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्” (योग० ४.२२) में कहा है। महर्षि व्यास ने भी योगसूत्र ४.२२ को लक्ष्य कर “बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष इति” कहकर महर्षि पतञ्जलि की मान्यता को स्पष्ट किया है। इसी प्रकार “एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनं” यह पञ्चशिखाचार्य का सूत्र भी चित्त और पुरुष की उपरोक्त स्थिति को ही स्पष्ट करता है। अतः इन प्रमाणों के आधार पर पुरुष को निष्क्रिय नहीं कहा जा सकता वरन् वह ही चित्त की वृत्तियों का अभिमन्ता, बोद्धा, द्रष्टा, भोक्ता कहा जाता है। तभी वह जन्म-मरण के अनवरत् चक्र में फसा हुआ भोग-अपवर्ग को प्राप्त करने वाला होता है।

अनुमान प्रमाण :— अनुमेय अर्थात् अनुमान के साधनरूप धर्म का, समान प्रकार वाले पदार्थों में पाया जाने वाला और भिन्न प्रकार के पदार्थों में न पाया जाने वाला जो सम्बन्ध होता है, उसे विषय बनाने पर सामान्य धर्मों का विशेष रूप से ज्ञान जिसमें हो, ऐसी चित्तवृत्ति अनुमान नामक प्रमाण है। अनुमान प्रमाण का उदाहरण देते हुए महर्षि व्यास कहते है कि चन्द्र और तारे गतिशील है क्योंकि वे एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त होते हैं, जैसे कि चैत्र नाम का मनुष्य। जो एक स्थान से दूसरे स्थान को प्राप्त नहीं करता वह गतिशील नहीं होता जैसे कि विन्ध्याचल पर्वत।

महर्षि गौतम ने अनुमान प्रमाण का लक्षण करते हुए कहा है — “तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानम् — पूर्ववत्, शेषवत् सामान्यतोदृष्टं च।” (न्याय १.१.५) अर्थात् प्रत्यक्ष पूर्वक होने वाला तीन प्रकार का अनुमान है। जैसे धुएँ और अग्नि का एक स्थान पर प्रत्यक्ष करने के बाद दूसरे स्थान पर धुआँ देखने पर अग्नि के होने का अनुमान हो जाता है। यह अनुमान पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट — तीन प्रकार का है।

आगम प्रमाण :— आप्त पुरुष द्वारा, प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से ज्ञात विषयों को, दूसरे पुरुषों को भी उस ज्ञात विषय का ज्ञान कराने हेतु, शब्द के द्वारा उपदेश किया जाता है। उन शब्दों से, उस अर्थ के सम्बन्ध में, विषय का ज्ञान कराने वाली, श्रोता की जो वृत्ति होती है वह आगम प्रमाण कहलाती है। यहाँ यह प्रश्न होता है कि क्या मिथ्यावादी, प्रपंचक के वाक्य से जो विषय या पदार्थ सम्बन्धित वृत्ति बनती है, उस मिथ्या वाक्य को भी आगम प्रमाण मानना चाहिए ? महर्षि व्यास कहते हैं जिस वाक्य के वक्ता ने विषय का प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से निश्चय न किया हो वह वक्ता अश्रद्धेय होने से, उस वाक्य अथवा उपदेश से होने वाली आगम नामक वृत्ति सदोष होने से प्रमाण कोटि में नहीं आती। दूसरी ओर मूल वक्ता, जो प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से पदार्थ को निश्चयपूर्वक जानता है, का वाक्य = उपदेश ही प्रमाणिक है।

न्यायदर्शनकार ने शब्द प्रमाण के विषय में कहा है —

आप्तोपदेशः शब्दः।

स द्विविधो दृष्टाऽदृष्टार्थत्वात् ॥ (न्याय० १.१.७-८)

जो आप्त अर्थात् पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकार प्रिय, सत्यवादी, पुरुषार्थी, जितेन्द्रिय पुरुष जैसा अपने आत्मा में जानता हो, और जिससे सुख पाया हो, उसी के कथन की इच्छा से प्रेरित सब मनुष्यों के कल्याणार्थ उपदेष्टा हो, अर्थात् जो पृथिवी से लेके परमेश्वर पर्यन्त पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर उपदेष्टा होता है, ऐसे पुरुष का उपदेश और पूर्ण आप्त परमेश्वर के उपदेश वेद हैं, उन्हीं को शब्द प्रमाण जानो॥ (स० प्र० ३रा समु॰)

किसी भी पदार्थ के यथार्थज्ञान का नाम आप्ति है। इसलिए किसी पदार्थ के साक्षात्कृतधर्मा पुरुष को आप्त कहते हैं। पृथिवी आदि महाभूतों से लेकर प्रकृति पर्यन्त तथा आत्मा, परमात्मा में से किसी भी पदार्थ का यथार्थज्ञान प्राप्त करने वाला पुरुष आप्त की श्रेणी में आता है। ऐसा मनुष्य जैसा अपने आत्मा में जानता है और जिससे वह सुख पा चुका है, उसी पदार्थ ज्ञान का दूसरे सब मनुष्यों के कल्याण हेतु उपदेश करता है। ऐसे पुरुष के वचन को शब्द प्रमाण माना है। इस विषय में महर्षि वात्स्यायन, सूत्र के भाष्य में, लिखते हैं —

आप्तः खलु साक्षात्कृतधर्मा यथादृष्टस्यार्थस्य चिख्यापयिषया प्रयुक्त उपदेष्टा। साक्षात्करण- मर्थस्याऽऽप्तिः, तया प्रवर्तते इत्याप्तः। ऋष्यार्यम्लेच्छानां समानं लक्षणम्।

साक्षात्कृतधर्मा (जिसने सुदृढ़ प्रमाणों द्वारा अर्थ का निश्चय कर लिया हो), यथादृष्ट (जिसप्रकार विषय को देखा हो) विषय को बताने की इच्छा से प्रवृत्त उपदेष्टा पुरुष आप्त कहलाता है। आप्त का लक्षण ऋषि (मन्त्रार्थद्रष्टा), आर्य (श्रेष्ठ) तथा मलेच्छ (जो उपरोक्त दो श्रेणियों में नहीं आते) पर समान रूप से घट सकता है।

इस प्रकार जो आज के भौतिक वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के विषय में दूरबीन आदि से प्रत्यक्ष कर = साक्षात् कर, जन मानस को जो बताते हैं, वह भी आगम प्रमाण की श्रेणी में आता है।

जगत् में अनेक प्रकार के व्यवहार आप्त प्रमाण के आधार पर चलते हैं। यदि मानव अपने पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान और उनके वचनों पर विश्वास न करके हर विषय को अपने स्तर पर जानने का प्रयास करे तो मानव जाति वहीं की वहीं रह जाती और आज की स्थिति में कदापि न पहुँचती। आज भी मानव अपने सीमित क्षेत्र में विशेष ज्ञान रखने वाले अर्थात् साक्षात्कृतधर्मा लोगों के ज्ञान के आधार पर अपना काम चलाते हैं। इसी प्रकार ईश्वर पूर्व गुरूओं का भी गुरू होने से पूर्ण आप्त तथा उसका ज्ञान वेद स्वतः प्रमाण होने से मानव मात्र के उत्थान में परम सहायक है।

दृष्टार्थ तथा अदृष्टार्थ भेद से शब्द प्रमाण दो प्रकार का है। जिस विषय को लोक में इन्द्रियों द्वारा प्रत्यक्ष किया जा सके वह दृष्टार्थ है तथा जिस अर्थ की परलोक में प्रतीति हो वह अदृष्टार्थ कहलाता है। जैसे ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः’ (शतपथ० ) अर्थात् स्वर्गप्राप्ति की इच्छा वाला यज्ञ करे। इस वाक्य में स्वर्ग रूपी अर्थ को इन्द्रियों द्वारा नहीं जाना जा सकता क्योंकि स्वर्ग परलोक का विषय है अतः अदृष्टार्थ है। लोक में इन्द्रिय द्वारा जाने जा सकने वाले अर्थ को दृष्टार्थ माना जाता है।

शंका :— दूसरे शास्त्रों में आठ प्रमाण गिने गए हैं। योग शास्त्र में केवल प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम को ही प्रमाण माना है। अतः उपमान, ऐतिह्य, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव को प्रमाण में न गिनने से यह प्रमाण भेद अपूर्ण हैं ?

समाधान :— महर्षि गौतम ने केवल चार प्रमाण मानते हुए, न्याय २.२.२ में इस पक्ष का उत्तर देते हुए कहा है—

शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्तिसम्भवाभावानर्थान्तर भावाच्चाप्रतिषेधः॥ न्याय २.२.२॥

अर्थात् इन में से शब्द में ऐतिह्य का, तथा अनुमान में अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव का अन्तर्भाव हो जाने से चार ही प्रमाण रह जाते हैं॥ इस योग शास्त्र में महर्षि पतञ्जलि ने भी उपमान को अनुमान और आगम प्रमाण में अन्तर्गत लेते हुए केवल तीन ही भेद किए हैं। वस्तुतः इस शास्त्र में प्रमाणों के प्रकार का वर्णन करना अभीष्ट नहीं है। योग = समाधि की दृष्टि से वृत्ति रूप जिन प्रमाणों की आवश्यकता थी महर्षि पतञ्जलि ने उन्हीं को ही कहा है। अतः उपरोक्त विभाग दोष रहित तथा पूर्ण है।