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प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥६॥

In Hindi:

पदपाठ : प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ताः क्लिष्टाश्चाक्लिष्टाश्च पञ्चधा वृत्तयः —

भूमिका हिंदी अर्थ : (ताः) वे (क्लिष्टाश्चाक्लिष्टाः च) क्लिष्ट और अक्लिष्ट भेद वाली (वृत्तयः) वृत्तियाँ (पञ्चधा) पाँच प्रकार की होती हैं—

हिंदी में अर्थ : वे पाँच वृत्तियाँ ये हैं — (पहली) प्रमाण; (दूसरी) विपर्यय; (तीसरी) विकल्प; (चौथी) निद्रा और (पाँचवी) स्मृति॥ (ऋ० भू॰ उपासना विषय)

वैदिक वृत्ति : इन वृत्तियों की व्याख्या सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि ने आगे के पाँच सूत्रों में स्वयं की है। यहाँ पर इतना ही समझना है कि महर्षि पतञ्जलि ने चित्त की सभी वृत्तियों को पाँच प्रकार से बाँटा है जो कि प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति के रूप में हैं। चित्त की समस्त वृत्तियाँ इन्हीं पाँच में ही समा जाती हैं। अतः वृत्ति निरोध के लिए इन पाँचों प्रकार की वृत्तियों के स्वरूप और लक्षणों को समझना आवश्यक है। तभी इन वृत्तियों का निरोध सम्भव हो पायेगा।

इन्हीं वृत्तियों को दूसरे प्रकार से पिछले सूत्र में दिखाया गया है जो कि क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप से हैं अर्थात् या तो कोई वृत्ति क्लेश सहित होगी; या क्लेश रहित होगी। परन्तु नामकरण की दृष्टि से सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि ने इन वृत्तियों के पाँच नाम इस सूत्र द्वारा दिए हैं। क्लिष्ट और अक्लिष्ट, वृत्तियों का नामकरण नहीं है; परन्तु वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को समझाने तथा बन्धन और अपवर्ग के कारणों को बताने के दृष्टिकोण से यह विभाग किया गया है। अर्थात् क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र से कर्म संस्कारों और वासनाओं को प्रबलता = सुदृढता मिलती, जिससे पुरुष को भोग और बन्धन की प्राप्ति होती है। दूसरी ओर अक्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र से पुरुष को विवेकख्याति की प्राप्ति और सत्त्व, रज, तम गुणों के कार्यों का विरोध = निरोध होने से पुरुष के लिए अपवर्ग का कारण = आधार बनता है॥