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स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥१४॥

In Hindi:

पदपाठ : स तु दीर्घकालः नैरन्तर्य सत्कारासेवितः दृढभूमिः॥

हिंदी में अर्थ : (स तु) वह अभ्यास तो (दीर्घकालः) दीर्घकाल पर्यन्त, (नैरन्तर्य) निरन्तर = लगातार, (सत्कारासेवितः) सत्कार = तप, ब्रह्मचर्य, विद्या और श्रद्धा पूर्वक सेवन किया हुआ (दृढभूमिः) दृढ़ अवस्था वाला होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : दीर्घकालासेवितो निरन्तरासेवितः सत्कारासेवितः। तपसा ब्रह्मचर्येण विद्यया श्रद्धया च सम्पादितः सत्कारवान्दृढभूमिर्भवति। व्युत्थानसंस्कारेण द्रागित्येवानभिभूतविषय इत्यर्थः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (दीर्घकाल आसेवितः) दीर्घकाल = लम्बे काल तक अनुष्ठान किया हुआ (निरन्तर आसेवितः) निरन्तर = लगातार नियमपूर्वक अनुष्ठान किया हुआ (सत्कार आसेवितः) सत्कारपूर्वक अनुष्ठान किया हुआ अर्थात् (तपसा) तप = सुखदुःखादि द्वन्द्वों को सहन करते हुए; (ब्रह्मचर्येण) ब्रह्मचर्य = इन्द्रियनिग्रह = वीर्यरक्षा करते हुए; (विद्यया) विद्या = वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय करते हुए; (श्रद्धया च) और श्रद्धा = सत्य को धारण करते हुए (सम्पादितः) सम्पादन किया हुआ अभ्यास (सत्कारवान्) सुसेवित = अच्छे प्रकार से अनुष्ठित (दृढभूमिः) दृढ़भूमि वाला (भवति) होता है। और वह अभ्यास (व्युत्थानसंस्कारेण) व्युत्थान संस्कारों के द्वारा (द्रागित्येव) शीघ्रता से (अनभिभूतविषयः) अभिभूत = दबने वाला नहीं होता, (इत्यर्थः) यह तात्पर्य है॥

वैदिक वृत्ति : कर्म एवं कर्मफलभोग हेतु जन्म-मरण की अनन्त यात्रा में जीवात्मा की वृत्तियाँ सामान्यतः बहिर्मुखी ही होती हैं। चित्त रूपी नदी की धारा संसाराभिमुख बहती हुई विषय-भोगों को ही प्राप्त कराती रहती है। इस धारा का आधार अविवेक = अज्ञान है, दूसरी ओर कल्याण के पथ पर जाने वाली धारा विवेकमार्ग पर ही बहा करती है।

योगमार्ग के पथिक के लिए, अभ्यास के द्वारा ही कल्याणवाहिनी धारा को प्रवाहित करना सम्भव होता है। इस धारा को निरन्तर प्रवाहित करने हेतु विवेकज्ञान की प्राप्ति ही मुख्य उपाय बताया गया है। विवेकज्ञान की प्राप्ति हेतु योगाङ्गों का पालन करना मात्र ही आवश्यक नहीं, वरन् इनका दीर्घकाल = आजीवन, निरन्तर = लगातार नियमपूर्वक तथा सत्कारपूर्वक = आदरपूर्वक अनुष्ठान करना होता है; तभी जीवात्मा के लिए परमपिता परमात्मा का पद मोक्ष = कैवल्य उपलब्ध हो पाता है। महर्षि पतञ्जलि ने अभ्यास को सुदृढ़ करने के लिए तीन उपाय बताये हैं :—

१. दीर्घाकालासेवित — योगमार्ग के पथिक को योगाङ्गों का दीर्घकाल = आजीवन अनुष्ठान करना चाहिए अन्यथा उसके विषयभोगों के संस्कार किसी निमित्त को पाकर कब उठ खड़े हो, यह कहा नहीं जा सकता।

२. निरन्तरासेवित — योगमार्ग के पथिक को योगाङ्गों का अनुष्ठान निरन्तर = लगातार करना चाहिए। क्योंकि विषयभोगों के मार्ग पर जन्म-जन्मान्तर से चलते रहने के कारण, अब चित्त को विवेकज्ञान के मार्ग पर चलाने हेतु अत्यधिक श्रम और सावधानी की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार कुएँ की मुंढेर पर रस्सी के लगातार चलते रहने से, रस्सी के उस पत्थर पर भी निशान पड़ जाते है, उसी प्रकार योगाङ्गों के दीर्घकालिक तथा निरन्तर अनुष्ठान से ही चित्त की कल्याणवाहिनी धारा के प्रवाह को चालू किया जाता है।

ऋग्वेद १.१६.३ में साधक के लिए निरन्तर अभ्यास का आदेश देते हुए कहा है “परमात्मा की उपासना प्रतिदिन करनी चाहिए — अर्थात् साधक को योगयज्ञ की सफलता के लिए वृत्ति नियन्त्रण हेतु परमात्मचिन्तन = परमात्मोपासना प्रतिदिन करनी चाहिए।” इसी प्रकार ऋग्वेद ८.६९.८ में आदेश है कि वृत्तिनिरोध हेतु अभ्यास तथा परमात्मचिन्तन = परमात्मोपासना श्रद्धा-प्रेमपूर्वक केवल एक-दो दिन नहीं वरन् निरन्तर इसी प्रकार जीवन भर, न केवल स्वयं वरन् पुत्रादि सहित, करते रहना चाहिए जिससे कि सफलता शीघ्र हो सके।

जहाँ भी योगाङ्गों के अनुष्ठान में निरन्तरता छूटती है, वहीं विषय-भोगों के संस्कार फिर से चित्त को अपने लुभावने मार्ग पर डाल देते है, और व्यक्ति उस अज्ञान मार्ग पर फिसलता हुआ संसार के आवागमन के अनवरत चक्र में उलझ जाता है।

३. सत्कारासेवित — योगमार्ग के पथिक को योगाङ्गों का अनुष्ठान सत्कारपूर्वक = आदरपूर्वक करना चाहिए। इसके लिए महर्षि व्यास लिखते है कि इस अनुष्ठान को निम्न प्रकार से करना चाहिए —

अ. तपसा — योगाङ्गों के अनुष्ठान को तपपूर्वक करना चाहिए। तप क्या है ? इसको स्पष्ट करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं — सदा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होके धर्मानुष्ठान करना। (सत्यार्थप्रकाश चतुर्थसमुल्लास); और, यथार्थ शुद्धभाव, सत्यमानना सत्य बोलना सत्य करना, मन को अधर्म में न जाने देना, बाह्य इन्द्रियों को अन्यायाचरणों में जाने से रोकना। अर्थात् शरीर इन्द्रिय और मन से शुभ कर्मों का आचरण करना, वेदादि सत्यविद्याओं का पढ़ना-पढ़ाना, वेदानुसार आचरण करना आदि उत्तम धर्मयुक्त कर्मों का नाम तप है। धातु को तपाके चमड़ी को जलाना तप नहीं है। (सत्यार्थप्रकाश एकादश समुल्लास)। महर्षि व्यास के अनुसार यह अनुष्ठान सभी प्रकार के द्वन्द्वों अर्थात् सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि को सहन करते हुए दीर्घकाल पर्यन्त निरन्तर करते रहना चाहिए। क्योंकि अतप्सवी को योग सिद्ध नहीं होता और अनादि काल से चली आ रही कर्म-क्लेश की वासनाएँ, चित्त की अशुद्धियाँ बिना तपस्या के शिथिल होकर नष्ट नहीं होती। अतः यह अभ्यास तपपूर्वक होना अत्यन्त आवश्यक है।

आ. ब्रह्मचर्येण — योगाङ्गों के अनुष्ठान को ब्रह्मचर्यपूर्वक अर्थात् इन्द्रियनिग्रह = वीर्यरक्षा करते हुए करना चाहिए। योग मार्ग के पथिक को ब्रह्मचर्य को नष्ट करने वाले कारणों तथा साधनों से सर्वथा दूर रहना चाहिए। जैसे अश्लील साहित्य का पढ़ना, अश्लील चित्रों को देखना, अश्लील वार्त्ता में रुचि लेना तथा करना, अश्लील संगीत आदि को सुनना, अष्ट प्रकार के मैथुनों का अपनाना आदि कार्यों से विरत रहना चाहिए, अन्यथा शरीरिक बल की हानि होने से योगाङ्गों का पालन आवश्यक क्षमता से होना सम्भव नहीं हो पायेगा। इस प्रकार से रक्षित वीर्य परम सूक्ष्म ब्रह्मविद्या को समझने एवम् आत्मसात् करने के लिए इन्धनवत् कार्य करता है।

इ. विद्यया — योगाङ्गों का अनुष्ठान विद्या प्राप्त करते हुए अर्थात् स्वाध्याय और प्रवचन करते हुए करना चाहिए। बिना विद्या के विवेकख्याति सम्भव नहीं है। अतः विद्या प्राप्ति हेतु वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय, पठन-पाठन निरन्तर करते रहना चाहिए। तैत्तरीयोपनिषद् शिक्षावल्ली १ में भी ऋषि उपदेश करते हैं कि जीवन में प्रत्येक कार्य करते हुए वेदादि सत्यशास्त्रों को पढ़ते-पढ़ाते रहना चाहिए।

ई. श्रद्धया — योगाङ्गों के अनुष्ठान को श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। श्रद्धा का अर्थ है जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाए तथा वेदादि सत्यशास्त्रों पर विश्वास करना। अर्थात् योगाङ्गों का अनुष्ठान यह विश्वास रखते हुए करना चाहिए कि इससे विवेकख्याति की प्राप्ति होगी, और अन्त में स्वरूपस्थिति को प्राप्त हो एवं परमात्म-साक्षात्कार होकर कैवल्य की प्राप्ति होगी। वेदादि सत्यशास्त्रों में इस मन्तव्य को स्थान-स्थान पर दृढ़तापूर्वक स्थापित किया गया है। छान्दोग्योपनिषद् ७.१९.१ में कहा है —

यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते। नाश्रद्दधन् मनुते। श्रद्दधदेव मनुते। श्रद्धात्वेव विजिज्ञासितव्येति। श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति॥

सनत्कुमार नारद को उपदेश देते हुए कहते है — “जब मनुष्य श्रद्धा करता है, तब ही मनन करता है; श्रद्धा न करता हुआ मनन नहीं करता किन्तु श्रद्धा करता हुआ ही मनन करता है; इस कारण हे नारद! श्रद्धा ही तो विशेषरूप से विजिज्ञासनीय है। यह सुन नारद कहते हैं हे भगवन्! श्रद्धा को विशेष रूप से जानने की इच्छा करता हूँ।” अतः योग की सिद्धि और ईश्वरप्राप्ति में मनन और मनन हेतु श्रद्धा का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

आत्मा द्वारा परमात्मज्ञान हेतु महर्षि पिप्पलाद ब्रह्मजिज्ञासु कबन्धी के प्रश्न के उत्तर में कहते हैं —

अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते। (प्रश्नोपनिषद् १.१०)

अर्थात् चित्त में उत्तरायण = धर्मयुक्त अवस्था के समय के साथ तपसा = द्वन्द्वसहन रूप तप पूर्वक, ब्रह्मचर्येण = अष्टविध मैथुन को त्यागकर, श्रद्धया = श्रद्धापूर्वक और विद्यया = वेदविद्या के ज्ञान वा अभ्यास से आत्मनम् = परमात्मा का अन्वेषण = ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने आत्मा को वश में करते हैं।

देखो, ऐसा ज्ञात होता है कि महर्षि व्यास ने उपनिषद् के उपदेश को ही इस सूत्र की व्याख्या में प्रतिपादित किया है। अतः योगपथ पर अग्रसर होने हेतु तप, श्रद्वा, विद्या, ब्रह्मचर्य का परिपालन अत्यावश्यक है। इस प्रकार से किया गया अभ्यास, व्युत्थान संस्कारों के द्वारा, अब तक की बहिर्मुखी वृत्तियों के द्वारा शीघ्रता से नहीं दबता और पुरुष कल्याणपथ का पथिक बन जाता है।