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दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥१५॥

In Hindi:

पदपाठ : दृष्टानुश्रविकः विषयः वितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥

हिंदी में अर्थ : (दृष्टः) इन्द्रियों द्वारा साक्षात् किए हुए, और (आनुश्रविकः) वेद तथा वेदोक्त ग्रंथों में पढ़े हुए अथवा आचार्यों से सुने हुए, इस लोक से परे अथवा इन्द्रियों से परे अतिन्द्रिय (विषयः) विषयों से (वितृष्णस्य) तृष्णारहित = वासनारहित मनुष्य की (वशीकारसंज्ञा) वशीकार प्रतीति = स्वाधीन अनुभूति (वैराग्यम्) वैराग्य है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : स्त्रियोऽन्नं पानमैश्वर्यमिति दृष्टविषये वितृष्णस्य स्वर्गवैदेह्यप्रकृतिलयत्वप्राप्तावानुश्रविकविषये वितृष्णस्य दिव्यादिव्यविषयसम्प्रयोगेऽपि चित्तस्य विषयदोषदर्शिनः प्रसंख्यानबलादनाभोगात्मिका हेयोपादेयशून्या वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (स्त्रियः) स्त्री, (अन्नं) अन्न = भोजन के पदार्थ, (पानम्) पान करने योग्य जल, दुग्धादि और (ऐश्वर्यम्) ऐश्वर्य = धन, सम्पदा, लौकिक मान प्रतिष्ठा, अधिकार की कामना आदि (इति दृष्टविषये) इस लोक में दृष्ट विषयों में (वितृष्णस्य) तृष्णारहित = वासना रहित; (स्वर्ग) स्वर्ग = पारलौकिक सुख विशेष, (वैदेह्यप्रकृतिलयत्वप्राप्तौ) विदेह और प्रकृतिलयत्व की प्राप्ति रूप (आनुश्रविकविषये) आनुश्रविक विषयों में (वितृष्णस्य) तृष्णारहित = वासनारहित; तथा (दिव्यादिव्यविषयः) दिव्य और अदिव्य विषयों के साथ (सम्प्रयोगे अपि) सम्बन्ध होने पर भी (विषयदोषदर्शिनः) विषयों में दोषों = नश्वरता, परिणाम एवं दुःख आदि को देखने वाले (चित्तस्य) चित्त की जो (प्रसंख्यानबलात्) विवेकज्ञान के बल से (अनाभोगात्मिका) न भोगने की (हेय उपादेय शून्या) हेय = द्वेष, और उपादेय = राग = ग्राह्य भाव से रहित (वशीकारसंज्ञा) वशीकार भावना = स्वाधीन अनुभूति = विषयों में अधिकार सहित वश में न होने की अनुभूति (वैराग्यम्) वैराग्य है॥

वैदिक वृत्ति : वृत्ति निरोध के दो उपाय बताए गए हैं — अभ्यास और वैराग्य। सत्त्वपुरुषान्यताख्याति रूप विवेकज्ञान के अभ्यास द्वारा मोक्ष मार्ग की ओर जाने वाला प्रवाह खोला जाता है; और वैराग्य के द्वारा सांसारिक विषयों से विरक्त होना होता है। जब तक व्यक्ति की अध्यात्मपथ की ओर रुचि उत्पन्न नहीं होती तब तक संसार के विषयों के प्रति आसक्ति को समाप्त करने का कोई कारण नहीं बनता। आगे योगसूत्र १.१६ में महर्षि व्यास ज्ञान की ही उत्कृष्ट सीमा को वैराग्य कहते हैं। अतः इन्हीं कारणों से अभ्यास के बाद वैराग्य को कहा गया है। वैराग्य से ही जन्म-जन्मान्तर के सांसारिक विषयभोगों के संस्कारों के प्रवाह को रोकने में सफलता प्राप्त होती है। क्योंकि महर्षि मनु ने भी भोगप्राप्ति से कामनाओं की शान्ति को नहीं माना —

न जातु कामः कामनामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ मनु॰ २.६९॥

जैसे अग्नि में इन्धन और घृत डालने से अग्नि बढ़ता जाता है; वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त कभी नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है॥ इसी कारण मनुष्य मात्र को आत्मोन्नति हेतु वैराग्य का उपदेश किया गया है।

वैराग्य क्या है? वैराग्य का सामान्य अर्थ है — विषयों में राग = कामना = सुखबुद्धि से रहित होना वैराग्य है। महर्षि पतञ्जलि ने इसे स्पष्ट करते हुए कहा है कि दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णारहित = वासनारहित मनुष्य की स्वाधीन अनुभूति वैराग्य है। दृष्ट = देखे हुए जैसे रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, अन्न- पानादि ऐश्वर्य, जो इस लोक में प्राप्त हुए अथवा होने वाले विषय-भोगों के प्रति तृष्णा रहित साधिकार अनुभूति; तथा आनुश्रविक = सुने हुए जैसा कि वेदादि सत्यशास्त्रों में उपदिष्ट हैं — स्वर्गकामो यजेत्; ऐसे शरीरान्तर = परजन्मादि में प्राप्त होने वाले सुखविशेष, विदेह और प्रकृतिलय (योगसूत्र १.१९) अवस्था की प्राप्ति; अथवा दिव्य रूप-रसादि (योगसूत्र १.३५) की प्राप्ति तथा विभूतिपाद में प्रतिपादित सिद्धियाँ, जो कि विभिन्न विषयों में संयम से प्राप्त होती हैं; चित्त में इन सभी की कामना से भी रहित साधिकार अनुभूति का नाम वैराग्य है।

संसार में मनुष्य की आसक्ति का सबसे प्रबल साधन और कारण यह शरीर है। इसी कारण महर्षि व्यास ने सूत्र की व्याख्या “स्त्री” शब्द से आरम्भ की है। पुरुषों की स्त्रियों के प्रति तथा स्त्रियों की पुरुषों के प्रति आसक्ति, अन्न, पान, धन-सम्पदा, लौकिक मान-प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य, विभिन्न प्रकार के अधिकार, तथा लोक में सभी प्रकार के रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श आदि के रूप में उपलब्ध विषय-भोग आदि दृष्ट विषय हैं। इसी प्रकार वेदादि सत्यशास्त्रों में कहे हुए, आचार्यों से सुने हुए, स्वर्ग-पारलौकिक सुखविशेष, परजन्म में धन-सम्पत्ति और अधिकार की कामना, विदेह और प्रकृतिलयत्व की प्राप्ति की कामना, तथा विभिन्न विषयों में संयम से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ आदि आनुश्रविक विषय कहलाते हैं। इन दोनों प्रकार के विषयों से तृष्णारहित होने की स्थिति का सम्पादन करना होता है। यहाँ पर यह जानना चाहिए कि विभूतिपाद की सिद्धियाँ को समाधि में बाधक कहा गया है (योगसूत्र ३.३७), तथा कैवल्य प्राप्ति हेतु सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से होने वाली सिद्धियों से भी वैराग्य की अनिवार्यता को कहा गया है (योगसूत्र ३.५०), और योगसूत्र ३.५५ की व्याख्या में महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कैवल्यप्राप्ति हेतु सिद्धिसम्पन्न होना आवश्यक नहीं है। अतः परमात्म-साक्षात्कार की प्राप्ति हेतु इन विभूतियों की प्राप्ति होने पर भी इनके प्रति वैराग्य का सम्पादन करना पड़ता है, अन्यथा स्वरूपस्थिति और कैवल्य प्राप्ति होना असम्भव होगा।

योग मार्ग के पथिक को संसार में रहते हुए दिव्य = सूक्ष्म और अदिव्य = स्थूल विषयों के साथ सम्बन्ध प्राप्त होता है। सामान्य शब्दादि अदिव्य-विषयों से सम्बन्ध तो जन-सामान्य को होता ही है; परन्तु प्रारम्भिक योगी को नासिकाग्र आदि स्थानों पर संयम करने से दिव्यगन्ध, दिव्यरस, दिव्यरूप आदि की भी अनुभूति होती है। इस प्रकार की अनुभूतियाँ उसे योगमार्ग पर आगे बढ़ने हेतु प्रेरक सिद्ध होती हुई भी, आगे की स्थिति सम्पादन में प्रबल बाधक होती हैं। अतः इन दोनों दिव्य और अदिव्य विषयों के साथ सम्बन्ध होने पर भी विषयों में दोषों = नश्वरता, परिणामता आदि और उनमें परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों को देखने वाला पुरुष, पूर्वोक्त विवेकज्ञान के अभ्यास के बल से, उन भोगों को न भोगने की अधिकारपूर्वक स्थिति बनाता है। वह यह स्पष्ट रूप से जानता है कि इन उपलब्ध भोगों को भोगने से परिणामस्वरूप अन्त में विभिन्न प्रकार के दुःख भी प्राप्त होगें। ये विषय-भोग अनित्य हैं, नश्वर हैं, समय के साथ समाप्त हो जाएँगे, और फिर भोगों को भोगने से अन्ततः दुःख ही मिलना है। इन भोगों के भोगकाल में = वर्त्तमान काल में जो सुखानुभूति हो रही है वह भी उस काल के व्यतीत होने के बाद नहीं रहेगी। क्योंकि जहाँ भोग वहाँ रोग। अतः वर्त्तमान काल में भोग चाहे अविद्या के कारण काल्पनिक सुख को प्राप्त करा रहे हों, परन्तु परिणाम में तो दुःखरूप ही हैं। भोगों को भोगने में किसी प्रकार के आनन्द की प्राप्ति सम्भव ही नही है। अतः इस प्रकार से वर्त्तमान काल में प्राप्त अथवा भविष्यत् में प्राप्त होने वाले विषय-भोगों की नश्वरता, आनन्द-रहितता तथा दुःख उत्पादकता की वास्तविकता को जानकर योगमार्ग का पथिक उन भोगों में नहीं फँसता। और वह उन भोगों के लिए राग-द्वेष की भावना से रहित, अधिकारपूर्वक चित्त में यह भावना बनाता है कि ये विषय-भोग मेरे वश में हैं, मैं इनके वश में नहीं हूँ। विषयों के उपलब्ध होते हुए भी उनको, उपरोक्त कारणों से, प्राप्त न करने की अधिकार सहित वशीकार भावना = स्वाधीन अनुभूति ही वैराग्य कहलाती है। जो विषय-भोग प्राप्त हो ही नहीं सकते अथवा जिनको प्राप्त करने की योग्यता नहीं है, उनमें इस प्रकार की भोगभावना सामान्यतः उत्पन्न नहीं हो पाती; और प्राप्त होने वाले भोगों में भी, स्वयं के किसी दोष अथवा अयोग्यता के कारण त्याग की स्थिति को वैराग्य नहीं मानना चाहिए। क्योंकि उस दोष अथवा अयोग्यता के दूर होने पर, उन विषय-भोगों को प्राप्त करने की भावना पुनः प्रबल हो जायेगी और व्यक्ति उन भोगों को प्राप्त करने और भोगने में तत्पर हो जायेगा। अतः यहाँ यह समझना अति आवश्यक है कि “मेरी स्थिति क्या है ?” क्या वास्तव में भोगों के दोषों और दुःखों को जानकर उन्हें प्राप्त न करने की भावना है या किसी शरीरिक दोष अथवा अयोग्यता आदि के कारण ही इन भोगों को प्राप्त नहीं करना चाहता?

यह विषयों से सम्बन्धित वैराग्य, अपर वैराग्य के नाम से जाना जाता है जोकि सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि का हेतु बनता है।

इस सूत्र में वशीकारसंज्ञा से वशीकार नाम वाला वैराग्य वाचस्पतिमिश्र ने माना है जिसका अनुकरण करते हुए पौराणिक व्याख्याकारों ने वैसा ही व्याख्यान किया है। उनके अनुसार “वशीकारसंज्ञा” नामक वैराग्य तक पहुँचने के पूर्व चित्त की यतमान संज्ञा, व्यतिरेक संज्ञा और एकेन्द्रिय संज्ञा नामक वैराग्य की स्थितियों को कहकर उनका पृथक् व्याख्यान किया है। वस्तुतः यहाँ संज्ञा से नामकरण न होकर उसका अर्थ अनुभव = प्रतीति है। व्यासभाष्य तथा भोजवृत्तिकार इसी अर्थ को ही बतलाते हैं। यथा व्यासभाष्य में “विषयदोषदर्शिनः प्रसंख्यानबलादनाभोगात्मिका हेयोपादेयशून्यावशीकारसंज्ञा वैराग्यम्” अर्थात् विषयों में दोषों, दुःखों आदि को देखने वाले मनुष्य की जो विवेकज्ञान के बल से न भोगने की हेय और उपादेय से रहित वशीकार भावना = स्वाधीन अनुभूति, वैराग्य है॥ इसी प्रकार भोजवृत्ति में तयोर्द्वयोरपि विषययोः परिणामविरसत्वदर्शनाद्विगतर्द्धस्य या वशीकारसंज्ञा ‘ममैते वश्या नाहमेतेषां वश्यः’ इति योऽयं विमर्शः, तद्वैराग्यमुच्यते॥ अर्थात् उन दोनों दृष्ट और आनुश्रविक विषयों में भी अनित्यता परिणाम और आनन्दरहितता, दुःखों को देखने से दूर हो गई है प्राप्त करने की इच्छा जिसकी, ऐसी वशीकारभावना अर्थात् मेरे ही वश में हैं ये सभी विषय, मैं इन विषयों के वश में नहीं हूँ; इस प्रकार का जो यह ज्ञान है, वही वैराग्य कहा जाता है॥ यहाँ पर भी संज्ञा शब्द अनुभव = प्रतीति का वाचक है। इसी प्रकार योगसूत्र २.२६ पर व्यासभाष्य में “वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्त्तमानस्य विवेकप्रत्ययप्रवाहो निर्मलो भवति”, तथा योगसूत्र ३.४९ पर व्यासभाष्य में “वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्त्तमानस्य सत्त्पुरुषान्यताख्याति-मात्ररूपप्रतिष्ठस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वम्” में भी वशीकारसंज्ञायाम् से वशीकार अनुभूति को ही कहा है। अतः वाचस्पतिमिश्रादि द्वारा ऐसा व्याख्यान व्यासभाष्य की भावना के अनुकूल नहीं है।