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वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्सम्प्रज्ञातः॥१७॥

In Hindi:

पदपाठ : वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञातः॥१७॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथोपायद्वयेन निरुद्धचित्तवृत्तेः कथमुच्यते सम्प्रज्ञातः समाधिरिति ? —

भूमिका हिंदी अर्थ : (अथ) अब (उपायद्वयेन) अभ्यास और वैराग्य रूप दोनों उपायों के द्वारा (निरुद्धचित्तवृत्तेः) निरुद्ध हुई चित्त वृत्ति वाले पुरुष की (सम्प्रज्ञातः समाधिः) सम्प्रज्ञात समाधि (कथम्) किस प्रकार की (उच्यते) कही जाती है? (इति) यह बतलाया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात्) वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता रूप स्थितियों के धर्मानुभव = साक्षात्कार से (सम्प्रज्ञातः) सम्प्रज्ञात समाधि होती है।

प्राचीन ॠषि भाष्य : वितर्कश्चित्तस्यालम्बने स्थूल आभोगः। सूक्ष्मो विचारः। आनन्दो ह्लादः। एकात्मिका संविदस्मिता। तत्र प्रथमश्चतुष्टयानुगतः समाधिः सवितर्कः। द्वितीयो वितर्कविकलः सविचारः। तृतीयो विचारविकलः सानन्दः। चतुर्थस्तद्विकलोऽस्मितामात्र इति। सर्व एते सालम्बनाः समाधयः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (चित्तस्य) चित्त के (आलम्बने) आलम्बन में = ध्येय विषय में (स्थूल आभोगः) स्थूल वस्तु = पदार्थो का आश्रय (वितर्कः) वितर्क है। चित्त के आलम्बन में (सूक्ष्मः) सूक्ष्म वस्तु = प्रकृति के सूक्ष्म विकारों तथा मूल प्रकृति का आश्रय ही (विचारः) विचार है। चित्त के आलम्बन में (ह्लादः) निर्विचार समाधि के वैशारद्य से अध्यात्मप्रसाद = बुद्धिविकास के कारण उत्पन्न हुए सुख विशेष का आश्रय ही (आनन्दः) आनन्द है। तथा चित्त के आलम्बन में (एकात्मिका संवित्) एक स्वयं की ही = आत्मा की प्रतीति ही (अस्मिता) अस्मिता है।

(तत्र) उनमें (प्रथमः) पहली (सवितर्कः समाधिः) वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि (चतुष्टयानुगतः) वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता चारों से युक्त रहती है। (परन्तु इसमें प्रधानता से स्थूल वस्तु = पदार्थों का सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार होता है।) (द्वितीयः) दूसरी (वितर्कविकलः) वितर्क से रहित अर्थात् विचार, आनन्द और अस्मिता से युक्त रहने वाली (सविचारः) विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है (परन्तु इसमें प्रधानता से सूक्ष्म विषयों = पदार्थों का सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार होता है।) (तृतीयः) तीसरी (विचारविकलः) विचार से रहित अर्थात् आनन्द और अस्मिता से युक्त रहने वाली (सानन्दः) आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि है। (परन्तु इसमें प्रधानता से सुख = ह्लाद का सम्प्रज्ञान = अनुभूति होती है।) (चतुर्थः) चतुर्थ समाधि (तद्विकलः) आनन्द से भी रहित (अस्मितामात्र इति) अस्मितामात्र ही है। इसमें आत्मतत्त्व का सम्प्रज्ञान = साक्षात्कार होता है। (एते) ये (सर्व समाधयः) सभी समाधियाँ (सालम्बनाः) चित्त के आलम्बन से होने से आलम्बन सहित = सालम्बन होती हैं॥

वैदिक वृत्ति : चित्त की जन्म-जन्मान्तर की बहिर्मुखी = विषयान्मुखी वृत्तियों में से, अभ्यास और वैराग्य द्वारा, रजोगुण और तमोगुण का सर्वथा निरोध होने पर, सत्त्वगुण बहुल चित्त में सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। यह चित्त की एकाग्रावस्था कहलाती है। समाधि क्या है ? महर्षि व्यास कहते हैं — चित्त में सर्वार्थता का क्षय और एकाग्रता का उदय समाधि है। इसी को भोजवृत्ति में इस प्रकार से कहा है — समाधिः भावनाविशेषः॥ समाधि भावना = विचार विशेष को कहते हैं। अर्थात् ध्येय पदार्थ के विचार = चिन्तन में दूसरे विषयों को हटाकर = दूर करके चित्त को उसी एक विषय पर एकाग्र रखना = उसके विचार को ही लगातार करना भावना रूप समाधि है। सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बन किये हुए विषय में किसी भी प्रकार के संशय और मिथ्याज्ञान से रहित रूप से, ध्येय पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को प्रकृष्टता के साथ जाना जाता है। महर्षि व्यास ने भी सूत्र १.१ के भाष्य में स्पष्ट करते हुए कहा है कि सम्प्रज्ञात समाधि पदार्थ के यथार्थ रूप को प्रकाशित करती है। चित्त की एकाग्रावस्था में, अर्थात् राजस और तामस वृत्तिरहित अवस्था में, होने वाली सम्प्रज्ञात समाधि के स्वरूप का वर्णन तो महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.४१ में किया है। इस सूत्र में सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदों का व्याख्यान किया गया है।

योग का फल कैवल्य है, और कैवल्य परमात्म-साक्षात्कार के बिना सम्भव नहीं है। परन्तु परमात्मा का साक्षात्कार पुरुष = जीवात्मा को सीधा ही नहीं होता। परमात्मा ब्रह्माण्ड के सभी पदार्थों से परम सूक्ष्म होने से अपनी सर्वव्यापकता से सभी में व्यापक है। दूसरे सभी पदार्थ परमात्मा की अपेक्षा स्थूल हैं। अतः परमात्म-साक्षात्कार हेतु स्थूल पदार्थों के सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार से आरम्भ करना होता है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदों = वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत में योगी पुरुष चित्त के माध्यम से दृश्यमान् स्थूल पदार्थों से आरम्भ करता हुआ स्वयं का सम्प्रज्ञान प्राप्त करता है।

पदार्थों की स्थूलता और सूक्ष्मता को स्पष्ट करते हुए महर्षि कपिल ने पदार्थों को जड़ और चेतन भेद से दो प्रकार का कहा है और जड़ पदार्थों के २४ चौबीस भेद बताये हैं —

सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽहङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गणः॥ सांख्य १.६१॥

अर्थात् सत्त्व, रज, तम = प्रकाश, गति और स्थिति की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। प्रकृति से महत्तत्त्व प्रकट होता है; महत्तत्त्व से अंहकार नामक दूसरा विकार प्रकट होता है; अंहकार से पंचतन्मात्रायें, मन तथा ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं; तन्मात्रों = सूक्ष्मभूतों से पृथिवी आदि पञ्च स्थूल महाभूत उत्पन्न होते हैं। पुरुष = चेतन सत्ता उनसे भिन्न है। इस प्रकार ये २५ पच्चीस तत्त्व हैं।

इनमें प्रकृति और उसके विकार, पुरुष की अपेक्षा स्थूल होने से पहले इन्हीं का साक्षात्कार = सम्यक् ज्ञान = सम्प्रज्ञान आवश्यक है।

सम्प्रज्ञात की पहली अवस्था वितर्क में स्थूल पदार्थों को चित्त में आलम्बन = ध्येय विषय बनाया जाता है। विभिन्न भाष्यकारों ने यहाँ स्थूल पदार्थों से पञ्च महाभूत = पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा इनसे बने हुए विभिन्न पदार्थों का ही ग्रहण किया है। देखो, जिस प्रकार से पञ्च महाभूतों के आगे विकार न होने से इन्हें स्थूल माना गया है, उसी प्रकार इन्द्रियों के भी आगे विकार न होने से, पञ्च महाभूतों की अपेक्षा से सूक्ष्म होती हुई, वे भी स्थूल ही कहलाती हैं। महर्षि व्यास ने अपने भाष्य में वितर्क से “स्थूल” का ग्रहण किया है। अतः भोज ने इसी आधार पर स्थूल से पञ्चमहाभूतों के साथ इन्द्रियों को भी वितर्कानुगत समाधि का ध्येय विषय माना है। महर्षि व्यास ने भी इन सभी सोलह तत्त्वों को योगसूत्र २.१९ की व्याख्या में “विशेष” मानते हुए एक ही श्रेणी में रखा है; तथा योगसूत्र १.४५ की व्याख्या में भी महर्षि व्यास ने इन्द्रियों को सूक्ष्म विषय के अन्तर्गत नहीं गिना है। अतः हमने वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में ध्येय विषय हेतु इन्द्रियों को भी पञ्च महाभूतों के साथ ही स्वीकार किया है। जब इन विषयों का आश्रय करके इनकी पूर्व दशा = उत्पत्ति दशा तथा अपर दशा = विनाश दशा के विचार को तथा उनके लिए प्रयुक्त शब्द, अर्थ और ज्ञान आदि विषय, उनके गुण, धर्म, दशा आदि सभी का विचार = ध्यान किया जाता है तब इसे वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। इस समाधि के द्वारा आलम्बन किये गए स्थूल पदार्थों का सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार होता है। इस वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के सवितर्क और निर्वितर्क नाम से दो भेद होते हैं।

पुरुष जब स्थूल पदार्थों का साक्षात्कार = सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तब वह सूक्ष्म पदार्थों = प्रकृति के सूक्ष्म विकारों के सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार करने हेतु प्रकृति के सूक्ष्म विकारों = गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द रूपी सूक्ष्म तन्मात्राओं, अंहकार, महत्तत्त्व तथा अव्यक्त = कारण प्रकृति का चित्त में आलम्बन = आश्रय करके, उनके देश, काल और धर्म = गुणों के सहित, विचार विशेष = ध्यान करता हुआ इनका सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार करता है। इस अवस्था को विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। यह विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि भी सविचार और निर्विचार भेद से दो प्रकार की होती है।

इस अवस्था तक पुरुष = जीवात्मा को प्रकृति के स्थूल से लेकर सूक्ष्म विकारों में महत्तत्त्व पर्यन्त तथा अलिङ्ग प्रकृति = कारण प्रकृति का सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार हो जाता है। निर्विचार समाधि की परिपक्वास्था में योगी को अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है। इस अवस्था में उसका “अशुद्धि आवरणरूप मल से रहित प्रकाश स्वरूप बुद्धिसत्त्व = अन्तःकरण का रजोगुण और तमोगुण के अबाधित स्वच्छ स्थितिप्रवाह वैशारद्य कहलाता है। ऐसे में योगी को अध्यात्मप्रसाद = बुद्धि प्रकाश प्रकट होता है, और ऐसे बुद्धि विकास को प्राप्त होकर, वह शोकहीन हुआ, शोक करते हुए प्राणियों को ऐसे देखता है जैसे पर्वत पर रहने वाला व्यक्ति भूमि पर रहने वालों को देखता है।” इस प्रकार अध्यात्मप्रसाद से शोकरहित अवस्था की प्राप्ति से योगी को विशेष प्रकार की सुखानुभूति होती है; और इसी सुख को आश्रय = आलम्बन करके सम्प्रज्ञात समाधि की तीसरी अवस्था आनन्दानुगत को प्राप्त करता है। इस अध्यात्म प्रसाद की अवस्था में वह बाह्य वस्तुओं अर्थात् कारण प्रकृति और उसके विकारों को अपने से पृथक् देखता हुआ और जानता हुआ ऐसा अनुभव करता है कि इस अखिल जड़ जगत् का उपादान कारण मूल प्रकृति है और प्रकृति से बना यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जड़ होने से परार्थ अर्थात् पुरुष = जीवात्मा के भोग और अपवर्ग के लिए है। इस स्वरूप भेद बोध से, पुरुष को अपने लक्ष्य की ओर जाने में सफलता होने से सुख की अनुभूति रहती है। इसी सुख = ह्लाद को चित्त में आश्रय = आलम्बन करके हुई समाधि को आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

तदुपरान्त इस सुख विशेष को भी अपना लक्ष्य न मानता हुआ जब पुरुष सभी जड़ पदार्थों = मूल प्रकृति और उसके विकारों से स्वयं को पृथक् जानता हुआ अपने स्वरूप का चित्त में आलम्बन = आश्रय करके विचार-विशेष = ध्यान करता है तब अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस आलम्बन में बुद्धि का भी स्वरूप न्यून रह जाता है; और चितिशक्ति = पुरुष की प्रधानता होने से, एक उसकी सत्तामात्र रह जाती है। उस समय बुद्धि, जो अन्य विषयों से तदाकारकारित होकर उनका भी ज्ञान कराती है, वह भी पुरुष के समान पवित्र होकर रहती है तथा प्रधानता से पुरुष का ही बोध कराती है।

इस प्रकार यह सम्प्रज्ञात समाधि चार प्रकार की है। इसमें वितर्कानुगत में स्थूल, सूक्ष्म, ह्लाद और पुरुष चारों का आलम्बन रहता है, परन्तु स्थूल पदार्थों का ही प्रधानता से सम्प्रज्ञान होता है; विचारानुगत में सूक्ष्म पदार्थों, ह्लाद तथा पुरुष का आलम्बन रहता है, परन्तु सूक्ष्म पदार्थों का ही प्रधानता से सम्प्रज्ञान होता है; आनन्दानुगत में ह्लाद और पुरुष का आलम्बन रहता है, परन्तु ह्लाद का ही प्रधानता से सम्प्रज्ञान होता है; और अस्मितानुगत में पुरुष का ही आलम्बन रहता है और उसी का ही सम्प्रज्ञान होता है। ये सभी समाधियाँ चित्त के आलम्बन से होने से सालम्बन समाधियाँ कहलाती है। आगे योगसूत्र १.४६ में महर्षि पतञ्जलि ने वितर्कानुगत और विचारानुगत के दो-दो भेदों को, बाह्यवस्तु विषयक होने से, सबीज समाधियाँ कहा है। सम्प्रज्ञात समाधि के शेष दो भेद = आनन्दानुगत और अस्मितानुगत बाह्यवस्तु विषयक न होने से सबीज समाधियाँ तो नहीं होती परन्तु चित्त के आलम्बन से होने से ये भी सालम्बन समाधियाँ ही कहलाती हैं। वस्तुतः यहाँ आलम्बन शब्द आधार और ध्येय विषय दोनों अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। इस पर विशेष विवरण अगले सूत्र की व्याख्या में देखें।

शंका — जैसे आपने वितर्क और विचार भेद में प्रकृति के सभी विकारों का समावेश मानकर व्याख्यान किया है, वैसे अन्य भाष्यकारों ने नहीं माना। इस पक्ष में क्या प्रमाण है ?

समाधान — इस सूत्र पर महर्षि व्यास का ही भाष्य सर्वथा प्रामाणिक है। महर्षि व्यास ने वितर्क में चित्त का आलम्बन = ध्येय विषय स्थूल आभोग कहा है; विचार में सूक्ष्म; आनन्द में ह्लाद; और अस्मिता में एकात्मिका को कहा है। विभिन्न भाष्यकारों का इनपर वर्गीकरण इस प्रकार से है —

............................................................................................................................समाधि — वितर्क विचार आनन्द अस्मिता

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भाष्यकार उनकी मान्यताएँ —

१.व्यास स्थूल सूक्ष्म ह्लाद एकात्मिका

२.भोज स्थूल भूत, इन्द्रिय तन्मात्राएँ, अन्तःकरण बुद्धि रजस्तमोलेशानभि-

भूतिशुद्ध सत्त्व

३. वाचस्पति- पाँचभौतिक भूत सूक्ष्मतन्मात्रा, लिंग, इन्द्रिय बुद्धि सह पुरुष

मिश्र चतुर्भुजादि स्वरूप अलिंग

४. विज्ञानभिक्षु स्थूल भूत, सूक्ष्मतन्मात्रा इन्द्रिय एकात्मिका

चतुर्भजादि, विराट्शरीर पुरुष

५. ब्रह्मलीन मुनि, —उपरोक्त— पंचतन्मात्राएँ एकादश इन्द्रिय अंहकार, बुद्वि,

रमाशंकर त्रिपाठी प्रकृति, पुरुष

६. भास्वतीटीका स्थूल पदार्थ सूक्ष्मतत्त्व चित्त, ज्ञानेन्दिय, अस्मितामात्र

(हरिहरानन्द आरण्य) विषय कर्मेन्द्रिय, प्राण

७. स्वामी विज्ञानाश्रम स्थूल भूत सूक्ष्मभूत ध्यानावस्था का जीवात्मा

आनन्द

८. सुरेशचन्द्र स्थूलकाराकारित्व सूक्ष्मकाराकारित्व एकादशइन्द्रिय बुद्धिस्थ पुरुष

श्रीवास्तव प्रतिबिम्ब

९. ब्रह्ममुनि तथा स्थूलभूत सूक्ष्मभूत कारणप्रकृति पुरुष

राजवीरशास्त्री

१०. स्वामी सत्यपति स्थूलभूत तन्मात्राएँ इन्द्रियाँ पुरुष

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व्यासभाष्य के आधार पर हमारे द्वारा किये गये वर्गीकरण को निम्न प्रकार से समझना चाहिए—

महर्षि कपिल ने प्रकृति और उसके विकारों का सांख्यसूत्र १.६१ में व्याख्यान किया है, जो निम्न प्रकार है — प्रकृति से महत्तत्त्व; महत्तत्त्व से अंहकार; अंहकार से पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, मन तथा पाँच सूक्ष्म भूत = तन्मात्राएँ प्रकट होती है; और अन्त में पाँच तन्मात्राओं से पाँच स्थूल भूत उत्पन्न होते हैं। इस क्रम में तन्मात्राओं से स्थूल भूत = पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश उत्पन्न होते हैं और इनका आगे कोई विकार न होने से इन्हें स्थूल कहा है। इसी प्रकार एकादश इन्द्रियों अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन का भी आगे कोई विकार न होने से ये भी स्थूलता के अन्तिम स्तर पर हैं। परन्तु एकादश इन्द्रिय स्थूल होते हुए भी पाँच स्थूल महाभूतों की अपेक्षा से सूक्ष्म ही हैं। इन सबको वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि हेतु स्थूल विषय = आलम्बन स्वीकार करने में निम्न प्रमाण / हेतु हैं —

१. महर्षि व्यास ने महर्षि कपिल द्वारा प्रतिपादित सृष्टि रचना की प्रक्रिया को मानते हुए, योगसूत्र २.१९ की व्याख्या में उपर्युक्त सभी १६ पदार्थों को प्रकृति के अन्तिम विकार होने के कारण विशेष की श्रेणी में रखा है। वहाँ स्पष्ट रूप से कहा है “न विशेषेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्तीति विशेषाणां नास्ति तत्त्वान्तरपरिणामः” अर्थात् इन विशेष नामक १६ पदार्थों से आगे अन्य कोई परिणाम नहीं है। अर्थात् ये अन्तिम कार्य पदार्थ हैं अतः प्रकृति के विकारों में स्थूलतम हैं।

२. महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४५ की व्याख्या में एकादश इन्दियों को सूक्ष्म विषयों के अन्तर्गत नहीं कहा है। योगसूत्र १.४४ में सविचारा और निर्विचारा के आलम्बन = ध्येय विषय सूक्ष्म विषय कहे हैं; और योगसूत्र १.४५ में तन्मात्राओं से लेकर मूल प्रकृति को ही सूक्ष्म विषयों में कहा है। अतः मूल प्रकृति के साक्षात्कार से पूर्व ही उसके सभी विकारों का साक्षात्कार न मानना भी दुराग्रह ही कहा जायेगा, यथा भाष्यकारों द्वारा आनन्दानुगत में इन्द्रियों का आलम्बन मानना।

३. शास्त्रकारों ने इन्द्रियों को तन्मात्राओं की अपेक्षा से स्थूल ही माना है, जैसे कि —

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः॥ कठो॰ ३.१०॥

अर्थात् नेत्रादि इन्द्रियों से इन्द्रियों के शब्द-स्पर्श-रूप आदि विषय निश्चय करके सूक्ष्म हैं, और इन शब्दादि विषयों से मन सूक्ष्म है और संकल्प-विकल्पात्मक मन से निश्चयात्मक वृत्ति बुद्धि सूक्ष्म है और इस निश्चयात्मक वृत्ति से व्यापक महान् = महत्तत्त्व अति सूक्ष्म है। यहाँ इन्द्रियों को स्पष्ट रूप से तन्मात्राओं की अपेक्षा से स्थूल कहा है। इसी प्रकार सांख्यदर्शन के सूत्र १.६१ में भी “.... अहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि ......” इन्द्रियों को पाँच तन्मात्राओं के पश्चात् ही गिना है, अर्थात् इनकी उत्पत्ति तन्मात्राओं के उपरान्त ही माननी चाहिए। अतः तन्मात्राओं की अपेक्षा से इन्द्रियाँ स्थूल ही सिद्ध होती है।

४. योग के समशास्त्र सांख्यदर्शन में भी महर्षि कपिल ने भी इन सभी १६ विकारों को एक ही श्रेणी का माना है अर्थात् अन्तिम कार्य पदार्थ।

५. स्थूलता के दृष्टि कोण से पाँचों महाभूतों में भी स्थूलता के स्तर में अन्तर है। सामान्य जनों के लिए, चक्षु प्रत्यक्ष के दृष्टिकोण से, तो वायु और आकाश भी प्रत्यक्ष नहीं होते, केवल मात्र पृथिवी, जल और अग्नि और इनके सम्मिश्रण से बने पदार्थों का ही चक्षु से प्रत्यक्ष होता है।

परन्तु योगी का तो विशेष प्रत्यक्ष होता है जो श्रुत ज्ञान और अनुमान ज्ञान से विशेष होता है और यही प्रत्यक्ष “परप्रत्यक्ष” कहलाता है, जैसा कि योगसूत्र १.४३ की भूमिका में महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से कहा है। इसी “परप्रत्यक्ष” के आधार पर ही आगम = शास्त्रों की रचना और अनुमान ज्ञान आधारित होता है। अतः व्यासभाष्य की भावना के अनुकूल स्थूल पदार्थों में उपरोक्त १६ पदार्थों का समावेश, उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर, उचित है। अतः इनको स्थूल मान कर आरम्भिक अवस्था में ही इनका साक्षात्कार होने से, योगी के लिए आगे सूक्ष्म विषयों = पदार्थों का साक्षात्कार होने में आधार बनता है।

६. दूसरे भाष्यकारों ने तन्मात्राओं को विचारानुगत का आलम्बन, और इन्द्रियों को आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का आलम्बन माना है। ऐसे में प्रकृति के शेष विकारों, यथा अंहकार और महत्तत्त्व तथा मूल प्रकृति, का साक्षात्कार सम्प्रज्ञात समाधि की किस अवस्था में माना जाए? इस अवस्था में यह भी विचारणीय है कि महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने निर्विचार समाधि की सिद्धि पर योगसूत्र १.४७ में अध्यात्मप्रसाद की प्राप्ति तथा योगसूत्र १.४८ में ऋतम्भरा-प्रज्ञा की प्राप्ति मानी है। ऐसे में वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में स्थूलभूतों और विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में तन्मात्राओं के साक्षात्कार मात्र से ही इन स्थितियों की प्राप्ति मानना ग्रन्थकार और भाष्यकार दोनों की मान्यता से विपरीत है।

उपर्युक्त कारणों के आधार पर स्थूलता के समान स्तर पर न होते हुए भी ये सभी १६ पदार्थ, आगे किसी भी अन्य विकार का कारण न होने से, स्थूल ही हैं। अतः इस आधार पर इन्हें स्थूल मानते हुए इनके आलम्बन से हुई समाधि को वितर्कानुगत कहा है।

महर्षि व्यास ने विचारानुगत के लिए “सूक्ष्मो विचारः” कहा है। यहाँ महर्षि व्यास की मान्यता के अनुकूल ही सूक्ष्म से पाँच तन्मात्राएँ, अंहकार, महत्तत्त्व तथा मूल प्रकृति को माना गया है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.४४ में सविचार और निर्विचार समाधि का आलम्बन सूक्ष्मविषय कहा है, और योगसूत्र १.४६ में स्पष्ट रूप से सूक्ष्मविषयता को अलिङ्ग प्रकृति तक माना है। इस सूत्र पर भाष्य करते हुए महर्षि व्यास ने सूक्ष्म विषयों को इस प्रकार से स्पष्ट किया है — “पार्थिवस्याणोर्गन्धतन्मात्रं सूक्ष्मो विषयः। आप्यस्य रसतन्मात्रम्। तैजसस्य रूपतनमात्रम्। वायवीयस्य स्पर्शतन्मात्रम्। आकाशस्य शब्दतन्मात्रमिति। तेषामहंकारः। अस्यापि लिङ्गमात्रं सूक्ष्मोऽविषयः। लिङ्गमात्रस्याप्यलिङ्गं सूक्ष्मविषयः। (व्यासभाष्य १.४५)”॥ अर्थात् पृथिवी की गन्ध तन्मात्रा सूक्ष्म विषय है; जल की रस तन्मात्रा; अग्नि की रूप तन्मात्रा; वायु की स्पर्श तन्मात्रा; आकाश की शब्द तन्मात्रा; इन पाँचों तन्मात्राओं का अंहकार; अंहकार का लिङ्ग = महत्तत्त्व सूक्ष्म विषय है; और महत्तत्त्व का अलिङ्ग प्रकृति सूक्ष्म विषय है। यह व्याख्या सांख्यदर्शन के प्रवक्ता महर्षि कपिल के अनुसार ही है। फिर आगे इन बाह्य वस्तुओं का आलम्बन सवितर्क से निर्विचार समाधि तक ही कहा है। “ताश्चतस्रः समापत्तयो बहिर्वस्तुबीजा इति समाधिरपि सबीजः। तत्र स्थूलेऽर्थे सवितर्को निर्वितर्कः, सूक्ष्मेऽर्थे सविचारो निर्विचार इति चतुर्धोपसंख्यातः समाधिरिति” (व्यासभाष्य १.४६)॥ और इसी आधार पर इन चारों को सबीज समाधियाँ माना है। अतः महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास की मान्यता के अनुसार ही यहाँ “सूक्ष्म” से प्रकृति के इन सभी विकारों तथा मूल प्रकृति का ग्रहण किया गया है, और इनके आश्रय से होने वाली समाधि को विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहा गया है।

महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४६ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से स्थूल पदार्थों / विषयों के आलम्बन से वितर्कानुगत और सूक्ष्म पदार्थों / विषयों के आलम्बन से विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि को स्वीकार किया है। अतः इस अवस्था में इन्द्रियों/बुद्धि/कारणप्रकृति आदि को आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बन स्वीकार करने वाले भाष्यकार महर्षि व्यास की मान्यता से विरुद्ध हैं, क्योंकि इन सभी आलम्बनों का ग्रहण स्थूल और सूक्ष्म आलम्बनों में हो जाता हैं।

महर्षि व्यास ने आनन्दानुगत के लिए “आनन्दो ह्लादः” कहा है। यहाँ आनन्दानुगत समाधि का विषय ह्लाद है नाकि कोई वस्तु विशेष। पञ्च स्थूलभूतों से मूल प्रकृति तक का साक्षात्कार सवितर्क से निर्विचार समाधि पर्यन्त होने से योगी को “निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः” योग० १.४७ के अनुसार अध्यात्मप्रसाद की प्राप्ति होती है, जिससे उसके चित्त में एक प्रकार की सुख की अनुभूति उत्पन्न होती है। इसी सुख = ह्लाद को आश्रय करके होने वाली समाधि ही आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है। इसी प्रकार के भाव को विज्ञानभिक्षु ने अपनी योगवार्त्तिक वृत्ति में कहा है॥ वस्तुतः ऐसा कहने के बाद भी विज्ञानुभिक्षु ने इस समाधि का आलम्बन “इन्द्रियाँ” कह दिया है, जोकि व्यासभाष्य की भावना के प्रतिकूल है।

प्रकृति के सभी विकारों तथा मूल प्रकृति का भी साक्षात्कार निर्विचार समाधि तक हो जाने के बाद चेतनतत्त्व “पुरुष” ही शेष है, जिसका आलम्बन होना है। इस अन्तिम अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में पुरुष = जीवात्मा ही आश्रय = आलम्बन रहता है, जिसे “एकात्मिका संविदस्मिता” कहा गया है। परन्तु पुरुष का यह साक्षात्कार भी सत्त्वप्रधान बुद्धि के आश्रय से ही होता है।

इस प्रकार से यह वर्गीकरण महर्षि व्यास के भाष्य के अनुरूप तथा योगदर्शन की अन्तःसाक्षी के अनुसार है।

यहाँ पर यह प्रश्न उठता है कि अगर वर्त्तमान में उपलब्ध योगदर्शन पर भाष्यों में वितर्कादि द्वारा दिखाए गए आलम्बनों का व्याख्यान महर्षि पतञ्जलि और व्यास के अनुकूल नहीं है, तो इस प्रकार के व्याख्यान का आरम्भ कहाँ से हुआ? इस विषय में हम केवल इतना ही कह सकते हैं कि सम्भवतः इस प्रकार के व्याख्यान का आरम्भ भोज के काल से अथवा उससे कुछ पूर्व में ही हुआ, और भोजवृत्ति में भी इस प्रकार का कुछ-कुछ मिश्रण मिलता है। उसके बाद के भाष्यकारों, वाचस्पतिमिश्र तथा विज्ञानभिक्षु आदि ने इस प्रकार के व्याख्यान के आधार पर, कुछ न कुछ परिवर्तन कर, अपने भाष्य लिखे। वर्त्तमान के भाष्यकारों ने भी उन्हीं का अंशतः या सर्वांशतः अनुकरण करते हुए वैसा ही व्याख्यान किया है। स्वामी विज्ञानाश्रम जी ने भी आनन्दानुगत का आलम्बन “ध्यानावस्था का आनन्द” कहा है, परन्तु वितर्क और विचार के लिए स्थूल और सूक्ष्म भूत मात्र ही कहे हैं, जो कि स्थूल और सूक्ष्म विषयों के पूर्ण रूपेण साक्षात्कार हेतु पर्याप्त नहीं हैं। विज्ञानभिक्षु ने महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास के आशय को आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में दर्शाने का प्रयास तो किया है, परन्तु अपने से पूर्व प्रचलित व्याख्यानों का प्रभाव ही उन पर सम्भवतः अधिक रहा होगा, अतः उन्होंने उन्हीं मान्यताओं को आधार मानते हुए वैसा ही व्याख्यान कर दिया। परन्तु सत्य को जानने और समझने हेतु महर्षि व्यास का भाष्य ही एकमात्र प्रामाणिक तथा ग्राह्य है।

शंका — वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में बहुधा पौराणिक भाष्यकारों ने स्थूल आलम्बन में पंचमहाभूतों के साथ चतुर्भुजादि ईश्वर स्वरूप को भी माना है। जबकि यहाँ इसका कोई संकेत भी नहीं दिया।

समाधान — महर्षि व्यास ने ईश्वर के चतुर्भुजादि स्वरूप को कही नहीं माना है। भोजवृत्ति में भी वितर्क के अन्तर्गत इसका समावेश नहीं किया गया। स्थूल भूतों के साथ इसका वर्णन वाचस्पति मिश्र तथा विज्ञानभिक्षु के काल में ही आरम्भ हुआ जिसका अनुकरण करते हुए पौराणिक भाष्यकारों ने स्थूल भूतों के साथ इसको भी अपने व्याख्यान में सम्मिलित किया है। महर्षि पतञ्जलि, महर्षि व्यास, महर्षि कपिल के अनुसार तथा वेद एवं अन्य वेदानुकूल ग्रन्थों के आधार पर ईश्वर के निराकार होने से उसके चतुर्भुजादि स्वरूप को प्रमाणित ही नहीं किया जा सकता। अतः इस प्रकार का ज्ञान विपर्यय ज्ञान होने से सर्वथा हेय कोटि में ही आता है।