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तीव्रसंवेगानामासन्नः॥२१॥

In Hindi:

पदपाठ : तीव्रसंवेगानाम् आसन्नः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ते खलु नव योगिनो मृदुमध्याधिमात्रोपाया भवन्ति। तद्यथा मृदूपायो मध्योपायोऽधिमात्रोपाय इति। तत्र मृदूपायस्त्रिविधः मृदुसंवेगो मध्यसंवेगस्तीव्रसंवेग इति। तथा मध्योपायस्तथाऽधिमात्रोपाय इति। तत्राधिमात्रोपायानाम्—

भूमिका हिंदी अर्थ : (ते खलु) वे निश्चय से (मृदुमध्याधिमात्रोपायाः) मृदु, मध्य और अधिमात्र उपायों के भेद से (नव) नौ प्रकार के (योगिनो) योगी (भवन्ति) होते हैं। (तद्यथा) वे जैसे कि (मृदूपायः) मृदु-उपाय वाला; (मध्योपायः) मध्य-उपाय वाला; और (अधिमात्रोपायः इति) अधिमात्र-उपाय वाला। (तत्र) उन तीन प्रकार के योगियों में (मृदूपायः) मृदु-उपाय वाले योगी (त्रिविधः) तीन प्रकार के हैं — (मृदुसंवेग) मृदु-संवेग वाले; (मध्यसंवेगः) मध्य-संवेग वाले; और (तीव्रसंवेग इति) तीव्र-संवेग वाले होते हैं। (तथा) वैसे ही (मध्योपायः) मध्य-उपाय वाले योगियों और (तथा) वैसे ही (अधिमात्रोपायः इति) अधिमात्र-उपाय वाले योगियों के भी तीन-तीन प्रकार होते हैं। (तत्र) उनमें से (अधिमात्रोपायानाम्) अधिमात्र उपाय वाले योगियों में से —

हिंदी में अर्थ : (तीव्रसंवेगानाम्) तीव्र-संवेग वाले योगियों को समाधि की सिद्धि (आसन्नः) शीघ्र ही होती है।

प्राचीन ॠषि भाष्य : समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : अधिमात्र उपाय और तीव्र संवेग वाले योगियों को (समाधिलाभः) समाधि का लाभ = सिद्धि (च) और (समाधिफलम्) समाधि का फल = कैवल्य = मोक्ष (आसन्नः = शीघ्र ही प्राप्त) (भवति इति) होता है॥

वैदिक वृत्ति : असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति और उसका फल कैवल्य सभी योगियों को एक ही समान काल में नहीं मिलता। योग के उपायों का अभ्यास करने वाले सभी योगी एक समान स्तर को प्राप्त नहीं कर पाते, ऐसा क्यो? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा है कि योगियों के द्वारा अपनाए गए उपायों और परवैराग्य के स्तर भेद के कारण ऐसा होता है। महर्षि व्यास कहते हैं कि मृदु, मध्य और अधिमात्र उपायों और संवेग के भेद से असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में सलंग्न योगी नौ प्रकार के होते हैं। पहले वर्गीकरण के अनुसार मृदु उपाय वाले योगी, मध्य उपाय वाले योगी और अधिमात्र उपाय वाले योगी होते हैं। यहाँ उपाय से अभिप्राय श्रद्धा आदि पूर्वक अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान = अभ्यास करना है। मृदु, मध्य और अधिमात्र को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. मृदूपाय — जो उपरोक्त उपायों को मन्द = शिथिल = अल्प रूप से अपनाते हैं वे मृदूपाय वाले योगी कहलाते हैं।

२. मध्योपाय — जो उपरोक्त उपायों को मध्य रूप से अर्थात् न तीव्र और न मन्द रूप से अपनाते हैं वे मध्योपाय वाले योगी कहलाते हैं।

३. अधिमात्रोपाय — जो उपरोक्त उपायों को तीव्रता पूर्वक अपनाते हैं वे अधिमात्रोपाय वाले योगी कहलाते हैं।

इन तीन श्रेणी के योगियों के आगे संवेग के स्तर भेद से तीन-तीन भेद किए हैं। यहाँ संवेग से अभिप्राय “परवैराग्य” है। मृदु, मध्य और तीव्र संवेग को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. मृदुसंवेग — जिस योगी का परवैराग्य का स्तर मन्द = अल्प है; वह मृदुसंवेग वाला होता है।

२. मध्यसंवेग — जिस योगी का परवैराग्य का स्तर न मन्द और न तीव्र है; वह मध्यसंवेग वाला होता है।

३. तीव्रसंवेग — जिस योगी का परवैराग्य का स्तर अत्यधिक = तीव्र है; वह तीव्रसंवेग वाला होता है।

योगियों द्वारा अनुष्ठित श्रद्धा आदि पूर्वक अष्टाङ्गयोग के अभ्यास का मृदु, मध्य और अधिमात्र स्तर, उनके संस्कारों, पूर्वजन्म कृत साधना के स्तर, वर्तमान जन्म में ईश्वर और योग के प्रति अभिरुचि, वेदादि सत्यशास्त्रों के ज्ञान के आधार पर निर्भर करता है। इसी प्रकार परवैराग्य में मृदुता, मध्यता और तीव्रता भी उसके संस्कारों, वेदादि सत्यशास्त्रों के ज्ञान, पुरुषदर्शन का अभ्यास तथा ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और अभिरुचि के स्तर के आधार पर निर्भर करती है।

अतः ये नौ प्रकार के योगी निम्न प्रकार के हैं —

मृदुपायवाले — १. मृदूपाय-मृदुसंवेग; २. मृदूपाय-मध्यसंवेग; ३. मृदूपाय-तीव्रसंवेग;

मध्योपायवाले — ४. मध्योपाय-मृदुसंवेग; ५. मध्योपाय-मध्यसंवेग; ६. मध्योपाय-तीव्रसंवेग;

अधिमात्रोपायवाले — ७. अधिमात्रोपाय-मृदुसंवेग; ८. अधिमात्रोपाय-मध्यसंवेग; तथा

९. अधिमात्रोपाय-तीव्रसंवेग।

इन नौ प्रकार के योगियों में से अधिमात्रोपाय-तीव्रसंवेग वाले योगी को असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि तथा समाधि का फल कैवल्य शीघ्रता से प्राप्त होता है। जितना-जितना उपायों का स्तर और परवैराग्य का स्तर कम होता जाता है, उतना-उतना योगी के लिए समाधि की सिद्धि और कैवल्य प्राप्ति का काल बढ़ता जाता है। इस प्रकार हर पिछले स्तर का योगी अपने अगले वाले स्तर के योगी की अपेक्षा अधिक काल असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और कैवल्य प्राप्ति हेतु लगाता है। प्रथम स्तर के योगी अर्थात् मृदूपाय-मृदुसंवेग वाले योगी को सबसे अधिक काल लगता है। इसको इस प्रकार से भी जान सकते हैं कि हर अगले स्तर वाले योगी को पहले स्तर वाले योगी की अपेक्षा कम काल लगाना होता है, और नवम् प्रकार के योगी को अन्यों की अपेक्षा से सबसे शीघ्र असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और कैवल्य की प्राप्ति होती है।

यह काल कितना है इसके बारे में शास्त्रों में कोई निश्चित समय नहीं दिया गया। वस्तुतः मोक्ष = कैवल्य की साधना कई जन्मों में जाकर पूरी होती है। ऐसे में जो पूर्व जन्मों में इस हेतु काल लगा चुका है, उस योगी को वर्त्तमान जन्म में अन्यों की अपेक्षा कम काल लगेगा। फिर यह साधना, योगाङ्गों के अनुष्ठान, सच्चे ईश्वर के प्रति आस्था, श्रद्धा, विश्वास और वेदादि सत्यशास्त्रों से प्राप्त ज्ञान के स्तर पर भी निर्भर करती है। अतः महर्षि कपिल ने सांख्यदर्शन में कहा है —

न कालनियमो वामदेववत्॥ सांख्य ४.२०॥

अर्थात् समाधि की सिद्धि में काल नियम नहीं है; किसी को शीघ्र, किसी को देर से, किसी को इसी जन्म में और किसी को अगले जन्म में समाधि लाभ और समाधि फल की प्राप्ति होती है, वामदेव के समान। ऋषि वामदेव को जैसे पूर्व जन्म में अनुष्ठान किए गए अष्टाङ्गयोग के साधनों और परवैराग्य के अनुष्ठान से इसी जन्म में सिद्धि प्राप्त हो गई थी।

अतः योगी को अधिमात्र उपायों और तीव्र परवैराग्य को अपनाने हेतु प्रयत्नशील रहना चाहिए, तभी शीघ्रातिशीघ्र असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति और समाधिफल मोक्ष की प्राप्ति सम्भव हो सकेगी।