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तस्य वाचकः प्रणवः॥२७॥

In Hindi:

पदपाठ : तस्य वाचकः प्रणवः॥

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस ईश्वर का (वाचकः) वाचक = बोधक शब्द = नाम (प्रणवः) प्रणव = ओम् है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “(तस्य वा॰) जो ईश्वर का ओंकार नाम है; सो पिता-पुत्र के सम्बन्ध के समान है और यह नाम ईश्वर को छोड़के दूसरे अर्थ का (अग्नि आदि की भाँति) वाची नहीं हो सकता। ईश्वर के जितने नाम हैं उनमें से ओंकार सबसे उत्तम नाम है”॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

“(ओ३म्) यह ओंकार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है। क्योंकि इसमें जो अ, उ, और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओ३म्) समुदाय बना है। इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत से नाम आते हैं। जैसे — अकार से विराट् अग्नि और विश्वादि। उकार से हिरण्यगर्भ, वायु, तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक है।” (स० प्र० प्रथम समु॰)

“सब वेदादि शास्त्रों में परमेश्वर का प्रधान और निज नाम (ओ३म्) को कहा है, अन्य सब गौणिक नाम हैं”॥ (स० प्र० प्रथम समु॰)

“ओङ्कार का वाच्य ईश्वर है। और, उसका वाचक ओङ्कार है। बाह्य विषय से इसको ही लेना, और कोई का नहीं।” (हुगली शास्त्रार्थ)

प्राचीन ॠषि भाष्य : वाच्य ईश्वरः प्रणवस्य। किमस्य संकेतकृतं वाच्यवाचकत्वमथ प्रदीपप्रकाशवदवस्थितमिति? स्थितोऽस्य वाच्यस्य वाचकेन सह सम्बन्धः। संकेतस्त्वीश्वरस्य स्थितमेवार्थमभिनयति। यथाऽवस्थितः पितापुत्रयोः सम्बन्धः संकेतेनावद्योत्यते, अयमस्य पिता, अयमस्य पुत्र इति। सर्गान्तरेष्वपि वाच्यवाचकशक्त्यपेक्षस्तथैव संकेतः क्रियते। सम्प्रतिपत्तिनित्यतया नित्यः शब्दार्थसम्बन्ध इत्यागमिनः प्रतिजानते॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (प्रणवस्य) प्रणव = ओम् का (वाच्यः) वाच्य (ईश्वरः) ईश्वर है। (प्रश्न) (किम्) क्या (अस्य) ईश्वर और प्रणव का (वाच्यवाचकत्वम्) वाच्य-वाचक सम्बन्ध (संकेतकृतम्) संकेतकृत अर्थात् कृत्रिम है (अथ) अथवा (प्रदीपप्रकाशवत्) प्रदीप और उसके प्रकाश के समान (अवस्थितम् इति) अवस्थित = स्थायी = नित्य है? (उत्तर) (अस्य वाच्यस्य) उस वाच्य रूप ईश्वर का (वाचकेन सह) वाचक रूप प्रणव के साथ (सम्बन्धः) सम्बन्ध (स्थितः) पहले से ही स्थित है अर्थात् यह सम्बन्ध स्थायी = शाश्वत् है। (ईश्वरस्य) ईश्वर का (संकेतः) संकेत (तु) तो (स्थितम् एव अर्थम्) पहले से ही स्थित सम्बन्ध को ही (अभिनयति) प्रकाशित करता है। (यथा) जिस प्रकार से (पितापुत्रयोः) पिता और पुत्र के (अवस्थितः) पहले से ही स्थित = नियत (सम्बन्धः) सम्बन्ध (संकेतेन) संकेत के द्वारा (अवद्योत्यते) दर्शाया जाता है = प्रकाशित किया जाता है कि (अयम्) यह (अस्य) इसका (पिता) पिता है, (अयम्) यह (अस्य) इसका (पुत्रः इति) पुत्र है।

(सर्गान्तरेषु) अन्य सर्गों = कल्पों में (अपि) भी (वाच्यवाचकशक्त्यपेक्षः) वाच्य-वाचक शक्ति की अपेक्षा से (तथैव) उसी प्रकार का (संकेतः) संकेत (क्रियते) किया जाता है। (सम्प्रतिपत्तिनित्यतया) सदृश व्यवहार की परम्परा के प्रवाह रूप से नित्य होने से (शब्दार्थसम्बन्धः) शब्द तथा अर्थ रूपी वाच्य-वाचक सम्बन्ध (नित्यः इति) नित्य है, यह (आगमिनः) वेद को मानने वाले आगम शास्त्रकार (प्रतिजानते) कहते हैं, मानते हैं॥

वैदिक वृत्ति : ईश्वर जो कि निरतिशय ज्ञानवान् होने से सर्वज्ञ और प्राणिमात्र का परमगुरु है उसके प्रति प्रणिधान का उपदेश महर्षि पतञ्जलि ने किया है। उस ईश्वर का वाचक प्रणव है। “प्रकर्षेण नूयते स्तूयते अनेन इति प्रणवः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार “जिस शब्द से ईश्वर की स्तुति प्रकृष्टरूप से की जाए वह प्रणव है।” ऋग्वेदी लोग ओंकार को प्रणव, सामवेदी लोग उद्गीथ् तथा अन्य ओंकार कहते है। यथा —

अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथ एष प्रणव ओमिति ह्येष स्वरन्नेति॥ छान्दोग्योपनिषद १.५.१॥

अर्थात् अब जो प्रसिद्ध उद्गीथ है सो प्रणव है। जो प्रणव है सो उद्गीथ है और यह उद्गीथ और प्रणव आदित्य अर्थात् अविनश्वर अखण्ड ईश्वर है क्योंकि यह उद्गीथ और प्रणव ओंकारवाच्य ब्रह्म को ही गाता हुआ उसी से सम्बन्ध रखता है।

यजु॰ १९.२५ में प्रणव का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं — प्रणवैः ओङ्कारैः अर्थात् प्रणव ही ओङ्कार है।

वेद में परमात्मा का नाम “ओम्” कहा है यथा —

हि॒र॒ण्मये॑न पात्रे॑ण स॒त्यस्यापि॑हितं॒ मुख॑म्। योऽसावा॑दि॒त्ये पुरु॑षः॒ सोऽसाव॒हम्। ओ३म् खं ब्रह्म॑॥

यजु॰ ४०.१७॥

अर्थात् — हे मनुष्यो! जिस ज्योति से परिपूर्ण सबके रक्षक मेरे द्वारा कभी नष्ट न होने वाले सत्रूप कारण (प्रकृति) का ढके हुए मुख के समान उत्तम अङ्ग का विकास किया जाता है; जो वह प्राण वा सूर्यमण्डल में पूर्ण परमात्मा है वह परोक्ष में, आकाश के समान व्यापक, गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से सबसे बड़ा हूँ, मैं सब जगत् का रक्षक “ओ३म्” हूँ, ऐसा जानो। (यजु॰ भाष्य स्वामी दयानन्द)

विश्वे॑ दे॒वास॑ऽइ॒ह मा॑दयन्ता॒मो३म्प्रति॑ष्ठ॥ यजु॰ २.१३॥

यहाँ पर भी “ओ३म्” पद वाच्य ईश्वर से अपने हृदय में प्रतिष्ठित हो वेद विद्या के स्थापन की प्रार्थना की गई है।

ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् यसि्॑मन्दे॒वा अधि॒विश्वे॑ निषे॒दुः। ऋ० १.१६४.३९॥

इस मन्त्र में “व्योमन्” का विग्रह इस प्रकार से है — विऽओमन् = वि + ओम् + अन् और व्योमन् का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं व्योमिन् व्यापके परमेश्वरे॥ इसी प्रकार व्योमन् शब्द अथर्ववेद ५.१७.६, ६.१२३.१, ७.५.३ आदि स्थलों में भी आया है।

ओमा॑सश्चर्षणीधृतो॒ विश्वे॑ देवास॒ आ ग॑त। दा॒श्वांसो॑ दा॒शुषः॑ सु॒तम्॥ ऋ० १.३.७॥

इस मन्त्र में ओमासः शब्द ओम् + आस् की सन्धि होकर बना है। यहाँ ओमासः का अर्थ हुआ ओम् = परमात्मा, और आस् नाम बैठने वाले अर्थात् परमात्मा के समीप बैठने वाले अर्थात् परमात्मा को जानने वाले विद्वान् को ओमासः कहा है। इस का विशेष अर्थ महर्षि दयानन्द कृत ऋग्वेद भाष्य में देखें।

इसी प्रकार समस्त सत्यशास्त्रों में प्रणव = ओ३म् से परमात्मा का ग्रहण है; यथा —

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाᳬसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।

यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्तितत्ते पदᳬसङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥ कठोपनिषद् २.१५॥

अर्थात् — जिस “ओम्” इस वाचक शब्द से वाच्य ब्रह्म को सब वेद कहते हैं; सब तपानुष्ठान भी जिस ब्रह्म की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं, जिस “ओम्” पद की इच्छा करते हुए विद्वान् ब्रह्मचर्य आश्रम के नियमों का सेवन करते, उस इस वाच्य वाचक रूप एक “ओम्” पद को मैं तुमसे संक्षेप से कहता हूँ।

यः पुनरेतत्त्रिमात्रेणैव ओमित्येतेनैवाक्षरेण ........... परात्परं पुरिशय पुरुषमीक्षते। प्रश्न० ५.५॥

जो उपासक इस तीन मात्रा “ओम्” के द्वारा अविनाशी परमेश्वर का ध्यान करता है वह आत्मा के द्वारा परात्पर ईश्वर का साक्षात् कर लेता है।

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ मुण्डक० २.२.४॥

प्रणव = ओंकार को धनुष, आत्मा को बाण और ब्रह्म को लक्ष्य बनाकर सावधानी से उस लक्ष्य में वेध करे और जैसे बाण लक्ष्य में लगकर तन्मय हो जाता है वैसे ही ओंकार के द्वारा मनन करता हुआ उपासक भी ब्रह्म में समाधिस्थ हो जाये।

ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्॥ माण्डुक्य० १॥

सम्पूर्ण माण्डुक्योपनिषद् में “ओम्” इसी शब्द से परमात्मा का ही व्याख्यान मात्र है।

ओमति ब्रह्म॥ तैत्तरीयाराण्यके २.१८॥

इस प्रकार हम देखते हैं कि वेदादि सत्यशास्त्रों में “ओ३म्” से परमात्मा का ही ग्रहण होता है। यह परमात्मा का मुख्य और सर्वोत्तम नाम है और अन्य सब गौणिक नाम हैं। इस ओम् शब्द से परमेश्वर के बहुत से नाम आते हैं। जैसे — अकार से विराट् अग्नि और विश्वादि। उकार से हिरण्यगर्भ, वायु, तैजसादि। मकार से ईश्वर, आदित्य और प्राज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक हैं। इस “ओ३म्” शब्द के अर्थ बहुत हैं। ओम् शब्द रक्षादि अर्थ में विद्यमान है। अव रक्षण-गति-कान्ति-प्रीति-तृप्त्यवगम-प्रवेश-श्रवण-स्वाम्यर्थयाचन-क्रियेच्छा-दीप्तिव्याप्त्यालिङ्गन-हिंसा-दान-भाग-वृद्धिषु धातु (धातुपाठ० १.३८०) से ओम् शब्द सिद्ध होता है। अव धातु के सभी अर्थ परमात्मा में घटाये जाते हैं; परन्तु मुख्यता करके परमात्मा को सर्वरक्षक कहा है। इस प्रकार आप्ऌ व्याप्तौ धातु (धातुपाठ ५.१५) से ओम् की सिद्धि मानने पर - जो सर्वत्र व्यापक हो उसे ओंकार कहते हैं (गोपथ ब्राह्मण १.२६)। ओम् शब्द अव्यय होने से परमात्मा के समान यह शब्द भी निर्विकार है। अर्थात् व्याकरण की दृष्टि से इस शब्द में विभक्त्यादि कृति विकार नहीं होते, अव्यय का सर्वदा एक ही रूप बना रहता है।

“ओ३म्” रूपी वाचक का परमात्मा रूपी वाच्य के साथ ऐसा सम्बन्ध है जैसा कि पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है। इसी तथ्य को महर्षि दयानन्द यजु॰ २.१३ के भावार्थ में कहते हैं — “ओमिति परमेश्वरस्यैव नाम, यथा पितापुत्रयोः प्रियः सम्बन्धस्तथैवेश्वरेण सहोंकारस्य सम्बन्धो अस्ति” अर्थात् ‘ओ३म्’ यह परमेश्वर का ही नाम है। जैसे पिता और पुत्र का प्रिय सम्बन्ध है वैसे ही ईश्वर के साथ ‘ओंकार’ का है।

“ओ३म्” और परमात्मा का यह वाच्य-वाचक सम्बन्ध कृत्रिम न होकर शाश्वत् है। जैसे हम जीवों का मनुष्य जन्म में एक वाचक = नाम होता है जो जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद जीव रूपी वाच्य से सम्बन्धित नहीं रहता। परन्तु परमात्मा का अपने वाचक नाम “ओ३म्” से यह सम्बन्ध शाश्वत् है। जैसे वेद के द्वारा परमात्मा ने अपना वाचक “ओ३म्” वर्त्तमान सर्ग = कल्प में कहा है वैसे ही अन्य सृष्टियों में जानना चाहिए। जिस प्रकार परमात्मा का ज्ञान नित्य और निर्विकार है, उसी प्रकार से परमात्मा और “ओ३म्” का सम्बन्ध भी नित्य = शाश्वत् होने से प्रत्येक सृष्टि में ऐसा ही जाना जाता है।