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एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता॥४४॥

In Hindi:

पदपाठ : एतया एव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता॥

हिंदी में अर्थ : (एतया एव) इस सवितर्का और निर्वितर्का समापत्तियों के व्याख्यान से ही (सूक्ष्मविषया) सूक्ष्म विषयों के आलम्बन वाली (सविचारा निर्विचारा च) सविचारा और निर्विचारा समापत्तियाँ भी (व्याख्याता) व्याख्यात समझनी चाहिए॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तत्र भूतसूक्ष्मेष्वभिव्यक्तधर्मकेषु देशकालनिमित्तानुभवावच्छिन्नेषु या समापत्तिः सा सविचारेत्युच्यते। तत्राप्येकबुद्धिनिर्ग्राह्यमेवोदितधर्मविशिष्टं भूतसूक्ष्ममालम्बनीभूतं समाधिप्रज्ञायामुपतिष्ठते।

या पुनः सर्वथा सर्वतः शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानवच्छिन्नेषु सर्वधर्मानुपातिषु सर्वधर्मात्मकेषु समापत्तिः सा निर्विचारेत्युच्यते। एवं स्वरूपं हि तद्भूतसूक्ष्ममेतेनैव स्वरूपेणालम्बनीभूतमेव समाधिप्रज्ञास्वरूपमुपरञ्जयति। प्रज्ञा च स्वरूपशून्येवार्थमात्रा यदा भवति तदा निर्विचारेत्युच्यते। तत्र महद्वस्तुविषया सवितर्का निर्वितर्का च, सूक्ष्मवस्तुविषया सविचारा निर्विचारा च। एवमुभयोरेतयैव निर्वितर्कया विकल्पहानिर्व्याख्यातेति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तत्र) उन सविचारा और निर्विचारा समापत्तियों में से (देशकालनिमित्तानुभवावच्छिन्नेषु) देश काल और निमित्तों के अनुभव = ज्ञान से सम्बन्धित (अभिव्यक्तधर्मकेषु) अभिव्यक्त = प्रकट धर्म वाले (भूतसूक्ष्मेषु) भूतसूक्ष्मों अर्थात् तन्मात्रादिकों (तन्मात्राओं से प्रकृति पर्यन्त) में (या) जो (समापत्तिः) समापत्ति होती है (सा) वह (सविचारा इति उच्यते) सविचारा सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है। (तत्र अपि) उस में = सविचारा समापत्ति में भी, सवितर्का के समान, (एकबुद्धिनिर्ग्राह्यम्) एक बुद्धि के द्वारा गृहीत होने वाले (उदितधर्मविशिष्टम्) उदित = वर्त्तमान काल के धर्म से विशिष्ट = युक्त (भूतसूक्ष्मम्) तन्मात्रादि विषय (आलम्बनीभूतम्) आलम्बन होते हुये = ध्येय विषय बने हुए (समाधिप्रज्ञायाम्) समाधिप्रज्ञा में (उपतिष्ठते) उपस्थित रहते हैं = भासते हैं।

(या पुनः) और जो (सर्वथा) सब प्रकार से (सर्वतः) सब ओर से (शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्माः) शान्त = भूतकालिक, उदित = वर्त्तमानकालिक और अव्यपदेश्य = भविष्यत काल के देश, निमित्त आदि धर्मों से (अनवच्छिन्नेषु) असम्बद्ध = अमिश्रित = रहित (सर्वधर्मानुपातिषु) सभी कार्य रूप धर्मों में अनुगत होने वाले अर्थात् (सर्वधर्मात्मकेषु) सभी धर्मों के कारण रूप तन्मात्रादि सूक्ष्मविषयों में जो (समापत्तिः) समापत्ति = तदाकारिता = तद्रूपता होती है (सा) वह (निर्विचारा इति उच्यते) निर्विचारा सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है। (एवम् स्वरूपम्) इस स्वरूप वाला (हि) ही (तत्) वह (भूतसूक्ष्मम्) तन्मात्रादि सूक्ष्मभूत (एतेन एव स्वरूपेण) केवल इसी स्वरूप से (आलम्बनीभूतम् एव) आलम्बन किया हुआ = ध्येय विषय बना हुआ ही (समाधिप्रज्ञास्वरूपम्) समाधिप्रज्ञा के स्वरूप को (उपरञ्जयति) उपरक्त करता है = तदाकार कारित करता है। (च) और (यदा) जिस अवस्था में (प्रज्ञा) समाधिप्रज्ञा (स्वरूपशून्या इव) स्वरूप शून्य के समान अर्थात् अपने स्वरूप का अनुभव न करती हुई सी (अर्थमात्रा) केवल ध्येय पदार्थ के स्वरूप की ही (भवति) होती है (तदा) उस अवस्था में (निर्विचारा इति उच्यते) निर्विचारा सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है॥

(तत्र) उन चारों समापत्तियों में (महद्वस्तुविषया) स्थूल वस्तु विषयक समापत्तियाँ (सवितर्का निर्वितर्का च) सवितर्क और निर्वितर्क सम्प्रज्ञात समाधियाँ होती हैं; और (सूक्ष्मवस्तुविषया) सूक्ष्म वस्तु विषयक (सविचारा निर्विचारा च) सविचार और निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधियाँ होती हैं। (एवम्) इस प्रकार (एतया निर्वितर्कया एव) इस निर्वितर्का समापत्ति के व्यख्यान द्वारा ही (उभयोः) दोनों = निर्वितर्का और निर्विचारा समापत्तियों की (विकल्पहानिः) विकल्प रहिता = भेदशून्यता (व्याख्याता इति) बतायी गई है॥

वैदिक वृत्ति : वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के सवितर्क और निर्वितर्क भेदों का व्याख्यान करने के पश्चात् महर्षि पतञ्जलि सूक्ष्म विषयों के आलम्बन से होने वाली विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के सविचार और निर्विचार भेदों का व्याख्यान करते हुए कहते हैं कि सवितर्क और निर्वितर्क भेदों के व्याख्यान के समान ही सविचार और निर्विचार भेदों को भी समझ लेना चाहिए। अर्थात् जिस प्रकार सवितर्क भेद में स्थूल विषय के “अर्थ” साक्षात्कार के साथ-साथ विषय = पदार्थ के “शब्द” और “ज्ञान” को बोध बना रहता है उसी प्रकार सविचार सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बन किए हुए सूक्ष्म विषय के “अर्थ” साक्षात्कार के साथ-साथ उसके “शब्द” और “ज्ञान” का मिश्रित बोध भी होता है। जिस प्रकार निर्वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बित स्थूल विषय के “अर्थ” साक्षात्कार के काल में, शब्दसंकेत जन्य ज्ञान, श्रुतज्ञान और अनुमानज्ञान की स्मृति निवृत्त हो जाती है, और चित्त स्वरूप शून्य सा होकर पदार्थ के स्वरूप मात्र का भासता है; वैसे ही निर्विचारा भेद में आलम्बन किए हुए सूक्ष्म विषय के “अर्थ” साक्षात्कार के विषय में भी जानना चाहिए। इस प्रकार से “शब्द” और “ज्ञान” की विकल्पसहितता और विकल्परहितता के आधार पर महर्षि पतञ्जलि ने विचारानुगत सम्प्रज्ञात के दो भेदों को कहा है।

विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बन हेतु सूक्ष्मविषय कहे गए हैं। इन सूक्ष्म विषयों का स्पष्टीकरण महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने अगले सूत्र में ही किया है, जिसके अनुसार पाँच तन्मात्राएँ, अहङ्कार, महत्तत्त्व और मूल प्रकृति ये ८ आठ पदार्थ सूक्ष्म विषय की श्रेणी में आते हैं।

महर्षि व्यास सूत्रकार के आशय को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “देश, काल और निमित्त के ज्ञान सहित, अभिव्यक्त धर्म वाले सूक्ष्म विषयों के आलम्बन से, जो समापत्ति होती है, वह सविचारा भेद से कही गयी है। यह उपर्युक्त सूक्ष्मविषय रूपी आलम्बन ही एक बुद्धि के द्वारा, वर्त्तमानकाल के धर्मों से विशेषतापूर्वक जाना जाता हुआ, समाधिप्रज्ञा में भासता है। यहाँ सविचार सम्प्रज्ञात समाधि को समझने हेतु देश, काल और निमित्त के अभिप्राय को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

देश — उपर्युक्त आठ सूक्ष्म पदार्थों = विषयों में से पञ्चतन्मात्राओं के प्रत्यक्ष हेतु देश = स्थान को महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.३५ के भाष्य में निम्न प्रकार से कहा है —

नासिका के अग्र भाग पर धारणा करने से दिव्य “गन्ध” साक्षात्कार ;

जिह्वा के अग्र भाग पर धारणा करने से दिव्य “रस” का साक्षात्कार ;

तालु में धारणा करने से दिव्य “रूप” का साक्षात्कार ;

जिह्वा के मध्य भाग में धारणा करने से दिव्य “स्पर्श” का साक्षात्कार ;

जिह्वा के मूल भाग में धारणा करने से दिव्य “शब्द” का साक्षात्कार होता है।

अहङ्कार और महत्तत्त्व का अन्तःकरण में समावेश होने से इनके साक्षात्कार के लिए देश हृदयपुण्डरीक , जहाँ पुरुष का भी साक्षात्कार होता है, को जानना चाहिए।

काल — काल से अभिप्राय भूतकाल, वर्त्तमानकाल और भविष्यतकाल को जानना चाहिए। उत्पत्ति क्रम में तन्मात्राओं के सन्दर्भ में, अहङ्कार, तन्मात्राओं का अतीत = भूतकाल है; तन्मात्राओं की उत्पत्ति पर उनका वर्त्तमान काल और तन्मात्राओं में पञ्चमहाभूत अनागत = भविष्यतकाल है। इसी प्रकार विलोम क्रम में पञ्चमहाभूतों, तन्मात्राओं और अहङ्कार में तीनों अवस्थाओं को समझना चाहिए। यथा गन्ध तन्मात्र के सन्दर्भ में विलोम क्रम से विचार = भावना करने पर पृथिवी महाभूत उसका अतीत = भूतकाल, गन्ध तन्मात्रा वर्त्तमानकाल और अहङ्कार इस गन्ध तन्मात्रा का अनागत = भविष्यतकाल का रूप है। इसी प्रकार अन्य सूक्ष्मविषयों के बारे में भी जानना चाहिए।

निमित्त — कार्य पदार्थों से कारण पदार्थों का ज्ञान होना। यहाँ कार्य पदार्थ रूपी निमित्त से उनके कारणों का ज्ञान होना निमित्त के रूप में जानना चाहिए।

इस प्रकार देश, काल और निमित्त के ज्ञान से सहित, इन अभिव्यक्त हुए तथा अपने कार्यों के रूप में अभिव्यक्त होने वाली मूलप्रकृति, रूप सूक्ष्मविषयों के आलम्बन से होने वाली समापत्ति को सविचारा सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। इस समाधि की अवस्था में चित्त में ये सूक्ष्म विषय देश और निमित्त के साथ अपने वर्त्तमान काल के धर्मों के द्वारा ही विशिष्टता पूर्वक भासित होते हैं। इस प्रकार इनकी प्रतीति यदि सूक्ष्म पदार्थों के भूतकालिक या भविष्यतकालिक धर्मों से युक्त होगी, तो वह सूक्ष्म विषय सविचारा समाधि में साक्षात् हुआ नहीं मानना चाहिए; अर्थात् गन्ध तन्मात्रा के आलम्बन के काल में यदि पृथिवी अथवा अहङ्कार रूपी भूतकालिक/भविष्यतकालिक धर्मों का बोध हो रहा हो तो ऐसे काल में होने वाला साक्षात्कार गन्धतन्मात्रा का साक्षात्कार नहीं मानना चाहिए। इसी प्रकार अन्य सूक्ष्मविषयों के विषय में भी जानना चाहिए।

सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि ने स्थूल पदार्थों के उपरान्त ही सूक्ष्म पदार्थों का साक्षात्कार लक्षित किया है। इसी तथ्य का ध्यान रखते हुए योगी को सृष्टि के स्थूल पदार्थों से आरम्भ कर के क्रमशः मूल प्रकृति तक, सृष्टि निर्माण से विलोम क्रम = प्रतिलोम क्रम को अपनाना होगा क्योंकि उपलब्ध कार्यपदार्थों द्वारा ही उनके कारणों का बोध अधिक सुगमता से सम्भव होता है। इसी रहस्य को महर्षि कपिल ने भी सांख्य दर्शन में प्रकृति के विकारों को दर्शाने के पश्चात् प्रतिलोम क्रम से मूल प्रकृति के अनुमान को इस प्रकार से कराया है —

स्थूलात् पञ्चतन्मात्रस्य॥

बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारस्य॥

तेनान्तःकरणस्य॥

ततः प्रकृतेः॥ सांख्य० १.६२-६५॥

अर्थात् पृथिवी आदि स्थूलभूत गण कार्यरूप से उनके कारण रूप पाँच तन्मात्र गण = सूक्ष्मभूतों का अनुमान से बोध = विवेक करना चाहिए ॥६२॥ बाह्य और आभ्यान्तर इन्द्रियों अर्थात् कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों, मन के द्वारा तथा उन पञ्चतन्मात्राओं के द्वारा कारण रूप अहङ्कार का अनुमान द्वारा बोध = विवेक करना चाहिए ॥६३॥ अहङ्कार कार्य से उसके कारण रूप महत्तत्त्व का अनुमान द्वारा बोध = विवेक करना चाहिए ॥६४॥ उस महत्तत्त्व कार्य से उसके कारण रूप प्रकृति का अनुमान से बोध = विवेक करना चाहिए ॥६५॥

इस सविचारा समाधि की उन्नत अवस्था में जब सूक्ष्म विषयों के आलम्बन काल में देश, काल, निमित्त आदि धर्मों से सर्वथा रहित, उस आलम्बित विषय के “शब्द” और “ज्ञान” के बोध रूपी मिश्रण से भी रहित, चित्त स्वरूप शून्य सा होकर मात्र “अर्थ” के स्वरूप से तदाकार होकर, केवल ध्येय सूक्ष्म विषय के स्वरूप का ही भासता है, वह अवस्था निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधि की है।

महर्षि व्यास ने यहाँ दो और शब्दों का प्रयोग किया है — “सर्वधर्मानुपातिषु सर्वधर्मात्मकेषु” जिसका अभिप्राय है कि ये सूक्ष्म विषय अपने सभी कार्य रूप धर्मों में अनुगत = उपस्थित होने वाले है अर्थात् सभी उत्पन्न हुए धर्मों के कारण रूप हैं; और इन्हीं कार्य रूपों से ही इनके कारणों का बोध हो जाता है। इसी भावना को महर्षि कणाद ने इस प्रकार कहा है —

तस्य कार्यं लिङ्गम्॥ वैशेषिक ४.१.२॥

अर्थात् उत्पन्न हुआ विद्यमान जगत् उसके मूल कारण के अस्तित्व में प्रमाण है। जिस प्रकार बिना कारण के कार्य नहीं होता उसी प्रकार कार्य भी कारण का बोध कराने में समर्थ होता है। इसी प्रकार महर्षि कपिल भी कहते हैं —

कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यात्॥ सांख्य० १.१३५॥

अर्थात् कार्य से कारण का अनुमान हो जाता है; कारण साहित्य से = कारण के साथ युक्त होने से कार्य सत्ता होती है, कार्य में कारण सूक्ष्मरूप से परिपूर्ण होकर रहता है। जैसे घड़े में मिट्टी, वस्त्र में तन्तु। इसी प्रकार पृथिवी में गन्ध तन्मात्र, जल में रस तन्मात्र, तेज में रूप तन्मात्र, वायु में स्पर्श तन्मात्र, आकाश में शब्द तन्मात्र; इसी प्रकार से अन्य सूक्ष्म कार्य पदार्थों अहङ्कार और महत्तत्त्व में भी जानना चाहिए।

अतः इसी प्रतिलोम क्रम का अनुसरण करते हुए सभी सूक्ष्म विषयों का साक्षात्कार योगी का निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधि में होता है। इस अवस्था में हुए साक्षात्कार को ही “परप्रत्यक्ष” कहते हैं।