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सूक्ष्मविषयत्वं चाऽऽलिङ्गपर्यवसानम्॥४५॥

In Hindi:

पदपाठ : सूक्ष्मविषयत्वम् च अलिङ्गपर्यवसानम्॥

हिंदी में अर्थ : (च) और सूक्ष्मविषय वाली विचारानुगत समापत्ति = सम्प्रज्ञात समाधि में जो (सूक्ष्मविषयत्वम्) सूक्ष्मविषयता है वह (अलिङ्गपर्यवसानम्) अलिङ्ग = मूल प्रकृति पर्यन्त है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : पार्थिवस्याणोर्गन्धतन्मात्रं सूक्ष्मो विषयः। आप्यस्य रसतन्मात्रम्। तैजसस्य रूपतन्मात्रम्। वायवीयस्य स्पर्शतन्मात्रम्। आकाशस्य शब्दतन्मात्रमिति। तेषामहंकारः। अस्यापि लिङ्गमात्रं सूक्ष्मो विषयः। लिङ्गमात्रस्याप्यलिङ्गं सूक्ष्मोऽविषयः। न चालिङ्गात्परं सूक्ष्ममस्ति।

नन्वस्ति पुरुषः सूक्ष्म इति। सत्यम्। यथा लिङ्गात्परमलिङ्गस्य सौक्ष्म्यं न चैवं पुरुषस्य। किन्तु लिङ्गस्यान्वयिकारणं पुरुषो न भवति, हेतुस्तु भवतीति। अतः प्रधाने सौक्ष्म्यं निरतिशयं व्याख्यातम्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (पार्थिवस्य अणोः) पृथिवी के अणु = परमाणु का (सूक्ष्मो विषयः) सूक्ष्मविषय (गन्धतन्मात्रम्) गन्धतन्मात्रा है; (आप्यस्य) जल के परमाणु का सूक्ष्मविषय (रसतन्मात्रम्) रसतन्मात्रा है; (तैजसस्य) अग्नि के परमाणु का सूक्ष्मविषय (रूपतन्मात्रम्) रूपतन्मात्रा है; (वायवीयस्य) वायु के परमाणु का सूक्ष्मविषय (स्पर्शतन्मात्रम्) स्पर्शतन्मात्रा है; और (आकाशस्य) आकाश के परमाणु का सूक्ष्मविषय (शब्दतन्मात्रम् इति) शब्द तन्मात्रा है। (तेषाम्) उन पाँचों तन्मात्राओं का सूक्ष्मविषय (अहंकारः) अंहकार है। (अस्य अपि) इस अहंकार का भी (सूक्ष्मो विषयः) सूक्ष्मविषय (लिङ्गमात्रम्) लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व है। (लिङ्गमात्रस्य) लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व का (अपि) भी (सूक्ष्मो विषयः) सूक्ष्मविषय (अलिङ्गम्) अलिङ्ग = मूल प्रकृति है। (च) और (अलिङ्गात्) अलिङ्ग = प्रकृति से (परम्) परे = अधिक (सूक्ष्मम्) सूक्ष्म विषय (न अस्ति) नहीं है।

(ननु) इस पर शंका है कि (अस्ति पुरुषः सूक्ष्म इति) प्रकृति से अधिक सूक्ष्म पुरुष = परमात्मा को शास्त्रकारों ने कहा है। तो प्रकृति से परे सूक्ष्म पुरुष क्यों नहीं है ? (सत्यम्) यह सत्य है कि पुरुष = परमात्मा प्रकृति से अधिक सूक्ष्म है परन्तु (यथा) जैसी (लिङ्गात्) लिङ्ग = महत्तत्त्व से (परम्) परे = अधिक (अलिङ्गस्य) अलिङ्ग = प्रकृति की (सौक्ष्म्यम्) सूक्ष्मता है (एवम्) वैसी सूक्ष्मता (पुरुषस्य) पुरुष = परमात्मा की (कार्य की अपेक्षा से कारण की) (न च) नहीं है। (किन्तु) क्योंकि (पुरुषः) पुरुष = परमात्मा (लिङ्गस्य) लिङ्ग = महत्तत्त्व का (अन्वयिकारणम्) उपादान कारण (न भवति) नहीं होता (हेतुः तु) निमित्त कारण तो (भवति इति) होता है। (अतः) इसलिए (प्रधाने) प्रकृति में (सौक्ष्म्यम्) कार्य पदार्थों की अपेक्षा से सूक्ष्मता (निरतिशयम्) निरतिशय = पराकाष्ठा को प्राप्त हुई (व्याख्यातम्) कही गई है॥

वैदिक वृत्ति : विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के दो भेद, सविचारा और निर्विचारा समापत्तियाँ सूक्ष्मविषयों के आलम्बन से होती हैं। ये सूक्ष्मविषय कौन से हैं और इनकी सूक्ष्मता की सीमा कहाँ तक है ? इस विषय को स्पष्ट करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि इन सूक्ष्मविषयों की सीमा मूल प्रकृति पर्यन्त है, और इन सूक्ष्म विषयों की गणना महर्षि व्यास ने सूत्र के भाष्य में की है।

पृथिवी आदि पाँच महाभूतों के सूक्ष्म विषय क्रमशः पाँच तन्मात्राएँ — गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द तन्मात्रा हैं। इन पाँचों तन्मात्राओं का सूक्ष्मविषय अंहकार है; अंहकार का सूक्ष्म विषय महत्तत्त्व और महत्तत्त्व का सूक्ष्मविषय मूल प्रकृति = सत्त्व, रज और तम की साम्यावस्था है। इस प्रकार स्थूल पदार्थों की अपेक्षा से ये आठ सूक्ष्म पदार्थ कहे गए हैं। प्रकृति किसी अन्य पदार्थ का कार्य = विकार न होने से सूक्ष्मतम कही गई है। परन्तु महत्तत्त्व, अंहकार और तन्मात्राएँ अपने से पूर्व विकार के कार्य और अपने से आगे के विकारों = कार्यपदार्थों के कारण हैं। यह वर्गीकरण = व्याख्यान महर्षि कपिल द्वारा में सांख्य सूत्रों प्रतिपादित सिद्धान्तों के अनुरूप है। प्रकृति को इस क्रम में सभी पदार्थों की अपेक्षा से सूक्ष्मतम कहा है; परन्तु शास्त्रों में पुरुष = परमात्मा को प्रकृति से भी सूक्ष्म कहा गया है। यथा कठोपनिषद् में कहा है —

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।

पुरुषान्न पर किञ्चित्सा काष्ठा सा परागतिः॥ कठो॰ ३.१०-११॥

अर्थात् नेत्रादि इन्द्रियों से इन्द्रियों के शब्द-स्पर्श-रूप आदि विषय निश्चय करके सूक्ष्म हैं, और इन शब्दादि विषयों से मन सूक्ष्म है, और संकल्प-विकल्पात्मक मन से निश्चयात्मक वृत्ति बुद्धि सूक्ष्म है और इस निश्चयात्मक वृत्ति से व्यापक महान् = महत्तत्त्व अति सूक्ष्म है॥ महत्तत्त्व से सत्त्व, रज और तमोगुण की साम्यावस्था प्रकृति सूक्ष्म है; अव्यक्त कारण रूप प्रकृति से पुरुष = परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है और पुरुष से सूक्ष्म कुछ भी नहीं है। वह अवधि = अन्तिम सीमा है और वही सूक्ष्मता की अन्तिम सीमा है उससे आगे किसी की सूक्ष्मता नहीं है।

उपर्युक्त प्रकार के प्रमाणों के सन्दर्भ में यह शंका की गयी है कि — “अलिङ्ग = प्रकृति से परे सूक्ष्म कुछ भी नहीं है”, यह कथन उचित नहीं है, क्योंकि शास्त्रों में पुरुष को प्रकृति से अधिक सूक्ष्म कहा है। इस शंका का समाधान करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि प्रकृति की परम सूक्ष्मता उपादान कारण के सन्दर्भ में कही गयी है। जैसे प्रकृति रूपी कारण से उसके महत्तत्त्व आदि विकार उत्पन्न होते हैं, वैसा पुरुष के सम्बन्ध में नहीं है। परमात्मा जगत् का निमित्त कारण है, उपादान कारण नहीं। कार्य-कारण परम्परा में प्रकृति ही सब से सूक्ष्म और परिणामी द्रव्य है। दूसरी ओर परमात्मा सबसे अधिक सूक्ष्म होते हुए भी अपरिणामी है और जगत् उसका विकार नहीं है। अतः कार्य द्रव्यों का मूल कारण प्रकृति ही है, न कि परमात्मा। जबकि परमात्मा जगत् का सृष्टा और नियन्ता है।

विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में आलम्बन = ध्येय विषय बनाए जाने वाले सूक्ष्मविषय तन्मात्राओं से प्रकृति पर्यन्त आठ पदार्थ ही स्पष्ट रूप से कहे गए हैं। यहाँ यह समझना चाहिए कि महर्षि व्यास ने इन्द्रियों को सूक्ष्म विषयों में नहीं गिना गया और कठोपनिषद् के उपरोक्त प्रमाण में भी इन्द्रियों की अपेक्षा से उनसे ग्रहण होने वाले शब्दादि विषय अधिक सूक्ष्म कहे गए है। इसी प्रकार भोज ने भी गुणों के चार परिणाम योगसूत्र २.१९ के अनुसार ही कहे हैं, जिसके अनुसार इन्द्रियों की स्थूल भूतों के साथ गणना करते हुए उन्हें वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का ध्येय विषय = आलम्बन माना गया है।