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तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥५०॥

In Hindi:

पदपाठ : तत् जः संस्कारः अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : समाधिप्रज्ञाप्रतिलम्भे योगिनः प्रज्ञाकृतः संस्कारो नवो नवो जायते —

भूमिका हिंदी अर्थ : (समाधिप्रज्ञाप्रतिलम्भे) समाधिप्रज्ञा के प्राप्त होने पर (योगिनः) योगी को (प्रज्ञाकृतः) उस प्रज्ञा जन्य (नवः नवः) नए-नए (संस्कारः) संस्कार (जायते) उत्पन्न होते हैं —

हिंदी में अर्थ : (तत् जः) उस समाधि प्रज्ञा से उत्पन्न (संस्कारः) संस्कार (अन्यसंस्कारप्रतिबन्धी) अन्य = व्युत्थान संस्कारों का बाधक = रोधक = दबाने वाला होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : समाधिप्रज्ञाप्रभवः संस्कारो व्युत्थानसंस्काराशयं बाधते। व्युत्थानसंस्काराभिभवात्तत्प्रभवाः प्रत्यया न भवन्ति। प्रत्ययनिरोधे समाधिरुपतिष्ठते। ततः समाधिजा प्रज्ञा, ततः प्रज्ञाकृताः संस्कारा इति नवो नवः संस्काराशयो जायते। ततश्च प्रज्ञा ततश्च संस्कारा इति।

कथमसौ संस्काराशयश्चित्तं साधिकारं न करिष्यतीति? न ते प्रज्ञाकृताः संस्काराः क्लेशक्षयहेतुत्वात् चित्तमधिकारविशिष्टं कुर्वन्ति। चित्तं हि ते स्वकार्यादवसादयन्ति। ख्यातिपर्यवसानं हि चित्तचेष्टितमिति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (समाधिप्रज्ञाप्रभवः) समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न (संस्कारः) संस्कार (व्युत्थानसंस्काराशयम्) व्युत्थान संस्कारों और उनकी वासनाओं को (बाधते) बाधित = अपने कार्य करने में असमर्थ करते हैं। (व्युत्थानसंस्कारअभिभवात्) व्युत्थान संस्कारों के अभिभूत होने से = दबने से = नष्ट होने से (तत्प्रभवाः) उन संस्कारों से उत्पन्न होने वाली (प्रत्ययाः) प्रतीतियाँ = वृत्तियाँ (न भवन्ति) उत्पन्न नहीं होतीं। (प्रत्ययनिरोधे) उन प्रत्ययों = ज्ञानों = वृत्तियों के निरोध होने पर (समाधिः) समाधि (उपतिष्ठते) उपस्थित रहती है = बनी रहती है। (ततः) उस समाधि के बने रहने से (समाधिजा प्रज्ञा) समाधि जन्य प्रज्ञा = ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त होती है। (ततः) उस समाधि जन्य प्रज्ञा से (प्रज्ञाकृताः) प्रज्ञा जन्य = प्रज्ञा से उत्पन्न होने वाले (संस्काराः) संस्कार बनते हैं। (इति) इस प्रकार (नवो नवः) नए-नए (संस्काराशयः) संस्कारों का आशय = वासना, समूह (जायते) उत्पन्न होता है। (ततः च प्रज्ञा) और उन संस्काराशय से = समाधि संस्कार से समाधिप्रज्ञा और (ततः च संस्काराः) समाधिप्रज्ञा से समाधि संस्कार (इति) इस प्रकार उत्पन्न होते रहते हैं।

शंका करते हैं — (असौ संस्काराशयः) इस समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न संस्कारों का आशय = की वासना (चित्तम्) चित्त को (साधिकारम्) साधिकार = गुणाधिकार वाला = भोगोन्मुख वृत्ति वाला (कथम्) क्यों (न करिष्यतीति) नहीं करेगा ? इसका समाधान करते हुए कहा है — (ते) वे (प्रज्ञाकृताः संस्काराः) समाधिप्रज्ञा जन्य संस्कार (क्लेशक्षयहेतुत्वात्) अविद्यादि क्लेशों के नाश के हेतु होने से (चित्तम्) चित्त को (अधिकारविशिष्टम्) अधिकार युक्त = साधिकार = भोगोन्मुख वृत्ति वाला (न कुर्वन्ति) नहीं करते। (हि) क्योंकि (ते) वे समाधिप्रज्ञा जन्य संस्कार (चित्तम्) चित्त को (स्वकार्यात्) अपने कार्य से = भोगों को सिद्ध करने रूप कार्य से (अवसादयन्ति) निवृत्त कर देते हैं; (हि) क्योंकि (चित्तचेष्टितम्) चित्त की चेष्टा = क्रिया (ख्यातिपर्यवसानम् इति) विवेकख्याति पर्यन्त ही होती है॥

वैदिक वृत्ति : साधक, अभ्यास और वैराग्य का सम्पादन करता हुआ सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है। वह क्रमशः स्थूल विषयों से आरम्भ कर, सूक्ष्म विषयों और प्रकृति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करता हुआ = साक्षात्कार करता हुआ, आत्मा = पुरुष का आलम्बन करता हुआ आत्मविषयक सम्प्रज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार से सम्प्रज्ञात समाधि में हुआ साक्षात्कार, पदार्थों के यथार्थ स्वरूप = उनके विशेष धर्म का बोध कराने वाला होता है। इस प्रकार से साधक को समाधिप्रज्ञा की प्राप्ति होती है, और इस समाधिप्रज्ञा से योगी के चित्त में वैसे ही (= यथार्थ ज्ञान विषयक) संस्कार बनते हैं। इस समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न हुए संस्कार, योगी के चित्त में उपस्थित व्युत्थान-संस्कारों अर्थात् क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त दशाओं में बने संस्कारों और उनकी वासनाओं को बाधित कर देते हैं; और इस प्रकार से बाधित हुए व्युत्थान संस्कार अपने कार्य को करने में असमर्थ हो जाते हैं। व्युत्थान अवस्था के संस्कार समाधि (सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात) विरोधी होते हैं। परन्तु समाधिप्रज्ञा से जनित प्रबल संस्कारों से वे संस्कार दब जाते हैं = प्रसुप्त अवस्था वाले हो जाते हैं। इस काल में व्युत्थान-संस्कारों के रुक जाने से, योगी के चित्त में विभिन्न प्रतीतियों = वृत्तियों का अभाव हो जाता है; और इस प्रकार विभिन्न वृत्तियों का अभाव हो जाने से, योगी के चित्त में समाधि की निरन्तरता बनी रहती है। ऐसी अवस्था में योगी के चित्त में समाधि के बने रहने से समाधिप्रज्ञा की निरन्तर प्राप्ति और उस समाधिप्रज्ञा से वैसे ही संस्कार बनते रहते हैं। इस प्रकार इस क्रम के चलते हुए चित्त में समाधिप्रज्ञा जनित नए-नए संस्कारों का बाहुल्य हो जाता है।

यहाँ पर यह शंका होती है कि इस समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न संस्कार चित्त को भोगों की ओर उन्मुख क्यों नहीं करते ? इस का उत्तर देते हुए कहा है कि समाधिप्रज्ञा यथार्थ विषयक होने से = प्रकृति और उसके विकारों का तथा पुरुष का यथार्थ साक्षात्कार कराने से, अविद्यादि क्लेशों के नाश का कारण बनती है। और अविद्यादि क्लेशों के नष्ट होने से, चित्त की प्रवृत्ति भोगों की ओर से रुक कर, विवेकख्याति की ओर अग्रसर हो जाती है। अर्थात् अविद्या आदि क्लेशों के नष्ट होने से चित्त, भोग-सम्पादन रूपी कार्य से निवृत्त हो जाता है; और ऐसे चित्त की क्रियाएँ मात्र विवेकख्याति पर्यन्त ही होती है। उस अवस्था में चित्त अपने स्वरूप से शून्य हुआ, पुरुष के समान पवित्र होकर स्थित होता है।

इस प्रक्रिया में यह जानना आवश्यक है कि चित्त प्रकृति का विकार होने से जड़ है, और चित्त में यह सभी कार्य पुरुष = आत्मा के द्वारा ही सम्पादित किए जाते हैं। पुरुष ही पुरुषार्थ करता हुआ व्युत्थान संस्कारों को, समाधिप्रज्ञा जन्य संस्कारों से नष्ट करता है। इस प्रकार से पुरुष ही जन्म-जन्मान्तर के बहिर्मुखी वृत्ति प्रवाह को निरुद्ध कर, उसे अन्तर्मुखी कर, विवेकख्याति की प्राप्ति में सफल हो पाता है। अतः इस समाधिप्रज्ञा की प्राप्ति हेतु अनवरत पुरुषार्थ करना चाहिए — एक साधक के लिए यही उपदेश है = यही आदेश है।