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जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः॥१॥

In Hindi:

पदपाठ : जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः॥

हिंदी में अर्थ : (जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः) जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि से प्राप्त होने वाली (सिद्धयः) सिद्धियाँ होती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : देहान्तरिता जन्मना सिद्धिः। औषधिभिरसुरभवनेषु रसायनेनेत्येवमादिः। मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः। तपसा संकल्पसिद्धिः कामरूपी यत्र तत्र कामग इत्येवमादिः। समाधिजाः सिद्धयो व्याख्याताः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (देहान्तरिता) देहान्तर में = इस जन्म के बाद दूसरी देह में होने वाली सिद्धि (जन्मना) जन्म से = जन्मजात (सिद्धिः) सिद्धि होती है। (असुरभवनेषु) असुर भवन = प्राणों की पुष्टि करने वाले भवनों = स्थानों में (रसायनेन इति एवम् आदिः) रसायनों के प्रयोग से और इस प्रकार से अन्य शरीर पुष्टि के साधनों से होने वाली सिद्धियाँ (औषधिभिः) औषधि से होने वाली सिद्धियाँ कहाती हैं। (मन्त्रैः) मन्त्रों से (आकाशगमनाणिमादिलाभः) आकाश गमन और अणिमा आदि सिद्धियों की प्राप्ति होती है। (तपसा) तप के अनुष्ठान से (संकल्पसिद्धिः) संकल्पसिद्धि अर्थात् (कामरूपी) यथेच्छ रूप वाला होकर (यत्र तत्र) जहाँ तहाँ (कामगः) कामनानुसार गमन करना (इति एवम् आदिः) इस प्रकार अन्य सत्य संकल्पों की पूर्त्ति भी जाननी चाहिए। (समाधिजाः सिद्धयः) समाधि से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ (व्याख्याताः) विभूतिपाद में कही गई हैं॥

वैदिक वृत्ति : विभूति पाद के अन्तिम सूत्र में कैवल्य हेतु सत्त्व अर्थात् बुद्धि = चित्त की, पुरुष के समान, शुद्धि की अनिवार्यता को कहा है। वस्तुतः पुरुष तो स्वरूपतः शुद्ध है, परन्तु चित्तगत अविद्यादि क्लेशों के कारण उसमें अशुद्धि आ जाती है। जब यह अशुद्धि पूर्णतया दूर हो जाती है अर्थात् अविद्यादि क्लेश दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाते हैं, तब चित्त भी चितिशक्ति = पुरुष के समान शुद्ध होकर स्थित होता है।

चित्त का पुरुष के साथ सम्बन्ध सर्गपर्यन्त अथवा बन्धन पर्यन्त रहता है। विभूतिपाद में जो विभिन्न प्रकार के संयमों से विभूतियों की प्राप्ति कही गई है, उन सब का प्रधान आश्रय चित्त ही है। इस कैवल्य पाद में महर्षि पतञ्जलि चित्त के विज्ञान को पूर्णतया स्पष्ट कर रहे हैं। चित्त जो कि पुरुष का अनादि काल से जन्म-जन्मान्तर का साथी है, उसके आश्रय से आत्मा अपने कर्मफलों और भोगों को प्राप्त करता है; इसी प्रकार पुरुष, चित्त के माध्यम से ही विभिन्न ऐश्वर्यों = विभूतियों को भी प्राप्त करता है।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि पुरुष को सिद्धियाँ — जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि के आश्रय से प्राप्त होती हैं। जन्म से प्राप्त होने वाली सिद्धियों में पूर्व जन्म में प्राप्त की गई चित्तगत विद्या का स्तर ही मुख्य कारण रहता है। इसमें यह तथ्य भी अन्तर्निहित है कि योगी द्वारा किसी भी जन्म में की गई साधना व्यर्थ नहीं होती, बल्कि वह साधना अगले जन्मों में सिद्धियों को प्राप्त कराने वाली होती है। अतः पुरुष इन पाँचों प्रकारों से ही चित्त के विभिन्न स्तरों = अवस्थाओं को प्राप्त करता है। इन सब में से समाधि की सिद्धि से बना चित्त सर्वश्रेष्ठ होता है, क्योंकि उसमें वासनाओं का अभाव होता है। इससे यह भी जानना चाहिए कि अन्य चार निमित्तों = जन्म, औषधि, मन्त्र, तप से बने चित्त का स्तर, समाधि से बने चित्त के स्तर से न्यून ही रहता है। अतः औषधि, मन्त्र और तप रूप निमित्तों को समाधि से भिन्न ही जानना चाहिए। सूत्र में कही गई पाँचों प्रकार की सिद्धियों को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. जन्मना सिद्धि :— जो जन्म से प्राप्त हो, वह जन्म-जात सिद्धि कहाती है। इस प्रकार से प्राप्त होने वाली योग्यताओं = सिद्धियों हेतु पुरुष को वर्त्तमान जन्म में विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। इन सिद्धियों = योग्यताओं का मूल आधार पूर्वजन्म में सञ्चित कर्माशय होता है। वस्तुतः पुरुष को अगला जन्म उसके कर्माशय के आधार पर मिलता है। कठोपनिषद् में यमाचार्य कहते हैं —

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ कठो॰ ५.७॥

अर्थात् ब्रह्मज्ञानी से अन्य मनुष्य, जैसा वा जितना जिसका कर्म है, और जैसा वा जितना शास्त्रज्ञान जिसको प्राप्त हुआ है, वैसे संस्कारों से हुई वासनाओं से बँधे हुए मनुष्य आदि का शरीर धारण करने हेतु योनि = गर्भ को प्राप्त करते हैं, और अन्य अति निकृष्ट पाप करने वाले वृक्षादि स्थावर योनियों को प्राप्त करते हैं।

इसी प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा है —

तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुत एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याऽविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वाऽन्येषां वा भूतानाम्॥ बृहदा॰ ४.४.४॥

अर्थात् जैसे सुवर्णकार सुवर्ण की मात्रा को लेकर दूसरा नवीन, उत्तम रूप बनाया करता है; वैसे ही यह आत्मा इस शरीर को निश्चेष्ट बना अविद्या को दूरकर नवीन = दूसरे जन्म में कल्याण करने वाला पित्र्य = कर्मकाण्डी वा गान्धर्व वा प्राजापत्य वा ब्राह्म रूप अर्थात् शरीर को धारण करता, और जिसने अविद्या को दूर नहीं किया है वह अन्य प्राणियों के शरीरों में से किसी एक शरीर को धारण करता है।

महर्षि गौतम भी न्याय दर्शन में इसी को कहते हैं —

पूर्वकृतफलानुबन्धात् तदुत्पत्तिः॥ न्याय ३.२.६४॥

अर्थात् पूर्व जन्मों में कृत कर्म और योगाभ्यास के फलानुबन्धन से समाधि की सिद्धि होती है।

इसी प्रकार महर्षि दयानन्द यजुर्वेद १७.७५ के भावार्थ में इस तथ्य को कहते हैं — “इस संसार में योग संस्कारों से सम्पन्न जिस जीव का पवित्र एवं सम्माननीय जन्म होता है, वह संस्कारों की प्रबलता से योग का जिज्ञासु ही बनता है और जो उसकी सेवा करते हैं, वे भी योग जिज्ञासु ही होते हैं। वे सब, अग्नि जैसे इन्धनों को वैसे, समस्त अशुद्धि को योग से जला डालते हैं।”

इस प्रकार वर्त्तमान जन्म के कर्मानुसार एवं ज्ञानानुसार ही अगले जन्मों की प्राप्ति होती और उस जन्म में प्राप्त होने वाली शरीर और चित्त की योग्यताओं के आधार पर विविध ऐश्वर्यों की प्राप्ति जन्म-जात सिद्धि कहलाती है। भोज ने इसका उदाहरण देते हुए कहा हैं जैसे कपिल आदि ऋषियों को जन्म के पश्चात् अल्पकाल में ही ज्ञानादि सांसिद्धिक गुणों की प्राप्ति हुई। इसी प्रकार पूर्व जन्म में कृत योगाभ्यास के फल से कुछ पुरुषों में विवेक वैराग्य आदि की शीघ्र प्राप्ति हो जाना और अन्यों को न होना, भी इसके उदाहरण जानने चाहिए।

२. औषधि-जात सिद्धि :— पुरुष को औषधि प्रयोग से प्राप्त होने वाली शारीरिक और मानसिक दृढ़ता एवं योग्यताओं से ऐश्वर्य = सुख विशेष की प्राप्ति को औषधि-जात सिद्धि कहा जाता है। आयुर्वेद में रसायन सेवन से शारीरिक पुष्टि का निर्देश मिलता है। इसी प्रकार कई औषधियों से, यथा त्रिफलाकल्प एवं लहसुनकल्प आदि के विधिपूर्वक सेवन से, शारीरिक कायाकल्प और बलवृद्धि आदि का वर्णन आयुर्वेद में मिलता है।

महर्षि व्यास ने असुर भवनों में रसायन आदि का प्रयोग कहा है। जिसके आधार पर बहुधा भाष्यकारों ने असुरों के आवास आदि में रसायन आदि के सेवन = प्रयोग को कहा है। वस्तुतः यहाँ असुर का अभिप्राय प्राण पोषक करने वाला है, अतः असुरभवन से वह स्थान लक्षित है जहाँ पुरुष के प्राणों की पुष्टि होती हो यथा चिकित्सालय आदि। अतः चिकित्सालय आदि में रोगी पुरुष के प्राणों के पोषण हेतु औषधि, रसायन आदि के प्रयोग से होने वाली शारीरिक नीरोगता को औषधि से होने वाली सिद्धि जानना चाहिए।

इस प्रकार से कायाकल्प एवं शरीर पुष्टि के साथ, चित्त में स्थिरता तथा विलक्षण परिणाम भी देखा जाता है। अतः औषधि सेवन से चित्त का निर्माण भी परोक्ष रूप से देखा जाना, चित्त की विभिन्न स्थिति = अवस्था का ज्ञापक है।

३. मन्त्र-जात सिद्धि :— महर्षि व्यास कहते हैं — “मन्त्रैराकाशगमनाणिमादिलाभः” अर्थात् मन्त्रों से आकाशगमन और अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति होती है। इस विषय में भाष्यकारों ने गायत्री आदि मन्त्रों के जप से उपरोक्त सिद्धियों को कहा है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.४२ में आकाशगमन हेतु काया और आकाश के सम्बन्ध में संयम तथा लघुतूलसमापत्ति को कहा है; तथा ३.४५ में अणिमादि सिद्धियों हेतु भूतजय को कहा है। यहाँ इस सूत्र में मन्त्रों से उपरोक्त दोनों सिद्धियों को स्पष्ट रूप से कहा है। अगर मात्र मन्त्र जप से ऐसा होना और मानना सम्भव होता तो विभूतिपाद में निर्दिष्ट अति क्लिष्ट संयम के विधान की आवश्यकता ही नहीं थी। अतः यहाँ मन्त्र से मात्र ‘‘मन्त्र-जप’’ ही अभिप्रेत नहीं है, इसके रहस्य को समझना चाहिए।

महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थप्रकाश के ११वे समुल्लास का निम्न प्रकरण द्रष्टव्य है, जहाँ महाभारत काल के इतिहास का वर्णन हो रहा है —

“प्रश्न — जो आग्नेयास्त्र आदि विद्या लिखी है, वे सत्य है वा नहीं ? और तोप तथा बन्दूक तो उस समय में थी वा नहीं ?

उत्तर — ये बात सच्ची है, ये शस्त्र भी थे। क्योंकि पदार्थविद्या से इन सब बातों का सम्भव है।

प्रश्न — क्या वे देवताओं के मन्त्रों से सिद्ध होते थे ?

उत्तर — नहीं। ये सब बातें जिनसे अस्त्र-शस्त्रों को सिद्ध करते थे, वे “मन्त्र” अर्थात् विचार से सिद्ध करते और चलाते थे। और जो “मन्त्र” अर्थात् शब्दमय होता है, उससे कोई द्रव्य उत्पन्न नहीं होता। और जो कोई कहे कि मन्त्र से अग्नि उत्पन्न होता है, तो मन्त्र के जप करने वाले के हृदय और जिह्वा को भस्म कर देवे। मारने जाय शत्रु को और मर रहै आप। इसलिये “मन्त्र” नाम है विचार का। जैसा राजमन्त्री अर्थात् राज कर्मों का विचार करने वाला कहाता है, वैसा “मन्त्र” अर्थात् विचार से सब सृष्टि के पदार्थों का प्रथम ज्ञान और पश्चात् क्रिया करने से अनेक प्रकार के पदार्थ और क्रियाकौशल उत्पन्न होते हैं।”

अतः प्रथम मन्त्र अर्थात् विचार और पश्चात् उस विचार को पदार्थ विज्ञान द्वारा क्रियान्वित करने से उपरोक्त आकाशगमन और अणिमादि की सिद्धि सम्भव है। वेद में विमानविद्या के मन्त्रों द्वारा विमान का ज्ञान प्राप्त कर वैसा विमान बना कर आकाशगमन होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने इसे सिद्ध कर दिया है, और जनसामान्य इन विमानों से वायुयात्रा कर रहे हैं। इसी प्रकार से पदार्थविद्या के विद्वान् जानते हैं कि “हीलियम” गैस (= एक प्रकार की गैस का आधुनिक नाम) का वस्त्रादि में प्रयोग करने से व्यक्ति भूमि से ऊपर उठकर एक सीमा तक आकाशगमन की स्थिति को प्राप्त कर लेता। यह भी मन्त्र से आकाशगमन का एक क्रियात्मक उदाहरण है। इसी प्रकार अणिमादि के सम्बन्ध में मन्त्र = विचार से प्राप्त पदार्थविद्या की आवश्यकता का वर्णन हमने योगसूत्र ३.४५ की व्याख्या में कर दिया है।

४. तपोजा सिद्धि :— तप का अर्थ योगाङ्गों के अनुष्ठान हेतु सुख-दुःख, मान-अपमान, शीतता-ऊष्णता आदि द्वन्द्वों का सहन करना है। इस तप का फल, शरीर और इन्द्रियों की अशुद्धि का क्षय होना है। (योग० २.४३) इसी पूर्वोक्त सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं — “तदावरणमलापगमात्कायसिद्धिरणिमाद्या।” अर्थात् उस आवरण रूपी चित्त मल के दूर हो जाने से स्थूल और सूक्ष्म शरीर की सिद्धियाँ अणिमादि होती है।

यहाँ इस सूत्र के भाष्य में महर्षि व्यास कहते हैं — “तपसा संकल्पसिद्धिः, कामरूपी यत्र तत्र कामग इत्येवमादिः।” अर्थात् तप के अनुष्ठान से संकल्पसिद्धि अर्थात् यथेच्छ रूप वाला होकर जहाँ तहाँ कामनानुसार गमन करना आदि संकल्पों की पूर्त्ति जाननी चाहिए। यह संकल्प सिद्धि वस्तुतः तो योगी के चित्त के अविद्यादि मलों के दूर होने पर शरीर और इन्द्रियों की शुद्धि के परिणामस्वरूप होती है अर्थात् ऐसी अवस्था में योगी अपने सत्य संकल्पों को पूर्ण करने में समर्थ होता है। इसी कारण इसे तपोजा सिद्धि कहा जाता है। जिस प्रकार तप के अनुष्ठान का अणिमादि की प्राप्ति में परोक्ष रूप से सम्बन्ध है उसी प्रकार यहाँ संकल्पसिद्धि में जानना चाहिए। इस तप के अनुष्ठान से योगी के चित्त की अविद्यादि अशुद्धि रहित अवस्था होती है।

संकल्पसिद्धि के सम्बन्ध में छान्दोग्योपनिषद् के आठवें प्रपाठक का दूसरा खण्ड द्रष्टव्य है। छान्दो॰ ८.१.५ में परमात्मा को सत्यकाम एवं सत्यसंकल्प वाला कहा है। जो उसको जान कर उसके अनुकूल चलते हैं, वे जिस-जिस प्रदेश की कामना करने वाले होते हैं, उस-उस को प्राप्त होते हैं। इस दूसरे खण्ड में योगी के लिए कहा है कि “यदि वह पितृलोक की कामना वाला होता है तो इस योगी के संकल्पमात्र से पितरगण सम्यक् उपस्थित होते हैं और वह पितृलोक से सम्पन्न = समृद्ध होकर महिमा का अनुभव करता है। इसी प्रकार मातृलोक, भातृलोक, स्वसृलोक, सखिलोक, गन्धमाल्यलोक, अन्नपानलोक, गीतवादिमलोक, स्त्रीलोक कह कर अन्त में कहा है “यं यमन्तमभि कामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य संकल्पादेव समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नोमहीयते।” (छान्दो॰ ८.२.१०) अर्थात् जिस-जिस लोक = प्रदेश की कामना वाला होता है, वह प्रदेश और वह कामना इस योगी के संकल्प से ही प्राप्त होती है और उससे समृद्ध हुआ अपनी महिमा को अनुभव करता है।

यहाँ उपर्युक्त प्रकार से परमात्मा को जानकर योगी के संकल्पों की पूर्त्ति कही गई है, इस सन्दर्भ में तपोजा सिद्धि को भी समझा और जाना जा सकता है।

५. समाधिजा सिद्धि :— समाधि अर्थात् विभिन्न प्रकार के संयमों से होने वाली सिद्धियों का व्याख्यान विभूति पाद में कर दिया गया है।

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उपर्युक्त प्रकार से प्राप्त होने वाली सभी सिद्धियों के द्वारा मूल रूप से चित्त की विशिष्ट योग्यता का स्तर बनता है। अतः उपरोक्त प्रकार से पुरुष के चित्त की पाँच विभिन्न प्रकार की अवस्थाएँ होती हैं अर्थात् योगी पुरुष इन पाँच प्रकार से चित्त का निर्माण कर लेता है।