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जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥२॥

In Hindi:

पदपाठ : जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्र कायेन्द्रियाणामन्यजातीयपरिणतानाम् —

भूमिका हिंदी अर्थ : (तत्र) उनमें (अन्यजातीयपरिणतानाम्) अन्य जाति = दूसरे जन्म में परिणाम को प्राप्त हुए (कायेन्द्रियाणाम्) काया = शरीर और इन्द्रियों का —

हिंदी में अर्थ : (जात्यन्तरपरिणामः) अन्य जाति = जन्मान्तर = देहान्तर में परिणाम (प्रकृत्यापूरात्) प्रकृति = उपादान कारण के आपूर = प्रवेश होने से होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : पूर्वपरिणामापाय उत्तरपरिणामोपजनस्तेषामपूर्वावयवानुप्रवेशाद्भवति। कायेन्द्रियप्रकृतयश्च स्वं स्वं विकारमनुगृह्णन्त्यापूरेण धर्मादिनिमित्तमपेक्षमाणा इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तेषाम्) उन शरीर और इन्द्रियों के (पूर्वपरिणामापायः) पूर्व (जन्म के) परिणाम के अपाय = नष्ट होने पर (उत्तरपरिणामोपजनः) उत्तर = बाद के शरीर इन्द्रिय रूप परिणाम की उत्पत्ति, (अपूर्वावयवः) अपूर्व = नवीन अवयवों के (अनुप्रवेशात्) अनुप्रवेश से (भवति) होती है। (च) और (कायेन्द्रियप्रकृतयः) शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियाँ (= महाभूत और अहंकार) (स्वम् स्वम् विकारम्) अपने-अपने विकार को (अर्थात् महाभूत अपने विकार “स्थूलशरीर” को और अहंकार अपने विकार “ज्ञान एवं कर्म इन्द्रियों” को), (धर्मादिनिमित्तम्) धर्म आदि निमित्त की (अपेक्षमाणाः) अपेक्षा करते हुए, (आपूरेण) अपने नवीन अवयवों के अनुप्रवेश द्वारा (अनुगृह्णन्ति इति) अनुगृहीत करते हैं॥

वैदिक वृत्ति : इस सूत्र में जन्म-जात सिद्धि हेतु जात्यन्तर परिणाम को स्पष्ट रूप से कहा गया है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि पुरुष के लिए जन्मान्तर = देहान्तर में शरीर और इन्द्रियों में जो परिणाम होता है, वह परिणाम इन शरीर और इन्द्रियों की प्रकृतियों के अवयवों के प्रवेश से होता है। महर्षि व्यास इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि पूर्व जन्म के शरीर और इन्द्रियों का जो परिणाम था, उसके नष्ट होने पर, उत्तर जन्म में = अगले जन्म हेतु जो शरीर और इन्द्रियों की उत्पत्ति है, वह इनकी प्रकृतियों, अर्थात् शरीर की प्रकृति — “महाभूत” और इन्द्रियों की प्रकृति — “अहंकार”, के अवयवों के अनुप्रवेश से होती है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि महर्षि व्यास ने शरीर और इन्द्रियों के नवीन परिणाम हेतु इनकी प्रकृतियों के अपूर्व = नवीन अवयवों के अनुप्रवेश को कहा है, न कि मात्र प्रवेश से। अनुप्रवेश का अभिप्राय है कि जीवात्मा के नवीन शरीर हेतु गर्भ / अण्डे आदि में प्रथम प्रवेश के उपरान्त शरीर और इन्द्रियों के परिणाम हेतु इनकी प्रकृतियों के नवीन अवयवों का अनुप्रवेश।

जीवात्मा सूक्ष्म शरीर से अर्थात् मुख्यतया चित्त से परिवेष्टित रहता है, और उसका संचित कर्माशय भी चित्त में ही रहता है। जीवात्मा को देहान्तर की प्राप्ति भी, उसके द्वारा संचित, धर्म-अधर्म आदि निमित्तों की अपेक्षा से होती है। अतः जैसा उसका कर्माशय होता है, उसी प्रकार का जाति = जन्म परिणाम उसे ईश्वरीय व्यवस्था में प्राप्त होता है। अपने धर्माधर्म रूपी कर्माशय के परिणामस्वरूप जैसी जाति उसे प्राप्त होनी होती है, वह = जीवात्मा वैसी योनि = गर्भ आदि को प्राप्त होता है; और यहाँ उसके हेतु स्थूलशरीर और इन्द्रियों का नवीन परिणाम, उसके धर्माधर्म आदि निमित्तों की अपेक्षा से, महाभूतों और अहंकार के नवीन अवयवों के, उस गर्भाशय आदि में, अनुप्रवेश से हो जाता है। अर्थात् यदि उसे मनुष्य योनि प्राप्त होती है तो स्त्री गर्भाशय में शरीर और इन्द्रियों का वैसा परिणाम तदनुसार महाभूतों और अंहकार के नवीन अवयवों के प्रवेश द्वारा होता है; और यदि पशु आदि योनि प्राप्त होनी होती है, तो जिस गर्भ अथवा अण्डे आदि में वह प्रवेश करता है, वहाँ शरीर और इन्द्रियों का वैसा परिणाम तदनुसार महाभूतों और अंहकार के नवीन अवयवों के प्रवेश द्वारा प्राप्त हो जाता है।

इस सूत्र पर भोजवृत्ति सर्वथा सिद्धान्त विरुद्ध है, क्योंकि वर्त्तमान शरीर में अन्य जाति परिणाम सम्भव नहीं होता। यहाँ यह जानना चाहिए कि — जाति किसे कहते हैं ? इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते हैं “जाति जो जन्म से लेकर मरणपर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एक रूप से प्राप्त हो, ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह हैं, वे जाति शब्दार्थ से लिए जाते हैं।” (आर्योद्देश्यरत्नमाला — ३८)। जाति विषयक यह मान्यता महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास, दोनों की मान्यता के अनुकूल है, क्योंकि योगसूत्र २.१३ में कर्मफल के रूप में जाति का अर्थ — “जन्म” ही इन दोनों ऋषियों को अभिप्रेत है। अतः कोई भी योगी वर्त्तमान जन्म में अन्य जाति परिणाम को न तो स्वयं के लिए कर सकता और न ही अन्यों के लिए कर सकता।

अतः कुछ भाष्यकारों द्वारा वर्त्तमान जन्म में जाति परिणाम का कथन भोजवृत्ति से ही प्रभावित है, जबकि व्यासभाष्य से ऐसा अर्थ प्रतिपादित नहीं होता। नन्दीश्वर और नहुष आदि के जातिपरिणाम का अभिप्राय हमने योगसूत्र २.१२ की व्याख्या में स्पष्ट कर दिया है। महर्षि व्यास ने इन दोनों का उदाहरण अगले सूत्र की व्याख्या में भी दिया है, इस पर विशेष वहीं देखें।

इस सूत्र से स्पष्ट है कि जीवात्मा के, धर्म-अधर्म आदि निमित्तों की अपेक्षा से, प्रत्येक जन्म में जाति विशेष की प्राप्ति के अनुसार ही शरीर और इन्द्रियों में परिणाम प्राप्त होता रहता है। अतः वर्त्तमान काल में ब्रह्माकुमारी आदि वेदविरुद्ध नास्तिक सम्प्रदायों की यह मान्यता, कि मनुष्य प्रत्येक जन्म में मनुष्य और पशु विशेष प्रत्येक जन्म में वही पशु ही बनता है, खण्डित हो जाती है।