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चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्॥२२॥

In Hindi:

पदपाठ : चितेः अप्रतिसंक्रमायाः तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : कथम्—

भूमिका हिंदी अर्थ : (कथम्) किस प्रकार से भोक्ता पुरुष की सत्ता को स्वीकार किया जाता हैं —

हिंदी में अर्थ : (अप्रतिसंक्रमायाः) प्रतिसंक्रमण अर्थात् अन्य पदार्थों से घुलने-मिलने एवं संचार रूपी सभी क्रियाओं से रहित अर्थात् अपरिणामी (चितेः) चितिशक्ति = चेतन पुरुष को (तदाकारापत्तौ) उस विषयाकार चित्त से सम्बन्ध होने पर (स्वबुद्धिसंवेदनम्) विषय से युक्त अपने चित्त का ज्ञान होता है ॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद् वृत्तिमनुपतति। तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहस्वरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिराख्यायते। तथा चोक्तम्—

न पातालं न च विवरं गिरीणां, नैवान्धकारं कुक्षयो नोदधीनाम्।

गुहा यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं, बुद्धिवृत्तिमविशिष्टां कवयो वेदयन्ते॥ इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (हि) क्योंकि (अपरिणामिनी) अपरिणामी = किसी प्रकार के परिणाम से रहित, (च) और (अप्रतिसंक्रमा) प्रतिसंक्रमा = निर्लेप, विषयों में घुलने-मिलने से रहित (भोक्तृशक्तिः) भोक्तृशक्ति = भोग करने वाली चितिशक्ति (= चेतन जीवात्मा) (परिणामिनि अर्थे) परिणामी पदार्थ = चित्त में (प्रतिसंक्रान्ता इव) प्रतिसंक्रमित = चलाय- मान परिणामवाली की भाँति होकर (तद् वृत्तिम्) उस चित्त की वृत्ति का (अनुपतति) अनुगमन = अनुसरण करती है; (च) और (प्राप्तचैतन्योपग्रहस्वरूपायाः) चितिशक्ति = चेतन पुरुष के प्रकाश = सम्बन्ध से चेतन सदृश स्वरूप को प्राप्त (तस्याः) उस (बुद्धिवृत्तेः) बुद्धिवृत्ति = चित्तवृत्ति के (अनुकारमात्रतया) अनुकरणमात्र होने से (बुद्धिवृत्त्यविशिष्टाः हि) बुद्धिवृत्ति = चित्तवृत्ति से अविशिष्ट = अभिन्न ही (ज्ञानवृत्तिः) पुरुष की ज्ञानवृत्ति (आख्यायते) कही जाती है।

(तथा च उक्तम्) और शास्त्रों में ऐसा कहा है कि — (गुहा) गुफा (यस्याम्) जिसमें (शाश्वतम् ब्रह्म) शाश्वत = नित्य ब्रह्म (निहितम्) निहित है, वह (न पातालम्) न पाताल लोक है, (च) और (न गिरीणाम् विवरम्) न पर्वतों की कन्दरा = गुफा है, (न एव अन्धकारम्) न अन्धकार है, (न उदधीनाम् कुक्षयः) न समुद्र की तलहटी ही है, किन्तु (अविशिष्टाम् बुद्धिवृत्तिम्) चेतन पुरुष से अभिन्न बुद्धिवृत्ति = चित्तवृत्ति ही गुफा है, ऐसा (कवयः) क्रान्तदर्शी विद्वान् लोग (वेदयन्ते इति) प्रतिपादित करते हैं॥

वैदिक वृत्ति : पूर्व सूत्रों में प्रसंग यह चल रहा था कि चित्त को अपना भोक्ता / ज्ञाता स्वीकार कर लेने पर, किसी चेतन सत्ता को स्वीकार करने की आवश्यकता ही नहीं होगी। क्षणिकवादियों की इस मान्यता का खण्डन महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने पूर्व के दो सूत्रों में युक्तिपूर्वक किया है। पिछले सूत्र की व्याख्या के अन्त में महर्षि व्यास ने यह प्रतिपादित किया है कि सांख्य-योग शास्त्रकार “स्व” शब्द से चित्त के स्वामी चेतन पुरुष को ही चित्त का भोक्ता स्वीकार करते हैं। वह चेतन पुरुष किस प्रकार से भोक्ता कहाता है, इस विषय को स्पष्ट करते हुए सूत्रकार कहते हैं कि अपरिणामी एवं संक्रमण से रहित चेतन पुरुष, विषयों से तदाकार हुए चित्त से सम्बद्ध होता हुआ, चित्त और विषयों का ज्ञाता एवं भोक्ता होता है।

चितिशक्ति को अप्रतिसंक्रमा कहा गया है अर्थात् चेतन पुरुष निर्लेप तथा विषयों में घुलने-मिलने के स्वभाव से रहित है; यह अपने से भिन्न अन्य किसी भी पदार्थ के स्वरूप में मिश्रित नहीं होता। दूसरी ओर अचेतन पदार्थ भिन्न स्वभाव वाले है, जैसे कि —

(१) सत्त्व, रज और तम गुण गौण-प्रधान रूप से परिणाम को प्राप्त होने पर प्रधान गुण के साथ प्रतिसंक्रमित होते = उस प्रधान गुण की समान रूपता को प्राप्त हो जाते हैं; अथवा जैसे

(२) परमाणु प्रसार को प्राप्त होकर विभिन्न प्रकार से मिश्रित होते हुए एक पदार्थ के रूप में उपस्थित हो जाते हैं।

जबकि चितिशक्ति इस प्रकार के किसी भी प्रतिसंक्रमण से रहित है, अतः उसे अपरिणामी कहा गया है। दूसरी ओर चित्त, सत्त्वादि गुणों का परिणाम होने से परिणामी कहलाता है, जो कि पुरुष के भोग और अपवर्ग को सिद्ध करने वाला है। चेतन पुरुष किस प्रकार से विषयों का ज्ञान प्राप्त करता है, इस विषय को कहते हैं — चेतन पुरुष प्रतिसंक्रमण सा करता हुआ = चलायमान जैसा होकर, उस चित्त की वृत्तियों का अनुगमन करता हुआ, उस चित्त की वृत्तियों का ज्ञान प्राप्त करता है। जड़ चित्त उस चेतन पुरुष के सम्बन्ध से चेतनता को = चेतन सदृश स्वरूप को प्राप्त करता है, और उस चित्त की वृत्ति का अनुकरण होने से चित्त की वृत्ति ही पुरुष की ज्ञानवृत्ति बन जाती है, जैसे कि व्यवहार दशा में “ मैं क्रोधित हूँ ”, “ मैं अमुक विषय में रागयुक्त हूँ ”, “ मैं मोहित हूँ ”, “ मैं भयभीत हूँ”, इत्यादि इस प्रकार का व्यवहार उपर्युक्त स्थिति को स्पष्ट करता है। क्योंकि सभी प्रकार की वृत्तियाँ चित्तगत होती हुई भी, पुरुष उनको अपने में आरोपित करता हुआ वैसा ही व्यवहार करता है।

अतः चित्त जिस-जिस विषय से तदाकार होता है, पुरुष उस-उस विषय का ज्ञान प्राप्त करता है। परन्तु चित्त की विषयों से तदाकरिता स्वतः नहीं होती क्योंकि चित्त दृश्य = जड़ है। यह तो पुरुष की सन्निधि में उसकी प्रेरणा से चेतनवत् सा होकर इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त विषयों से तदाकारकारित होता है।

पुरुष द्वारा स्वबुद्धिसंवेदन के महत्त्व को दिखाने के लिए महर्षि व्यास ने एक श्लोक उद्धृत किया है, जिसका अभिप्राय है कि “ परब्रह्म न तो पाताल लोक में, न पर्वतों की कन्दरा में, न अन्धकार में, न समुद्र के तल में मिलता है; परन्तु चेतन पुरुष की चित्तवृत्ति ही वह गुफा है जहाँ वह निहित है।” इसका अभिप्राय यह है कि विद्वान् = योगी पुरुष सर्वप्रथम प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम = वेदज्ञान रूप प्रमाणों से ही परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करता हुआ ही तदनन्तर समाधिस्थ होकर ब्रह्म का साक्षात्कार करता है। जिस पुरुष ने प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त नहीं किया, वह समाधि की अवस्था में पुरुष = जीवात्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करने में कदापि समर्थ नहीं हो सकता। अतः चित्त की तदाकरिता से न केवल लौकिक व्यवहार ही सिद्ध होता है, बल्कि अध्यात्म व्यवहार भी इसी ज्ञानवृत्ति से सिद्ध होता है। इस प्रकार से यह परिणामी चित्त दृश्य होता हुआ, पुरुष के भोग और अपवर्ग दोनों को सिद्ध करने वाला होता है।

इस सूत्र की व्याख्या में पौराणिक भाष्यकारों ने चित्त की तदाकारिता को पुरुष-प्रतिबिम्ब के सिद्धान्त से जोड़ा है। वाचस्पतिमिश्र के अनुसार बुद्धि में पड़ा हुआ पुरुष प्रतिबिम्ब ही बुद्धि को चेतनवती के समान कर देता है, और तब वह विषयाकार में परिणत होती है। दूसरी ओर विज्ञानभिक्षु के अनुसार चित्प्रतिबिम्ब से चेतनवती बुद्धि विषयाकार परिणत होकर बुद्धिवृत्ति बनती है, और यह विषयाकारकारित बुद्धि शुद्ध पुरुषतत्त्व में स्वतः प्रतिबिम्बित होती है, परिणामस्वरूप पुरुष में पड़ा हुआ बुद्धि का यह प्रतिबिम्ब पुरुष को अपने आकार का कर देता है। अन्य पौराणिक भाष्यकारों ने इस प्रतिबिम्ब सिद्धान्त का किसी न किसी प्रकार से अनुकरण किया है। मूलसूत्र और व्यासभाष्य में प्रतिबिम्ब का कोई उल्लेख ही नहीं है, और न ही भोज ने इस सूत्र की व्याख्या में ऐसा कुछ कहा है। यहाँ यह जानना चाहिए कि प्रतिबिम्ब साकार का साकार में सम्भव होता है, न कि निराकार का साकार में अथवा साकार का निराकार में। ऐसा प्रतीत होता है कि इन भाष्यकारों ने यह सिद्धान्त आचार्य शंकर की अद्वैतवाद की अवैदिक मान्यता से लिया है जहाँ पर वे जीव को ब्रह्म का प्रतिबिम्ब एवं चिदाभास को कहते हैं। वस्तुतः चेतन पुरुष निराकार होने से उसका अन्य पदार्थ, चित्त = बुद्धि में अथवा बुद्धिवृत्ति = चित्तवृत्ति का पुरुष में प्रतिबिम्ब नहीं घटता। अतः इस प्रकार का व्याख्यान महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास के सिद्धान्तों के अनुसार नहीं है। इस विषय में पौराणिक भाष्यकार यह कहते हैं कि योगसूत्र ४.२३ में महर्षि व्यास ने भाष्य करते हुए प्रतिबिम्ब के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। यह कथन भी उस सूत्र के भाष्य को न समझने के कारण ही है, वहाँ जो प्रतिबिम्ब को कहा है, वह पुरुषगत नहीं है। इसकी विशेष व्याख्या वहीं देखें।