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तदसंख्येयवासनाभिश्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्॥२४॥

In Hindi:

पदपाठ : तत् असंख्येयवासनाभिः चित्रम् अपि परार्थम् संहत्यकारित्वात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : कुतश्चैतत् —

भूमिका हिंदी अर्थ : (च) और (एतत्) यह चित्त से भिन्न द्रष्टा पुरुष को स्वीकार करना (कुतः) कैसे संगत है —

हिंदी में अर्थ : (तत्) वह चित्त (असंख्येयवासनाभिः) असंख्य वासनाओं से (चित्रम्) चित्रित = युक्त होता हुआ (अपि) भी (संहत्यकारित्वात्) संहत = प्रकृति के सत्त्व, रज, तम रूप गुणों से निर्मित होने से (परार्थम्) पर = पुरुष के अर्थ = प्रयोजन को सिद्ध करने वाला है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : तदेतच्चित्तमसंख्येयाभिर्वासनाभिरेव चित्रीकृतमपि परार्थं परस्य भोगापवर्गार्थं न स्वार्थं संहत्यकारित्वात् गृहवत्। संहत्यकारिणाऽचित्तेन न स्वार्थेन भवितव्यम्। न सुखचित्तं सुखार्थं न ज्ञानं ज्ञानार्थंमुभयमप्येतत्परार्थम्। यश्च भोगेनापवर्गेण चार्थेनार्थवान्पुरुषः स एव परो न परः सामान्यमात्रम्। यत्तु किञ्चित्परं सामान्यमात्रं स्वरूपेणोदाहरेद्वैनाशिकस्तत्सर्वं संहत्यकारित्वात्वरार्थमेव स्यात्। यस्त्वसौ परो विशेषः स न संहत्यकारी पुरुष इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (तत्) वह (एतत्) यह (चित्तम्) चित्त (असंख्येयाभिः) असंख्य = अगणित (वासनाभिः एव) वासनाओं से (चित्रीकृतम्) चित्रित = युक्त होता हुआ (अपि) भी (परार्थम्) परार्थ है अर्थात् (परस्य) दूसरे अर्थात् चेतन पुरुष के (भोगापवर्गार्थम्) भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए है, (न स्वार्थम्) अपने किसी प्रयोजन को सिद्ध करने वाला नहीं है; इसमें हेतु देते हैं — (संहत्यकारित्वात्) संहत = सत्त्वादि गुणों के मिश्रण से मिलकर कार्य करने वाला होने से, (गृहवत्) घर के समान। अतः (संहत्यकारिणा) संघात होने एवं संघात रूप से कार्य करने वाला (चित्तेन) चित्त (स्वार्थेन) अपने प्रयोजन को सिद्ध करने वाला (न) नहीं (भवितव्यम्) हो सकता। इसे स्पष्ट करते हैं — (सुखचित्तम्) सुखरूप से परिणत हुआ = अनुकूलात्मक रूप सुख (सुखार्थम्) चित्त के सुख के लिए (न) नहीं है; (ज्ञानम्) चित्त में उत्पन्न ज्ञान = विषयों की तदाकारिता एवं विवेक वैराग्यादि से उत्पन्न ज्ञान (ज्ञानार्थम्) चित्त के ज्ञान के लिए (न) नहीं है। (एतत् उभयम् अपि) चित्त के ये दोनों = भोग और ज्ञान रूप परिणाम भी (परार्थम्) परार्थ = चित्त से भिन्न “पर” के प्रयोजन के लिए हैं। (च यः) और जो (भोगेन अपवर्गेण च) भोग और अपवर्ग रूप (अर्थेन) प्रयोजनों से सम्बद्ध (अर्थवान्) अर्थ = प्रयोजन वाला (पुरुषः) चेतन पुरुष है, (सः) वह (एव) ही (परः) परार्थ से लक्षित “पर” है, (सामान्यमात्रम्) कोई सामान्यमात्र (= अन्य कोई संहत पदार्थ) (परः) “पर” (न) नहीं हो सकता।

(यत् तु) जो तो (वैनाशिकः) वैनाशिक = क्षणिकवादी लोग (किञ्चित्) किसी (सामान्यमात्रम्) अन्य सामान्यमात्र पदार्थ को (परम्) “पर” शब्द से बोध्य मानकर उस पदार्थ के (स्वरूपेण) स्वरूप से (उदाहरेत्) उदाहरण देवें, तो (तत्) वह (सर्वम्) सभी पदार्थ (संहत्यकारित्वात्) संघात रूप होने से एवं संघात रूप से कार्य करने वाले होने से (परार्थम्) परार्थ (एव) ही (स्यात्) सिद्ध होंगे। दूसरी ओर (यः तु) जो तो (असौ) वह (परः विशेषः) “पर” शब्द से वाच्य चित्त से भिन्न (पुरुषः) चेतन पुरुष है (सः) वह (न संहत्यकारी इति) न तो सत्त्वादि गुणों का संघात है और न ही संघात रूप से कार्य करने वाला है॥

वैदिक वृत्ति : पिछले सूत्र की व्याख्या करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं यद्यपि चित्त ही ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता रूप से ज्ञात होता है; फिर भी ये तीनों पदार्थ स्वरूप से भिन्न-भिन्न हैं, और जो विद्वान् इन तीनों को भिन्न-भिन्न ही जानते हैं, वे ही सम्यग्दर्शी = यथार्थ रूप से जानने वाले होते हैं। यहाँ प्रश्न होता है कि जब चित्त ही ग्रहीता रूप से ज्ञात होता है, तो चित्त से भिन्न चेतन पुरुष को स्वीकार करना और ऐसे ज्ञान वाला ही यथार्थ द्रष्टा किस प्रकार से है? इस विषय में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि वह चित्त अनन्त काल से असंख्य वासनाओं से युक्त होता हुआ भी, संहत्यकारी होने से, अपने भिन्न चेतन पुरुष के भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है।

शास्त्रकारों का यह सुदृढ़ सिद्धान्त है कि जो पदार्थ संहत = अन्य द्रव्यों से मिलकर बना होता है, वह अपने प्रयोजन वाला न होकर, अपने से भिन्न किसी अन्य के प्रयोजन को सिद्ध करने वाला होता है। चित्त भी प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों से मिलकर बना है, अतः संहत है, इससे यह भी परार्थ है। महर्षि कपिल सांख्य दर्शन में कहते हैं — “संहतपरार्थत्वात्॥” सांख्य १.१४०॥ अर्थात् संहत पदार्थ परार्थ = अपने से भिन्न का प्रयोजन सिद्ध करने वाले होते हैं जैसे शय्या आदि। वह “पर” क्या है, इसको स्पष्ट किया है —

संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य॥ सांख्य० १.६६॥

यहाँ प्रकृति के सत्त्वादि गुणों से कार्य-कारण प्रक्रिया से अनुलोम और प्रतिलोम क्रम को दिखला कर इसको कहा है कि — सत्त्वादि गुणों से संहत = बने हुए प्रकृति के सभी विकार परार्थ हैं, और वह “पर” पुरुष है जिसके भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों का, प्रकृति के विकारों द्वारा सम्पादन होता है।

इस प्रकार चित्त भी संहत्यकारी = सत्त्वादि गुणों के संघात से बना होकर कार्य करने वाला है। इस चित्त में अनादि काल से, अनन्त जन्मों की वासनायें भी चित्रित हैं। फिर भी यह अपने किसी प्रयोजन को सिद्ध नहीं करता, क्योंकि यह जड़ प्रकृति का परिणाम होने से जड़ ही है, और जड़ = अचेतन पदार्थ का अपना कोई प्रयोजन नही होता। यह चित्त भी अपने से भिन्न चेतन पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है। अर्थात् अनन्त जन्मों में सुख-दुःख रूपी भोगों का भोक्ता चित्त का स्वामी चेतन पुरुष ही है। इसमें हेतु दिया है कि संहत्यकारी होने से = सत्त्वादि गुणों के मिश्रण से बनकर, कार्य करने वाला होने से चित्त भी, घर आदि के समान, परार्थ है। जैसे विभिन्न द्रव्यों से मिलकर बना हुआ घर, अपने से भिन्न के लिये होता है; वैसे ही सत्त्वादि गुणों के संघात से बना चित्त भी अपने से भिन्न “पर” के लिये है। इसको स्पष्ट करते हुए कहा है — विषयों की अनुकूलता से चित्त में सुख का होना चित्त के लिये नहीं है, अर्थात् सुख-दुःख आदि का भोग जड़ चित्त के लिये नहीं होता; और इसी प्रकार से चित्त में विषयों की तदाकारिता से, और विवेक-वैराग्य आदि से उत्पन्न हुआ ज्ञान भी चित्त के लिये नहीं है; अर्थात् न तो भोग का सम्पादन इस चित्त के लिये होता, और न ही ज्ञान और ज्ञान से अन्ततः प्राप्त होने वाला अपवर्ग भी चित्त के लिये है। ये दोनों = भोग और ज्ञान रूप परिणाम इस चित्त से भिन्न, अन्य के लिये ही हैं; और वह “पर”, जो भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों वाला है, चेतन पुरुष = जीवात्मा ही है। यहाँ यह जानना चाहिए कि वह “पर” केवल और केवल मात्र चेतन पुरुष रूप जीवात्मा ही है, न कि चित्त से भिन्न कोई अन्य संहत पदार्थ मात्र।

यदि कोई क्षणिकवादी यह कहे कि “पर” से चेतन पुरुष को ग्रहण करने की क्या आवश्यकता है ? चित्त से भिन्न कोई भी पदार्थ “पर” हो सकता है। जैसे “घर” अपने से भिन्न शरीरधारी प्राणी के भोग के लिये है, वैसे ही चित्त के विषय में भी जानना चाहिए। इसका उत्तर यह है कि यदि चेतन पुरुष से भिन्न कोई भी पदार्थ = प्रकृति का कोई भी विकार “पर” शब्द से स्वीकार किया जायेगा, तो वह भी संहत होने से परार्थ ही सिद्ध होगा। देखो, प्रकृति के सभी विकार, प्राणियों के शरीर, इन्द्रियाँ, बुद्धि आदि सभी पदार्थ सत्त्वादि गुणों के विभिन्न मिश्रणों के परिणाम हैं, अतः सभी संहत्यकारी हैं; और कोई भी संहत्यकारी पदार्थ अपने किसी प्रयोजन को सिद्ध करने वाला नहीं होता। दूसरी ओर चेतन पुरुष प्रकृति से भी सूक्ष्म तथा उससे भिन्न है, और वह, प्रकृति के सत्त्वादि गुणों से या अन्य किन्हीं कल्पित पदार्थों से मिलकर न बना होने से, असंहत है, और वही जन्म-मरण के संसार-चक्र में लगा हुआ “पर” है, जिसके भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए ईश्वर निमित्त कारण होकर प्रकृति रूपी उपादान कारण से इस सृष्टि का निर्माण करता है, और जीवों को सुख-दुःख रूपी भोगों एवं अपवर्ग को उनके कर्मानुसार प्राप्त कराता है।

इसीप्रकार यहाँ “पर” शब्द से ईश्वर का ग्रहण भी नहीं हो सकता, क्योंकि सूत्रकार ने उसे वेदादि सत्यशास्त्रों के अनुकूल क्लेश, कर्म, कर्मफलों और वासनाओं से सर्वथा असम्बद्ध स्वीकार किया है। अतः चित्त की वासनाओं और उनके फलों का भोक्ता ईश्वर सिद्ध नहीं होता।

इसप्रकार यहाँ चेतन पुरुष की स्वतन्त्र सत्ता सिद्ध हो जाने से सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि आगे इसके अपवर्ग के विषय को विशेष रूप से प्रतिपादित करते हैं।