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विशेषदर्शिन आत्मभावभावनानिवृत्तिः॥२५॥

In Hindi:

पदपाठ : विशेषदर्शिनः आत्मभावभावना निवृत्तिः॥

हिंदी में अर्थ : (विशेषदर्शिनः) विवेकख्याति द्वारा चित्त और आत्मा के भेद का साक्षात्कार करने वाले योगी की (आत्मभावभावना) आत्मविषयक जिज्ञासा (निवृत्तिः) निवृत्त हो जाती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यथा प्रावृषि तृणाङ्कुरस्योद्भवेन तद्बीजसत्ताऽनुमीयते तथा मोक्षमार्गश्रवणेन यस्य रोमहर्षाश्रुपातौ दृश्येते तत्रापि अस्ति विशेषदर्शनबीजमपवर्गभागीयं कर्माभिनिर्वर्त्तितमित्यनुमीयते। तस्यात्मभावभावना स्वाभाविकी प्रवर्त्तते। यस्याभावादिदमुक्तं स्वभावं मुक्तवा दोषाद्येषां पूर्वपक्षे रुचिर्भवत्यरुचिश्च निर्णये भवति। तत्राऽऽत्मभावभावना कोऽहमासं कथमहमासं किंस्विदिदं कथंस्विदिदं के भविष्यामः कथं वा भविष्याम इति। सा तु विशेषदर्शिनो निवर्तते कुतः? चित्तस्यैवैष विचित्रः परिणामः, पुरुषस्त्वसत्यामविद्यायां शुद्धश्चित्तधर्मैंरपरामृष्ट इति। ततोऽस्यात्मभावभावना कुशलस्य विनिवर्त्तत इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यथा) जैसे (प्रावृषि) वर्षा ऋतु में (तृणाङ्कुरस्य) तृण = घास के अंकुरों के (उद्भवेन) उत्पन्न होने से (तत्) उस तृण के (बीजसत्ता) बीज की सत्ता का (अनुमीयते) अनुमान होता है; (तथा) वैसे ही (मोक्षमार्गश्रवणेन) मोक्ष मार्ग की वार्त्ता का श्रवण करने से (यस्य) जिस पुरुष के (रोमहर्षाश्रुपातौ) शरीर में रोमाञ्च और आँखों से आँसु बहना (दृश्येते) देखे जाते हैं, (तत्र अपि) उस पुरुष के चित्त में भी (अपवर्गभागीयम्) मोक्ष को प्राप्त कराने वाला (कर्माभिनिर्वर्त्तितम्) वर्त्तमान और पूर्व जन्मों में योगाङ्गानुष्ठान रूप कर्मों से सम्पादित (विशेषदर्शनबीजम्) सत्त्वपुरुषान्यताख्याति रूप विवेकज्ञान = यथार्थ ज्ञान का कारण (अस्ति) है, (इति) इस प्रकार से (अनुमीयते) अनुमान किया जाता है। (तस्य) उस पुरुष की (आत्मभावभावना) आत्मज्ञान विषयक भावना = जिज्ञासा (स्वाभाविकी) स्वाभाविक रूप से, (प्रवर्त्तते) प्रवृत्त होती है। (यस्य) जिस तत्त्वज्ञान के बीज का (अभावात्) अभाव होने पर (इदम् उक्तम्) यह कहा गया है कि “(स्वभावम्) अपनी भाव = आत्मसत्ता को (मुक्तवा) छोड़कर (दोषात्) अविद्यादि दोषों के कारण (एषाम्) इनकी (पूर्वपक्षे) सिद्धान्तहीन पूर्वपक्ष = अनात्मवाद में = चित्त ही भोक्ता है इस पक्ष में (रुचिः) रुचि (भवति) होती है, (च) और (निर्णये) चेतन पुरुष और जड़-चेतन भेद के निर्णय में (अरुचिः) अरुचि (भवति) होती है।”

(तत्र) इस सूत्र में (आत्मभावभावना) आत्मभावभावना का अभिप्राय यह है कि “(अहम् कः आसम्) मैं पूर्व जन्मों में कौन था ? (कथम् अहम् आसम्) उन जन्मों में किस प्रकार से और क्यों था ? (किंस्वित् इदम्) इस जन्म में मेरा यह यथार्थ स्वरूप क्या है ? (कथंस्वित् इदम्) इस जन्म में इस शरीर की प्राप्ति क्यों हुई ? (के भविष्यामः) भविष्यत् काल में क्या होंगे ? (कथम् वा भविष्यामः इति) और कैसे होंगे ?” (सा तु) वह आत्मविषयक भावना तो (विशेषदर्शिनः) विशेषदर्शी = आत्मख्याति प्राप्त योगी की (निवर्तते) निवृत्त हो जाती है। (कुतः) किस प्रकार से और क्यों ? (एषः) यह (विचित्र परिणामः) तीनों कालों में भिन्न-भिन्न रूप = शरीरादि की प्राप्ति रूप विचित्र परिणाम (चित्तस्य एव) चित्त का ही धर्म है, (पुरुषः तु) चेतन पुरुष तो (अविद्यायाम्) अविद्या के (असत्याम्) न रहने पर (शुद्धः) शुद्ध स्वरूप का है और (चित्तधर्मैः) चित्त के धर्मों से (अपरापृष्टः इति) असम्बद्ध होता है।

(ततः) इसलिये उस विवेकख्याति से (अस्य) इस (कुशलस्य) कुशल सम्यग्दर्शी योगी की (आत्मभावभावना) आत्मभाव भावना = आत्मविषयक जिज्ञासा (विनिवर्त्तते इति) पूर्णतः निवृत्त हो जाती है॥

वैदिक वृत्ति : साधक को चित्त से भिन्न पुरुष की सत्ता का बोध हो गया है। उस चेतन पुरुष का मुख्य पुरुषार्थ अपवर्ग = मोक्षप्राप्ति है, न कि सांसारिक भोग। सांसारिक भोगों को तो यह चेतन पुरुष, चित्त के सम्बन्ध से, अपनी जन्म-मरण की अनवरत यात्रा में भोगता ही आया है। इस संसारचक्र में उसे सदा दुःख की ही प्राप्ति हुई है, जो शरीरधारण हेतु गर्भवास से आरम्भ होकर मरण पर्यन्त किसी न किसी रूप से उसे मिलता रहता है। इस अनवरत यात्रा में उसे जब कभी सुख का थोड़ा सा आभास भी हुआ है, तो भी उस सुख के पीछे दुःख सदा उपस्थित रहा है।

दूसरी ओर, चेतन पुरुष के लिये, इस संसारचक्र के दुःखों से विपरीत, शाश्वत सुख की एक ऐसी स्थिति भी है जिसे अपवर्ग कहा जाता है। यह योगशास्त्र इसी अपवर्ग रूप फल का ही प्रतिपादन करता है। सूत्रकार अब चेतन पुरुष के लिये अपवर्ग की प्राप्ति का विशेष रूप से व्याख्यान कर रहे हैं।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि विशेषदर्शी पुरुष की आत्मविषयक जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है। अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में जब चित्त, चेतन पुरुष के आलम्बन से तदाकार होकर, चेतन पुरुष का ज्ञान कराता है, तब योगी को जड़ चित्त से भिन्न, चित्त से सर्वथा विपरीत स्वरूप वाले चेतन पुरुष का ज्ञान होता है। ऐसा योगी उस काल में उन दोनों = चित्त और पुरुष के भेद का साक्षात् करता है, और यह विशेषदर्शी कहाता है अर्थात् वह चित्त और पुरुष के भेद को देखने वाला होता है। इस स्थिति को वही योगी प्राप्त करने में समर्थ होता है, जिसका लक्ष्य कैवल्य प्राप्ति होता है। ऐसा योगी अपनी आत्मभावभावना को निवृत्त करने में समर्थ होता है।

शास्त्रकारों ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि मोक्ष की प्राप्ति एक जन्म में नहीं होती, किन्तु इसके लिये कई जन्मों में पुरुषार्थ करना होता है। इसमें साधक द्वारा अपनाये गये उपायों के मृदु, मध्य, अधिमात्र स्तर का होना तथा “परवैराग्य” रूपी संवेग का भी मृदु, मध्य अथवा तीव्र भेद के होने से प्रत्येक पुरुष को मुक्ति प्राप्ति हेतु भिन्न-भिन्न काल लगता है। अतः यह स्पष्ट है कि सभी साधक वर्त्तमान् जन्म में ही मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होते।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि किस पुरुष ने अपने पूर्व जन्मों में अपवर्ग प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ किया था? इसका उत्तर देते हुए महर्षि व्यास कहते हैं — जैसे वर्षाकाल में घास के अंकुर उत्पन्न होने से घास के बीजों की सत्ता का अनुमान होता है, कि यहाँ पर उस घास के बीज उपस्थित थे; उसी प्रकार जिस पुरुष को मोक्ष सम्बन्धी वार्त्ता अर्थात् मोक्ष के उपायों, मोक्ष में शाश्वतसुख प्राप्ति = सांसारिक दुःख रहित स्थिति की प्राप्ति होती है, आदि विषयों को सुनने से, शरीर में रोमाञ्च उत्पन्न हो जाये, उसकी आँखों से अश्रु बहने लगें, तो जानना चाहिए कि इस पुरुष ने पूर्व जन्मों में अपवर्ग प्राप्ति हेतु योग का अनुष्ठान किया था। ऐसे पुरुष की अपने विषय में = आत्मविषय में स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा रहती है। दूसरी ओर जिस पुरुष ने पूर्व जन्मों में ऐसा कोई पुरुषार्थ नहीं किया होता उस पुरुष की सांसारिक विषयों में ही स्वाभाविक रूप से रुचि रहती है, ऐसे पुरुष को प्रकृति और पुरुष के यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति में किसी प्रकार का उत्साह नहीं होता; उसके लिये वर्त्तमान जीवन और उस जीवन में मिलने वाले सुख-भोग के साधन ही सब कुछ होते हैं।

योगी पुरुष की आत्मभावभावना = आत्मविषयक जिज्ञासा कैसी होती है, इसको स्पष्ट करते हुए कहा है — “मैं पूर्व जन्म में कौन था? उस जन्म में किस कारण से और क्यों था?” यह उसकी अपने भूतकाल विषयक जिज्ञासा है। उसकी वर्त्तमान विषयक जिज्ञासा इस प्रकार से हैं — “इस जन्म में मेरा यथार्थ स्वरूप क्या है? इस जन्म में इस शरीर की प्राप्ति क्यों हुई?” और इसी प्रकार भविष्यत् काल विषयक जिज्ञासा इस प्रकार से होती है — “आगे क्या हूँगा? और कैसे अथवा क्यों हूँगा?”

भूतकाल विषयक जिज्ञासा से सामान्य रूप से यह ज्ञान होता है कि योगी अपने अर्थात् आत्मा के चेतन अपरिणामी स्वरूप को जानता है; वह जानता है कि यह आत्मा ही विभिन्न शरीरों को प्राप्त करती रही है। पूर्वकाल में प्राप्त हुए उन सभी शरीरों में, मैं अर्थात् चेतन सत्ता के रूप में अनुगत था, तथा मैं अपने कर्माशय के कारण ही कर्मफल भोग हेतु उन विभिन्न शरीरों को प्राप्त हो रहा था। और जब मेरे पाप और पुण्य कर्म, भोग के पश्चात्, समान हो गये थे तो परमात्मा की व्यवस्था में मुझे यह मनुष्य शरीर प्राप्त हुआ है। इस भूतकाल विषयक जिज्ञासा से यह कहा जाये कि योगी अपने पूर्वजन्मों के विषय में जानता है और उन जन्मों को प्राप्त करने का कारण = अपने शुभाशुभ संचित कर्माशय के विषय में भी जानता है, तो किन्हीं विशिष्ट योगियों के विषय में यह भी सम्भव है। क्योंकि यदि यह ज्ञान आत्मस्वरूप के सम्बन्ध में सामान्य रूप से कहा जाये तो प्रत्येक शरीर में आत्मा का स्वरूप एक सा ही रहता है, केवल चित्त में प्रधान रूप से फलोन्मुखी कर्माशय के कारण ही उसे विभिन्न शरीरों की प्राप्ति होती है, ऐसा वह सामान्य रूप से जानता है। परन्तु “उन जन्मों में किस कारण से था ?” इस प्रश्न का यही उत्तर उचित है कि योगी अपने पूर्व जन्मों और उन जन्मों की प्राप्ति के कारण शुभाशुभ कर्माशय का भी ज्ञान प्राप्त कर सकता है। देखो, महर्षि पतञ्जलि ने संस्कारों के साक्षात्कार से पूर्वजाति ज्ञान की विभूति को योगसूत्र ३.१८ में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है।

वर्त्तमानकाल विषयक जिज्ञासा को इस प्रकार से समझना चाहिए कि वर्त्तमान जन्म में मिले शरीर, इन्द्रियाँ, मन आदि क्या हैं ? इनका आत्मा से क्या सम्बन्ध है ? मेरा यथार्थ स्वरूप क्या है ? और इस शरीर की प्राप्ति किस प्रकार हुई ? अर्थात् पिछले शरीरपात के समय चित्तस्थ कर्माशय की क्या स्थिति थी, जिसके कारण वर्त्तमान में मनुष्य शरीर की प्राप्ति हुई, आदि-आदि ... इस प्रकार वर्त्तमान विषयक जिज्ञासा निवृत्त करता है।

भविष्यत् विषयक जिज्ञासा के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है कि आगे मैं क्या हूँगा ? और किस कारण से हूँगा ? अर्थात् वह वर्त्तमान में अपने कर्मों के विषय में विचारता है, अपने चित्त में उपस्थित अविद्यादि क्लेशों की स्थिति — प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न, उदार अवस्थाओं को जानता है। इन क्लेशों के कारण संचित होने वाले कर्माशय पर विचार करता है कि इस प्रकार की स्थिति में, इस शरीर वियोग के पश्चात् मेरी = अर्थात् आत्मा की क्या स्थिति होगी?, मेरे संचित कर्माशय के आधार पर किस प्रकार के शरीर प्राप्त होंगे?, अथवा क्या मैंने क्लेशों को दग्धबीजवत् कर दिया है?, क्या क्लेशों और कर्मों की निवृत्ति हो गयी है ? (सूत्र ४.३०); क्या मेरे कर्म अशुक्ल-अकृष्ण हैं? (सूत्र ४.७) जिसके परिणामस्वरूप मैं स्वरूपस्थिति को प्राप्त कर जन्म-मरण रूपी संसारचक्र से छूट जाऊँगा ? क्योंकि योगी यह स्पष्ट रूप से जानता है कि तीनों कालों में जन्म-मरण रूपी संसारचक्र की प्राप्ति, आत्मा = चेतन पुरुष का चित्त के साथ सम्बन्ध रहने के कारण ही होती है; अतः यह संसारचक्र, असंख्य वासनाओं से चित्रित चित्त का ही धर्म है। जब अविद्यादि क्लेश दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जायेंगे तो चित्त भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जायेगा और परिणामस्वरूप पुरुष इस संसारचक्र से छूटकर कैवल्य को प्राप्त कर लेगा, क्योंकि पुरुष तो स्वरूपतः शुद्ध ही है।

अतः इस प्रकार से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में चित्त और पुरुष के भेद का साक्षात् करने वाला योगी विशेषदर्शी कहलाता है, और ऐसे योगी की आत्मविषयक जिज्ञासायें निवृत्त हो जाती हैं।