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पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥ ३४॥

In Hindi:

पदपाठ : पुरुषार्थशून्यानाम् गुणानाम् प्रतिप्रसवः कैवल्यम् स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिः इति॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : गुणाधिकारक्रमसमाप्तौ कैवल्यमुक्तं तत्स्वरूपमवधार्यते—

भूमिका हिंदी अर्थ : (गुणाधिकारक्रमसमाप्तौ) सत्त्वादि गुणों के अधिकार = परिणामक्रम की समाप्ति होने पर (कैवल्यम्) कैवल्य की प्राप्ति (उक्तम्) कही गयी है; (तत्) उस कैवल्य का (स्वरूपम्) स्वरूप (अवधार्यते) निश्चित किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (पुरुषार्थशून्यानाम् गुणानाम्) भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों से रहित हुए बुद्धि आदि रूप से परिणत हुए गुणों का (प्रतिप्रसवः) अपने कारण = सत्त्व, रज और तम गुण रूप में लीन हो जाना (कैवल्यम्) कैवल्य = अपवर्ग है, (वा) अर्थात् (चितिशक्तिः) पुरुष = जीवात्मा (स्वरूपप्रतिष्ठा) अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है। (इति) यह शास्त्र की समाप्ति का सूचक है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (पुरुषार्थ०) अर्थात् कारण के सत्त्व, रजस् और तमोगुण और उनके सब कार्य, पुरुषार्थ से नष्ट होकर आत्मा में विज्ञान और शुद्धि यथावत् होके स्परूप प्रतिष्ठा = जैसे जीव का तत्त्व है, वैसा ही स्वभाविक शक्ति और गुणों से युक्त होके शुद्धस्वरूप परमेश्वर के स्वरूप, विज्ञान, प्रकाश और नित्य आनन्द में जो रहना है, उसी को कैवल्य = मोक्ष कहते हैं। (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : कृतभोगापवर्गाणां पुरुषार्थशून्यानां यः प्रतिप्रसवः कार्यकारणात्मनां गुणानां तत्कैवल्यम्, स्वरूपप्रतिष्ठा पुनर्बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात्पुरुषस्य चितिशक्तिरेव केवला, तस्याः सदा तथैवावस्थानं कैवल्यमिति॥

इति पातञ्जलयोगसूत्रे व्यासभाष्ये कैवल्यपादः चतुर्थः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (कृतभोगापवर्गाणाम्) पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग का सम्पादन कर चुके, अतः (पुरुषार्थशून्यानाम्) पुरुषार्थ से रहित हुये (कार्यकारणात्मनाम्) कार्य कारण रूप = महाभूतों से महत्तत्त्व पर्यन्त कार्य कारण रूप से विद्यमान (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों का (यः) जो (प्रतिप्रसवः) अपने मूल कारण रूप में लीन हो जाना है, (तत्) वह (कैवल्यम्) कैवल्य है। (पुरुषस्य) पुरुष का (स्वरूपप्रतिष्ठा) अपने स्वरूप में स्थित होना अर्थात् (पुनः) फिर से (बुद्धिसत्त्वानभिसम्बन्धात्) बुद्धि = चित्त से सम्बन्ध को प्राप्त न होना, (केवला) केवल (चितिशक्तिः एव) चेतन पुरुष रूप मात्र ही रह जाना, और (तस्याः) उस स्थिति का (सदा) निरन्तर (तथैव) उसी प्रकार से (अवस्थानम्) स्थित रहना = बना रहना (कैवल्यम्) कैवल्य = मोक्ष है। (इति) यह शास्त्र की समाप्ति का सूचक है॥

वैदिक वृत्ति : योगी, सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से चेतन पुरुष की श्रेष्ठता को जानता हुआ, परिणामी सत्त्वादि गुणों और उनके सम्पर्क में दोष देखता हुआ, परवैराग्य के अभ्यास द्वारा गुणों के प्रति तृष्णा रहित होता हुआ, सभी वृत्तियों का निरोध करता हुआ, असम्प्रज्ञात समाधि में अपने चेतनस्वरूप से चेतन परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाता है; और इस अवस्था में उसका चित्त, तीव्र संवेग = तीव्र परवैराग्य के अभ्यास द्वारा सत्त्वादि गुणों के प्रति समस्त प्रकार की वासनाओं से सर्वथा रहित हो जाता है, अर्थात् उसके चित्त के संस्कार दग्धबीजभाव की अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं। इस अवस्था में उसके चित्त में समस्त वासनाओं के दग्धबीजभाव को प्राप्त होने से सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम उस योगी के लिये समाप्त हो जाता है।

इस स्थिति के लिये महर्षि व्यास कहते हैं — “तदेवंभूतं चित्तमवसिताधिकरमात्मकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रलयं वा गच्छतीति॥” योगभाष्य १.५॥ अर्थात् इस प्रकार वृत्ति-संस्कार रहित चित्त कृतकार्य हुआ = सत्त्व, रज और तम गुणों के परिणामों से रहित हुआ आत्मा के समान पवित्र होकर रहता है तथा शरीरपात होने पर अपने मूल कारण प्रकृति में विलीन हो जाता है। इसी को “पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः” कहा है। देखो, सत्त्वादि गुणों का प्रयोजन आत्मा के भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना है, यही सत्त्वादि गुणों का पुरुषार्थ = पुरुष का अर्थ सम्पादन है। सत्त्वादि गुणों का परिणामक्रम महत्तत्त्व, अंहकार, मन, इन्दियाँ, तन्मात्रायें और महाभूत हैं। ये सभी विकार कार्य-कारण रूप होते हुये द्रष्टा = चेतन पुरुष के प्रयोजन को सिद्ध करते हैं। जब तक पुरुष अपवर्ग को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक भोग रूपी प्रयोजन अनवरत रूप से पुरुष को प्राप्त होता रहता है। अब जब पुरुष, योग का सम्पादन करता हुआ, क्लेश और कर्मों से निवृत्त होकर जीवन्मुक्ति की अवस्था को प्राप्त करता हुआ, अन्तिम लक्ष्य प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करता हुआ, अपने चित्तस्थ संस्कारों को भी दग्धबीजभाव की अवस्था में ले आता है, तब पुरुष के लिये सत्त्वादि गुण पुरुषार्थ शून्य हो जाते हैं; अर्थात् पुरुष के लिये अपवर्ग की अवस्था प्राप्त हो जाने से अब इनका कोई प्रयोजन शेष नहीं रहता — इसी अवस्था को सत्त्वादि गुणों की पुरुषार्थशून्य अवस्था कहा है। इस प्रकार से पुरुषार्थ शून्य हुये सत्त्वादि गुणों का परिणाम बुद्धि = चित्त भी पुरुष के समान शुद्ध हो जाता है। महर्षि पतञ्जलि ने विभूतिपाद के अन्तिम सूत्र में स्पष्ट रूप से कहा है कि — “सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति॥” योग० ३.५५॥ अर्थात् बुद्धि और पुरुष की शुद्धि की समानता होने पर कैवल्य होता है। पुरुष तो स्वरूपतः शुद्ध है, और जब तक बुद्धि = चित्त की शुद्धि पुरुषवत् नहीं होती, तब तक कैवल्य प्राप्ति असम्भव है। बुद्धि की शुद्धि हेतु महर्षि व्यास उक्त सूत्र की व्याख्या में स्पष्ट करते हैं — “यदा निर्धूतरजस्तमोमलं बुद्धिसत्त्वं पुरुषस्यान्यताप्रतीतिमात्राधिकारं दग्धक्लेशबीजं भवति तदा पुरुषस्य शुद्धिसारूप्यमिवापन्नं भवति, तदा पुरुषस्योपचरितभोगाभावः शुद्धिः। अर्थात् जब रजोगुण और तमोगुण के मलों से रहित सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि, पुरुष के भेदज्ञान मात्र अधिकार वाली, और दग्ध क्लेश बीज भाव वाली होती है, तब बुद्धि पुरुष की शुद्धि के समान स्वरूप को प्राप्त कर लेती है। और उस समय पुरुष में उपस्थित भोगों का अभाव हो जाना पुरुष की शुद्धि है।” अतः पुरुष के समान शुद्धि को प्राप्त बुद्धि = चित्त के लिये केवल प्रतिप्रसव, अर्थात् अपने मूल कारण सत्त्वादि गुणों में लीन होना, शेष रहता है। इस प्रकार से बुद्धि का अपने कारण सत्त्वादि गुणों में लीन हो जाना पुरुष का कैवल्य कहाता है।

पौराणिक भाष्यकारों ने इसे सत्त्वादि गुणों का कैवल्य माना है, जो कि सिद्धान्त विरुद्ध है। यह मान्यता व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी से विरुद्ध है। सत्त्वादि गुण तो जड़ हैं, उनका बन्ध और मोक्ष कदापि नहीं होता। देखो, ईश्वर रूपी निमित्त कारण द्वारा, उपादान कारण रूपी सत्त्वादि गुणों से सृष्टि का निर्माण होता है। अतः ये गुण तो ईश्वर की व्यवस्था में ही प्रतिसृष्टि परिणत होते हैं; और प्रलयकाल में प्रतिलोम क्रम से, प्रत्येक कार्य अपने-अपने कारण में लीन हो जाता है। सत्त्वादि गुण किसी एक कृतार्थ पुरुष के लिये नष्ट होते हुये भी अन्य सभी पुरुषों के लिये तो कार्यरत रहते हैं, अर्थात् उनका परिणाम क्रम अनवरत रूप से चालू रहता है। और फिर योगसूत्र २.२३ की व्याख्या में महर्षि व्यास कहते हैं — “या तु द्रष्टुः स्वरूपोपलब्धिः सोऽपवर्गः” अर्थात् जो तो द्रष्टा = पुरुष के स्वरूप का ज्ञान होना है, वह अपवर्ग है। अतः अपवर्ग पुरुष का है न कि सत्त्वादि गुणों का।

बुद्धि के अपने कारण में लीन हो जाने पर क्या अवस्था होती है यह सूत्र के दूसरे भाग में कहा है — “स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिः।” यहाँ ‘वा’ शब्द विकल्प अर्थ में न होकर समुच्चय अर्थ में है। इसका अभिप्राय है — अर्थात् चेतन पुरुष अपने चेतनस्वरूप में स्थित हो जाता है। इस वाक्य के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुये महर्षि दयानन्द लिखते हैं “ ....... आत्मा में विज्ञान और शुद्धि यथावत् होके स्परूप प्रतिष्ठा = जैसे जीव का तत्त्व है, वैसा ही स्वभाविक शक्ति और गुणों से युक्त होके शुद्धस्वरूप परमेश्वर के स्वरूप, विज्ञान, प्रकाश और नित्य आनन्द में जो रहना है, उसी को कैवल्य = मोक्ष कहते हैं।” यहाँ ध्यान देना चाहिए पुरुषार्थ शून्य हुए बुद्धि आदि का अपने मूल कारण में प्रतिप्रसव = लीन हुये बिना आगे की स्थिति नहीं बनती। अतः उपर्युक्त अवस्था प्रतिप्रसव के उपरान्त की स्थिति का वर्णन है। क्लेश और कर्मों से निवृत्त हुए, तथा संस्कारों के दग्धबीज भाव अवस्था वाले जीवन्मुक्त योगी का जब वर्तमान शरीर छूटता है तो उसका चित्त, सूक्ष्म शरीर सहित सत्त्वादि गुणों में लय हो जाता है। आत्मा = पुरुष की उस समय की स्थिति का वर्णन यहाँ किया गया है।

पुरुष को वेदादि सत्यशास्त्रों में चेतनस्वरूप कहा गया है। यह जीवात्मा तो चेतनस्वरूप ही है —

एवं वा अरे अयमात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव॥ बृहदा॰ ४.५.१३॥

अर्थात् यह आत्मा अन्दर बाहर भेदरहित सम्पूर्ण प्रज्ञानघन = ज्ञानस्वरूप चेतन ही है। महर्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में लिखते हैं कि मुक्ति में भौतिक शरीर नहीं रहता। स्थूल शरीर के साथ-साथ सूक्ष्म शरीर जो कि सत्त्वादि गुणों का परिणाम रूप है वह भी नहीं रहता। यहाँ सूक्ष्म शरीर के विषय में स्पष्ट करते हुये कहते हैं “यह सूक्ष्म शरीर जन्ममरणादि में भी जीव के साथ रहता है। इसके दो भेद हैं — एक भौतिक अर्थात् जो सूक्ष्म भूतों के अंशों से बना है। दूसरा स्वाभाविक जो जीव के स्वाभाविक गुण रूप है। यह दूसरा अभौतिक शरीर मुक्ति में भी रहता है। इसी से जीव मुक्ति के सुख को भोगता है।” अर्थात् चेतनस्वरूप जीवात्मा का स्वाभाविक गुण रूप शरीर कैवल्य में भी रहता है। वह शरीर कैसा है? महर्षि दयानन्द शतपथ ब्राह्मण के प्रमाण से कहते हैं —

“शृण्वन् श्रोत्रं भवति, स्पर्शयन् त्वग्भवति, पश्यन् चक्षुर्भवति, रसयन् रसना भवति, जिघ्रन् घ्राणं भवति, मन्वानो मनो भवति, बोधयन् बुद्धिर्भवति, चेतयंश्चित्तम्भवत्यहङ्कुर्वाणोऽहङ्कारो भवति॥

अर्थात् जब सुनना चाहता है तब श्रोत्र, स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा, देखने के सङ्कल्प से चक्षु, स्वाद के अर्थ रसना, गन्ध के लिये घ्राण, संकल्प-विकल्प करते समय मन, निश्चय करने के लिये बुद्धि, स्मरण करने के लिये चित्त और अहंकार के अर्थ अंहकार रूप अपनी स्वशक्ति से जीवात्मा मुक्ति में हो जाता है और संकल्पमात्र शरीर होता है। जैसे शरीर के आधार रह कर इन्द्रियों के गोलक द्वारा जीव स्वकार्य करता है, वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में सब आनन्द भोग लेता है।

प्रश्न — उसकी शक्ति कै प्रकार की और कितनी है ?

उत्तर — मुख्य एक प्रकार की शक्ति है, परन्तु बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति, भीषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा, प्रेम, द्वेष, संयोग, विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, स्वादन और गन्धग्रहण तथा ज्ञान इन २४ चौबीस प्रकार के सामर्थ्ययुक्त जीव है। इससे मुक्ति में भी आनन्द की प्राप्ति भोग करता है।” (सत्यार्थप्रकाश नवम समुल्लास)

अतः पुरुष अपने चैतन्य स्वरूप में स्थित होकर, अपने शुद्ध स्वाभाविक गुण युक्त सङ्कल्पमय शरीर वाला होता हुआ, परमेश्वर के स्वरूप, विज्ञान, प्रकाश और नित्य आनन्द से युक्त होता हुआ, अव्याहतगति से अनन्त परमात्मा में विचरता है। यही कैवल्य की अवस्था है। महर्षि दयानन्द द्वारा प्रतिपादित इस स्थिति का प्रमाण छान्दोग्योपनिषद् का निम्न वचन है—

अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत ॥

॥ छान्दोग्य० ८.३.४॥

अर्थात् जो यह जीवात्मा है वह इस शरीर से उठ कर अर्थात् इस शरीर को त्यागकर परमात्म-ज्योति के सान्निध्य को पाकर निजरूप से वर्तमान रहता हुआ उस परमात्मा के अभ्यन्तर चारों ओर विचरता है।

महर्षि पतञ्जलि सर्ववृत्तिनिरोध होने पर वर्तमान शरीर में ही स्वरूपस्थिति को मानते हैं। और वह स्वरूपस्थिति असम्प्रज्ञात समाधि में चेतन पुरुष की चेतन परमात्मा में होती है। इसको उक्तसूत्र १.३ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है।

पौराणिक भाष्यकारों ने स्वरूपस्थिति को मात्र जीवात्मा के चेतनस्वरूप में स्थिति को ही माना है, परन्तु यह भ्रान्ति वेदादि सत्यशास्त्रों को न समझने के कारण ही है। देखो, मुक्ति परमात्म-साक्षात्कार के बिना सम्भव नहीं होती, इसमें निम्न प्रमाण द्रष्टव्य हैं —

१. यजुर्वेद में मृत्यु से पार पाने का उपाय परमात्म-ज्ञान = परमात्म-साक्षात्कार कहा है —

तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥ (यजु॰ ३१.१८)

२. महर्षि व्यास अपने ग्रन्थ वेदान्तसूत्रों में आडुलौमि आचार्य का मत दर्शाते हैं —

चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः॥ वेदान्त० ४.४.६॥

अर्थात् अविद्यादि दोषों से छूट शुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थित हुआ जीवात्मा ब्रह्मस्वरूप के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होता है। इसी प्रकार जैमिनि का मत भी दर्शाते हैं —

ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः ॥ वेदान्त० ४.४.५॥

अर्थात् जीवात्मा ब्रह्म की सन्निधि से, मुक्ति की अवस्था में, युक्त हो जाता है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है।

३. रसो वै सः। रसं हि एव अयं लब्ध्वा आनन्दी भवति॥ तै॰ उप० २.७॥

अर्थात् परमात्मा आनन्द स्वरूप है, यह जीवात्मा उसके रस = आनन्द को पाकर आनन्दी हो जाता है।

इस प्रकार के प्रमाण वेदादि सत्यशास्त्रों में बहुलता से पाये जाते हैं।

इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास लिखते हैं — “तस्याः सदा तथैवावस्थानं कैवल्यमिति॥” अर्थात् उस स्वरूपस्थिति का सदा, उसी प्रकार से बना रहना, कैवल्य है। यहाँ ‘सदा’ का अभिप्राय निरन्तर है, ना कि अनन्त काल पर्यन्त। मुक्ति के काल को महर्षि दयानन्द ने ३६००० कल्प पर्यन्त कहा है अर्थात् ३६००० बार सृष्टि की उत्पत्ति और विनाश पर्यन्त जीवात्मा मुक्ति में रहता है। उसके उपरान्त पुनः अपने अभुक्त कर्माशय के आधार पर साधारण मनुष्य का जन्म लेता है। क्योंकि मुक्ति से पूर्व चित्तस्थ संस्कार = वासनायें किसी भौतिक पदार्थ के समान दग्ध नहीं होते वरन् उनके लिये दग्धबीजभाव की प्राप्ति को कहा गया है, जिसका अभिप्राय है कि परवैराग्य के निरन्तर अभ्यास और असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में परमात्म-साक्षात्कार से क्लेश, कर्म और संस्कार दग्धबीज के समान होकर अपने कार्य सम्पादन में असमर्थ हो जाते हैं। मुक्ति की अवधि के उपरान्त इन वासनाओं = संस्कारों की दग्धबीजभावता समाप्त हो जाती है , जिससे ये अपने कार्य सम्पादन में समर्थ हो जाते हैं; और पुरुष पुनः जन्म-मरण रूपी संसारचक्र को प्राप्त हो जाता है।

अतः इस प्रकार सत्त्वादि गुणों के परिणाम चित्त के अपने कारण मूल प्रकृति में लीन हो जाने पर, स्वरूपतः शुद्ध चेतन आत्मा अपने स्वरूप को प्राप्त कर, शुद्ध स्वरूप परमेश्वर के विज्ञान, प्रकाश एवं नित्य आनन्द को प्राप्त करता है, यही कैवल्य = मुक्ति की अवस्था है।

ओ३म् शन्नो॑ मि॒त्रः शं वरु॑णः॒ शन्नो॑ भवत्वय्र्य॒मा।

शन्न॒ऽइन्द्रो॒ बृह॒स्पतिः॒ शन्नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः॥ यजु॰ ३६.९॥

नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम्। ऋतमवादिषम्, सत्यमवादिषम्। तन्मामावीत्। तद्वक्तारमावीत्। आवीन्माम्। आवीद्वक्तारम्। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

॥ इति सतीशार्यविरचितायां पातञ्जलयोगसूत्रव्यासभाष्यराजमार्तण्डवृत्तिव्याख्यायां

वैदिकयोगमीमांसायां कैवल्यपादः चतुर्थः॥