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क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः॥३३॥

In Hindi:

पदपाठ : क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ कोऽयं क्रमो नामेति—

भूमिका हिंदी अर्थ : (अथ) अब (अयम्) यह (क्रमः नाम) क्रम नाम की वस्तु (कः) क्या है ? (इति) इसको कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (क्षणप्रतियोगी) क्षण समूह पर आश्रित रहने वाला तथा (परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः) परिणाम के अनन्तर = परिणाम की समाप्ति पर ज्ञात होने वाला (क्रमः) क्रम है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : क्षणानन्तर्यात्मा परिणामस्यापरान्तेनावसानेन गृह्यते क्रमः। न ह्यननुभूतक्रमक्षणा नवस्य पुराणता वस्त्रस्यान्ते भवति। नित्येषु च क्रमो दृष्टः। द्वयी चेयं नित्यता कूटस्थनित्यता परिणामिनित्यता च। तत्र कूटस्थनित्यता पुरुषस्य। परिणामिनित्यता गुणानाम्। यस्मिन्परिणम्यमाने तत्त्वं न विहन्यते तन्नित्यम्। उभयस्य च तत्त्वानभिघातान्नित्यत्वम्। तत्र गुणधर्मेषु बुद्ध्यादिषु परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः क्रमो लब्धपर्यवसानो नित्येषु धर्मिषु गुणेष्वलब्धपर्यवसानः। कूटस्थनित्येषु स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्तपुरुषेषु स्वरूपास्तिता क्रमेणैवानुभूयते इति तत्राप्यलब्धपर्यवसानः शब्दपृष्ठेनास्तिक्रियामुपादाय कल्पित इति।

अथास्य संसारस्य स्थित्या गत्या च गुणेषु वर्त्तमानस्यास्ति क्रमसमाप्तिर्न वेति। अवचनीयमेतत्। कथम्? अस्तिप्रश्न एकान्तवचनीयः सर्वो जातो मरिष्यति इति। ओं भो इति। अथ सर्वो मृत्चा जनिष्यत इति। विभज्यवचनीयमेतत्। प्रत्युदितख्यातिः क्षीणतृष्णः कुशलो न जनिष्यत इतरस्तु जनिष्यते। तथा मनुष्यजातिः श्रेयसी न वा श्रेयसीत्येवं परिपृष्टे विभज्यवचनीयः प्रश्नः पशूनधिकृत्य श्रेयसी देवानृषींश्चाधिकृत्य नेति। अयं त्ववचनीयः प्रश्नः संसारोऽयमन्तवानथानन्त इति। कुशलस्यास्ति संसारक्रमसमाप्तिर्नेतरस्येत्यन्यतरावधरणे दोषः। तस्माद्व्याकरणीय एवायं प्रश्न इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (क्षणानन्तर्यात्मा) क्षण के अनन्तर = पश्चात् होने वाले (परिणामस्य) परिणाम की (अपरान्तेन्) समाप्ति के द्वारा अर्थात् (अवसानेन) अवसान के द्वारा जो (गृह्यते) ग्रहण किया जाये, वह (क्रमः) क्रम है। (नवस्य वस्त्रस्य) नये वस्त्र के (अन्ते) अन्त में जो (पुराणता) पुरानापन है, वह (अननुभूतक्रमक्षणा) क्रम के आश्रित क्षणों का अनुभव किये बिना (हि) निश्चयपूर्वक (न) नहीं (भवति) होता। (च) और (नित्येषु) नित्य पदार्थों में (क्रमः) क्रम (दृष्टः) देखा जाता है। (अयम् नित्यता) यह नित्यता (द्वयी च) दो प्रकार की है — (१) (कूटस्थनित्यता) कूटस्थ नित्यता = अपरिणामी, निर्विकार नित्यता; (च) और (२) (परिणामिनित्यता) परिणामी नित्यता। (तत्र) उन दो प्रकार की नित्यताओं में से (पुरुषस्य) चेतन पुरुष की (कूटस्थनित्यता) कूटस्थ नित्यता है; और (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों की (परिणामिनित्यता) परिणामी नित्यता है, अर्थात् विकारों के होने पर भी मूल तत्त्व सत्त्वादि गुण मूलरूप से नष्ट नहीं होते। गुणों के परिणाम को प्राप्त होने पर भी नित्यता कैसे? (यस्मिन्) जिस पदार्थ के (परिणम्यमाने) स्वयं परिणत होते रहने पर भी (तत्त्वम्) उसका मूलतत्त्व (न विहन्यते) नष्ट नहीं होता, (तत्) वह पदार्थ (नित्यम्) नित्य कहा जाता है। (च) और (उभयस्य) दोनों = पुरुष और सत्त्वादि गुणों के (तत्त्वानभिघातात्) तत्त्व = मूल स्वरूप के नष्ट न होने से, (नित्यत्वम्) दोनों की नित्यता है।

(तत्र) उन दोनों में से (गुणधर्मेषु) सत्त्वादि गुणों के धर्म परिणाम (बुद्ध्यादिषु) बुद्धि आदि पदार्थों में (परिणामापरान्तनिर्ग्राह्यः) परिणाम की समाप्ति से ज्ञात होने वाला (क्रमः) क्रम (लब्धपर्यवसानः) लब्ध पर्यवसान = अन्त को प्राप्त करने वाला होता है, और (नित्येषु धर्मिषु गुणेषु) नित्य धर्मी सत्त्वादि गुणों में क्रम (अलब्धपर्यवसानः) समाप्ति को प्राप्त करने वाला नहीं होता।

कूटस्थ नित्य चेतन पुरुष में क्रम के विषय को कहते हैं — (कूटस्थनित्येषु) कूटस्थ नित्य (स्वरूपमात्रप्रतिष्ठेषु मुक्तपुरुषेषु) अपने स्वरूप में स्थित मुक्त पुरुषों में (स्वरूपास्तिता) स्वरूप का अस्तित्व (क्रमेण एव) क्रम से ही (अनुभूयते) अनुभूत होता है; (इति) इसलिये (तत्र अपि) उन में भी क्रम का (अलब्धपर्यवसानः) पर्यवसान = अन्त उपलब्ध नहीं होता, और वहाँ क्रम (शब्दपृष्ठेन) शब्द के आधार पर (अस्तिक्रियाम् उपादाय) “अस्ति” क्रिया अर्थात् “स्वरूपतः स्थित है” को लेकर (कल्पितः इति) कल्पित किया गया है।

(अथ) अब प्रश्न होता है कि (स्थित्या गत्या च) स्थिति और गति की अवस्था वाले (गुणेषु) सत्त्वादि गुणों के रूप में (वर्त्तमानस्य) विद्यमान (अस्य संसारस्य) इस संसार की (क्रमसमाप्तिः) क्रम समाप्ति (अस्ति) है (वा) अथवा (न इति) नहीं है? (एतत्) यह प्रश्न (अवचनीयम्) अवचनीय = एक शब्द में उत्तर देने योग्य नहीं है। (कथम्) कैसे अवचनीय है? (अस्ति प्रश्नः एकान्तवचनीयः) एक प्रश्न एकान्तवचनीय = “हाँ” या “ना” में उत्तर देने योग्य होता है, जैसे (सर्वः जातः) क्या उत्पन्न हुये सभी प्राणी (मरिष्यति इति) मरेंगे? (ओम् भो इति) इसका उत्तर है “हाँ” अर्थात् मरेंगे। (अथ) यदि कोई प्रश्न करे कि (सर्वा मृत्चा) सभी मृत्यु को प्राप्त हुए प्राणी (जनिष्यते इति) पुनः जन्म लेंगे? (एतत्) यह प्रश्न (विभज्यवचनीयम्) विभाग करके उत्तर देने योग्य है — (प्रत्युदितख्यातिः) जिसको विवेकख्याति = सत्त्वपुरुषान्तयाख्याति प्राप्त हो गयी है, (क्षीणतृष्णः) जिसकी तृष्णा = वासनायें नष्ट हो गयी हैं, ऐसा (कुशलः) कुशल योगी (न जनिष्यते) नहीं जन्मेगा, (इतरः तु) अन्य सभी प्राणी तो (जनिष्यते) जन्म लेंगे। (तथा) उसी प्रकार से (मनुष्यजातिः श्रेयसी) मनुष्य जाति श्रेष्ठ है (वा) अथवा (न श्रेयसी) नहीं है, (इति एवम्) इस प्रकार (परिपृष्टे) पूछे जाने पर, यह भी (प्रश्नः) प्रश्न (विभज्यवचनीयः) विभाग करके उत्तर देने योग्य है — (पशून्) पशुओं की (अधिकृत्य) तुलना में (श्रेयसी) श्रेष्ठ है, और (देवान् ऋषीन् च) देवों और ऋषियों की (अधिकृत्य) तुलना में (न इति) श्रेष्ठ नहीं है।

(अयम् तु प्रश्नः) यह प्रकृत प्रश्न कि “(अयम् संसारः) यह संसार (अन्तवान्) अन्तवाला = समाप्त होने वाला है (अथ) अथवा (अनन्तः इति) अनन्त = समाप्त न होने वाला है?” (अवचनीयः) एकान्तवचनीय नहीं है। इसका विभाग करके उत्तर देते हैं — (कुशलस्य) कुशल = सर्वथाविवेकख्याति = अविप्लवा विवेकख्याति वाले योगी के लिये (संसारक्रमसमाप्तिः) संसारक्रम की समाप्ति (अस्ति) है, और (इतरस्य न) अन्य प्राणियों के लिये संसारक्रम की समाप्ति नहीं है। (इति) इसलिये (अन्यतरावधरणे) दो में से किसी एक अवधारणा को स्वीकार करने पर (दोषः) दोष होगा। (तस्मात्) इस कारण से (व्याकरणीयः एव) विभाग करके उत्तर देने योग्य ही (अयम् प्रश्नः इति) यह प्रश्न है॥

वैदिक वृत्ति : पूर्वसूत्र में सत्त्वादि गुणों के परिणामक्रम को कहा है। क्रम क्या है? इसको इस सूत्र द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि क्षणों के अनन्तर, परिणाम की समाप्ति पर ग्रहण होने वाला क्रम है। वस्तुतः क्षण काल के अति अल्प काल का नाम है जिसका आगे विभाग नहीं हो सकता। एक क्षण के उपरान्त दूसरा क्षण उपस्थित होता है और इस प्रकार क्षणों की निरन्तरता बनी रहती है। इन क्षणों के आश्रित होता हुआ परिणाम की समाप्ति पर ज्ञात होने वाला क्रम कहाता है। परिणाम, स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार का होता है। स्थूल रूप से होने वाले परिणाम को साधारण जन भी जानते हैं यथा — मिट्टी से पिण्ड, पिण्ड से घट, घट से कपाल, कपाल से चूर्ण = मिट्टी के कण रूप परिणाम को साधारण मनुष्य भी प्रत्यक्ष करता है। परन्तु जो सूक्ष्म परिणाम होता है उसे योगी ही विशेष रूप से जानता है। कई स्थूल पदार्थों में भी क्रम का प्रत्यक्ष नहीं हो पाता, वहाँ क्रम का ज्ञान अनुमान से होता है, जैसे कि नवीन वस्त्र कालान्तर में पुराना होकर क्षीण = नष्ट हो जाता है, यह परिणामक्रम के आश्रित क्षणों के अनुभव किये बिना नहीं होता। अतः यहाँ वस्त्र में जो परिणाम है वह अनुमान से ज्ञात होता है।

सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया में सत्त्वादि गुणों से महत्तत्व, अंहकार, इन्द्रियाँ, तन्मात्रायें, और स्थूल भूत रूपी परिणाम होते हैं। परन्तु ये महत्तत्त्व आदि नामक परिणाम, परिणामक्रम की एक अवस्था विशेष को ही दर्शाते हैं। जबकि पूर्व दशा से उत्तर दशा में आने में असंख्य परिणाम हुये होते हैं जिनका कोई नामकरण नहीं होता; यथा सत्त्वादि गुणों की साम्यावस्था से महत्तत्त्व तक की अवस्था में आने हेतु अगणित परिणाम हुये, इसलिये इस अवस्था प्राप्ति को सत्त्वादि गुणों का एक ही परिणाम कहना अज्ञानता है। इसीप्रकार आगे के विकारों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए। इस प्रकार से एक अवस्था से दूसरी अवस्था प्राप्ति तक के असंख्य परिणामों के प्रत्येक परिणाम से क्रम का ज्ञान होता है, और इन क्रमों का ज्ञान योगी ही समाधि की अवस्था में कर सकता है, अन्यथा तो ये मात्र अनुमान से जानने योग्य हैं। परिणामों का यह जो प्रवाह होता है, वह क्रमों का ज्ञान कराता है। प्रथम क्षण के आरम्भ से क्रम का प्रारम्भ होकर दूसरे क्षण पर उस क्रम की समाप्ति होती है। वह क्षण जहाँ क्रम का आरम्भ होता है वह पूर्वान्त और अगला क्षण अपरान्त कहाता है।

क्रम के महत्त्व को इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि महर्षि पतञ्जलि विभूतिपाद में विवेकज्ञानसिद्धि को क्षण और उसके क्रम में संयम से कहते हैं। अर्थात् क्षण और उसके क्रम के बिना भौतिक पदार्थों का यथार्थ एवं सम्यक् रूप से विवेकज्ञान नहीं हो सकता; इस क्षण ज्ञान से ही जाति और लक्षण से समान पदार्थों में भेद ज्ञान हेतु देश भेद का निर्णय होता है।

महर्षि व्यास परिणामी पदार्थों के साथ-साथ नित्य पदार्थों में भी क्रम को कहते हैं। परिणामी पदार्थों में परिणाम के अनुसार क्रम ज्ञान तो स्वतः सिद्ध है। परन्तु नित्य पदार्थों में क्रम के विषय को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि नित्यता दो प्रकार की होती है —

१. कूटस्थ नित्यता अर्थात् जिसमें पदार्थ में किसी प्रकार का परिणाम नहीं होता अतः इसे अपरिणामी, निर्विकार नित्यता कहा जाता है। पुरुष = चेतन जीवात्मा और परमात्मा दोनों की कूटस्थ नित्य कहाते हैं।

२. परिणामी नित्यता का अभिप्राय है जिसमें पदार्थ में धर्म परिणाम होने पर भी मूलतत्त्व का नाश नहीं होता। सत्त्वादि गुणों की परिणामी नित्यता कही गयी है। सत्त्वादि गुणों के महत्तत्त्व, अंहकार आदि धर्मपरिणाम होते हुए भी, सत्त्वादि गुणों का नाश नहीं होता, अतः ये परिणामी नित्य कहाते हैं।

इन सत्त्वादि गुणों के धर्म परिणामों, यथा बुद्धि आदि में परिणाम की समाप्ति से जाना जाने वाला ‘क्रम’ अन्त को प्राप्त करने वाला होता है, जबकि नित्य धर्मी पदार्थ सत्त्वादि गुणों में उपलब्ध होने वाला ‘क्रम’ अन्त वाला नहीं होता। यहाँ शंका होती है कि चेतन पुरुष कूटस्थ नित्य होने से उसमें परिणाम का सर्वथा अभाव होने से उसमें ‘क्रम’ का कथन किस प्रकार से संगत है? इसको स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि स्वरूपस्थिति को प्राप्त मुक्तपुरुषों के स्वरूप के अस्तित्व का ज्ञान क्रम से ही होता है और उस क्रम का भी अन्त उपलब्ध नहीं होता। परन्तु “क्रम” का यह ज्ञान “स्वरूपतः स्थिति” के आधार पर ही कहा गया है, जबकि यथार्थ रूप से पुरुष में क्रम नहीं होता।

यहाँ प्रश्न उपस्थित होता है कि सत्त्वादि गुणों के परिणाम रूप इस संसार की क्रम समाप्ति है या नहीं? क्योंकि पूर्व सूत्र में जीवन्मुक्त पुरुषों के गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति का कथन किया गया है, अतः इस शंका को उठाया गया है। महर्षि व्यास कहते हैं कि कुछ प्रश्नों का उत्तर सीधा “हाँ” या “ना” में दिया जा सकता है, ऐसे प्रश्नों को एकान्तवचनीय कहते हैं, जैसे कोई पूछे कि “क्या जन्म लेने वाले सभी प्राणी मृत्यु को प्राप्त होंगे?” इसका एकमात्र उत्तर है “हाँ” अर्थात् सभी जन्म लेने वाले प्राणी मृत्यु को प्राप्त होंगे। दूसरी ओर जिन प्रश्नों का उत्तर सीधा न होकर विभाग करके देना पड़े, उन प्रश्नों को ‘विभज्यवचनीय’ कहते हैं। जैसे “क्या मृत्यु को प्राप्त होने वाले प्राणी पुनः जन्मेंगे?” इस प्रश्न का उत्तर “हाँ” या “ना” में नहीं हो सकता, अतः इसका उत्तर विभाग करके दिया है। जिन पुरुषों को विवेकख्याति प्राप्त हो गयी है, जिनकी तृष्णायें = वासनायें नष्ट हो गयी हैं, ऐसे कुशल = जीवन्मुक्त पुरुष शरीरपात के उपरान्त पुनः जन्म नहीं लेंगे, अन्य सभी प्राणी तो पुनः जन्म लेंगे।

इसी प्रकार “यह संसार अन्त वाला है अथवा नहीं?” इस का उत्तर भी विभाग करके देने योग्य है। कुशल योगी = अविप्लवा विवेकख्याति को प्राप्त योगी के लिये तो यह संसार अन्त वाला है, अर्थात् उसके लिये सत्त्वादि गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति होने से, उसको पुनः जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में घूमना नहीं होता; अन्य सभी प्राणियों के लिये तो संसारचक्र चालू रहता है॥