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वेदविषयविचारः

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : वेदविषयविचारः

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

अत्र चत्वारो वेदविषयाः सन्ति, विज्ञानकर्मोपासना-ज्ञानकाण्डभेदात्। तत्रादिमो विज्ञानविषयो हि सर्वेभ्यो मुख्योऽस्ति। तस्य परमेश्वरादारभ्य तृणपर्यन्तपदार्थेषु साक्षाद् बोधान्वयत्वात्। तत्रापीश्वरानुभवो मुख्योऽस्ति। कुतः? अत्रैव सर्वेषां वेदानां तात्पर्यमस्तीश्वरस्य खलु सर्वेभ्यः पदार्थेभ्यः प्रधानत्वात्। अत्र प्रमाणानि—



‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।



यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्॥’



—कठोपनि॰ वल्ली 2। मं॰ 15॥



‘तस्य वाचकः प्रणवः॥’ —योगशास्त्रे अ॰ 1। पा॰ 1। सू॰ 27॥



‘ओ३म् खं ब्रह्म॥’ —यजुः॰ अ॰ 40॥



‘ओमिति ब्रह्म॥’



—तैत्तिरीयारण्यके। प्र॰ 7। अनु॰ 8॥



‘तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥1॥



यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः॥2॥’ —मुण्डके 1। खण्ड 1। मं॰ 5-6॥



एषामर्थः— (सर्वे वेदाः) यत्परमं पदं मोक्षाख्यं परब्रह्मप्राप्तिलक्षणं सर्वानन्दमयं सर्वदुःखेतरदस्ति तदेवौङ्कारवाच्यमस्ति। (तस्य॰) तस्येश्वरस्य प्रणव ओङ्कारो वाचकोऽस्ति वाच्यश्चेश्वरः। (ओम्॰) ओमिति परमेश्वरस्य नामास्ति, तदेव परं ब्रह्म सर्वे वेदा आमनन्ति आसमन्तादभ्यस्यन्ति मुख्यतया प्रतिपादयन्ति, (तपांसि॰) सत्यधर्मानुष्ठानानि तपांस्यपि तदभ्यासपराण्येव सन्ति, (यदिच्छन्तो॰) ब्रह्मचर्यग्रहणमुपलक्षणार्थं, ब्रह्मचर्य्यगृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासाश्रमाचरणानि सर्वाणि तदेवामनन्ति ब्रह्मप्राप्त्यभ्यासपराणि सन्ति। यद् ब्रह्मेच्छन्तो विद्वांसस्तस्मिन्नध्यासमाना वदन्त्युपदिशन्ति च। हे नचिकेतः! अहं यमो यदीदृशं पदमस्ति तदेतत्ते तुभ्यं संग्रहेण संक्षेपेण ब्रवीमि॥1॥



(तत्रापरा॰) वेदेषु द्वे विद्ये वर्त्तेते अपरा परा चेति। तत्र यया पृथिवीतृणमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तानां पदार्थानां ज्ञानेन यथावदुपकारग्रहणं क्रियते सा अपरोच्यते। यया चादृश्यादिविशेषणयुक्तं सर्वशक्तिमद् ब्रह्म विज्ञायते सा पराऽर्थादपरायाः सकाशादत्युत्कृष्टास्तीति वेद्यम्।



भाषार्थ—अब वेदों के नित्यत्वविचार के उपरान्त वेदों में कौन कौन विषय किस किस प्रकार के हैं, इसका विचार किया जाता है। वेदों में अवयवरूप विषय तो अनेक हैं, परन्तु उनमें से चार मुख्य हैं—(1) एक विज्ञान अर्थात् सब पदार्थों को यथार्थ जानना, (2) दूसरा कर्म, (3) तीसरा उपासना, और (4) चौथा ज्ञान है। ‘विज्ञान’ उसको कहते हैं कि जो कर्म, उपासना और ज्ञान इन





तीनों से यथावत् उपयोग लेना, और परमेश्वर से लेके तृणपर्य्यन्त पदार्थों का साक्षाद् बोध का होना उनसे यथावत् उपयोग का करना, इससे यह विषय इन चारों में भी प्रधान है, क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है। सो भी दो प्रकार का है—एक तो परमेश्वर का यथावत् ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना, और दूसरा यह है कि उसके रचे हुए सब पदार्थों के गुणों को यथावत् विचार के उनसे कार्य सिद्ध करना, अर्थात् ईश्वर ने कौन कौन पदार्थ किस किस प्रयोजन के लिए रचे हैं। और इन दोनों में से भी ईश्वर का जो प्रतिपादन है सो ही प्रधान है।



इसमें आगे कठवल्ली आदि के प्रमाण लिखते हैं—(सर्वे वेदाः॰) परमपद अर्थात् जिसका नाम मोक्ष है, जिसमें परब्रह्म को प्राप्त होके सदा सुख में ही रहना, जो सब आनन्दों से युक्त सब दुःखों से रहित और सर्वशक्तिमान् परब्रह्म है, जिसके नाम (ओम्) आदि हैं, उसी में सब वेदों का मुख्य तात्पर्य है। इसमें योगसूत्र का भी प्रमाण है—(तस्य॰) परमेश्वर का ही ओङ्कार नाम है। (ओं खं॰) तथा (ओमिति॰) ओं और खं ये दोनों ब्रह्म के नाम हैं और उसी की प्राप्ति कराने में सब वेद प्रवृत्त हो रहे हैं, उसकी प्राप्ति के आगे किसी पदार्थ की प्राप्ति उत्तम नहीं है, क्योंकि जगत् का वर्णन, दृष्टान्त और उपयोगादि का करना ये सब परब्रह्म को ही प्रकाशित करते हैं तथा सत्यधर्म के अनुष्ठान, जिनको तप कहते हैं, वे भी परमेश्वर की ही प्राप्ति के लिए हैं, तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के सत्याचरणरूप जो कर्म हैं वे भी परमेश्वर की ही प्राप्ति कराने के लिए हैं, जिस ब्रह्म की प्राप्ति की इच्छा करके विद्वान् लोग प्रयत्न और उसी का उपदेश भी करते हैं। नचिकेता और यम इन दोनों का परस्पर यह संवाद है कि हे नचिकेतः! जो अवश्य प्राप्ति करने योग्य परब्रह्म है, उसी का मैं तेरे लिए संक्षेप से उपदेश करता हूं। और यहां यह भी जानना उचित है कि अलङ्काररूप कथा से नचिकेता नाम से जीव और यम से अन्तर्यामी परमात्मा को समझना चाहिए।



(तत्रापरा॰) वेदों में दो विद्या हैं—एक अपरा, दूसरी परा। इनमें से अपरा यह है कि जिससे पृथिवी और तृण से लेके प्रकृतिपर्यन्त पदार्थों के गुणों के ज्ञान से ठीक ठीक कार्य सिद्ध करना होता है और दूसरी परा कि जिससे सर्वशक्तिमान् ब्रह्म की यथावत् प्राप्ति होती है। यह परा विद्या अपरा विद्या से अत्यन्त उत्तम है क्योंकि अपरा का ही उत्तम फल परा विद्या है।



अन्यच्च—



तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥1॥



—ऋग्वेदे अष्टके 1। अध्याये 2। वर्गे 7। मन्त्रः 5॥



अस्यायमर्थः— यत् (विष्णोः) व्यापकस्य परमेश्वरस्य (परमं) प्रकृष्टानन्दस्वरूपं (पदं) पदनीयं सर्वोत्तमोपायैर्मनुष्यैः प्रापणीयं मोक्षाख्यमस्ति तत् (सूरयः) विद्वांसः सदा सर्वेषु कालेषु पश्यन्ति, कीदृशं तत्? (आततम्) आसमन्तात्ततं विस्तृतं यद्देशकाल-वस्तुपरिच्छेदरहितमस्ति, अतः सर्वैः सर्वत्र तदुपलभ्यते, तस्य ब्रह्मस्वरूपस्य विभुत्वात्। कस्यां किमिव? (दिवीव चक्षुराततम्) दिवि मार्त्तण्डप्रकाशे नेत्रदृष्टेर्व्याप्तिर्यथा भवति तथैव तत्पदं ब्रह्मापि वर्तते, मोक्षस्य च सर्वस्मादधिकोत्कृष्टत्वात् तदेव द्रष्टुं प्राप्तुमिच्छन्ति। अतो वेदा विशेषेण तस्यैव प्रतिपादनं कुर्वन्ति।





एतद्विषयकं वेदान्तसूत्रं व्यासोऽप्याह—



‘तत्तु समन्वयात्॥’ —अ॰ 1। पा॰ 1। सू॰ 4॥



अस्यायमर्थः— तदेव ब्रह्म सर्वत्र वेदवाक्येषु समन्वितं प्रतिपादितमस्ति। क्वचित्साक्षात् क्वचित् परम्परया च। अतः परमोऽर्थो वेदानां ब्रह्मैवास्ति। तथा यजुर्वेदे प्रमाणम्—



यस्मान्न जातः परोऽअन्यो अस्ति यऽआविवेश भुवनानि विश्वा।



प्रजापतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी॥



—य॰ अ॰ 8। मं॰ 36॥



एतस्यार्थः— (यस्मात्) नैव परब्रह्मणः सकाशात् (परः) उत्तमः पदार्थः (जातः) प्रादुर्भूतः प्रकटः (अन्यः) भिन्नः कश्चिदप्यस्ति (प्रजापतिः) प्रजापतिरिति ब्रह्मणो नामास्ति प्रजापालकत्वात् (य आविवेश भु॰) यः परमेश्वरः (विश्वा) विश्वानि सर्वाणि (भुवनानि) सर्वलोकान् (आविवेश) व्याप्तवानस्ति (संरराणः) सर्वप्राणिभ्योऽत्यन्तं सुखं दत्तवान् सन् (त्रीणि ज्योतींषि) त्रीण्यग्निसूर्यविद्युदाख्यानि सर्वजगत्प्रकाशकानि (प्रजया) ज्योतिषोऽन्यया सृष्ट्या सह तानि (सचते) समवेतानि करोति कृतवानस्ति (सः) अतः स एवेश्वरः (षोडशी) येन षोडशकला जगति रचितास्ता विद्यन्ते यस्मिन्यस्य वा तस्मात्स षोडशीत्युच्यते। अतोऽयमेव परमोऽर्थो वेदितव्यः।



ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानम्॥ —इदं माण्डूक्योपनिषद्वचनमस्ति॥



अस्यायमर्थः— ओमित्येतद्यस्य नामास्ति तदक्षरम्। यन्न क्षीयते कदाचिद्यच्चराचरं जगदश्नुते व्याप्नोति तद् ब्रह्मैवास्तीति विज्ञेयम्। अस्यैव सर्वैर्वेदादिभिः शास्त्रैः सकलेन जगता वोपगतं व्याख्यानं मुख्यतया क्रियतेऽतोऽयं प्रधानविषयोऽस्तीत्यवधार्यम्। किं च नैव प्रधानस्याग्रेऽप्रधानस्य ग्रहणं भवितुमर्हति। ‘प्रधानाप्रधानयोः प्रधाने कार्य्यसम्प्रत्यय’ इति व्याकरणमहाभाष्य-वचनप्रामाण्यात्। एवमेव सर्वेषां वेदानामीश्वरे मुख्येऽर्थे मुख्यतात्पर्यमस्ति। तत्प्राप्तिप्रयोजना एव सर्व उपदेशाः सन्ति। अतस्तदुपदेशपुरःसरेणैव त्रयाणां कर्मोपासना-ज्ञान-काण्डानां पारमार्थिक-व्यवहारिक-फलसिद्धये यथायोग्योपकाराय चानुष्ठानं सर्वैर्मनुष्यैर्यथावत् कर्तव्यमिति।



भाषार्थ—और भी इस विषय में ऋग्वेद का प्रमाण है कि—(तद्वि॰)। (विष्णुः) अर्थात् व्यापक जो परमेश्वर है उसका (परमं) अत्यन्त उत्तम आनन्दस्वरूप (पदं) जो प्राप्ति होने के योग्य अर्थात् जिसका नाम मोक्ष है उसको (सूरयः) विद्वान् लोग (सदा पश्यन्ति) सब काल में देखते हैं। वह कैसा है कि सब में व्याप्त हो रहा है, और उसमें देश काल और वस्तु का भेद नहीं है। अर्थात् उस देश में है और इस देश में नहीं, तथा उस काल में था और इस काल में नहीं, उस वस्तु में है और इस वस्तु में नहीं, इसी कारण से वह पद सब जगह में सब को प्राप्त होता है, क्योंकि वह ब्रह्म सब ठिकाने परिपूर्ण है। इसमें यह दृष्टान्त है कि (दिवीव चक्षुराततम्) जैसे सूर्य का प्रकाश आवरणरहित आकाश में व्याप्त होता है, और जैसे उस प्रकाश में नेत्र की दृष्टि व्याप्त होती है, इसी प्रकार परब्रह्म पद भी स्वयंप्रकाश, सर्वत्र व्याप्तवान् हो रहा है। उस पद की प्राप्ति से कोई भी प्राप्ति उत्तम नहीं है। इसलिये चारों वेद उसी की प्राप्ति कराने के लिए विशेष करके प्रतिपादन कर रहे हैं।





इस विषय में वेदान्तशास्त्र में व्यासमुनि के सूत्र का भी प्रमाण है—(तत्तु समन्वयात्)। सब वेदवाक्यों में ब्रह्म का ही विशेष करके प्रतिपादन है। कहीं कहीं साक्षात् रूप और कहीं कहीं परम्परा से इसी कारण से वह परब्रह्म वेदों का परम अर्थ है।



तथा इस विषय में यजुर्वेद का भी प्रमाण है कि—(यस्मान्न जातः॰)। जिस परब्रह्म से (अन्यः) दूसरा कोई भी (परः) उत्तम पदार्थ (जातः) प्रकट (नास्ति) अर्थात् नहीं है। (य आविवेश भु॰) जो सब विश्व अर्थात् सब जगह में व्याप्त हो रहा है (प्रजापतिः प्र॰) वही सब जगत् का पालनकर्त्ता और अध्यक्ष है, जिसने (त्रीणि ज्योतींषि) अग्नि, सूर्य और बिजुली इन तीन ज्योतियों को प्रजा के प्रकाश के लिए (सचते) रचके संयुक्त किया है, और जिसका नाम (षोडशी) है अर्थात् (1) ईक्षण जो यथार्थ विचार (2) प्राण जो कि सब विश्व का धारण करने वाला (3) श्रद्धा सत्य में विश्वास (4) आकाश (5) वायु (6) अग्नि (7) जल (8) पृथिवी (9) इन्द्रिय (10) मन अर्थात् ज्ञान (11) अन्न (12) वीर्य अर्थात् बल और पराक्रम (13) तप अर्थात् धर्मानुष्ठान सत्याचार (14) मन्त्र अर्थात् वेदविद्या (15) कर्म अर्थात् सब चेष्टा (16) नाम अर्थात् दृश्य और अदृश्य पदार्थों की संज्ञा, ये ही सोलह कला कहाती हैं। ये सब ईश्वर ही के बीच में हैं, इससे उसको षोडशी कहते हैं। इन षोडश कलाओं का प्रतिपादन प्रश्नोपनिषद् के 6 छठे प्रश्न में लिखा है।



इससे परमेश्वर ही वेदों का मुख्य अर्थ है और उससे पृथक् जो यह जगत् है सो वेदों का गौण अर्थ है। और इन दोनों में से प्रधान का ही ग्रहण होता है। इससे क्या आया कि वेदों का मुख्य तात्पर्य परमेश्वर ही की प्राप्ति कराने और प्रतिपादन करने में है। उस परमेश्वर के उपदेशरूप वेदों से कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों काण्डों का इस लोक और परलोक के व्यवहारों के फलों की सिद्धि और यथावत् उपकार करने के लिए सब मनुष्य इन चार विषयों के अनुष्ठानों में पुरुषार्थ करें, यही मनुष्य-देह धारण करने के फल हैं।



तत्र द्वितीयो विषयः कर्मकाण्डाख्यः,स सर्वः क्रियामयोऽस्ति। नैतेन विना विद्याभ्यासज्ञाने अपि पूर्णे भवतः। कुतः?बाह्यमानस-व्यवहारयोर्बाह्याभ्यन्तरे युक्तत्वात्। स चानेकविधोऽस्ति। परं तु तस्यापि खलु द्वौ भेदौ मुख्यौ स्तः—एकः परमपुरुषार्थसिद्ध्यर्थोऽर्थाद्य ईश्वरस्तुति-प्रार्थनोपासनाऽऽज्ञापालन-धर्मानुष्ठानज्ञानेन मोक्षमेव साधयितुं प्रवर्त्तते। अपरो लोकव्यवहार-सिद्धये यो धर्मेणार्थकामौ निर्वर्त्तयितुं संयोज्यते।



स यदा परमेश्वरस्य प्राप्तिमेव फलमुद्दिश्य क्रियते तदाऽयं श्रेष्ठफलापन्नो निष्कामसंज्ञां लभते। अस्य खल्वनन्तसुखेन योगात्। यदा चार्थकाम-फलसिद्ध्यवसानो लौकिकसुखाय योज्यते तदा सोऽपरः सकाम एव भवति। अस्य जन्ममरणफलभोगेन युक्तत्वात्।



स चाग्निहोत्रमारभ्याश्वमेधपर्यन्तेषु यज्ञेषु सुगन्धि-मिष्ट-पुष्ट-रोगनाशक-गुणैर्युक्तस्य सम्यक् संस्कारेण शोधितस्य द्रव्यस्य वायु-वृष्टि-जलशुद्धि-करणार्थमग्नौ होमः क्रियते, स तद्द्वारा सर्वजगत् सुखकार्येव भवति। यं च भोजनाच्छादन-यानकला-कौशलयन्त्र-सामाजिकनियम-प्रयोजनसिद्धयर्थं विधत्ते सोऽधिकतया स्वसुखायैव भवति।



भाषार्थ—उनमें से दूसरा कर्मकाण्ड विषय है, सो सब क्रियाप्रधान ही होता है। जिसके विना विद्याभ्यास और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकते, क्योंकि मन का योग बाहर की क्रिया और भीतर के





व्यवहार में सदा रहता है। वह अनेक प्रकार का है परन्तु उसके दो भेद मुख्य हैं—एक परमार्थ, दूसरा लोकव्यवहार। अर्थात् पहले से परमार्थ और दूसरे से लोकव्यवहार की सिद्धि करनी होती है। प्रथम जो परम पुरुषार्थरूप कहा उसमें परमेश्वर की (स्तुति) अर्थात् उसके सर्वशक्तिमत्त्वादि गुणों का कीर्तन उपदेश और श्रवण करना, (प्रार्थना) अर्थात् जिस करके ईश्वर से सहायता की इच्छा करनी, (उपासना) अर्थात् ईश्वर के स्वरूप में मग्न होके उसकी सत्यभाषाणादि आज्ञा का यथावत् पालन करना। सो उपासना वेद और पातञ्जल योगशास्त्र की रीति से ही करनी चाहिए तथा धर्म का स्वरूप न्यायाचरण है। ‘न्यायाचरण’ उसको कहते हैं जो पक्षपात को छोड़ के सब प्रकार से सत्य का ग्रहण और असत्य का परित्याग करना। इसी धर्म का जो ज्ञान और अनुष्ठान का यथावत् करना है सो ही कर्मकाण्ड का प्रधान भाग है। और दूसरा यह है कि जिससे पूर्वोक्त अर्थ, काम और उनकी सिद्धि करने वाले साधनों की प्राप्ति होती है।



सो इस भेद को इस प्रकार से जानना कि जब मोक्ष अर्थात्सब दुःखों से छूट के केवल परमेश्वर की ही प्राप्ति के लिए धर्म से युक्त सब कर्मों का यथावत् करना,यही निष्काम मार्ग कहाता है,क्योंकि इसमें संसार के भोगों की कामना नहीं की जाती। इसी कारण से इसका फल अक्षय है। और जिसमें संसार के भोगों की इच्छा से धर्मयुक्त काम किये जाते हैं,उसको सकाम कहते हैं।इस हेतु से इसका फल नाशवान् होता है, क्योंकि सब कर्मों को करके इन्द्रिय भोगों को प्राप्त होके जन्म मरण से नहीं छूट सकता।



सो अग्निहोत्र से लेके अश्वमेध पर्यन्त जो कर्मकाण्ड है, उसमें चार प्रकार के द्रव्यों का होम करना होता है—एक सुगन्धगुणयुक्त, जो कस्तूरी केशरादि हैं, दूसरा मिष्टगुणयुक्त, जो कि गुड़ और सहत आदि कहाते हैं, तीसरा पुष्टिकारकगुणयुक्त, जो घृत, दुग्ध और अन्न आदि हैं, और चौथा रोगनाशकगुणयुक्त जो कि सोमलतादि ओषधि आदि हैं। इन चारों का परस्पर शोधन, संस्कार और यथायोग्य मिला के अग्नि में युक्तिपूर्वक जो होम किया जाता है, वह वायु और वृष्टिजल की शुद्धि करने वाला होता है। इस से सब जगत् को सुख होता है। और जिस को भोजन, छादन, विमानादि यान, कलाकुशलता, यन्त्र और सामाजिक नियम होने के लिए करते हैं, वह अधिकांश से कर्त्ता को ही सुख देने वाला होता है।



अत्र पूर्वमीमांसायाः प्रमाणम्-



द्रव्यसंस्कारकर्मसु परार्थत्वात्फलश्रुतिरर्थवादः स्यात्॥-अ॰ 4। पा॰ 3। सू॰ 1॥



द्रव्याणां तु क्रियार्थानां संस्कारः क्रतुधर्मः स्यात्॥-अ॰ 4। पा॰ 3। सू॰ 8॥



अनयोरर्थः-द्रव्यं संस्कारः कर्म चैतत्त्रयं यज्ञकर्त्रा कर्त्तव्यम्। द्रव्याणि पूर्वोक्तानि चतुःसंख्याकानि सुगन्धादि-गुणयुक्तान्येव गृहीत्वा तेषां परस्परमुत्तमोत्तम-गुणसम्पादनार्थं संस्कारः कर्त्तव्यः। यथा सूपादीनां संस्कारार्थं सुगन्धयुक्तं घृतं चमसे संस्थाप्याग्नौ प्रतप्य स धूमे जाते सति तं सूपपात्रे प्रवेश्य तन्मुखं बद्ध्वा प्रचालयेच्च तदा यः पूर्वं धूमवद्वाष्प उत्थितः स सर्वः सुगन्धो हि जलं भूत्वा प्रविष्टः सन् सर्वं सूपं सुगन्धमेव करोति,तेन पुष्टिरुचिकरश्च भवति,तथैव यज्ञाद्यो वाष्पो जायते स वायुं वृष्टिजलं च निर्दोषं कृत्वा सर्वजगते सुखायैव भवति। अतश्चोक्तम्-



यज्ञोऽपि तस्यै जनतायै कल्पते यत्रैवं विद्वान् होता भवति॥-ऐ॰ब्रा॰पं॰ 1। अ॰ 2





जनानां समूहो जनता,तत्सुखायैव यज्ञो भवति,यस्मिन्यज्ञेऽमुना प्रकारेण विद्वान् संस्कृत-द्रव्याणामग्नौ होमं करोति। कुतः?तस्य परार्थत्वात्। यज्ञः परोपकारायैव भवति। अत एव फलस्य श्रुतिः श्रवणमर्थवादोऽनर्थवारणाय भवति। तथैव होमक्रियार्थानां द्रव्याणां पुरुषाणां च यः संस्कारो भवति स एव क्रतुधर्मो बोध्यः। एवं क्रतुना यज्ञेन धर्मो जायते नान्यथेति।



भाषार्थ-इसमें पूर्वमीमांसा धर्मशास्त्र की भी सम्मति है- (द्रव्य॰) एक तो द्रव्य, दूसरा संस्कार, और तीसरा उनका यथावत् उपयोग करना, ये तीनों बातें यज्ञ के कर्त्ता को अवश्य करनी चाहिए। सो पूर्वोक्त सुगन्धादियुक्त चार प्रकार के द्रव्यों का अच्छी प्रकार संस्कार करके अग्नि में होम करने से जगत् का अत्यन्त उपकार होता है। जैसे दाल और शाक आदि में सुगन्धद्रव्य और घी इन दोनों को चमचे में अग्नि पर तपा के उनमें छोंक देने से वे सुगन्धित हो जाते हैं, क्योंकि उस सुगन्ध द्रव्य और घी के अणु उनको सुगन्धित करके दाल आदि पदार्थों को पुष्टि और रुचि बढ़ाने वाले कर देते हैं, वैसे ही यज्ञ से जो भाफ उठता है, वह भी वायु और वृष्टि के जल को निर्दोष और सुगन्धित करके सब जगत् को सुखी करता है, इससे वह यज्ञ परोपकार के लिए ही होता है।



इस में ऐतरेय ब्राह्मण का प्रमाण है कि- (यज्ञोऽपि त॰) अर्थात् जनता नाम जो मनुष्यों का समूह है, उसी के सुख के लिए यज्ञ होता है, और संस्कार किये द्रव्यों का होम करने वाला जो विद्वान् मनुष्य है, वह भी आनन्द को प्राप्त होता है, क्योंकि जो मनुष्य जगत् का जितना उपकार करेगा उसको उतना ही ईश्वर की व्यवस्था से सुख प्राप्त होगा। इसलिये यज्ञ का अर्थवाद (टिप्पणी- इस शब्द का अर्थ आगे वेदसंज्ञा-प्रकरण में लिखा जायगा।) यह है कि अनर्थ दोषों को हटा के जगत् में आनन्द को बढ़ाता है परन्तु होम के द्रव्यों का उत्तम संस्कार और होम के करने वाले मनुष्यों को होम करने की श्रेष्ठ विद्या अवश्य होनी चाहिए। सो इसी प्रकार के यज्ञ करने से सब को उत्तम फल प्राप्त होता है, विशेष करके यज्ञकर्ता को, अन्यथा नहीं।



अत्र प्रमाणम्-



अग्नेर्वै धूमो जायते धूमादभ्रमभ्राद् वृष्टिरग्नेर्वा एता जायन्ते तस्मादाह तपोजा इति॥



-श॰ कां॰ 5। अ॰ 3॥



अस्यायमभिप्रायः-अग्नेः सकाशाद् धूमवाष्पौ जायेते। यदाऽयमग्निर्वृक्षौषधि-वनस्पति- जलादिपदार्थान् प्रविश्य तान् संहतान् विभिद्य तेभ्यो रसं च पृथक् करोति,पुनस्ते लघुत्वमापन्ना वाय्वाधारेणोपर्य्याकाशं गच्छन्ति। तत्र यावान् जलरसांशस्तावतो वाष्पसंज्ञास्ति। यश्च निःस्नेहो भागः स पृथिव्यंशोऽस्ति। अत एवोभयभागयुक्तो धूम इत्युपचर्य्यते। पुनर्धूम-गमनानन्तरमाकाशे जलसञ्चयो भवति। तस्मादभ्रं घना जायन्ते। तेभ्यो वायुदलेभ्यो वृष्टिर्जायते। अतोऽग्नेरेवैता यवादय ओषधयो जायन्ते ताभ्योऽन्नमन्नाद्वीर्यं वीर्य्याच्छरीराणि भवन्तीति।



भाषार्थ-इसमें शतपथ ब्राह्मण का भी प्रमाण है कि-(अग्ने॰) जो होम करने के द्रव्य अग्नि में डाले जाते हैं, उनसे धुंआ और भाफ उत्पन्न होते हैं, क्योंकि अग्नि का यही स्वभाव है कि पदार्थों में प्रवेश करके उनको भिन्न-भिन्न कर देता है, फिर वे हलके होके वायु के साथ ऊपर आकाश में चढ़ जाते हैं। उनमें जितना जल का अंश है वह भाफ कहाता है, और जो शुष्क है वह पृथ्वी





का भाग है, इन दोनों के योग का नाम धूम है। जब वे परमाणु मेघमण्डल में वायु के आधार से रहते हैं फिर वे परस्पर मिल के बादल होके उनसे वृष्टि, वृष्टि से ओषधि, ओषधियों से अन्न, अन्न से धातु, धातुओं से शरीर और शरीर से कर्म बनता है।



अत्र विषये तैत्तिरीयोपनिषद्यप्युक्तम्-



तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः,आकाशाद्वायुः,वायोरग्निः,अग्नेरापः,अद्भ्यः पृथिवी,पृथिव्या ओषधयः ओषधिभ्योऽन्नं,अन्नाद्रेतः,रेतसः पुरुषः स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः॥



-आनन्दवल्यां प्रथमेऽनुवाके॥



स तपोऽतप्यत तपस्तप्त्वा अन्नं ब्रह्मेति विजानात् अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते,अन्नेन जातानि जीवन्ति,अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति॥



-भृगुवल्ल्यां द्वितीयेऽनुवाके॥



अन्नं ब्रह्मेत्युच्यते,जीवनस्य बृहद्धेतुत्वात्। शुद्धान्नजल-वाय्वादिद्वारैव प्राणिनां सुखं भवति नातोऽन्यथेति।



भाषार्थ-इस विषय में तैत्तिरीय उपनिषत् का भी प्रमाण है कि-(तस्माद्वा॰) परमात्मा के अनन्त सामर्थ्य से आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी आदि तत्त्व उत्पन्न हुए हैं, और उनमें ही पूर्वोक्त क्रम के अनुसार शरीर आदि उत्पत्ति, जीवन और प्रलय को प्राप्त होते हैं। यहां ब्रह्म का नाम अन्न और अन्न का नाम ब्रह्म भी है, क्योंकि जिसका जो कार्य है वह उसी में मिलता है। वैसे ही ईश्वर के सामर्थ्य से जगत् की तीनों अवस्था होती हैं, और सब जीवों के जीवन का मुख्य साधन है, इससे अन्न को ब्रह्म कहते हैं। जब होम से वायु, जल और ओषधि आदि शुद्ध होते हैं, तब सब जगत् को सुख और अशुद्ध होने से सब को दुःख होता है। इससे इनकी शुद्धि अवश्य करनी चाहिए।



तत्र द्विविधः प्रयत्नोऽस्तीश्वरकृतो जीवकृतश्च। ईश्वरेण खल्वग्निमयः सूर्य्यो निर्मितः सुगन्धपुष्पादिश्च। स निरन्तरं सर्वस्माज्जगतो रसानाकर्षति। तस्य सुगन्ध-दुर्गन्धाणुसंयोगत्वेन तज्जलवायू अपीष्टानिष्ट-गुणयोगान्मध्यगुणौ भवतस्तयोः सुगन्ध-दुर्गन्ध-मिश्रितत्वात्। तज्जलवृष्टावोषध्यन्नरेतःशरीराण्यपि मध्यमान्येव भवन्ति। तन्मध्यमत्वाद् बलबुद्धिवीर्य्यपराक्रमधैर्य्य-शौर्य्यादयोऽपि गुणा मध्यमा एव जायन्ते। कुतः?यस्य यादृशं कारणमस्ति तस्य तादृशमेव कार्य्यं भवतीति दर्शनात्। अयं खल्वीश्वरसृष्टेर्दोषो नास्ति। कुतः?दुर्गन्धादिविकारस्य मनुष्यसृष्ट्यन्तर्भावात्। यतो दुर्गन्धादि-विकारस्योत्पत्तिर्मनुष्यादिभ्य एव भवति,तस्मादस्य निवारणमपि मनुष्यैरेव करणीयमिति। यथेश्वरेणाज्ञा दत्ता सत्यभाषणमेव कर्त्तव्यं नानृतमिति,यस्तामुल्लङ्घ्य प्रवर्त्तते स पापीयान्भूत्वा क्लेशं चेश्वरव्यवस्थया प्राप्नोति तथा यज्ञः कर्त्तव्य इतीयमप्याज्ञा तेनैव दत्तास्ति,तामपि य उल्लङ्घयति सोऽपि पापीयान् सन् क्लेशवांश्च भवति।



भाषार्थ-सो उनकी शुद्धि करने में दो प्रकार का प्रयत्न है-एक तो ईश्वर का किया हुआ और दूसरा जीव का। उनमें से ईश्वर का किया यह है कि उसने अग्निरूप सूर्य और सुगन्धरूप पुष्पादि पदार्थों को उत्पन्न किया है। वह सूर्य निरन्तर सब जगत् के रसों को पूर्वोक्त प्रकार से उपर खैंचता है। और जो पुष्पादि का सुगन्ध है वह भी दुर्गन्ध को निवारण करता रहता है। परन्तु वे परमाणु सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त होने से जल और वायु को भी मध्यम कर देते हैं। उस जल की वृष्टि से ओषधि, अन्न, वीर्य और शरीर आदि भी मध्यम गुण वाले हो जाते हैं और उनके योग से बुद्धि,





बल, पराक्रम, धैर्य और शूरवीरतादि गुण भी निकृष्ट ही होते हैं, क्योंकि जिसका जैसा कारण होता है, उसका वैसा ही कार्य होता है। यह दुर्गन्ध से वायु और वृष्टि जल का दोषयुक्त होना सर्वत्र देखने में आता है। सो यह दोष ईश्वर की सृष्टि से नहीं किन्तु मनुष्यों ही की सृष्टि से होता है। इस कारण से उसका निवारण करना भी मनुष्यों ही को उचित है। जैसे ईश्वर ने सत्यभाषणादि धर्मव्यवहार करने की आज्ञा दी है, मिथ्याभाषणादि की नहीं, जो इस आज्ञा से उलटा काम करता है, वह अत्यन्त पापी होता है, और ईश्वर की न्यायव्यवस्था से उसको क्लेश भी होता है, वैसे ही ईश्वर ने मनुष्यों को यज्ञ करने की आज्ञा दी है, इसको जो नहीं करता, वह भी पापी हो के दुःख का भागी होता है।



कुतः?सर्वोपकाराकरणात्। यत्र खलु यावान्मनुष्यादि-प्राणिसमुदायो भवति तत्र तावानेव दुर्गन्धसमुदायो जायते न चैवायमीश्वरसृष्टिनिमित्ते भवितुमर्हति। कुतः?तस्य मनुष्यादि-प्राणिसमुदाय-निमित्तोत्पन्नत्वात्। यत्तु खलु मनुष्याः स्वसुखार्थं हस्त्यादि-प्राणिनामेकत्र बाहुल्यं कुर्वन्ति,अतस्तज्जन्योऽप्यधिको दुर्गन्धो मनुष्यसुखेच्छानिमित्त एव जायते। एवं वायु-वृष्टिजल-दूषकः सर्वो दुर्गन्धो मनुष्यनिमित्तादेवोत्पद्यतेऽतस्तस्य निवारणमपि मनुष्या एव कर्त्तुमर्हन्ति।



भाषार्थ-क्योंकि सब के उपकार करने वाले यज्ञ को नहीं करने से मनुष्यों को दोष लगता है। जहां जितने मनुष्य आदि के समुदाय अधिक होते हैं, वहां उतना ही दुर्गन्ध भी अधिक होता है। वह ईश्वर की सृष्टि से नहीं, किन्तु मनुष्यादि प्राणियों के निमित्त से ही उत्पन्न होता है। क्योंकि हस्ति आदि के समुदायों को मनुष्य अपने ही सुख के लिए इकट्ठा करते हैं, इस से उन पशुओं से भी जो अधिक दुर्गन्ध उत्पन्न होता है सो मनुष्यों के ही सुख की इच्छा से होता है। इससे क्या आया कि जल वायु और वृष्टिजल को बिगाड़ने वाला सब दुर्गन्ध मनुष्यों के ही निमित्त से उत्पन्न होता है तो उस का निवारण करना भी उन को ही योग्य है।



तेषां मध्यान्मनुष्या एवोपकारानुपकारौ वेदितुमर्हाः सन्ति। मननं विचारस्तद्योगादेव मनुष्यत्वं जायते। परमेश्वरेण हि सर्वदेहधारिप्राणिनां मध्ये मनस्विनो विज्ञानं कर्त्तुं योग्या मनुष्या एव सृष्टास्तद्देहेषु परमाणुसंयोग-विशेषेण विज्ञानभवनानुकूलानामवयवानामुत्पादितत्वात्। अतस्त एव धर्माधर्मयोर्ज्ञानमनुष्ठानाननुष्ठाने च कर्तुमर्हन्ति न चान्ये। अस्मात्कारणात्सर्वोपकाराय सर्वैर्मनुष्यैर्यज्ञः कर्त्तव्य एव।



भाषार्थ-क्योंकि जितने प्राणी देहधारी जगत् में हैं उनमें से मनुष्य ही उत्तम हैं, इससे वे ही उपकार और अनुपकार को जानने को योग्य हैं। मनन नाम विचार का है, जिसके होने से ही मनुष्य नाम होता है, अन्यथा नहीं। क्योंकि ईश्वर ने मनुष्य के शरीर में परमाणु आदि के संयोगविशेष इस प्रकार के रचे हैं कि जिन से उन को ज्ञान की उन्नति होती है। इसी कारण से धर्म का अनुष्ठान और अधर्म का त्याग करने को भी वे ही योग्य होते हैं, अन्य नहीं। इस से सब के उपकार के लिये यज्ञ का अनुष्ठान भी उन्हीं को करना उचित है।



किं च भोः। कस्तूर्य्यादीनां सुरभियुक्तानां द्रव्याणामग्नौ प्रक्षेपणेन विनाशात् कथमुपकाराय यज्ञो भवितुमर्हतीति। किं त्वीदृशैरुत्तमैः पदार्थैर्मनुष्यादिभ्यो भोजनादिदानेनोपकारे कृते होमादप्युत्तमं फलं जायते,पुनः किमर्थं यज्ञकरणमिति?





अत्रोच्यते-नात्यन्तो विनाशः कस्यापि सम्भवति। विनाशो हि यद् दृश्यं भूत्वा पुनर्न दृश्येतेति विज्ञायते। परन्तु दर्शनं त्वया कतिविधं स्वीक्रियते?अष्टविधं चेति।



किं च तत्?अत्राहुर्गोतमाचार्य्या न्यायशास्त्रे-



इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमव्यपदेश्यमव्यभिचारि-व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्॥1॥



अथ तत्पूर्वकं त्रिविधमनुमानं पूर्ववच्छेषवत्सामान्यतो दृष्टं च॥2॥



प्रसिद्धसाधर्म्यात् साध्यसाधनमुपमानम्॥3॥



आप्तोपदेशः शब्दः॥4॥



-अ॰ 1। आह्निकम् 1। सू॰ 4। 5। 6। 7॥



प्रत्यक्षानुमानोपमान-शब्दैतिह्यार्थापत्ति-सम्भवाभावसाधन-भेदादष्टधा प्रमाणं मया मन्यत इति। तत्र यदिन्द्रियार्थसम्बन्धात् सत्यमव्यभिचारिज्ञानमुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षम्। सन्निकटे दर्शनान्मनुष्योऽयं नान्य इत्याद्युदाहरणम्॥1॥



यत्र लिङ्गज्ञानेन लिङ्गिनो ज्ञानं जायते तदनुमानम्। पुत्रं दृष्ट्वाऽऽसीदस्य पितेत्याद्युदाहरणम्॥2॥



उपमानं सादृश्यज्ञानम्। यथा देवदत्तोऽस्ति तथैव यज्ञदत्तोऽप्यस्तीति साधर्म्यादुपदिशतीत्याद्युदाहरणम्॥3॥



शब्द्यते प्रत्याय्यते दृष्टोऽदृष्टश्चार्थो येन स शब्दः। ज्ञानेन मोक्षो भवतीत्याद्युदाहरणम्॥4॥



भाषार्थ-प्र॰-सुगन्धयुक्त जो कस्तूरी आदि पदार्थ हैं, उनको अन्य द्रव्यों में मिला के अग्नि में डालने से उन का नाश हो जाता है, फिर यज्ञ से किसी प्रकार का उपकार नहीं हो सकता, किन्तु ऐसे उत्तम-उत्तम पदार्थ मनुष्यों को भोजनादि के लिए देने से होम से भी अधिक उपकार हो सकता है, फिर यज्ञ करना किसलिये चाहिए?



उ॰-किसी पदार्थ का विनाश नहीं होता, केवल वियोग मात्र होता है। परन्तु यह तो कहिये कि आप विनाश किसको कहते हैं?उ॰-जो स्थूल होके प्रथम देखने में आकर फिर न देख पड़े, उस को हम विनाश कहते हैं।प्र॰-आप कितने प्रकार का दर्शन मानते हैं?उ॰-आठ प्रकार का।प्र॰-कौन-कौन से?उ॰-प्रत्यक्ष 1, अनुमान 2, उपमान 3, शब्द 4, ऐतिह्य 5, अर्थापत्ति 6, सम्भव 7, और अभाव 8, इस भेद से हम आठ प्रकार का दर्शन मानते हैं।



(इन्द्रियार्थ॰) इनमें से प्रत्यक्ष उसको कहते हैं कि जो चक्षु आदि इन्द्रिय और रूप आदि विषयों के सम्बन्ध से सत्यज्ञान उत्पन्न हो। जैसे दूर से देखने में सन्देह हुआ कि वह मनुष्य है वा कुछ और, फिर उसके समीप होने से निश्चय होता है कि यह मनुष्य ही है अन्य नहीं, इत्यादि प्रत्यक्ष के उदाहरण हैं॥1॥



(अथ तत्पू॰) और जो किसी पदार्थ के चिह्न देखने से उसी पदार्थ का यथावत् ज्ञान हो वह अनुमान कहाता है। जैसे किसी के पुत्र को देखने से ज्ञान होता है कि इसके माता पिता आदि हैं, वा अवश्य थे, इत्यादि उसके उदाहरण हैं॥2॥



(प्रसिद्ध॰) तीसरा उपमान कि जिस से किसी का तुल्य धर्म देख के समान धर्म वाले का ज्ञान हो। जैसे किसी ने किसी से कहा कि जिस प्रकार का यह देवदत्त है, उसी प्रकार का वह यज्ञदत्त भी है, उसके पास जाके इस काम को कर ला। इस प्रकार के तुल्य धर्म से जो ज्ञान होता है, उस को उपमान कहते हैं॥3॥



आप्तोप॰) चौथा शब्दप्रमाण है कि जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अर्थ का निश्चय कराने वाला है। जैसे ज्ञान से मोक्ष होता है, यह आप्तों के उपदेश शब्दप्रमाण का उदाहरण है॥4॥





न चतुष्ट्वमैतिह्यार्थापत्ति-सम्भवाभावप्रामाण्यात्॥5॥



शब्द ऐतिह्यानर्थान्तरभावादनुमानेऽर्थापत्ति-सम्भवाभावानर्थान्तर-भावाच्चाप्रतिषेधः॥6॥



-अ॰ 2। आ॰ 2। सू॰ 1। 2॥



न चतुष्ट्वमिति सूत्रद्वयस्य संक्षिप्तोऽर्थः क्रियते-



(ऐतिह्यम्) शब्दोपगतमाप्तोपदिष्टं ग्राह्यम्। देवासुराः संयत्ता आसन्नित्यादि॥5॥



(अर्थापत्तिः) अर्थादापद्यते सार्थापत्तिः। केनचिदुक्तं सत्सु घनेषु वृष्टिर्भवतीति। किमत्र प्रसज्यते?असत्सु घनेषु न भवतीत्याद्युदाहरणम्॥6॥



(सम्भवः) सम्भवति येन यस्मिन्वा स सम्भवः। केनचिदुक्तं मातापितृभ्यां सन्तानं जायते सम्भवोऽस्तीति वाच्यम्। परन्तु कश्चिद् ब्रूयात्कुम्भकरणस्य क्रोशचतुष्टयपर्यन्तं श्मश्रुणः केशा ऊर्ध्वंस्थिता आसन्,षोडशक्रोशमूर्ध्वं नासिका चासम्भवत्वान्मिथ्यैवास्तीति विज्ञायते,इत्याद्युदाहरणम्॥7॥



(अभावः) कोऽपि ब्रूयाद् घटमानयेति,स तत्र घटमपश्यन्नत्र घटो नास्तीत्यभावलक्षणेन यत्र घटो वर्त्तमानस्तस्मादानीयते॥8॥



इति प्रत्यक्षादीनां संक्षेपतोऽर्थः। एवमष्टविधं दर्शनमर्थाज्ज्ञानं मया मन्यते। सत्यमेवमेतत् नैवमङ्गीकारेण विना समग्रौ व्यवहारपरमार्थौ कस्यापि सिध्येताम्।



भाषार्थ-(ऐतिह्यम्) सत्यवादी विद्वानों के कहे वा लिखे उपदेश का नाम इतिहास है। जैसा 'देव और असुर युद्ध करने के लिए तत्पर हुए थे' जो यह इतिहास ऐतरेय, शतपथ ब्राह्मणादि सत्यग्रन्थों में लिखा है, उसी का ग्रहण होता है, अन्य का नहीं। यह पांचवां प्रमाण है॥5॥



और छठा (अर्थापत्तिः) जो एक बात किसी ने कही हो उस से विरुद्ध दूसरी बात समझी जावे। जैसे किसी ने कहा कि बादलों के होने से वृष्टि होती है, दूसरे ने इतने ही कहने से जान लिया कि बादलों के विना वृष्टि कभी नहीं हो सकती। इस प्रकार के प्रमाणों से जो ज्ञान होता है, उस को अर्थापत्ति कहते हैं॥6॥



सातवां (सम्भवः) जैसे किसी ने किसी से कहा कि माता पिता से सन्तानों की उत्पत्ति होती है, तो दूसरा मान ले कि इस बात का तो सम्भव है। परन्तु जो कोई ऐसा कहे कि रावण के भाई कुम्भकरण की मूंछ चार कोश तक आकाश में ऊपर खड़ी रहती थी और उसकी नाक (16) सोलह कोश पर्यन्त लम्बी चौड़ी थी, उसकी यह बात मिथ्या समझी जायगी क्योंकि ऐसी बात का सम्भव कभी नहीं हो सकता॥7॥



और आठवां (अभावः) जैसे किसी ने किसी से कहा कि तुम घड़ा ले आओ और जब उसने वहां नहीं पाया तब वह जहां पर घड़ा था वहां से ले आया॥8॥



इन आठ प्रकार के प्रमाणों को मैं मानता हूं। यहां इन आठों का अर्थ संक्षेप से किया है। (टिप्पणी- कहीं कहीं शब्द में ऐतिह्य और अनुमान में अर्थापत्ति सम्भव और अभाव को मानने से (4) चार प्रमाण रहते हैं।)



उ॰-यह बात सत्य है कि इनके विना माने सम्पूर्ण व्यवहार और परमार्थ किसी का सिद्ध नहीं हो सकता। इस से इन आठों को हम लोग भी मानते हैं।





यथा कश्चिदेकं मृत्पिण्डं विशेषतश्चूर्णीकृत्य वेगयुक्ते वायौ बाहुवेगेनाकाशे प्रति-क्षिपेत्तस्य नाशो भवतीत्युपचर्य्यते। चक्षुषा दर्शनाभावात्'णश अदर्शने'अस्माद् घञ्-प्रत्यये कृते नाश इति शब्दः सिध्यति। अतो नाशो बाह्येन्द्रियाऽदर्शनमेव भवितुमर्हति। किञ्च यदा परमाणवः पृथक् पृथक् भवन्ति तदा ते चक्षुषा नैव दृश्यन्ते तेषामतीन्द्रियत्वात्। यदा चैते मिलित्वा स्थूलभावमापद्यन्ते तदैव तद्द्रव्यं दृष्टिपथमागच्छति स्थूलस्यैन्द्रियकत्वात्। यद्द्रव्यं विभक्तं विभक्तमन्तविभागानर्हं भवति तस्य परमाणुसंज्ञा चेति व्यवहारः। ते हि विभक्ता अतीन्द्रियाः सन्त आकाशे वर्त्तन्त एव।



भाषार्थ-नाश को समझने के लिए यह दृष्टान्त है कि कोई मनुष्य मिट्टी के ढेले को पीस के वायु के बीच में बल से फैंक दे, फिर जैसे वे छोटे-छोटे कण आंख से नहीं दीखते। क्योंकि (णश्) धातु का अदर्शन ही अर्थ है। जब अणु अलग-अलग हो जाते हैं तब वे देखने में नहीं आते, इसी का नाम नाश है। और जब परमाणु के संयोग से द्रव्य स्थूल अर्थात् बड़ा होता है, तब वह देखने में आता है। और परमाणु इसको कहते हैं कि जिसका विभाग फिर कभी न हो सके। परन्तु यह बात केवल एकदेशी है, क्योंकि उसका भी ज्ञान से विभाग हो सकता है। जिस की परिधि और व्यास बन सकता है। उसका भी टुकड़ा हो सकता है। यहां तक कि जब पर्यन्त वह एकरस न हो जाय तब पर्यन्त ज्ञान से बराबर कटता ही चला जायगा।



तथैवाग्नौ यद् द्रव्यं प्रक्षिप्यते तद्विभागं प्राप्य देशान्तरे वर्त्तत एव। न हि तस्याभावः कदाचिद् भवति। एवं यद् दुर्गन्धादि-दोषनिवारकं सुगन्धादि-द्रव्यमस्ति तच्चाग्नौ हुतं सद्वायोर्वृष्टिजलस्य शुद्धिकरं भवति तस्मिन्निर्दोषे सति सृष्टये महान् ह्युपकारो भवति सुखं चातः कारणाद्यज्ञः कर्त्तव्य एवेति।



किं च भोः! वायुवृष्टिजलशुद्धिकरणमेव यज्ञस्य प्रयोजनमस्ति चेत्तर्हि गृहाणां मध्ये सुगन्धद्रव्यरक्षणेनैतत् सेत्स्यति,पुनः किमर्थमेतावानाडम्बरः?



नैवं शक्यम्। नैव तेनाशुद्धो वायुः सूक्ष्मो भूत्वाऽऽकाशं गच्छति,तस्य पृथक्त्व-लघुत्वाभावात्। तत्र तस्य स्थितौ सत्यां नैव बाह्यो वायुरागन्तुं शक्नोत्यवकाशाभावात्। तत्र पुनः सुगन्धदुर्गन्ध-युक्तस्य वायोर्वर्तमानत्वादारोग्यादिकं फलमपि भवितुमशक्यमेवास्ति।



भाषार्थ-वैसे ही जो सुगन्ध आदि युक्त द्रव्य अग्नि में डाला जाता है, उसके अणु अलग-अलग होके आकाश में रहते ही हैं, क्योंकि किसी द्रव्य का वस्तुता से अभाव नहीं होता। इस से वह द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों का निवारण करने वाला अवश्य होता है। फिर उस से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि के होने से जगत् का बड़ा उपकार और सुख अवश्य होता है। इस कारण से यज्ञ को करना ही चाहिए।



प्र॰-जो यज्ञ से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि करना मात्र ही प्रयोजन है तो इस की सिद्धि अतर और पुष्पादि के घरों में रखने से भी हो सकती है, फिर इतना बड़ा परिश्रम यज्ञ में क्यों करना?



उ॰-यह कार्य अन्य किसी से सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि अतर और पुष्पादि का सुगन्ध तो उसी दुर्गन्ध वायु में मिल के रहता है, उस को छेदन करके बाहर नहीं निकाल सकता, और न वह ऊपर चढ़ सकता है, क्योंकि उस में हलकापन नहीं होता। उसके उसी अवकाश में रहने से बाहर का शुद्ध वायु उस ठिकाने में जा भी नहीं सकता, क्योंकि खाली जगह के विना दूसरे का





प्रवेश नहीं हो सकता। फिर सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त वायु के वहीं रहने से रोगनाशादि फल भी नहीं होते।



यदा तु खलु तस्मिन् गृहेऽग्निमध्ये सुगन्ध्यादिद्रव्यस्य होमः क्रियते,तदाऽग्निना पूर्वो वायुर्भेदं प्राप्य लघुत्वमापन्न उपर्य्याकाशं गच्छति। तस्मिन् गते सति तत्रावकाशत्वाच्चतसृभ्यो दिग्भ्यः शुद्धो वायुराद्रवति। तेन गृहाकाशस्य पूर्णत्वादारोग्यादिकं फलमपि जायते।



भाषार्थ-और जब अग्नि उस वायु को वहां से हलका करके निकाल देता है, तब वहां शुद्ध वायु भी प्रवेश कर सकता है। इसी कारण यह फल यज्ञ से ही हो सकता है, अन्य प्रकार से नहीं। क्योंकि जो होम के परमाणुयुक्त शुद्ध वायु है, सो पूर्वस्थित दुर्गन्धवायु को निकाल के, उस देशस्थ वायु को शुद्ध करके, रोगों का नाश करने वाला होता और मनुष्यादि सृष्टि को उत्तम सुख को प्राप्त कराता है।



यो होमेन सुगन्धयुक्त-द्रव्यपरमाणुयुक्त उपरिगतो वायुर्भवति स वृष्टिजलं शुद्धं कृत्वा वृष्ट्याधिक्यमपि करोति। तद्द्वारौषध्यादीनां शुद्धेरुत्तरोत्तरं जगति महत्सुखं वर्धत इति निश्चीयते। एतत्खल्वग्नि-संयोगरहित-सुगन्धेन वायुना भवितुमशक्यमस्ति। तस्माद्धोम-करणमुत्तममेव भवतीति निश्चेतव्यम्।



भाषार्थ-जो वायु सुगन्ध्यादि द्रव्य के परमाणुओं से युक्त होम द्वारा आकाश में चढ़ के वृष्टिजल को शुद्ध कर देता है और उस से वृष्टि भी अधिक होती है, क्योंकि होम करके नीचे गर्मी अधिक होने से जल भी ऊपर अधिक चढ़ता है। शुद्ध जल और वायु के द्वारा अन्नादि ओषधि भी अत्यन्त शुद्ध होती हैं। ऐसे प्रतिदिन सुगन्ध के अधिक होने से जगत् में नित्यप्रति अधिक सुख बढ़ता है। यह फल अग्नि में होम करने के विना दूसरे प्रकार से होना असम्भव है। इससे होम का करना अवश्य है।



अन्यच्च दरू स्थले केनचित्पुरुषेणाग्नौ सुगन्धद्रव्यस्य होमः क्रियते,तद्युक्तो वायुर्दूरस्थमनुष्यस्य घ्राणेन्द्रियेण संयुक्तो भवति। सोऽत्र सुगन्धो वायुरस्तीति जानात्येव। अनेन विज्ञायते वायुना सह सुगन्धं दुर्गन्धं च द्रव्यं गच्छतीति। तद्यदा स दूरं गच्छति तदा तस्य घ्राणेन्द्रियसंयोगो न भवति,पुनर्बालबुद्धीनां भ्रमो भवति स सुगन्धो नास्तीति। परन्तु तस्य हुतस्य पृथग्भूतस्य वायुस्थस्य सुगन्धयुक्तस्य द्रव्यस्य देशान्तरे वर्त्तमानत्वात्तैर्न विज्ञायते। अन्यदपि खलु होमकरणस्य बहुविधमुत्तमं फलमस्ति तद्विचारेण बुधैर्विज्ञेयमिति।



भाषार्थ-और भी सुगन्ध के नाश नहीं होने में कारण है कि किसी पुरुष ने दूर देश में सुगन्ध चीजों का अग्नि में होम किया हो, उस सुगन्ध से युक्त जो वायु है, सो होम के स्थान से दूर देश में स्थित हुए मनुष्य के नाक इन्द्रिय के साथ संयुक्त होने से उस को यह ज्ञान होता है कि यहां सुगन्ध वायु है। इस से जाना जाता है कि द्रव्य के अलग होने में भी द्रव्य का गुण द्रव्य के साथ ही बना रहता है, और वह वायु के साथ सुगन्ध और दुर्गन्धयुक्त सूक्ष्म होके जाता आता है। परन्तु जब वह द्रव्य दूर चला जाता है, तब उसके नाक इन्द्रिय से संयोग भी छूट जाता है, फिर बालबुद्धि मनुष्यों को ऐसा भ्रम होता है कि वह सुगन्धित द्रव्य नहीं रहा। परन्तु यह उन को अवश्य जानना चाहिए कि वह सुगन्ध द्रव्य आकाश में वायु के साथ बना ही रहता है। इन से अन्य भी होम करने





के बहुत से उत्तम फल हैं, उन को बुद्धिमान् लोग विचार से जान लेंगे।



यदि होमकरणस्यैतत्फलमस्ति,तद्धोमकरणमात्रेणैव सिध्यति,पुनस्तत्र वेदमन्त्राणां पाठः किमर्थः क्रियते?



अत्र ब्रूमः-एतस्यान्यदेव फलमस्ति। किम्?यथा हस्तेन होमो नेत्रेण दर्शनं त्वचा स्पर्शनं च क्रियते तथा वाचा वेदमन्त्रा अपि पठ्यन्ते। तत्पाठेनेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाः क्रियन्ते। होमेन किं फलं भवतीत्यस्य ज्ञानं,तत्पाठानुवृत्त्या वेदमन्त्राणां रक्षणमीश्वरस्यास्तित्वसिद्धिश्च। अन्यच्च,सर्वकर्मादावीश्वरस्य प्रार्थना कार्य्येत्युपदेशः। यज्ञे तु वेदमन्त्रोच्चारणात् सर्वत्रैव तत्प्रार्थना भवतीति वेदितव्यम्।



भाषार्थ-प्र॰-होम करने का जो प्रयोजन है सो तो केवल होम से ही सिद्ध होता है फिर वहां वेदमन्त्रों के पढ़ने का क्या काम है?



उ॰-उन के पढ़ने का प्रयोजन कुछ और ही है।प्र॰-वह क्या है?उ॰-जैसे हाथ से होम करते, आंख से देखते और त्वचा से स्पर्श करते हैं, वैसे ही वाणी से वेदमन्त्रों को भी पढ़ते हैं। क्योंकि उनके पढ़ने से वेदों की रक्षा, ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना होती है। तथा होम से जो जो फल होते हैं उनका स्मरण भी होता है। वेदमन्त्रों के वारंवार पाठ करने से वे कण्ठस्थ भी रहते हैं, और ईश्वर का होना भी विदित होता है कि कोई नास्तिक न हो जाय, क्योंकि ईश्वर की प्रार्थनापूर्वक ही सब कर्मों का आरम्भ करना होता है। सो वेदमन्त्रों के उच्चारण से यज्ञ में तो उसकी प्रार्थना सर्वत्र होती है। इसलिए सब उत्तम कर्म वेदमन्त्रों से ही करना उचित है।



कश्चिदत्राह-वेदमन्त्रोच्चारणं विहायान्यस्य कस्यचित्पाठस्तत्र क्रियेत तदा किं दूषणमस्तीति?



अत्रोच्यते-



नान्यस्य पाठे कृते सत्येतत्प्रयोजनं सिध्यति। कुतः?ईश्वरोक्ताभावान्निरतिशय-सत्यविरहाच्च। यद्यद्धि यत्र क्वचित्सत्यं प्रसिद्धमस्ति तत्तत्सर्वं वेदादेव प्रसृतमिति विज्ञेयम् यद्यत्खल्वनृतं तत्तदनीश्वरोक्तं वेदाद् बहिरिति च।



अत्रार्थे मनुराह-



त्वमेको ह्यस्य सर्वस्य विधानस्य स्वयम्भुवः।



अचिन्त्यस्याप्रमेयस्य कार्य्यतत्त्वार्थवित्प्रभो॥1॥-अ॰ 1। श्लो॰ 3॥



चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक्।



भूतं भव्यं भविष्यच्च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति॥2॥



बिभर्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम्।



तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम्॥3॥-अ॰ 12 श्लो॰ 97, 99॥



भाषार्थ-प्र॰-यज्ञ में वेदमन्त्रों को छोड़ के दूसरे का पाठ करें तो क्या दोष है?उ॰-अन्य के पाठ में यह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। ईश्वर के वचन से जो सत्य प्रयोजन सिद्ध होता है, सो अन्य के वचन से कभी नहीं हो सकता। क्योंकि जैसा ईश्वर का वचन सर्वथा भ्रान्तिरहित सत्य होता है वैसा अन्य का नहीं। और जो कोई वेदों के अनुकूल अर्थात् आत्मा की शुद्धि, आप्त पुरुषों के ग्रन्थों का बोध और उनकी शिक्षा से वेदों को यथावत् जानके कहता है, उसका भी वचन सत्य ही होता है। और जो केवल अपनी बुद्धि से कहता है वह ठीक ठीक नहीं हो सकता। इस से यह निश्चय है कि जहां जहां सत्य दीखता और सुनने में आता है, वहां





वहां वेदों में से ही फैला है, और जो जो मिथ्या है सो सो वेद से नहीं, किन्तु वह जीवों ही की कल्पना से प्रसिद्ध हुआ है। क्योंकि जो ईश्वरोक्त ग्रन्थ से सत्य प्रयोजन सिद्ध होता है, सो दूसरे से कभी नहीं हो सकता। इस विषय में मनु का प्रमाण है कि-



(त्वमे॰) मनु जी से ऋषि लोग कहते हैं कि स्वयम्भू जो सनातन वेद हैं, जिनमें असत्य कुछ भी नहीं, और जिन में सब सत्यविद्याओं का विधान है, उन के अर्थ को जानने वाले केवल आप ही हैं॥1॥



(चातु॰) अर्थात् चार वर्ण, चार आश्रम, भूत, भविष्यत् और वर्तमान आदि की सब विद्या वेदों से ही प्रसिद्ध होती हैं॥2॥ क्योंकि-



(बिभर्ति॰) यह जो सनातन वेदशास्त्र है, सो सब विद्याओं के दान से सम्पूर्ण प्राणियों का धारण और सब सुखों को प्राप्त करता है, इस कारण से हम लोग उस को सर्वथा उत्तम मानते हैं और इसी प्रकार मानना भी चाहिए। क्योंकि सब जीवों के लिए सब सुखों का साधन यही है॥3॥



किं यज्ञानुष्ठानार्थं भूमिं खनित्वा वेदिः,प्रणीतादीनि पात्राणि,कुशतृणं,यज्ञशाला,ऋत्विजश्चैतत्सर्वं करणीयमस्ति?



अत्र ब्रूमः-यद्यदावश्यकं युक्तिसिद्धं तत्तत्कर्त्तव्यं नेतरत्। तद्यथा-भूमिं खनित्वा वेदी रचनीया,तस्यां होमे कृतेऽग्नेस्तीव्रत्वाद्धुतं द्रव्यं सद्यो विभेदं प्राप्याकाशं गच्छति। तथा वेदिदृष्टान्तेन त्रिकोण-चतुष्कोण-गोल-श्येनाद्याकारवत्करणाद्रेखागणितमपि साध्यते। तत्र चेष्टकानां परिगणितत्वादनया गणितविद्यापि गृह्यते। एवमेवोत्तरेऽपि पदार्थाः सप्रयोजनाः सन्त्येव। परन्त्वेवं प्रणीतायां रक्षितायां पुण्यं स्यादेवं पापमिति। यदुच्यते,तत्र पापनिमित्ता- भावात्सा कल्पना मिथ्यैवास्ति। किन्तु खलु यज्ञसिद्ध्यर्थं यद्यदावश्यकं युक्तिसिद्धमस्ति,तत्तदेव ग्राह्यम्। कुतः?तैर्विना तदसिद्धेः।



भाषार्थ-प्र॰-क्या यज्ञ करने के लिए पृथिवी खोद के वेदिरचन, प्रणीता, प्रोक्षणी और चमसादि पात्रों का स्थापन, दर्भ का रखना, यज्ञशाला का बनाना और ऋत्विजों का करना, यह सब करना ही चाहिए?



उ॰-करना तो चाहिए, परन्तु जो जो युक्ति सिद्ध हैं, सो सो ही करने के योग्य हैं। क्योंकि जैसे वेदि बना के उस में होम करने से वह द्रव्य शीघ्र भिन्न भिन्न परमाणुरूप होके, वायु और अग्नि के साथ आकाश में फैल जाता है, ऐसे ही वेदि में भी अग्नि तेज होने और होम का साकल्य इधर उधर बिखरने से रोकने के लिए वेदि अवश्य रचनी चाहिए। और वेदि के त्रिकोण, चतुष्कोण, गोल तथा श्येन पक्षी आदि के तुल्य बनाने के दृष्टान्त से रेखागणितविद्या भी जानी जाती है कि जिस से त्रिभुज आदि रेखाओं का भी मनुष्यों को यथावत् बोध हो। तथा उसमें जो ईंटों की संख्या की है उस से गणितविद्या भी समझी जाती है। इस प्रकार से कि जब इतनी लम्बी चौड़ी और गहरी वेदि हो तो उस में इतनी बड़ी ईंटें इतनी लगेंगी, इत्यादि वेदि के बनाने में बहुत प्रयोजन है। तथा सुवर्ण, चांदी वा काष्ठ के पात्र इस कारण से बनाते हैं कि उनमें जो घृतादि पदार्थ रक्खे जाते हैं वे बिगड़ते नहीं। और कुश इसलिये रखते हैं कि जिस से यज्ञशाला का मार्जन हो, और चिंवटी आदि कोई जन्तु वेदी की ओर अग्नि में न गिरने पावें। ऐसी ही यज्ञशाला बनाने का यह प्रयोजन है कि जिस से अग्नि की ज्वाला में वायु अत्यन्त न लगे, और वेदि में कोई पक्षी किंवा उन की





बीट भी न गिरे। इसी प्रकार ऋत्विजों के विना यज्ञ का काम कभी नहीं हो सकता, इत्यादि प्रयोजन के लिए यह सब विधान यज्ञ में अवश्य करना चाहिए। इन से भिन्न द्रव्य की शुद्धि और संस्कार आदि भी अवश्य करने चाहिए। परन्तु इस प्रकार से प्रणीतापात्र रखने से पुण्य और इस प्रकार रखने से पाप होता है, इत्यादि कल्पना मिथ्या ही है। किन्तु जिस प्रकार करने में यज्ञ का कार्य अच्छा बने, वही करना अवश्य है, अन्य नहीं।



यज्ञे देवताशब्देन किं गृह्यते?



याश्च वेदोक्ताः अत्र प्रमाणानि-



अग्निर्देवता वातो देवता सूर्य्यो देवता चन्द्रमा देवता वसवो देवता रुद्रा देवताऽऽदित्या देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता॥1॥



-यजुः अ॰ 14। मं॰ 20॥



अत्र कर्मकाण्डे देवताशब्देन वेदमन्त्राणां ग्रहणम्। गायत्र्यादीनि छन्दांसि ह्यग्न्यादिदेवताख्यान्येव गृह्यन्ते। तेषां कर्मकाण्डादि-विधेर्द्योतकत्वात्। यस्मिन्मन्त्रे चाग्निशब्दार्थ-प्रतिपादनं वर्त्तते,स एव मन्त्रोऽग्निदेवतो गृह्यते। एवमेव वातः सूर्य्यश्चन्द्रमा वसवो रुद्रा आदित्या मरुतो विश्वेदेवा बृहस्पतिरिन्द्रो वरुणश्चेत्येतच्छन्दयुक्ता मन्त्रा देवताशब्देन गृह्यन्ते। तेषामपि तत्तदर्थस्य द्योतकत्वात्परमाप्तेश्वरेण कृतसङ्केतत्वाच्च।



भाषार्थ-प्र॰-यज्ञ में देवता शब्द से किसका ग्रहण होता है?



उ॰-जो जो वेद में कहे हैं, उन्हीं का ग्रहण होता है, इसमें यह यजुर्वेद का प्रमाण है कि- (अग्निर्देव॰) कर्मकाण्ड अर्थात् यज्ञक्रिया में मुख्य करके देवता शब्द से वेदमन्त्रों का ही ग्रहण करते हैं, क्योंकि जो गायत्र्यादि छन्द हैं वे ही देवता कहाते हैं। और इन वेदमन्त्रों से ही सब विद्याओं का प्रकाश भी होता है। इसमें यह कारण है कि जिन जिन मन्त्रों में अग्नि आदि शब्द हैं, उन उन मन्त्रों का और उन उन शब्दों के अर्थों का अग्नि आदि देवता नामों से ग्रहण होता है। मन्त्रों का देवता नाम इसलिए है कि उन्हीं से सब अर्थों का यथावत् प्रकाश होता है।



अत्राह यास्काचार्य्यो निरुक्ते-



कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे॥-निरु॰ अ॰ 1। खं॰ 1॥



अथातो दैवतम्। तद्यानि नामानि प्राधान्यस्तुतीनां देवतानां तद्दैवतमित्याचक्षते। सैषा देवतोपपरीक्षा। यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति तास्त्रिविधा ऋचः। परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्च॥-नि॰ अ॰ 7। खं॰ 1॥



अस्यार्थः-(कर्मसं॰) कर्मणामग्निहोत्राद्यश्वमेधान्तानां शिल्पविद्या-साधनानां च सम्पत्तिः सम्पन्नता संयोगो भवति येन स मन्त्रो वेदे देवताशब्देन गृह्यते। तथा च कर्मणां सम्पत्ति-र्मोक्षो भवति येन परमेश्वर-प्राप्तिश्च सोऽपि मन्त्रो मन्त्रार्थश्चाङ्गीकार्य्यः।



अथेत्यनन्तरं दैवतं किमुच्यते,यत्प्राधान्येन स्तुतिर्यासां देवतानां क्रियते तद्दैवतमिति विज्ञायते। यानि नामानि मन्त्रोक्तानि येषामर्थानां मन्त्रेषु विद्यन्ते तानि सर्वाणि देवतालिङ्गानि भवन्ति। तद्यथा-





अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे। देवाँ २ ऽ आ सादयादिह॥1॥



-यजुः॰ अ॰ 22। मं॰ 17॥



अत्राग्निशब्दो लिङ्गमस्ति। अतः किं विज्ञेयं,यत्र यत्र देवतोच्यते तत्र तत्र तल्लिङ्गो मन्त्रो ग्राह्य इति। यस्य द्रव्यस्य नामान्वितं यच्छन्दोऽस्ति तदेव दैवतमिति बोध्यम्। सा एषा देवतोपपरीक्षाऽतीता आगामिनी चास्ति। अत्रोच्यते-



ऋषिरीश्वरः सर्वदृग्,यत्कामो यं कामयमान इममर्थमुपदिशेयमिति स यत्कामः,यस्यां देवतायामार्थपत्यमर्थस्य स्वामित्वमुपदेष्टुमिच्छन् सन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते,तदर्थगुणकीर्त्तनं प्रयुक्तवानस्ति,स एव मन्त्रस्तद्देवतो भवति। किञ्च यदेवार्थप्रतीतिकरणं दैवतं प्रकाश्यं येन भवति स मन्त्रो देवताशब्दवाच्योऽस्तीति विज्ञायते। देवताभिधा ऋचो याभिर्विद्वांसः सर्वाः सत्यविद्याः स्तुवन्ति प्रकाशयन्ति,ऋच् स्तुताविति धात्वर्थयोगात्। ताः श्रुतयस्त्रिविधास्त्रिप्रकारकाः सन्ति-परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृता आध्यात्मिक्यश्चेति। यासां देवतानामृचां परोक्षकृतोऽर्थोऽस्ति ताः परोक्षकृताः। यासां प्रत्यक्षमर्थो दृश्यते ताः प्रत्यक्षकृता ऋचो देवताः। आध्यात्मिक्यश्चाध्यात्मं जीवात्मानं तदन्तर्यामिणं परमेश्वरं च प्रतिपादितुमर्हा या ऋचो मन्त्रास्ता आध्यात्मिक्यश्चेति। एता एव कर्मकाण्डे देवताशब्दार्थाः सन्तीति विज्ञेयम्।



भाषार्थ-(कर्मस॰) वेदमन्त्रों करके अग्निहोत्र से लेके अश्वमेधपर्य्यन्त सब यज्ञों की शिल्पविद्या और उनके साधनों की सम्पत्ति अर्थात् प्राप्ति होती, और कर्मकाण्ड को लेके मोक्षपर्य्यन्त सुख मिलता है, इसी हेतु से उन का नाम देवता है।



(अथातो॰) दैवत उन को कहते हैं कि जिनके गुणों का कथन किया जाय, अर्थात् जो जो संज्ञा जिन जिन मन्त्रों में जिस जिस अर्थ की होती है उन उन मन्त्रों का नाम वही देवता होता है। जैसे 'अग्निं दूतं' इस मन्त्र में अग्नि शब्द चिह्न है, यहां इसी मन्त्र को अग्नि देवता जानना चाहिए। ऐसे ही जहां-जहां मन्त्रों में जिस जिस शब्द का लेख है, वहां-वहां उस उस मन्त्र को ही देवता समझना होता है। इसी प्रकार सर्वत्र समझ लेना चाहिए। सो देवता शब्द से जिस जिस गुण से जो जो अर्थ लिये जाते हैं, सो सो निरुक्त और ब्राह्मणादि ग्रन्थों में अच्छी प्रकार लिखा है।



इस में यह कारण है कि ईश्वर ने जिस जिस अर्थ को जिस जिस नाम से वेदों में उपदेश किया है, उस उस नाम वाले मन्त्रों से उन्हीं अर्थों को जानना होता है। सो वे मन्त्र तीन प्रकार के हैं।



उनमें से कई एक परोक्ष अर्थात् अप्रत्यक्ष अर्थ के कई एक प्रत्यक्ष अर्थात् प्रसिद्ध अर्थ के, और कई एक आध्यात्मिक अर्थात् जीव परमेश्वर और सब पदार्थों के कार्य कारण के प्रतिपादन करने वाले हैं। इससे क्या आया कि त्रिकालस्थ जितने पदार्थ और विद्या हैं, उनके विधान करने वाले मन्त्र ही हैं। इसी कारण से इनका नाम देवता है।



तद्येऽनादिष्टदेवता-मन्त्रास्तेषु देवतोपपरीक्षा। यद्देवतः स यज्ञो वा यज्ञाङ्गं वा तद्देवता भवन्त्यथान्यत्र यज्ञात्प्राजापत्या इति याज्ञिका,नाराशंसा इति नैरुक्ता अपि वा सा कामदेवता स्यात् प्रायोदेवता वा,अस्ति ह्याचारो बहुलं लोके देवदेवत्यमतिथिदेवत्यं पितृदेवत्यं याज्ञदैवतो मन्त्र इति॥-निरु॰ अ॰ 7। खं॰ 4॥



(तद्येऽनादि॰) तत्तस्माद्ये खल्वनादिष्टदेवता मन्त्रा अर्थान्न विशेषतो देवतादर्शनं





नामार्थो वा येषु दृश्यते,तेषु देवतोपपरीक्षा कास्तीत्यत्रोच्यते-यत्र विशेषो न दृश्यते तत्रैवं यज्ञो देवता,यज्ञाङ्गं वेत्येतद्देवताख्यमिति विज्ञायते। ये खलु यज्ञादन्यत्र प्रयुज्यन्ते ते वै प्राजापत्याः परमेश्वरदेवताका मन्त्रा भवन्तीत्येवं याज्ञिका मन्यन्ते। अत्रैव विकल्पोऽस्ति-नाराशंसा मनुष्यविषया इति नैरुक्ता ब्रुवन्ति। तथा या कामना सा कामदेवता भवतीति सकामा लौकिका जना जानन्ति। एवं देवताविकल्पस्य प्रायेण लोके बहुलमाचारोऽस्ति। क्वचिद्देवदेवत्यं कर्म,मातृदेवत्यं,विद्वद्देवत्यमतिथिदेवत्यं,पितृदेवत्यं चैतेऽपि पूज्याः सत् कर्त्तव्याः सन्त्यतस्तेषामुपकार-कर्तृत्वमात्रमेव देवतात्वमस्तीति विज्ञायते। मन्त्रास्तु खलु यज्ञ-सिद्धये मुख्यहेतुत्वाद्याज्ञदैवता एव सन्तीति निश्चीयते।



भाषार्थ-जिन-जिन मन्त्रों में सामान्य अर्थात् जहां-जहां किसी विशेष अर्थ का नाम प्रसिद्ध नहीं दीख पड़ता, वहां-वहां यज्ञ आदि को देवता जानना होता है। (अग्निमीळे॰) इस मन्त्र के भाष्य में जो तीन प्रकार का यज्ञ लिखा है, अर्थात् एक तो अग्निहोत्र से लेके अश्वमेध पर्यन्त, दूसरा प्रकृति से लेके पृथिवी पर्यन्त जगत् का रचनरूप तथा शिल्पविद्या और तीसरा सत्संग आदि से जो विज्ञान और योगरूप यज्ञ है, ये ही उन मन्त्रों के देवता जानने चाहियें तथा जिनसे यह यज्ञ सिद्ध होता है, वे यज्ञाङ्ग भी उन मन्त्रों के देवता हैं। और जो इनसे भिन्न मन्त्र हैं उनका प्राजापत्य अर्थात् परमेश्वर ही देवता है। तथा जो मन्त्र मनुष्यों का प्रतिपादन करते हैं, उनके मनुष्य देवता हैं। इसमें बहुत प्रकार के विकल्प हैं कि कहीं पूर्वोक्त देवता कहाते हैं, कहीं यज्ञादि कर्म, कहीं माता, कहीं पिता, कहीं विद्वान्, कहीं अतिथि और कहीं आचार्य देव कहाते हैं।परन्तु इसमें इतना भेद है कि यज्ञ में मन्त्र और परमेश्वर को ही देव मानते हैं।



अत्र परिगणनम्। गायत्र्यादिच्छन्दोन्विता मन्त्रा ईश्वराज्ञा,यज्ञः,यज्ञाङ्गं,प्रजापतिः परमेश्वरः,नराः,कामः,विद्वान्,अतिथिः,माता,पिता,आचार्य्यश्चेति कर्मकाण्डादीन् प्रत्येता देवताः सन्ति। परन्तु मन्त्रेश्वरावेव याज्ञदैवते भवत इति निश्चयः।



भाषार्थ-जो जो गायत्र्यादि छन्दों से युक्त वेदों के मन्त्र, उन्हीं में ईश्वर की आज्ञा, यज्ञ और उनके अग् अर्थात् साधन, प्रजापति जो परमेश्वर, नर जो मनुष्य, काम, विद्वान्, अतिथि, माता, पिता और आचार्य ये अपने अपने दिव्यगुणों से ही देवता कहाते हैं।परन्तु यज्ञ में तो वेदों के मन्त्र और ईश्वर को ही देवता माना है।



अन्यच्च-



देवो दानाद्वा,दीपनाद्वा,द्योतनाद्वा,द्युस्थानो भवतीति वा॥-निरु॰ अ॰ 7। खं॰ 15॥



मन्त्रा मननाच्छन्दांसि छादनात्॥-निरु॰ अ॰ 7। खं॰ 11॥



अस्यार्थः-(देवो दानात्) यत्स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकं परस्वत्वोत्पादनं तद्दानं भवति (दीपनात्) दीपनं प्रकाशनम्,द्योतनमुपदेशादिकं च। अत्र दानशब्देनेश्वरो विद्वांसो मनुष्याश्च देवतासंज्ञाः सन्ति। दीपनात्सूर्य्यादयो द्योतनान्मातृ-पित्राचार्य्यातिथयश्च। तथा द्यौः किरणा आदित्यरश्मयः प्राणसूर्य्यादयो वा स्थानं स्थित्यर्थं यस्य स द्युस्थानः।



प्रकाशकानामपि प्रकाशकत्वात्परमेश्वर एवात्र देवोऽस्तीति विज्ञेयम्। अत्र प्रमाणम्-



न तत्र सूर्य्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।



तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥-कठ॰ वल्ली 5। मं॰ 15॥





तत्र नैव परमेश्वरे सूर्य्यादयो भान्ति प्रकाशं कुर्वन्ति। किन्तु तमेव भान्तं प्रकाशयन्तमनुपश्चात्ते हि प्रकाशयन्ति। नैव खल्वेतेषु कश्चित्स्वातन्त्र्येण प्रकाशोऽस्तीति। अतो मुख्यो देव एकः परमेश्वर एवोपास्योऽस्तीति मन्यध्वम्।



भाषार्थ-(देवो दाना॰) दान देने से देव नाम पड़ता है और दान कहते हैं अपनी चीज दूसरे के अर्थ दे देना। दीपन कहते हैं प्रकाश करने को, द्योतन कहते हैं सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है कि जिसने जगत् को सब पदार्थ दे रक्खे हैं, तथा विद्वान् मनुष्य भी विद्यादि पदार्थों के देने वाले होने से देव कहाते हैं। (दीपन) अर्थात् सब मूर्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करने से सूर्य्यादि लोकों का नाम भी देव है। तथा माता, पिता, आचार्य्य और अतिथि भी पालन, विद्या और सत्योपदेशादि के करने से देव कहाते हैं। वैसे ही सूर्य्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है, सो ही ईश्वर सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव है, अन्य कोई नहीं। इस में कठोपनिषत् का भी प्रमाण है कि-



सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजुली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते, किन्तु इन सब का प्रकाश करने वाला एक वही है क्योंकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य्य आदि सब जगत् प्रकाशित हो रहा है। इस में यह जानना चाहिए कि ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतन्त्र प्रकाश करने वाला नहीं है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव है।



नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्॥-य॰ अ॰ 40। मं॰ 4॥



अत्र देवशब्देन मनःषष्ठानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि गृह्यन्ते। तेषां शब्दस्पर्श-रूपरसगन्धानां सत्यासत्ययोश्चार्थानां द्योतकत्वात्तान्यपि देवाः। यो देवः सा देवता, 'देवात्तल्'इत्येनन सूत्रेण स्वार्थे'तल्'विधानात्। स्तुतिर्हि गुणदोषकीर्तनं भवति। यस्य पदार्थस्य मध्ये यादृशा गुणा वा दोषाः सन्ति तादृशानामेवोपदेशः स्तुतिर्विज्ञायते। तद्यथा अयमसिः प्रहृतः सन्नतीव च्छेदनं करोति तीक्ष्णधारः स्वच्छो धनुर्वन्नाम्यमानोऽपि न त्रुट्यतीत्यादि गुणकथनमतो विपरीतोऽसिर्नैव तत् कर्त्तुं समर्थो भवतीत्यसेः स्तुतिर्विज्ञेया।



भाषार्थ-(नैनद्देवा॰) इस वचन में देव शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण होता है। जो कि श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, जीभ, नाक और मन, ये छः देव कहाते हैं। क्योंकि शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, सत्य और असत्य इत्यादि अर्थों का इनसे प्रकाश होता है। और देव शब्द से स्वार्थ में 'तल्' प्रत्यय करने से देवता शब्द सिद्ध होता है। जो जो गुण जिस जिस पदार्थ में ईश्वर ने रचे हैं, उन उन गुणों का लेख उपेदश, श्रवण और विज्ञान करना तथा मनुष्य सृष्टि के गुण दोषों का भी लेख आदि करना इस को 'स्तुति' कहते हैं क्योंकि जितना-जितना जिस-जिस में गुण है उतना-उतना उस में देवपन है। इस से वे किसी के इष्टदेव नहीं हो सकते। जैसे किसी ने किसी से कहा कि यह तलवार काट करने में बहुत अच्छी और निर्मल है, इसकी धार बहुत तेज है, और यह धनुष् के समान नमाने से भी नहीं टूटती, इत्यादि तलवार के गुण-कथन को स्तुति कहते हैं।



तद्वदन्यत्रापि विज्ञयेम्। परन्त्वयं नियमः कर्मकाण्डं प्रत्यस्ति। उपासनाज्ञानकाण्डयोः कर्मकाण्डस्य निष्कामभागेऽपि च परमेश्वर एवेष्टदेवोऽस्ति। कस्मात्?तत्र तस्यैव प्राप्तिः प्रार्थ्यते। यश्च तस्य सकामो भागोऽस्ति तत्रेष्टविषयभोग-प्राप्तये परमेश्वरः प्रार्थ्यते। अतः





कारणाद्भेदो भवति परन्तु नैवेश्वरार्थत्यागः क्वापि भवतीति वेदाभिप्रायोऽस्ति।



भाषार्थ-इसी प्रकार सर्वत्र जान लेना। इस नियम के साथ कि केवल परमेश्वर ही कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्ड में सब का इष्टदेव स्तुति, प्रार्थना, पूजा और उपासना करने के योग्य है। क्योंकि गुण वे कहाते हैं, जिनसे कर्मकाण्डादि में उपकार लेना होता है। परन्तु सर्वत्र कर्मकाण्ड में भी इष्टभोग प्राप्ति के लिए परमेश्वर का त्याग नहीं होता, क्योंकि कार्य कारण सम्बन्ध से ईश्वर ही सर्वत्र स्तुति, प्रार्थना, उपासना से पूजा करने के योग्य होता है।



अत्र प्रमाणम्-



महाभाग्याद्देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते। एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति। कर्मजन्मान आत्मजन्मान आत्मैवैषां रथो भवत्यात्माऽश्वा आत्मायुधमात्मेषव आत्मा सर्वं देवस्य देवस्य॥



-निरु॰ अ॰ 7। खं॰ 4॥



(महाभाग्याद्देव॰) सर्वासां व्यवहारोपयोगिदेवतानां मध्य आत्मन एव मुख्यं देवतात्वमस्ति। कुतः?आत्मनो माहाभाग्यादर्थात् सर्वशक्तिमत्त्वादि-विशेषणवत्त्वात्। न तस्याग्रेऽन्यस्य कस्यापि देवतात्वं गण्यं भवितुमर्हति। कुतः?सर्वेषु वेदेष्वेकस्याद्वितीयस्यासहायस्य सर्वत्र व्याप्तस्यात्मन एव बहुधा बहुप्रकारैरुपासना विहिताऽस्ति। अस्मादन्ये ये देवा उक्ता वक्ष्यन्ते च। ते सर्व एकस्यात्मनः परमेश्वरस्य प्रत्यङ्गान्येव भवन्ति। अङ्गमङ्गं प्रत्यञ्चतीति निरुक्त्या तस्यैव सामर्थ्यस्यैकैकस्मिन्देशे प्रकाशिताः सन्ति। ते च (कर्मज॰) यतः कर्मणा जायन्ते तस्मात्कर्मजन्मानो यत आत्मन ईश्वरस्य सामर्थ्याज्जातास्तस्मादात्मजन्मानश्च सन्ति। अथैतेषां देवानामात्मा परमेश्वर एव रथो रमणाधिकरणम्। स एवाश्वागमनहेतवः। स आयुधं विजयावहमिषवो बाणा दुःखनाशकाः स एवास्ति। तथा चात्मैव देवस्य देवस्य सर्वस्वमस्ति। अर्थात्सर्वेषां देवानां स एवोत्पादको धाताधिष्ठाता मङ्गलकारी वर्त्तते। नातः परं किञ्चिदुत्तमं वस्तु विद्यत इति बोध्यम्।



भाषार्थ-इस में निरुक्त का भी प्रमाण है कि व्यवहार के देवताओं की उपासना कभी नहीं करनी चाहिए, किन्तु एक परमेश्वर ही की करनी उचित है। इसका निश्चय वेदों में अनेक प्रकार से किया गया है कि एक अद्वितीय परमेश्वर के ही प्रकाश, धारण, उत्पादन करने से वे सब व्यवहार के देव प्रकाशित हो रहे हैं। इनका जन्म और कर्म ईश्वर के सामर्थ्य से होता है। और इनका रथ अर्थात् जो रमण का स्थान, अश्व अर्थात् शीघ्र सुख प्राप्ति का कारण, आयुध अर्थात् सब शत्रुओं के नाश करने का हेतु और इषु अर्थात् जो बाण के समान सब दुष्टगुणों का छेदन करने वाला शस्त्र है, सो एक परमेश्वर ही है। क्योंकि परमेश्वर ने जिस-जिस में जितना दिव्यगुण रक्खा है उतना- उतना ही उन द्रव्यों में देवपन है, अधिक नहीं। इससे क्या सिद्ध हुआ कि केवल परमेश्वर ही उन सब का उत्पादन, धारण और मुक्ति का देने वाला है।



अत्रान्यदपि प्रमाणम्-



'ये त्रिंशति त्रयस्परो देवासो बर्हिरासदन्। विदन्नह द्वितासनन्॥1॥



-ऋ॰ अ॰ 6। अ॰ 2। व॰ 35। मं॰ 1॥



त्रयस्त्रिंशतास्तुवत भूतान्यशाम्यन् प्रजापतिः परमेष्ठ्यधिपतिरासीत्॥2॥-य॰ अ॰ 14। मं॰ 31॥





यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा निधिं रक्षन्ति सर्वदा। निधिं तमद्य को वेद यं देवा अभिरक्षथ॥3॥



यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अङ्गे गात्रा विभेजिरे। तान्वै त्रयस्त्रिंशद् देवानेके ब्रह्मविदो विदुः॥4॥



-अथर्व॰ कां॰ 10 प्रपा॰ 23। अनु॰ 4। मं॰ 23। 27॥



स होवाच महिमान एवैषामेते त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवा इति। कतमे ते त्रयस्त्रिंशदित्यष्टौ वसव एकादश रुद्रा द्वादशादित्यास्त एकत्रिंशदिन्द्रश्चैव प्रजापतिश्च त्रयस्त्रिंशाविति॥5॥



कतमे वसव इति?अग्निश्च पृथिवी च वायुश्चान्तरिक्षं चादित्यश्च द्यौश्च चन्द्रमाश्च नक्षत्राणि चैते वसवः। एतेषु हीदं सर्वं वसुहितमेते हीदं सर्वं वासयन्ते तद्यदिदं सर्वं वासयन्ते तस्माद्वसव इति॥6॥



कतमे रुद्रा इति?दशेमे पुरुषे प्राणा आत्मैकादशस्ते यदास्मान्मर्त्याच्छरीरादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रोदयन्ति तस्माद् रुद्रा इति॥7॥



कतम आदित्या इति?द्वादशमासाः संवत्सरस्यैत आदित्याः। एते हीदं सर्वमाददाना यन्ति तद्यदिदं सर्वमाददाना यन्ति तस्मादादित्या इति॥8॥



कतम इन्द्रः,कतमः प्रजापतिरिति?स्तनयित्नुरेवेन्द्रो,यज्ञः प्रजापतिरिति। कतमः स्तनयित्नुरित्यशनिरिति। कतमो यज्ञ इति?पशव इति॥9॥



कतमे ते त्रयो देवा इतीम एव। त्रयो लोका एषु हीमे सर्वे देवा इति। कतमौ द्वौ देवावित्यन्नं चैव प्राणश्चेति। कतमोऽध्यर्ध इति?योऽयं पवत इति॥10॥



तदाहुः। यदयमेक एव पवतेऽथ कथमध्यर्ध इति?यदस्मिन्निदं सर्वमध्यार्ध्नोत्तेनाध्यर्ध इति कतम एको देव इति?स ब्रह्म त्यदित्याचक्षते॥11॥-श॰ कां॰ 14। प्रपा॰ 16॥



अथैषामर्थः-वेदमन्त्राणामेवार्थो ब्राह्मणग्रन्थेषु प्रकाशित इति द्रष्टव्यम्। शाकल्यं प्रति याज्ञवल्क्योक्तिः। त्रयस्त्रिंशदेव देवाः सन्ति। अष्टौ वसवः। एकादश रुद्राः द्वादशादित्याः। इन्द्रः प्रजापतिश्चेति।



तत्र (वसवः)-अग्निः पृथिवी वायुः अन्तरिक्षम् आदित्यः द्यौः चन्द्रमाः नक्षत्राणि च। एतेषामष्टानां वसुसंज्ञा कृतास्ति। आदित्यः सूर्य्यलोकस्तस्य प्रकाशोऽस्ति द्यौः सूर्य्य-सन्निधौ पृथिव्यादिषु वा। अग्निलोकोऽस्त्यग्निरेव। कुत एते वसव इति यद्यस्मादेतेष्वष्टस्वेवेदं सर्वं सम्पूर्णं वसु वस्तुजातं हितं धृतमस्ति। किञ्च सर्वेषां वासाधिकरणानीम एव लोकाः सन्ति हि यतश्चेदं वासयन्ते सर्वस्यास्य जगतो वासहेतवस्तस्मात्कारणादग्न्यादयो वसुसंज्ञकाः सन्तीति बोद्धव्यम्।



(एकादश रुद्राः)-ये पुरुषेऽस्मिन् देहे प्राणः अपानः व्यानः समानः उदानः नागः कूर्मः कृकलः देवदत्तः धनञ्जयश्च। इमे दश प्राणा,एकादशम आत्मा,सर्वे मिलित्वैकादश रुद्रा भवन्ति। कुत एते रुद्रा इत्यत्राह-यदा यस्मिन् कालेऽस्मान्मरणधर्मकाच्छरीरादुत्क्रामन्तो निःसरन्तः सन्तोऽथेत्यनन्तरं मृतकसम्बन्धिनो जनांस्ते रोदयन्ति। यतो जना रुदन्ति,तस्मात् कारणादेते रुद्राः सन्तीति विज्ञेयम्।



(द्वादशादित्याः) चैत्राद्याः फाल्गुनान्ता द्वादश मासा आदित्या विज्ञेयाः। कुतः?हि यत एते सर्वं जगदाददाना अर्थादासमन्ताद् गृह्णन्तः प्रतिक्षणमुत्पन्नस्य वस्तुन आयुषः





प्रलयं निकटमानयन्तो यन्ति गच्छन्ति चक्रवद् भ्रमणेनोत्तरोत्तरं जातस्य वस्तुनोऽवयवशिथिलतां परिणामेन प्रापयन्ति तस्मात्कारणान्मासानामादित्यसंज्ञा कृतास्ति।



इन्द्रः परमैश्वर्य्ययोगात् स्तनयित्नुरशनिर्विद्युदिति। प्रजापतिर्यज्ञः पशव इति। प्रजायाः पालनहेतुत्वात् पशूनां यज्ञस्य च प्रजापतिरिति गौणिकी संज्ञा कृतास्ति। एते सर्वे मिलित्वा त्रयस्त्रिंशद्देवा भवन्ति। देवो दानादित्यादिनिरुक्त्या ह्येतेषु व्यावहारिकमेव देवत्वं योजनीयम्।



त्रयो लोकास्त्रयो देवाः,के त इत्यत्राह निरुक्तकारः—



धामानि त्रयाणि भवन्ति,स्थानानि नामानि जन्मानीति।-निरु॰ अ॰ 9। खं॰ 28॥



त्रयो लोका एत एव। वागेवायं लोको मनोऽन्तरिक्षलोकः प्राणोऽसौ लोकः॥-श॰ कां॰ 14। अ॰ 4॥



एतेऽपि त्रयो देवा ज्ञातव्याः। द्वौ देवावन्नं प्राणश्चेति। अध्यर्धो ब्रह्माण्डस्थः सूत्रात्माख्यः सर्वजगतो वृद्धिकरत्वाद्वायुर्देवः। किमेते सर्व एवोपास्याः सन्तीत्यत्राह-



नैव,किन्तु (स ब्रह्म॰) यत्सर्वजगत्कर्त्तृ-सर्वशक्तिमत्सर्वस्येष्टं सर्वोपास्यं सर्वाधारं सर्वव्यापकं सर्वकारण-मनादि-सच्चिदानन्द-स्वरूपमजं न्यायकारीत्यादि-विशेषणयुक्तं ब्रह्मास्ति स एवैको देवश्चतुस्त्रिंशो वेदोक्त-सिद्धान्त-प्रकाशितः परमेश्वरो देवः सर्वमनुष्यैरुपास्योऽस्तीति मन्यध्वम्। ये वेदोक्तमार्गपरायणा आर्य्यास्ते सर्वदैतस्यैवोपासनं चक्रुः,कुर्वन्ति,करिष्यन्ति च। अस्माद्भिन्नस्येष्ट-करणेनोपासनेन चानार्य्यत्वमेव मनुष्येषु सिध्यतीति निश्चयः।



अत्र प्रमाणम्-आत्मेत्येवोपासीत स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियं रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत,स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुकं भवति। योऽन्यां देवतामुपास्ते न स वेद यथा पशुरेव स देवानाम्॥-श॰कां॰ 14। अ॰ 4॥



अनेनार्य्येतिहासेन विज्ञायते न परमेश्वरं विहायान्यस्योपासका आर्य्या ह्यासन्निति।



भाषार्थ-अब आगे देवता विषय में तेतीस देवों का व्याख्यान लिखते हैं। जैसा ब्राह्मणग्रन्थों में वेद मन्त्रों का व्याख्यान लिखा है। (त्रयस्त्रिंशत्॰) अर्थात् व्यवहार के ये (33) तेतीस देवता हैं, (8) आठ वसु, (11) ग्यारह रुद्र, (12) बारह आदित्य, एक इन्द्र और एक प्रजापति।



उनमें से आठ वसु ये हैं- अग्नि, पृथिवी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य, द्यौ, चन्द्रमा और नक्षत्र। इनका वसु नाम इस कारण से है कि सब पदार्थ इन्हीं में बसते हैं और ये ही सब के निवास करने के स्थान हैं।



(11) ग्यारह रुद्र ये कहाते हैं-जो शरीर में दश प्राण हैं, अर्थात् प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनञ्जय और ग्यारहवां जीवात्मा है। क्योंकि जब वे इस शरीर से निकल जाते हैं तब मरण होने से उस के सब सम्बन्धी लोग रोते हैं। वे निकलते हुए उन को रुलाते हैं, इस से इन का नाम रुद्र है।



इसी प्रकार आदित्य बारह महीनों को कहते हैं, क्योंकि वे सब जगत् के पदार्थों का आदान अर्थात् सब की आयु को ग्रहण करते चले जाते हैं, इसी से इनका नाम आदित्य है। ऐसे ही इन्द्र नाम बिजुली का है, क्योंकि वह उत्तम ऐश्वर्य की विद्या का मुख्य हेतु है और यज्ञ को प्रजापति इसलिये कहते हैं कि उस से





वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा प्रजा का पालन होता है। तथा पशुओं की यज्ञसंज्ञा होने का यह कारण है कि उन से भी प्रजा का जीवन होता है।



ये सब मिलके अपने अपने दिव्य गुणों से तेतीस देव कहाते हैं। और तीन देव-स्थान, नाम और जन्म को कहते हैं। दो देव-अन्न और प्राण को कहते हैं। अध्यर्धदेव अर्थात् जिस से सब का धारण और वृद्धि होती है, जो सूत्रात्मा वायु सब जगत् में भर रहा है, उस को अध्यर्धदेव कहते हैं।



प्र॰-क्या ये चालीस देव भी सब मनुष्यों को उपासना के योग्य हैं?



उ॰-इनमें से कोई भी उपासना के योग्य नहीं है, किन्तु व्यवहारमात्र की सिद्धि के लिए ये सब देव हैं, और सब मनुष्यों के उपासना के योग्य तो देव एक ब्रह्म ही है। इस में यह प्रमाण है-



(स ब्रह्म॰) जो सब जगत् का कर्त्ता, सर्वशक्तिमान्, सब का इष्ट, सब को उपासना के योग्य, सब का धारण करने वाला सब में व्यापक और सब का कारण है, जिस का आदि अन्त नहीं, और जो सच्चिदानन्दस्वरूप है, जिस का जन्म कभी नहीं होता और जो कभी अन्याय नहीं करता, इत्यादि विशेषणों से वेदादि शास्त्रों में जिस का प्रतिपादन किया है, उसी को इष्टदेव मानना चाहिए और जो कोई इससे भिन्न को इष्ट देव मानता है, उसको अनार्य्य अर्थात् अनाड़ी कहना चाहिए। क्योंकि-



(आत्मेत्ये॰) इसमें आर्यों का इतिहास शतपथब्राह्मण में है कि परमेश्वर जो सब का आत्मा है, सब मनुष्यों को उसी की उपासना करनी उचित है। इस में जो कोई कहे कि परमेश्वर को छोड़ के दूसरे में भी ईश्वरबुद्धि से प्रेमभक्ति करनी चाहिए तो उस से कहे कि तू सदा दुःखी होके रोदन करेगा, क्योंकि जो ईश्वर की उपासना करता है वह सदा आनन्द में ही रहता है। जो दूसरे में ईश्वरबुद्धि करके उपासना करता है वह कुछ भी नहीं जानता, इसलिए वह विद्वानों के बीच में पशु अर्थात् गधा के समान है। इससे यह निश्चय हुआ कि आर्य लोग सब दिन से एक ईश्वर ही की उपासना करते आये हैं।



अतः फलितार्थोऽयं जातः। देवशब्दे दिवुधातोर्ये दशार्थास्ते सङ्गता भवन्तीति। तद्यथा-क्रीडा,विजिगीषा,व्यवहारः,द्युतिः,स्तुतिः,मोदः,मदः,स्वप्नः,कान्तिः,गतिश्चेति। एषामुभयत्र समानार्थत्वात्। परन्त्वन्याः सर्वा देवताः परमेश्वरप्रकाश्याः सन्ति। स च स्वयंप्रकाशोऽस्ति। तत्र क्रीडनं क्रीडा। दुष्टान् विजेतुमिच्छा विजिगीषा। व्यवह्रियन्ते यस्मिन् व्यवहरणं व्यवहारः। स्वप्नो निद्रा। मदो ग्लेपनं दीनता,एते मुख्यतया लौकिक-व्यवहारवृत्तयो भवन्ति। तत्सिद्धिहेतवोऽग्न्यादयो देवताः सन्ति। अत्रापि नैव सर्वथा परमेश्वरस्य त्यागो भवति,तस्य सर्वत्रानुषङ्गितया सर्वोत्पादकाधारकत्वात्। तथा द्युतिर्द्योतनं प्रकाशनं,स्तुतिर्गुणेषु गुणकथनं स्थापनं च,मोदो हर्षः प्रसन्नता,कान्तिः शोभा,गतिर्ज्ञानं गमनं प्राप्तिश्चेति। एते परमेश्वरे मुख्यवृत्त्या यथावत् सङ्गच्छन्ते। अतोऽन्यत्र तत्सत्तया गौण्या वृत्त्या वर्त्तन्ते। एवं गौणमुख्याभ्यां हेतुभ्यामुभयत्र देवतात्वं सम्यक् प्रतीयते।



भाषार्थ-इस से यह सिद्ध हुआ कि 'दिवु' धातु के जो दश अर्थ हैं वे व्यवहार और परमार्थ इन दोनों अर्थ में यथावत् घटते हैं, क्योंकि इन के दोनों अर्थ की योजना वेदों में अच्छी प्रकार से की है। इनमें इतना भेद है कि पूर्वोक्त वसु आदि देवता परमेश्वर के ही प्रकाश से प्रकाशित होते हैं, और परमेश्वर देव तो अपने ही प्रकाश से सदा प्रकाशित हो रहा है। इस से वही सब का पूज्यदेव है। और दिवु धातु के दश अर्थ ये हैं





कि —एक क्रीडा जो खेलना, दूसरा विजिगीषा जो शत्रुओं को जीतने की इच्छा होना, तीसरा व्यवहार जो कि दो प्रकार का है एक बाहर और दूसरा भीतर का, चौथा निद्रा और पांचवां मद। ये पांच अर्थ मुख्य करके व्यवहार में ही घटते हैं, क्योंकि अग्नि आदि ही पदार्थ व्यवहारसिद्धि के हेतु हैं। परन्तु परमेश्वर का त्याग इस में भी सर्वथा नहीं होता, क्योंकि वे देव उसी की व्यापकता और रचना से दिव्य गुण वाले हुए हैं। तथा द्युति जो प्रकाश करना, स्तुति जो गुणों का कीर्तन करना, मोद प्रसन्नता, कान्ति जो शोभा, गति जो ज्ञान गमन और प्राप्ति हैं, ये पांच अर्थ परमेश्वर में मुख्य करके वर्त्तते हैं। क्योंकि इन से भिन्न अर्थों में जितने जितने जिन जिन में गुण हैं उतना उतना ही उन में देवतापन लिया जाता है। परमेश्वर में तो सर्वशक्तिमत्त्वादि सब गुण अनन्त हैं, इस से पूज्यदेव एक वही है।



अत्र केचिदाहुः-वेदेषु जडचेतनयोः पूजाविधानाद्वेदाः संशयास्पदं प्राप्ताः सन्तीति गम्यते?



अत्रोच्यते-मैवं भ्रमि। ईश्वरेण सर्वेषु पदार्थेषु स्वातन्त्र्यस्य रक्षितत्वात्। यथा चक्षुषि रूपग्रहण-शक्तिस्तेन रक्षितास्ति,अतश्चक्षुष्मान् पश्यति नैवान्धश्चेति व्यवहारोऽस्ति। अत्र कश्चिद् ब्रूयान् नेत्रेण सूर्य्यादिभिश्च विनेश्वरो रूपं कथं न दर्शयतीति,यथा तस्य व्यर्थेयं शङ्कास्ति तथा पूजनं पूजा सत्कारः प्रियाचरणमनुकूलाचरणं चेत्यादयः पर्य्याया भवन्ति। इयं पूजा चक्षुषोऽपि सर्वैर्जनैः क्रियत एवमग्न्यादिषु यावदर्थद्योतकत्वं विद्या-क्रियोपयोगित्वं चास्ति तावद्देवतात्वमप्यस्तु,नात्र काचित्क्षतिरस्ति। कुतः?वेदेषु यत्र यत्रोपासना विधीयते तत्र तत्र देवतात्वेनेश्वरस्यैव ग्रहणात्।



भाषार्थ-प्र॰-इस विषय में कोई कोई मनुष्य ऐसा कहते हैं कि वेदों के प्रतिपादन से एक ईश्वर की पूजा सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि उन में जड़ और चेतन की पूजा लिखी है। इससे वेदों में सन्देह सहित कथन मालूम पड़ता है।



उ॰-ऐसा भ्रम मत करो क्योंकि ईश्वर ने सब पदार्थों के बीच में स्वतन्त्र गुण रखे हैं। जैसे उसने आंख में देखने का सामर्थ्य रक्खा है तो उससे दीखता है, यह लोक में व्यवहार है। इस में कोई पुरुष ऐसा कहे कि ईश्वर नेत्र और सूर्य के विना रूप को क्यों नहीं दिखलाता है, जैसे यह शङ्का उसकी व्यर्थ है,वैसे ही पूजा-विषय में भी जानना। क्योंकि जो दूसरे का सत्कार,प्रियाचरण अर्थात् उसके अनुकूल काम करना है,इसी का नाम पूजा है सो सब मनुष्यों को करनी उचित है।इसी प्रकार अग्नि आदि पदार्थों में जितना जितना अर्थ का प्रकाश, दिव्यगुण, क्रियासिद्धि और उपकार लेने का सम्भव है, उतना उतना उन में देवपन मानने से कुछ भी हानि नहीं हो सकती। क्योंकि वेदों में जहां जहां उपासनाव्यवहार लिया जाता है, वहां वहां एक अद्वितीय परमेश्वर का ही ग्रहण किया है।



तत्रापि मतद्वयं विग्रहवत्यविग्रहद्देवताभेदात्। तच्चोभयं पूर्वं प्रतिपादितम्।



अन्यच्च-



मातृदेवो भव,पितृदेवो भव,आचार्य्यदेवो भव,अतिथिदेवो भव॥-प्रपा॰ 7। अनु॰ 11॥



त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि,त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि॥-प्रपा॰ 7। अनु॰ 1॥



इति सर्वमनुष्योपास्याः पञ्चदेवतास्तैत्तिरीयोपनिषद्युक्ताः। यथात्र मातापितरावाचार्य्योऽतिथिश्चेति सशरीरा





देवताः सन्ति। एवं सर्वथा निःशरीरं ब्रह्मास्ति।



भाषार्थ-इस देवता विषय में दो प्रकार का भेद है। एक मूर्तिमान् और दूसरा अमूर्तिमान्। जैसे माता, पिता, आचार्य, अतिथि ये चार तो मूर्तिमान् देवता हैं और पांचवां परब्रह्म अमूर्तिमान् है, अर्थात् उसकी किसी प्रकार की मूर्ति नहीं है। इस प्रकार से पांच देव की पूजा में यह दो प्रकार का भेद जानना उचित है।



तथैव पूर्वोक्तासु देवतास्वग्निपृथिव्यादित्यचन्द्रमोनक्षत्राणि चेति पञ्च वसवो विग्रहवत्यः सन्ति। एवमेकादश रुद्रा द्वादशादित्या मनः षष्ठानि ज्ञानेन्द्रियाणि वायुरन्तरिक्षं द्यौर्मन्त्राश्चेति शरीररहिताः। तथा स्तनयित्नुविधियज्ञौ च सशरीराशरीरे देवते स्त इति। एवं सशरीर- निश्शरीरभेदेन देवताद्वयं भवति। तत्रैतासां व्यवहारोपयोगित्वमात्रमेव देवतात्वं गृह्यते। इत्थमेव मातृपित्राचार्य्यातिथीनां व्यवहारोपयोगित्वं परमार्थप्रकाशकत्वं चैतावन्मात्रं च। परमेश्वरस्तु खल्विष्टोपयोगित्वेनैवोपास्योऽस्ति। नातो वेदेषु ह्यपरा काचिद्देवता पूज्योपास्यत्वेन विहितास्तीति निश्चीयताम्।



भाषार्थ-इसी प्रकार पूर्वोक्त आठ वसुओं में से अग्नि, पृथिवी, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र ये पांच मूर्तिमान् देव हैं। और ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, मन, अन्तरिक्ष, वायु, द्यौ और मन्त्र, ये मूर्तिरहित देव हैं। तथा पांच ज्ञानेन्द्रियां, बिजुली और विधियज्ञ ये सब देव मूर्त्तिमान् और अमूर्त्तिमान् भी हैं। (टिप्पणी- इन्द्रियों की शक्तिरूपद्रव्य अमूर्त्तिमान् और गोलक मूर्त्तिमान् तथा विद्युत् और विधियज्ञ में जो जो शब्द तथा ज्ञान अमूर्त्तिमान् और दर्शन तथा सामग्री मूर्त्तिमान् जाननी चाहिए।) इससे साकार और निराकार भेद से दो प्रकार की व्यवस्था देवताओं में जाननी चाहिए।इन में से पृथिव्यादि का देवपन केवल व्यवहार में तथा माता, पिता, आचार्य और अतिथियों का व्यवहार में उपयोग और परमार्थ का प्रकाश करनामात्र ही देवपन है और ऐसे ही मन और इन्द्रियों का उपयोग व्यवहार और परमार्थ करने में होता है। परन्तु सब मनुष्यों को उपासना करने योग्य एक परमेश्वर ही देव है।



अत इदानीन्तनाः केचिदार्य्या यूरोपखण्डवासिनश्च भौतिकदेवतानामेव पूजनं वेदेष्वस्तीत्यूचुर्वदन्ति च तदलीकतरमस्ति। तथा यूरोपखण्डवासिनो बहव एवं वदन्ति-पुरा ह्यार्य्या भौतिकदेवतानां पूजका आसन्,पुनस्ताः सम्पूज्य सम्पूज्य च बहुकालान्तरे परमात्मानं पूज्यं विदुरिति,तदप्यसत्। तेषां सृष्ट्यारम्भमारभ्यानेकैरिन्द्र-वरुणाग्न्यादिभिर्नामभिर्वेदोक्त-रीत्येश्वरस्यैवोपासना-नुष्ठानाचारागमात्।



भाषार्थ-प्र॰-कितने ही आजकल के आर्य और यूरोपदेशवासी अर्थात् अंग्रेज आदि लोग इस में ऐसी शंका करते हैं कि वेदों में पृथिव्यादि भूतों की पूजा कही है। वे लोग यह भी कहते हैं कि पहले आर्य लोग भूतों की पूजा करते थे, फिर पूजते पूजते बहुत काल पीछे उन्होंने परमेश्वर को भी पूज्य जाना था।



उ॰-यह उन का कहना मिथ्या है, क्योंकि आर्य लोग सृष्टि के आरम्भ से आज पर्यन्त इन्द्र वरुण और अग्नि आदि नामों करके वेदोक्त प्रमाण से एक परमेश्वर की ही उपासना करते चले आये हैं। इस विषय में अनेक प्रमाण हैं, उनमें से थोड़े से यहां भी लिखते हैं-



अत्र प्रमाणानि-



(अग्निमी॰) अस्य मन्त्रस्य व्याख्याने हि'इन्द्रं मित्रम्॰',ऋग्मन्त्रोऽयम्। अस्योपरि'इममेवाग्निं महान्तमात्मानम्'इत्यादि निरुक्तं च लिखितं तत्र द्रष्टव्यम्। तथा'तदेवाग्निस्तदादित्य॰'इति यजुर्मन्त्रश्च।





तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्।



पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥1॥-ऋ॰ अ॰ 1। अ॰ 6। व॰ 15। मं॰ 5॥



हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्।



स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम॥2॥-ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 7। व॰ 3। मं॰ 1॥



इत्यादयो नव मन्त्रा एतद्विषयाः सन्ति॥



प्र तद्वोचेदमृतं नु विद्वान् गन्धर्वो धाम विभृतं गुहा सत्।



त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुः पितासत्॥3॥



स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा।



यत्र देवा अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त॥4॥



परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च।



उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मनात्मानमभि सं विवेश॥5॥



-य॰ अ॰ 32 11॥



वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।



तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥6॥



-य॰ अ॰ 31। मं॰ 18॥



तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके।



तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः॥7॥



-य॰ अ॰ 40। मं॰ 5॥



स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमित्यादि च॥



य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिर्होता न्यसीदत्पिता नः।



स आशिषा द्रविणमिच्छमानः प्रथमच्छदवराँ आविवेश॥8॥



किंस्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वित् कथासीत्।



यतो भूमिं जनयन् विश्वकर्मा वि द्यामौर्णोन्महिना विश्वचक्षाः॥9॥



विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहुरुत विश्वतस्पात्।



सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः॥10॥



-य॰ अ॰ 17। मं॰ 17। 18। 19॥



इत्यादयो मन्त्रा यजुषि बहवः सन्ति॥



तथा सामवेदस्योत्तरार्चिके त्रिकम्11 —



अभि त्वा शूर नो नुमोऽदुग्धा इव धेनवः।



ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः॥11॥





न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते।



अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥12॥इत्यादयश्च।



नासदासीन्नो सदासीत् तदानीं नासीद् रजो नो व्योमा परो यत्।



किमावरीवः कुहकस्य शर्म्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम्॥13॥



इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।



यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद॥14॥



—इत्यन्ताः सप्त मन्त्रा ऋग्वेदे॥



-ऋ॰ अ॰ 8। अ॰ 7। व॰ 17। मं॰ 1-7॥



यत् परममवम यच्च मध्यमं प्रजापतिः ससृजे विश्वरूपम्।



कियता स्कम्भः प्रविवेश तत्र यन्न प्राविशत् कियत्तद् बभूव॥15॥



यस्मिन् भूमिरन्तरिक्षं द्यौर्यस्मिन्नध्याहिता।



यत्राग्निनश्चन्द्रमाः सूर्य्यो वातस्तिष्ठन्त्यार्पिताः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥16॥



-अथर्व॰ कां॰ 10। अनु॰ 4। मं॰ 8। 12॥



इत्यादयोऽथर्ववेदेऽपि बहवो मन्त्राः सन्ति। एतेषां मन्त्राणां मध्यात् केषाञ्चिदर्थः पूर्वं प्रकाशितः केषाञ्चिदग्रे विधास्यतेऽत्राप्रसङ्गान्नोच्यते।



अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।



तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः॥1॥



अशब्दमस्पर्शरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्।



अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते॥2॥



यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥3॥



एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति।



तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥4॥



नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।



तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥5॥-इति कठवल्ल्युपनिषदि



दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः। अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः॥6॥



यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि। दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः॥7॥-इति मुण्डकोपनिषदि



नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्य्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्य-मव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः॥8॥



-इति माण्डूक्योपनिषदि



सत्यं ज्ञानम् अनन्तं ब्रह्म यो वेद निहितं गुहायाम्।



परमे व्योमन्त्सोऽश्नुते सर्वान् कामान् ब्रह्मणा सह विपश्चितेति॥9॥-इति तैत्तिरीयोपनिषदि





यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखम्। भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति। यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमा। अथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पम्। यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यं स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि॥-इति छान्दोग्योपनिषदि



वेदोक्तेशानादिविशेषण-प्रतिपादितोऽणोरणीयानित्याद्युपनिषदुक्तविशेषण-प्रतिपादितश्च यः परमेश्वरोऽस्ति,स एवाऽऽर्य्यैः सृष्टिमारभ्याद्यपर्य्यन्तं यथावद्विदित्वोपासितोऽस्तीति मन्यध्वम्। एवं परब्रह्मविषयप्रकाशकेषु प्रमाणेषु सत्सु यद्भटट्मोक्षमूलरैरुक्तमार्य्याणां पूर्वमीश्वरज्ञानं नासीत् पुनः क्रमाज्जातमिति न तच्छिष्टग्रहणार्हमस्तीति विजानीमः।



भाषार्थ-(इन्द्रं मित्रम्॰) इस में चारों वेद, शतपथ आदि चारों ब्राह्मण, निरुक्त और छः शास्त्र आदि के अनेक प्रमाण हैं कि जिस सद्वस्तु ब्रह्म के इन्द्र, ईशान, अग्नि आदि वेदोक्त नाम हैं और 'अणोरणीयान्' इत्यादि उपनिषदों के विशेषणों से जिसका प्रतिपादन किया है, उसी की उपासना आर्य लोग सदा से करते आये हैं। इन मन्त्रों में से जिनका अर्थ भूमिका में नहीं किया है, उनका आगे वेदभाष्य में किया जायेगा। और कोई कोई आर्य लोग किंवा यूरोप आदि देशों में रहने वाले अंग्रेज कहते हैं कि प्राचीन आर्य लोग अनेक देवताओं और भूतों की पूजा करते थे, यह उन का कहना व्यर्थ है, क्योंकि वेदों और उनके प्राचीन व्याख्यानों में अग्नि आदि नामों से उपासना के लिए एक परमेश्वर का ही ग्रहण किया है, जिस की उपासना आर्य लोग करते थे। इस से पूर्वोक्त शङ्का किसी प्रकार से नहीं आ सकती।



भाष्यम्-किञ्च'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पति॰'एतन्मन्त्रव्याख्यानावसरेऽयं मन्त्रोऽर्वाचीनोऽस्ति छन्दस इति शारमण्यदेशोत्पन्नैर्भट्टमोक्षमूलरैः स्वकीयसंस्कृतसाहित्याख्ये ग्रन्थे एतद्विषये यदुक्तं तन्न सङ्गच्छते। यच्च वेदानां द्वौ भागावेकश्छन्दो द्वितीयो मन्त्रश्च तत्र यत्सामान्यार्थाभिधानं परबुद्धिप्रेरणाजन्यं स्वकल्पनया रचनाभावं यथा ह्यज्ञानिनो मुखादकस्मान्निस्सरेदीदृशं यद्रचनं तच्छन्द इति विज्ञेयम्। तस्योत्पत्तिसमय एकत्रिंशच्छतानि वर्षाण्यधिकादधिकानि व्यतीतानि। तथैकोनत्रिंशच्छतानि वर्षाणि मन्त्रोत्पत्तौ चेत्यनुमानं तेषामस्ति। तत्र तैरुक्तानि प्रमाणानि-



'अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत'इत्यादीनि ज्ञातव्यानि।



तदिदमप्यन्यथास्ति। कुतः?हिरण्यगर्भशब्दस्यार्थ-ज्ञानाभावात्। अत्र प्रमाणानि-



ज्योतिर्वै हिरण्यं ज्योतिरेषोऽमृतं हिरण्यम्॥-श॰ कां॰ 6। अ॰।7॥



केशी केशारश्मयस्तैस्तद्वान् भवति। काशनाद्वा प्रकाशनाद्वा। केशीदं ज्योतिरुच्यते॥-निरु॰अ॰12। खं॰25॥



यशो वै हिरण्यम्॥-ऐ॰ पं॰ 7। अ॰ 3॥



ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मज्योतिः॥-श॰ कां॰ 14। अ॰ 7॥



ज्योतिरिन्द्राग्नी॥-श॰ कां॰ 10। अ॰ 4॥



एषामर्थः-ज्योतिर्विज्ञानं गर्भः स्वरूपं यस्य स हिरण्यगर्भः। एवं च ज्योतिर्हिरण्यं प्रकाशो ज्योतिरमृतं मोक्षो ज्योतिरादित्यादयः केशाः प्रकाशका लोकाश्च,यशः सत्कीर्तिर्धन्यवादश्च,ज्योतिरात्मा जीवश्च,ज्योतिरिन्द्रः सूर्य्योऽग्निश्चैतत्सर्वं हिरण्याख्यं गर्भे सामर्थ्ये यस्य स हिरण्यगर्भः परमेश्वरः।





अतो हिरण्यगर्भशब्द-प्रयोगाद्वेदानामुत्तमत्वं सनातनत्वं तु निश्चीयते न नवीनत्वं च अस्मात्कारणाद्यत्तैरुक्तं हिरण्यगर्भशब्द-प्रयोगान्मन्त्रभागस्य नवीनत्वं तु द्योतितं भवति,किन्त्वस्य प्राचीनवत्वे किमपि प्रमाणं नोपलभामह इति तद् भ्रममूलमेव विज्ञेयम्। यच्चोक्तं मन्त्रभाग-नवीनत्वे'अग्निः पूर्वेभि'रित्यादिकारणं तदपि तादृशमेव। कुतः?ईश्वरस्य त्रिकालदर्शित्वात्। ईश्वरो हि त्रीन्कालान् जानाति। भूतभविष्यद्वर्त्तमान-कालस्थैर्मन्त्रद्रष्टृभिर्मनुष्यैर्मन्त्रैः प्राणैस्तर्कैश्चर्षिभिरहमेवेड्यो बभूव भवामि भविष्यामि चेति विदित्वेदमुक्तमित्यदोषः। अन्यच्च ये वेदादि-शास्त्राण्यधीत्य विद्वांसो भूत्वाऽध्यापयन्ति ते प्राचीनाः ये चाधीयते ते नवीनाः। तैर्ऋषिभिरग्निः परमेश्वर एवेड्योऽस्त्यतश्च।



भाषार्थ-इसी विषय में डॉक्टर मोक्षमूलर साहेब ने अपने बनाये संस्कृत साहित्य ग्रन्थ में ऐसा लिखा है कि आर्य लोगों को क्रम से अर्थात् बहुत काल के पीछे ईश्वर का ज्ञान हुआ था, और वेदों के प्राचीन होने में एक भी प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु उनके नवीन होने में तो अनेक प्रमाण पाये जाते हैं। इसमें एक तो 'हिरण्यगर्भ' शब्द का प्रमाण दिया है कि छन्दोभाग से मन्त्रभाग दो सौ वर्ष पीछे बना है, और दूसरा यह है कि वेदों में दो भाग हैं, एक तो छन्द और दूसरा मन्त्र। उनमें से छन्दोभाग ऐसा है जो सामान्य अर्थ के साथ सम्बन्ध रखता है, और दूसरे की प्रेरणा से प्रकाशित हुआ मालूम पड़ता है, कि जिसकी उत्पत्ति बनाने वाले की प्रेरणा से नहीं हो सकती, और उसमें कथन इस प्रकार का है, जैसे अज्ञानी के मुख से अकस्मात् वचन निकला हो। उसकी उत्पत्ति में (3100) इकतीस सौ वर्ष व्यतीत हुए हैं और मन्त्रभाग की उत्पत्ति में (2900) उनतीस सौ वर्ष हुए हैं। उसमें (अग्निः पूर्वेभिः॰) इस मन्त्र का भी प्रमाण दिया है।



सो उनका यह कहना ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि उन्होंने (हिरण्यगर्भः॰) और (अग्निः पूर्वेभिः) इन दोनों मन्त्रों का अर्थ यथावत् नहीं जाना है। तथा मालूम होता है कि उन को 'हिरण्यगर्भ' शब्द नवीन जान पड़ा होगा, इस विचार से कि हिरण्य नाम है सोने का, वह सृष्टि से बहुत पीछे से उत्पन्न हुआ है, अर्थात् मनुष्यों की उन्नति, राजा और प्रजा के प्रबन्ध होने के उपरान्त पृथिवी में से निकाला गया है। सो यह बात भी उनकी ठीक नहीं हो सकती, क्योंकि इस शब्द का अर्थ यह है कि-ज्योति कहते हैं विज्ञान को, सो जिसके गर्भ अर्थात् स्वरूप में है, ज्योति अमृत अर्थात् मोक्ष है सामर्थ्य में जिस के और ज्योति जो प्रकाशस्वरूप सूर्यादि लोक जिसके गर्भ में हैं तथा ज्योति जो जीवात्मा जिस के गर्भ अर्थात् सामर्थ्य में है तथा यशः सत्कीर्ति जो धन्यवाद जिस के स्वरूप में है, इसी प्रकार ज्योति = इन्द्र अर्थात् सूर्य वायु और अग्नि ये सब जिस के सामर्थ्य में हैं, ऐसा जो एक परमेश्वर है उसी को हिरण्यगर्भ कहते हैं।



इस हिरण्यगर्भ शब्द के प्रयोग से वेदों का उत्तमपन और सनातनपन तो यथावत् सिद्ध होता है, परन्तु इस से उन का नवीनपन सिद्ध कभी नहीं हो सकता। इससे डॉक्टर मोक्षमूलर साहेब का कहना जो वेदों के नवीन होने के विषय में है सो सत्य नहीं है। और जो उन्होंने (अग्निः पूर्वेभिः॰) इस का प्रमाण वेदों के नवीन होने में दिया है, सो भी अन्यथा है, क्योंकि इस मन्त्र में वेदों के कर्त्ता, त्रिकालदर्शी ईश्वर ने भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान तीनों कालों के व्यवहारों को यथावत् जान के कहा है कि वेदों को पढ़ के जो विद्वान् हो चुके हैं वा जो पढ़ते हैं, वे प्राचीन और नवीन ऋषि लोग मेरी स्तुति करें। तथा ऋषि नाम मन्त्र, प्राण और तर्क का भी है, इन से ही मेरी स्तुति करनी योग्य है।





इसी अपेक्षा से ईश्वर ने इस मन्त्र का प्रयोग किया है। इससे वेदों का सनातनपन और उत्तमपन तो सिद्ध होता है, किन्तु उन हेतुओं से वेदों का नवीन होना किसी प्रकार से सिद्ध नहीं हो सकता। इसी हेतु से डाक्टर मोक्षमूलर साहेब का कहना ठीक नहीं।



भाष्यम्-अत्र निरुक्तेऽपि प्रमाणम्-



तत्प्रकृतीतरद्वर्त्तन-सामान्यादित्ययं मन्त्रार्थ-चिन्ताभ्यूहोऽ-भ्यूढोऽपि श्रुतितोऽपि तर्कतो न तु पृथक्त्वेन मन्त्रा निर्वक्तव्याः प्रकरणश एव तु निर्वक्तव्या नह्येषु प्रत्यक्षमस्त्यनृषेरतपसो वा पारोवर्य्यवित्सु तु खलु वेदितृषु भूयोविद्यः प्रशस्यो भवतीत्युक्तं पुरस्तान्मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन् को न ऋषिर्भविष्यतीति तेभ्य एतं तर्कमृषिं प्रायच्छन् मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहमभ्यूढं तस्माद्यदेव किं चानूचानोऽभ्यूहत्यार्षं तद्भवति॥



-निरु॰ अ॰ 13। खं॰ 12॥



अस्यार्थः-(तत्प्रकृति॰) तस्य मन्त्रसमूहस्य पदशब्दाक्षर-समुदायानामितरत् परस्परं विशेष्य-विशेषणतया सामान्यवृत्तौ वर्त्तमानानां मन्त्राणामर्थज्ञान-चिन्ता भवति। कोऽयं खल्वस्य मन्त्रस्यार्थो भविष्यतीत्यभ्यूहो बुद्धावाभिमुख्येनोहो विशेषज्ञानार्थस्तर्को मनुष्येण कर्त्तव्यः। नैते श्रुतितः श्रवणमात्रेणैव तर्कमात्रेण च पृथक् पृथक् मन्त्रार्था निर्वक्तव्याः। किन्तु प्रकरणानुकूलतया पूर्वापरसम्बन्धेनैव नितरां वक्तव्याः। किञ्च नैवेतेषु मन्त्रेष्वनृषेरतपसोऽशुद्धान्तःकरणस्याविदुषः प्रत्यक्षं ज्ञानं भवति। न यावद्वा पारोवर्य्यवित्सु कृतप्रत्यक्ष-मन्त्रार्थेषु मनुष्येषु भूयोविद्यो बहुविद्यान्वितः प्रशस्योऽत्युत्तमो विद्वान् भवति न तावदभ्यूढः सुतर्केण वेदार्थमपि वक्तुमर्हतीत्युक्तं सिद्धमस्ति।



अत्रेतिहासमाह-पुरस्तात्कदाचिन्मनुष्या ऋषिषु मन्त्रार्थ-द्रष्टृषूत्क्रामत्स्वतीतेषु सत्सु देवान् विदुषोऽब्रुवन्नपृच्छन् कोऽस्माकं मध्ये ऋषिर्भविष्यतीति। तेभ्यः सत्यासत्यविज्ञानेन वेदार्थ- बोधार्थं चैतं तर्कमृषिं ते प्रायच्छन् दत्तवन्तोऽयमेव युष्मासु ऋषिर्भविष्यतीत्युत्तरमुक्तवन्तः। कथंभूतं तं तर्कं?मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहमभ्यूढम्,मन्त्रार्थविज्ञानकारकम्। अतः किं सिद्धम्?यः कश्चिदनूचानो विद्यापारगः पुरुषोऽभ्यूहति वेदार्थमभ्यूहते प्रकाशयते,तदेवार्षमृषिप्रोक्तं वेदव्याख्यानं भवतीति मन्तव्यम्। किञ्च यदल्पविद्येनाल्पबुद्धिना पक्षपातिना मनुष्येण चाभ्यूह्यते तदनार्षमनृतं भवति। नैतत्केनाप्यादर्त्तव्यमिति। कुतः?तस्यानर्थयुक्तत्वात्। तदादरेण मनुष्याणामप्यनर्थापत्तेश्चेति।



अतः पूर्वेभिः प्राक्तनैः प्रथमोत्पन्नैस्तर्कैर्ऋषिभिस्तथा नूतनैर्वर्तमानस्थैश्चोतापि भविष्यद्भिश्च त्रिकालस्थैरग्निः परमेश्वर एवेड्योऽस्ति। नैवास्माद्भिन्नः कश्चित् पदार्थः कस्यापि मनुष्यस्येड्यः स्तोतव्य उपास्योऽस्तीति निश्चयः। एवमग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीडयो नूतनैरुतेत्यस्य मन्त्रस्यार्थसङ्गतेर्नैव वेदेष्वर्वाचीनाख्यः कश्चिद् दोषो भवितुमर्हतीति।



भाषार्थ-इसमें विचारना चाहिए कि वेदों के अर्थ को यथावत् विना विचारे उनके अर्थ में किसी मनुष्य को हठ से साहस करना उचित नहीं, क्योंकि जो वेद सब विद्याओं से युक्त हैं, अर्थात् उन में जितने मन्त्र और पद हैं, वे सब सम्पूर्ण सत्यविद्याओं के प्रकाश करने वाले हैं और ईश्वर ने वेदों का व्याख्यान भी वेदों से ही कर रक्खा है, क्योंकि उनके शब्द धात्वर्थ के साथ योग रखते हैं। इस में निरुक्त का भी प्रमाण है, जैसा कि यास्कमुनि ने कहा-(तत्प्रकृतीत॰) इत्यादि। वेदों के व्याख्यान करने के विषय में ऐसा समझना कि जब तक सत्य प्रमाण, सुतर्क, वेदों के शब्दों का





पूर्वापर प्रकरणों, व्याकरण आदि वेदाङ्गों, शतपथ आदि ब्राह्मणों, पूर्वमीमांसा आदि शास्त्रों, और शास्त्रान्तरों का यथावत् बोध न हो, और परमेश्वर का अनुग्रह, उत्तम विद्वानों की शिक्षा, उनके सङ्ग से पक्षपात छोड़ के आत्मा की शुद्धि न हो तथा महर्षि लोगों के किये व्याख्यानों को न देखें, तब तक वेदों के अर्थ का यथावत् प्रकाश मनुष्य के हृदय में नहीं होता। इसलिये सब आर्य विद्वानों का सिद्धान्त है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से युक्त जो तर्क है, वही मनुष्यों के लिये ऋषि है।



इससे यह सिद्ध होता है कि जो सायणाचार्य और महीधरादि अल्पबुद्धि लोगों के झूठे व्याख्यानों को देखके आजकल के आर्यावर्त्त और यूरोपदेश के निवासी लोग जो वेदों के ऊपर अपनी अपनी देशभाषाओं में व्याख्यान करते हैं, वे ठीक-ठीक नहीं हैं, और उन अनर्थयुक्त व्याख्यानों के मानने से मनुष्यों को अत्यन्त दुःख प्राप्त होता है। इससे बुद्धिमानों को उन व्याख्यानों का प्रमाण करना योग्य नहीं। 'तर्क' का नाम ऋषि होने से सब आर्य लोगों का सिद्धान्त है कि सब कालों में अग्नि जो परमेश्वर है, वही उपासना करने के योग्य है।



भाष्यम्-अन्यच्च-प्राणा वा ऋषयो दैव्यासः॥-ऐ॰ पं॰ 2। अ॰ 4॥



पूर्वेभिः पूर्वकालावस्थास्थैः कारणस्थैः प्राणैः कार्यद्रव्यस्थैर्नूतनैश्चर्षिभिः सहैव समाधियोगेन सर्वैर्विद्वद्भिरग्निः परमेश्वर एवेड्योऽस्त्यनेन श्रेयो भवतीति मन्तव्यम्।



भाषार्थ-जगत् के कारण प्रकृति में जो प्राण हैं, उनको प्राचीन, और उस के कार्य में जो प्राण हैं, उन को नवीन कहते हैं। इसलिये सब विद्वानों को उन्हीं ऋषियों के साथ योगाभ्यास से अग्निनामक परमेश्वर की ही स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी योग्य है। इतने से ही समझना चाहिए कि भट्ट मोक्षमूलर साहेब आदि ने इस मन्त्र का अर्थ ठीक ठीक नहीं जाना है।



भाष्यम्-यच्चोक्तं छन्दोमन्त्रयोर्भेदोऽस्तीति,तदप्यसङ्गतम्। कुतः?छन्दोवेदनिगम- मन्त्रश्रुतीनां पर्य्यायवाचकत्वात्। तत्र छन्दोऽनेकार्थवाचकमस्ति। वैदिकानां गायत्र्यादिवृत्तानां लौकिकानामार्य्यादीनां च वाचकम्। क्वचित् स्वातन्त्र्यस्यापि। अत्राहुर्यास्काचार्य्याः-



मन्त्रा मननाच्छन्दांसि छादनात् स्तोमः स्तवनाद्यजुर्यजतेः साम सम्मितमृचा॥-निरु॰ अ॰ 7। खं॰ 12॥



अविद्यादिदुःखानां निवारणात् सुखैराच्छादनाच्छन्दो वेदः। तथा'चन्देरादेश्च छः।'इत्यौणादिकं सूत्रम्।'चदि आह्लादने दीप्तौ चे'त्यस्माद्धातोरसुन्प्रत्यये परे चकारस्य छकारादेशे च कृते छन्दस् इति शब्दो भवति। वेदाध्ययनेन सर्वविद्याप्राप्तेर्मनुष्य आह्लादी भवति सर्वार्थज्ञाता चातश्छन्दो वेदः।



छन्दांसि वै देवा वयोनाधाश्छन्दोभिर्हीदं सर्वं वयुनं नद्धम्॥-श॰कां॰ 8। अ॰ 2॥



एता वै देवताश्छन्दांसि॥-श॰ कां॰ 8। अ॰ 3॥



अस्यायमभिप्रायः-'मत्रि गुप्तभाषणे'अस्माद्'हलश्च'इति सूत्रेण'घञ्-प्रत्यये'कृते मन्त्रशब्दस्य सिद्धिर्जायते। गुप्तानां पदार्थानां भाषणं यस्मिन् वर्त्तते स मन्त्रो वेदः। तदवयवानामनेकार्थानामपि मन्त्रसंज्ञा भवति,तेषां तदर्थवत्त्वात्। तथा'मन ज्ञाने'अस्माद्धातोः'सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्।'इत्युणादिसूत्रेण ष्ट्रन् प्रत्यये कृते मन्त्रशब्दो व्युत्पद्यते। मन्यन्ते ज्ञायन्ते सर्वैर्मनुष्यैः सत्याः पदार्था येन यस्मिन् वा स मन्त्रो वेदः। तदवयवा'अग्निमीळे पुरोहित'मित्यादयो मन्त्राः गृह्यन्ते। यानि गायत्र्यादीनि च्छन्दांसि तदन्विता मन्त्राः सर्वार्थ-





द्योतकत्वाद्देवता-शब्देन गृह्यन्ते। अतश्च छन्दांस्येव देवाः। वयोनाधाः सर्वक्रिया-विद्या-निबन्धनास्तैश्छन्दोभिरेव वेदैर्वेदमन्त्रैश्चेदं सर्वं विश्वं वयुनं कर्मादि चेश्वरेण नद्धं बद्धं कृतमिति विज्ञेयम्। येन छन्दसा छन्दोभिर्वा सर्वा विद्याः संवृताः आवृताः सम्यक् स्वीकृता भवन्ति,तस्माच्छन्दांसि वेदा मननान्मन्त्राश्चेति पर्य्यायौ।



एवं श्रुतिस्तु वेदो विज्ञेय इति मनुस्मृतौ,इत्यपि निगमो भवतीति निरुक्ते। श्रुतिर्वेदो मन्त्रश्च,निगमो वेदो मन्त्रश्चेति पर्य्यायौ स्तः। श्रूयन्ते वा सकला विद्या यया सा श्रुतिर्वेदो मन्त्राश्च श्रुतयः। तथा निगच्छन्ति नितरां जानन्ति प्राप्नुवन्ति वा सर्वा विद्या यस्मिन् स निगमो वेदो मन्त्रश्चेति।



भाषार्थ-जैसे 'छन्द' और 'मन्त्र' ये दोनों शब्द एकार्थवाची अर्थात् संहिता भाग के नाम हैं, वैसे ही 'निगम' और 'श्रुति' भी वेदों के नाम हैं। भेद होने का कारण केवल अर्थ ही है। वेदों का नाम 'छन्द' इसलिए रक्खा है कि वे स्वतन्त्र प्रमाण और सत्यविद्याओं से परिपूर्ण हैं तथा उन का 'मन्त्र नाम इसलिए है कि उनसे सत्यविद्याओं का ज्ञान होता है और 'श्रुति' इसलिए कहते हैं कि उनके पढ़ने, अभ्यास करने और सुनने से सब सत्य विद्याओं को मनुष्य लोग जान सकते हैं। ऐसे ही जिस करके सब पदार्थों का यथार्थ ज्ञान हो उस को 'निगम' कहते हैं। इससे यह चारों शब्द पर्याय अर्थात् एक अर्थ के वाची हैं, ऐसा ही जानना चाहिए।



भाष्यम्-तथा व्याकरणेऽपि-



मन्त्रे घसह्वरणश्वृदहाद्वृच्कृगमिजनिभ्यो लेः॥1॥



-अष्टाध्याय्याम् अ॰ 2। पा॰ 4। सू॰ 80॥



छन्दसि लुङ् लङ् लिटः॥2॥-अ॰ 3। पा॰ 4। सू॰ 6॥



वा षपूर्वस्य निगमे॥3॥-अ॰ 6। पा॰ 4। सू॰ 9॥



अत्रापि च्छन्दोमन्त्रनिगमाः पर्य्यायवाचिनः सन्ति। एवं छन्दआदीनां पर्यायसिद्धेर्योभेदं ब्रूते तद्वचनमप्रमाणमेवास्तीति विज्ञायते।



भाषार्थ-वैसे ही अष्टाध्यायी व्याकरण में भी छन्द, मन्त्र और निगम ये तीनों नाम वेदों ही के हैं। इसलिये जो लोग इन में भेद मानते हैं उनका वचन प्रमाण करने के योग्य नहीं।



॥इति वेदविषयविचारः॥4॥