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अ॒ग्निना॑ र॒यिम॑श्नव॒त्पोष॑मे॒व दि॒वेदि॑वे। य॒शसं॑ वी॒रव॑त्तमम्॥ ३॥

In Hindi:

पदपाठ : अ॒ग्निना॑। र॒यिम्। अ॒श्न॒व॒त्। पोष॒म्। ए॒व। दिवे॒ऽदि॑वे। य॒शस॑म्। वी॒रव॑त्तमम्॥ ३॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ऋग्वेदः अष्टक १। अध्याय १। वर्ग १। मंत्र ३।

मधुच्छन्दा ऋषिः। अग्निर्देवता। गायत्रीच्छन्दः। षड्जः स्वरः॥



महर्षि दयानन्द व्याख्या :

(अग्निना)विज्ञानानन्दस्वरूपेण दयालुना सद्धर्मानुष्ठानयोगाभ्यासपरम-प्रीत्युपासनोपासितेनैवाग्निनेश्वरेण, विद्याधर्मयुक्तः सन् जीवः(रयिं)धर्ममोक्ष-विद्याचक्रवर्त्तिराज्यारोग्यादिस्वरूपं धनम्।(अश्नवत्)प्राप्नुयात् वा नान्यथेति निश्चयः। कथं भूतं तद्धनम्? आत्ममनःशरीरेद्रियाणां(दिवेदिवे)प्रतिदिनं नित्यम्।(पोषमेव)पुष्टिकरमेव भवति, तथा(यशसं)यशः सत्कीर्त्तिवर्धकं शिष्टाचारादिकीर्त्तिमच्च। तथा(वीरवत्तमम्)प्रतिदिनं बुद्धिबलवीर्यशौर्य्य-धैर्य्यादिगुणयुक्ताः पुत्रबन्धुमित्रभृत्यादयो वीरा भवन्ति यस्मिन्धने तद्वीरवत्, अतिशयेन वीरवत् इति वीरवत्तमम्।



अयमाशयः—परमेश्वरोपासनेन विना स्थिरं नित्यं च सुखं कदा-चित्कस्यापि नैव भवतीति। रयिरिति धननामास्ति निघण्टौ॥



सायणाचार्येण यज्ञहोमसम्बन्धमात्रेणैवेयमृग्व्याख्याता। अत्रेश्वरान्य-पदार्थविद्यात्यागात्तद्व्याख्यानं सम्यङ् नास्तीति विज्ञेयम्। तथा वेदार्थयत्न-कर्तृडाक्तरविलसनाख्यकृतमपि च तादृशमेवास्ति। अस्य स्वल्पविषयत्वात्। मुख्यार्थस्येश्वरस्य त्यागादस्पष्टार्थत्वाच्च विदुषामाह्लादकरमीदृशं व्याख्यानं नैव भवतीति दिक्॥ ३॥



॥ भाषार्थ॥



(अग्निना)अग्नि जो विज्ञान और आनन्दस्वरूप है और दया करने वाला है, सत्य धर्म का आचरण, योगाभ्यास जो समाधि का करना, परमेश्वर से अत्यन्त प्रीति और विज्ञान से जो दृढ़ विश्वास का यथावत् होना, इस प्रकार की उपासना से जो प्रसन्न होता है, उस अग्नि ईश्वर की कृपादृष्टि से सत्यविद्या और सत्यधर्माचरण से युक्त जो जीव, सो(रयिम्)जो धर्म मोक्षविद्या और चक्रवर्ति राज्यादि का होना इस धन को(अश्नवत्)प्राप्त होता है। इससे दूसरे प्रकार से नहीं। वह धन कैसा है?(पोषमेव दिवेदिवे)आत्मा, मन, शरीर और इन्द्रिय इन को नित्य पुष्टि और आनन्द कराने वाला है, तथा(यशसम्)अर्थात् दिन दिन को [नित्य] प्रति सत्कीर्ति का बढ़ाने वाला और जिस धन से शिष्टाचार और सब मनुष्यों का उपकार हो। तथा(वीरवत्तमम्)बुद्धि, बल, शरीर, पराक्रम, शूरता, धीरज आदि गुण-वाले जो हैं वे पुत्र, भाई, मित्र और भृत्यादि वीरपुरुष प्राप्त हों जिस धन से, उस धन को वीरवत् कहते हैं। और जो पूर्वोक्त गुणों से अत्यन्त युक्त हो उस धन को वीरवत्तम कहते हैं।



इसका यह अभिप्राय है कि विना परमेश्वर की उपासना से संसार में स्थिर जो सुख और मोक्ष में जो नित्य सुख उस को कोई भी प्राप्त नहीं हो सकता॥



सायणाचार्य ने अग्निमीळे आदि मन्त्रों का अग्नि में आहुति डालनामात्र प्रयोजन लिखा है। इस अर्थ में ईश्वर और होम से भिन्न अन्य पदार्थविद्या के त्याग से वह व्याख्यान अच्छा नहीं है। तथा वेदार्थयत्न में और डाक्तर विलसन साहेब का किया व्याख्यान भी वैसा ही है। तथा सायणाचार्य के व्याख्यान से इन का व्याख्यान बहुत अल्पार्थ है। क्योंकि ये सब व्याख्यान मुख्य अर्थ जो ईश्वर उन के त्याग और निश्चितार्थ नहीं होने से विद्वानों को प्रिय और साधारण को भी यथावत् उपकारक नहीं हो सकता॥ ३॥



॥ अथ द्वितीयोर्थः॥



भौतिकाग्निनिमित्तेन शिल्पविद्याचिकीर्षुः पुरुषः सुवर्णरत्नादि राज्यादि च पूर्वोक्तविशेषणयुक्तं रयिं धनमश्नवत् प्राप्नोतु प्राप्तुमिच्छेत्। शिल्पविद्या-यामग्नेरेव मुख्यसाधनत्वात्॥ ३॥



॥ भाषार्थ॥



प्रत्यक्ष जो यह अग्नि इस के विना उत्तम कारीगरी सिद्ध नहीं हो सकती। कारीगरी के विना धन और राज्य के जो उत्तम व्यवहार तथा पदार्थ हैं वे सब मनुष्यों को यथावत् प्राप्त नहीं हो सकते क्योंकि उत्तम कारीगरी के होने में अग्नि मुख्य साधन है। इस अग्नि से बिजुली आदि पदार्थों को सिद्ध करके विमानादि विद्या रच लेनी चाहिए। इससे पृथिवी, जल और आकाशमार्ग में चलने के लिए विमान आदि विद्या रचनी सब मनुष्यों को उचित है॥ ३॥