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अ॒ग्निः पूर्वे॑भि॒र्ऋषि॑भि॒रीड्यो॒ नूत॑नैरु॒त। स दे॒वाँ एह व॑क्षति॥ २॥

In Hindi:

पदपाठ : अ॒ग्निः। पूर्वे॑भिः। ऋषि॑भिः। ईड्यः॑। नूतनैः। उ॒त। सः। दे॒वान्। आ। इ॒ह। व॒क्ष॒ति॒॥ २॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ऋग्वेदः अष्टक १। अध्याय १। वर्ग १। मंत्र २।

मधुच्छन्दा ऋषिः। अग्निर्देवता। गायत्रीच्छन्दः। षड्जः स्वरः॥



महर्षि दयानन्द व्याख्या :

(अग्निः) अयमग्निः परमेश्वरः।(पूर्वेभिः)पूर्वैस्तथा।(नूतनैरुत)नवीनैरपि(ऋषिभिरीड्यः)मन्त्रद्रष्टृभिर्ऋषिभिस्तर्कैः प्राणैश्च सदैवेड्यः स्तुत्यो वन्द्योऽन्वेषणीयः पूज्यश्चास्ति। स जगदीश्वरः स्वकृपाकटाक्षेण(देवान्)देवान् दिव्यानीन्द्रियाणि विद्यादिदिव्यगुणान् दिव्यर्त्तून् दिव्यभोगाँश्च।(एह वक्षति)इहास्मिन् संसारे जन्मन्यात्मनि च। आवक्षति। आवहतु। आसमन्तात्प्रापयतु न इति शेषः॥ अत्र प्रमाणानि।



प्राणा वा ऋषयो दैव्यासः॥ऐत॰ पं॰ २। अ॰ ४॥



प्राणा ऋषयः। ऋतवो वै देवाः॥श॰ का॰ ७। अ॰ २॥



अग्निः पूर्वेभिर्ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत। स देवाँ एह वक्षति॥ १॥



अग्निर्यः पूर्वैर्ऋषिभिरीडितव्यो वन्दितव्योस्माभिश्च नवतरैः स देवानिहावहत्विति। स न मन्येतायमेवाऽग्निरित्यप्येते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते॥नि॰ अ॰ ७। खं॰ १६॥



पुरस्तान्मनुष्या वा ऋषिषूत्क्रामत्सु देवानब्रुवन्को न ऋषिर्भविष्य-तीति तेभ्य एतं तर्कमृषिं प्रायच्छन्मन्त्रार्थचिन्ताभ्यूहमभ्यूढम् इति॥नि॰ अ॰ १३। खं॰ १२॥



अयमर्थः। पूर्वेभिर्जगत्कारणस्थैर्नूतनैः कार्यशरीरस्थैर्ऋषिभिः प्राणैः सह मनुष्यैरीड्य इत्यर्थः।(अग्निर्य॰)योऽग्निः परमेश्वरो भौतिको वास्ति सोऽत्र ग्राह्यः। कुतः? स न मन्येतायमेवाग्निरित्यप्येते उत्तरे ज्योतिषी अग्नी उच्येते इत्युक्तत्वात्। परमेश्वरो विद्युदादिदिव्यश्चैतावग्नी उत्तरे ज्योतिषी अत्र ग्रहीतुं योग्ये स्तः। एवमेव र्तैं॑र्र्वेदशास्त्रादिस्थैः पूर्वेभिरस्मदादिभिरि-दानीन्तनैर्नवतरैश्चैवेश्वरः स्तुत्या वन्दनेन वेद्योऽस्ति नान्यथा। ‘अविज्ञात-तत्त्वेर्थे कारणोपपत्तितस्तत्त्वज्ञानार्थमूहस्तर्कः’ इति गोतमाचार्येण न्याय-शास्त्रे प्रतिपादितत्वात् मनुष्याणां तर्कैर्विना यथार्थज्ञानं नैव कदाचिद्भवत्यत उक्तमृषिभिस्तर्कैरिति॥ तथेश्वरस्य त्रिकालज्ञत्वात्। नवीनापेक्षया प्राचीनैः प्राचीनापेक्षया नवीनैश्च विद्वद्भिरीड्य इत्युक्ते सति न दोषो भवति देवस्य सर्वज्ञवाक्यत्वात्। प्रथम-मन्त्रभाष्ये निरुक्तव्याकरणादिरीत्या देवशब्दार्थ उक्तः सोऽत्र द्रष्टव्यः।



एतन्मन्त्रार्थः सायणाचार्यादिभिरन्यथोक्तः। तद्यथा—पुरातनैर्भृग्वंगिरः प्रभृतिभिः। नूतनैरुतेदानींतनैरस्माभिरपि स्तुत्यः। देवान् हविर्भुज आवक्ष-तीत्यन्यथेदं व्याख्यानमस्ति, तद्वद्यूरोपखण्डस्थैरत्रस्थैश्च कृतमिंगलैंडभाषायां वेदार्थयत्नादिषु च व्याख्यानमप्यसमञ्जसम्। कुतः? ईश्वरोक्तस्यानादिभूतस्य वेदस्येदृशं व्याख्यानं क्षुद्राशयं गम्यते, तथा निरुक्तशतपथादिग्रन्थाशयविरुद्धं चातः॥ २॥



॥ भाषार्थ॥



(अग्निः)अग्नि जो परमेश्वर(पूर्वेभिर्ऋ॰)प्राचीन और नवीन ऋषि जो प्राण, मन्त्रार्थ जानने वाले जो विद्वान् और तर्क हैं। अर्थात् स्थूल जगत् का कारण जो ईश्वर की सामर्थ्य प्रकृति और परमाणु रूप है, इनमें जो सूक्ष्म प्राण हैं उनका नाम प्राचीन है और जो प्राण सदैव निर्विकार बने रहते हैं, जो ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले हैं उनका ‘पूर्वेभिः’ इस पद से ग्रहण होता है। और कार्य जो स्थूल जगत् तथा शरीर में जो प्राण हैं तथा पहिले और वर्तमान में जो विद्वान् हैं उन पूर्व हो गए विद्वानों के जो तर्क थे और आत्मा में जो तर्क हैं उनको भी ‘पूर्वेभिः’ तथा ‘नूतनैः’ इन पदों से ग्रहण करते हैं। क्योंकि ये सब शरीर के साथ ही उत्पत्ति वृद्धि और क्षय को प्राप्त होते हैं। इन दोनों प्राणों के साथ अभ्यास करने से इनके बीच ही परमेश्वर प्राप्त होता है। तथा मन्त्रार्थ जानने वाले प्राचीन और नवीन ऋषियों को भी स्तुति करने के योग्य परमेश्वर ही है। सो जगदीश्वर अपनी कृपा-कटाक्ष से शुद्ध सद्विद्यादि गुण, श्रेष्ठ इन्द्रिय, उत्तम ऋतु और सब प्रकार के जो उत्तम भोग हैं कि जिन गुणों से परमानन्द मोक्ष प्राप्त होता है, जिन इन्द्रियों से धर्माचरण, विद्या और उत्तम सुख होता है, दिव्यऋतु=जिनमें परमार्थ और व्यवहार के दोनों सुख बढ़ें। दिव्यभोग जो मोक्ष और व्यवहार में भी होते हैं, (स देवानेह वक्षति)इस संसार, इस जन्म और हमारे आत्मा में आप हम लोगों को सब प्रकार से उन सुखों को प्राप्त करो।



प्राण, तर्क और मन्त्रार्थ के जानने वाले विद्वानों को ऋषि कहते हैं। सद्विद्यादि जो दिव्यगुण और ऋतु आदि को देव कहते हैं। इसमें शतपथादि ग्रन्थों का लेख संस्कृत में लिखा है सो देख लेना।



इस मन्त्र का सायणाचार्य आदि लोगों ने अन्यथा अर्थ वर्णन किया है। इसका खण्डन भी संस्कृत में देख लेना। तद्वत् डाक्तर विलसन साहेब कृत और ‘वेदार्थयत्न’ में भी इस मन्त्र का अर्थ ठीक नहीं किया है। ‘वेदार्थयत्न’ वाले ने जो यह बात लिखी है कि यह मन्त्र लक्ष्य में रखने के योग्य है अर्थात् वेद ईश्वरकृत सनातन नहीं है। उनका ऐसा अभिप्राय देखने में आता है। सो उनकी बुद्धि के अनुसार ही है यह प्रमाणयुक्त नहीं है॥ २॥



॥ अथ द्वितीयोर्थः॥



प्राक्तनैर्नवीनैः प्राणैः शिल्पविद्याविद्भिस्तर्क्कैः पूर्वोक्तैर्ऋषिभिरयमेवाग्निरन्वेष्टव्यगुणोस्ति। कुतः? सोऽयमग्निरिह पदार्थविद्यायां कलाकौशलस्य विमानादीनां यानानां दिव्यगुणानावक्षति। आवहत्वित्याकांक्ष्येत चेति॥ २॥



॥ भाषार्थ॥



(अग्निः)शिल्पविद्या के जानने तथा शिल्पविद्या को सिद्ध करने की इच्छा रखने वाले, उसको पढ़ाने और पढ़नेवाले जो ऋषि अर्थात् कारीगर लोग हैं वे अग्नि के गुणों के सुतर्कपूर्वक खोज से पदार्थविद्या को सिद्ध करते हैं और करें। क्योंकि पदार्थविद्या में कला-कौशल विमान आदि सवारियों के परमोत्तम गुणों की प्राप्ति अग्नि से ही होती है। इससे अग्नि के गुणों के खोजने में सब लोग सदा प्रयत्न करें॥२॥