अ॒ग्निर्होता॑ क॒विक्र॑तुः स॒त्यश्चि॒त्रश्र॑वस्तमः। दे॒वो दे॒वेभि॒राग॑मत्॥ ५॥
In Hindi:
पदपाठ : अग्निः। होता। क॒विक्र॑तुः। स॒त्यः। चि॒त्रश्र॑वःऽतमः। दे॒वः। दे॒वेभिः॑। आ ग॒म॒त्॥ ५॥(अग्निः)पूर्वोक्तविशेषणयुक्तः परमेश्वरोग्निः।(होता)सर्वोत्तम-पदार्थानां दाता पृथिव्यादीनामादाता ग्रहीता यो धारणकर्त्तास्ति।(कविक्रतुः)कविश्चासौ क्रतुश्च स कविक्रतुः। कविः=सर्वज्ञः क्रान्तप्रज्ञः सर्वेषां जीवानां बुद्धेः क्रमिता तदग्रे न कस्यापि बुद्धिः क्रमते सर्वेषां बुद्धेः प्रभुत्वात्। क्रतुः=सर्वजगत्कर्त्ता।(सत्यः)अस्तीति सत्, सति साधुः सत्यः, सर्वदा विनाशरहितः(चित्रश्रवस्तमः)चित्रमाश्चर्यं श्रवः श्रवणं यस्य स चित्रश्रवाः। अतिशयेन चित्रश्रवाः इति चित्रश्रवस्तमः। इत्यत्रार्थप्रमाणम्—
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृणवन्तोपि बहवो यन्न विद्युः।
आश्चर्यों वक्ता कुशलोस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः॥कठोपनि॰ वल्ली २॥
इत्यनेनाश्चर्यश्रवणत्वं परमेश्वर एव घटते नान्यत्रेति॥
(देवः)स जगदीश्वरः सर्वजगत्प्रकाशकः।(देवेभिरागमत्)दिव्यैः सर्वज्ञपरमानन्दादिभिर्गुणैः सह, अस्माकं हृदयेऽस्मिन्संसारे च प्रकाशमागमत्, आगच्छतु। स्वसामर्थ्येन कृपया च सर्वथा प्रकाशितो भवत्विति प्रार्थ्यतेऽस्माभिः।
कविसत्यशब्दार्थो यास्केनाप्येवं व्याख्यातः—
कविः क्रान्तदर्शनो भवति कवतेर्वा प्रसुवति भद्रमित्यादि॥नि॰ अ॰ १२ खं १३॥
कुङ् शब्दे, कु शब्दे, कवते, कौति वा सर्वविद्यायुक्तं वेदशास्त्रमुपदिशति स कविरीश्वरः। प्रसुवति भद्रं भद्रैश्वर्योत्पादनदानाभ्याम्॥
सत्यं कस्मात्सत्सु तायते सत्प्रभवं भवतीति वा इति॥नि॰ अ॰ १२। ख॰ १३॥
सत्सु गुणेषु, भागेषु, पदार्थेषु वा सन्तानयति पालयति वा सर्वान् जनान् यः। सत्प्रभ॰=सत्ता ज्ञानेन योगेन धर्मेण वेदैर्वा प्रभवः प्रकटता यस्य च॥ अतः स परमेश्वर एव सत्यो भवितुमर्हति नान्यः।
अयमपि मन्त्रः सायणाचार्येण तथा तदनुसारिभिरध्यापकविलसना-ख्यादिभिश्च न सम्यग्वर्णितः। कुतः? अस्य मन्त्रस्यार्थो होममात्रसम्बन्धेनैव वर्णितस्तस्मात्। एवमेव प्राकृतभाषाकृतोऽप्यर्थोऽन्यथैवास्तीति बोध्यम्॥ ५॥
॥ भाषार्थ॥
(अग्निः)पूर्वोक्त विशेषणयुक्त जो परमेश्वर है।(होता)जो सत्यविद्यादि शुभगुण और चक्रवर्ति राज्य ऐश्वर्य का देने वाला है तथा जो पृथिव्यादि लोकों का धारण करने वाला है।(कविक्रतुः)और जो सब जानने वाला है और सब की बुद्धि का अध्यक्ष है उसको कवि कहते हैं। जिसके सामने सबकी बुद्धि अल्प हो जाती है। क्योंकि वह सबकी बुद्धियों का प्रभु है तथा क्रतुः=जो सब जगत् का करने वाला है।(सत्यः)जिसका नाश कभी नहीं होता।(चित्रश्रवस्तमः)जिसका कथन, श्रवण और स्वरूप अत्यन्त अद्भुत है।(देवो देवेभिरागमत्)उस परमेश्वर की सत्यभाव से हम लोग भक्ति करते हैं वही जगदीश्वर एक अद्वितीय देव है। क्योंकि प्रकाश करने वाले जो सूर्य आदि सब लोक हैं उनका भी प्रकाशक एक वही परमेश्वर है और उसका प्रकाश करने वाला दूसरा कोई नहीं किन्तु वह तो आप ही प्रकाशित है। वह परमेश्वर जो सर्वज्ञ और परमानन्दादि दिव्य उत्तम गुण हैं उनके सह वर्त्तमान हमारे हृदय और इस संसार में कृपा करके प्रकाश को प्राप्त हो। ऐसी प्रार्थना उसकी हम लोग करते हैं जिससे वह अपनी कृपा करके जगत् के बीच में सर्वदा प्रकाशित हो।
श्रवणाया॰=जिस परमेश्वर को सुनने को बहुत मनुष्य प्रवृत्त होते हैं परन्तु उनमें से जो विद्वान् सत्याचरण करने वाले हैं वे ही परमेश्वर को सुन के प्राप्त होते हैं और जो इस प्रकार के नहीं हैं, वे परमेश्वर को सुन के भी प्राप्त नहीं होते। क्योंकि इस परमेश्वर का यथार्थ उपदेश करने वाले का मिलना कठिन है। तथा ब्रह्म के जानने वाले से परमेश्वर को सुन के जाननेवाला भी कठिन है, सो जो कुशल अत्यन्त चतुर है वही इस ब्रह्म को प्राप्त होता है। क्योंकि इसका जाननेवाला अत्यन्त अद्भुत है और इस कुशल पुरुष के उपदेश से भी जो इस ब्रह्म को यथावत् जानता है वह भी इस जगत् में आश्चर्यरूप ही है इस कारण से परमेश्वर को चित्रश्रवस्तम इस मन्त्र में विशेषण दिया है।
तथा सत्सु ता॰=जो सत्य गुण, सत्य भोग, सत्य पदार्थ और सत्य व्यवहार हैं, इन में ही जो मनुष्य वर्त्तमान हैं उनको जो सुख में विस्तृत करता है, किंवा उनका जो पालनकर्त्ता है इससे परमेश्वर का सत्य नाम है। तथा सत्यप्रभवं॰=जो सत्य ज्ञान, सत्य योग, सत्य धर्म और जो वेद हैं, इनसे ही जिसकी प्रकटता होती है इसलिये परमेश्वर का नाम सत्य है।
इस मन्त्र का भी सायणाचार्यादि, विलसन साहेब ने और ‘वेदार्थयत्न’ में भी अच्छी रीति से व्याख्यान नहीं किया है॥ ५॥
॥ अथ द्वितीयोर्थः॥
(अग्निर्होता)अग्निर्भौतिकोऽश्वः। होता सर्वशिल्पविद्यागुणधार-कोऽस्ति।(कविः)शिल्पविद्यायाः क्रान्तदर्शनः क्रमप्रकाशकः।(क्रतुः)शिल्पविद्या क्रियते येन सोऽयं क्रतुः।(सत्यः)सति शिल्पविद्याव्यवहारे साधुर्यः स सत्योग्निः।(चित्रश्रवस्तमः)विद्युदादिस्थगुणानां चित्रमद्भुतं श्रवः श्रवणं यस्मिन्सः। अतिशयेन चित्रश्रवा इति चित्रश्रवस्तमः।(देवः)शिल्पविद्यादिगुणद्योतकः सोऽग्निः।(देवेभिः)शिल्पविद्याद्योतकैर्गुणैर्दिव्यैः सह वर्त्तमानो योऽग्निरस्ति सः। हे परमेश्वर! भवत्कृपया(आगमत्)अस्माभिर्ज्ञातो भवतु। येन सर्वां शिल्पविद्यां वयं लभेमहि॥५॥
॥ भाषार्थ॥
(अग्निर्होता)जिस अग्नि का नाम अश्व है और जो सब शिल्पविद्या के गुणों का धारण करनेवाला है।(कविक्रतुः)कवि=जो शिल्पविद्या का प्रकाश करनेवाला और क्रतुः=कि शिल्पविद्या जिससे की जाती है।(सत्यः)कारीगरी में जो साधु उत्तम साधन है।(चित्रश्रवस्तमः)बिजुली आदि में अत्युत्तम जो वेगादि गुण हैं वे जिसमें सुनते हैं और जिसमें अत्यन्त अद्भुत सामर्थ्य ईश्वर ने रक्खा है।(देवो देवभिः०)जो अग्नि वेगादि गुणों का प्रकाश करनेवाला है सो हमारे शिल्पविद्यादिव्यवहार में अत्यन्त उपकार करनेवाला आपकी कृपा से हो। जिससे शिल्पविद्या में जो दिव्यगुण उनको हम लोग यथावत् सिद्ध करके अत्यन्त सुखी हों॥ ५॥