स नः॑ पि॒तेव॑ सूनवेऽग्ने॑ सूपायनो भ॑व। सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑॥ ९॥
In Hindi:
पदपाठ : सः। नः॒। पि॒ताऽ इव॑। सूनवे॑। अग्ने॑। सु॒ऽ उ॒पा॒य॒नः। भ॒व। सच॑स्व। नः॒। स्व॒स्तये॑॥ ९॥(सः)यः। अग्निमीडे पुरोहितमित्यादिमन्त्रेषु पुरोहितादिविशेषणैः प्रतिपादितोऽग्निसंज्ञः परमेश्वरः सोऽत्र गृह्यते।(अग्ने)हे परमात्मन्!(सूपायनः)स्वकृपया सुखेनैव प्राप्तस्त्वं भव। तथा हे परमेश्वराभिधाग्ने!(नः) (स्वस्तये)ऐहिकपारमार्थिकसुखायास्मान् स्वकृपया।(सचस्व)समवेतान् कुरु। अर्थात् तत्सुखेन सह वर्त्तमानानस्मान् सदा कुरु। एवं तत्सुखस्य यथावत् सिध्द्यर्थं सचस्व त्वं नित्यं समवेतः कृपयानुकूलो भव। कस्मै क इव(पितेन सूनवे)यथा स्वसन्तानाय स्वप्रजायै अत्यन्तप्रेम्णानु-कम्पयमानः सन्तानसुखाय प्रवर्त्तमानः पिता इव। कुतः? भवानेवास्माकं पितास्त्यतः।
वर्गद्वयस्थैर्नवभिर्मन्त्रैरग्निहोत्राद्यश्वमेधपर्यन्तेषु वायुवृष्टिजलशुद्धि-प्रयोजनेषु यज्ञेषु युक्तिप्रमाणसिद्धानां कर्मणामनुष्ठानं कर्तुं योग्यमस्ति, परन्तु सूत्रब्राह्मणग्रन्थेषु यादृशो विनियोगः प्रतिपादितः सोऽप्यत्र तदुक्तरीत्या कार्यः॥ ९॥
॥ भाषार्थ॥
(सः)अग्निमीळे इत्यादि आठ मंत्रों में पुरोहित आदि जिन विशेषणों से जिस परमेश्वर का कथन किया है, उसी का ‘सः’ शब्द से ग्रहण होता है।(अग्ने)हे परमेश्वर अग्ने! अपनी कृपा से ही(नः)हमको प्राप्त हो। तथा(सूपायनः)इस लोक और परलोक के सुख के लिये।(नः)हमको(सचस्व)संयुक्त कर। तथा आप भी हमारे सहायकारी नित्य रहो। तथा(स्वस्तये)सद्विद्यादि शुभगुणों में मोक्ष आदि सुख के लिये हमको सदा युक्त कर। जिससे स्वस्ति जो परम सुख सो सदा हमको प्राप्त हो। जैसे पिता अत्यन्त प्रेम से अपने सन्तानों को सुख देता है वैसे ही आप हमको पुरुषार्थ से आनन्दयुक्त करके नित्य पालन करो। क्योंकि आप ही हम लोगों के पिता हो। इससे हमको सुख देनेवाले एक आप ही हो॥ ९॥