राज॑न्तमध्व॒राणां॑ गो॒पामृ॒तस्य॒ दीदि॑विम्। वर्ध॑मानं॒ स्वे दमे॥ ८॥
In Hindi:
पदपाठ : राज॑न्तम्। अ॒ध्व॒राणा॑म्। गो॒पाम्। ऋ॒तस्य॑। दीदि॑विम्। वर्ध॑मानम्। स्वे। दमे॑॥ ८॥एमसीत्यनुवर्त्तते॥(अध्वराणाम्)अग्निष्टोमादियज्ञानां तत्कतॄणां धर्मात्मनां मानवानां च।(गोपां)रक्षकम्। तथा(राजन्तम्)सूर्यादीनां लोकानां मध्ये योगिनामात्मनश्च मध्ये धारकान्तर्यामितया(राजन्तम्)सदा प्रकाशमानम्।(ऋतस्य दीदिविम्)सत्यविद्यामयस्य वेदचतुष्टयस्य मोक्षस्य च,(दीदिविम्)सम्यक् प्रकाशकम्। तथा(स्वे)स्वकीये(दमे)परमोत्कृष्टे पदे।(वर्धमानम्)अत्यन्तवृद्धिमन्तम्। एवंभूतं परमेश्वरमग्निं त्वां वयं सदैवोपैमसि। भवत्परमपदमोक्षप्राप्तये परमप्रेम्णा सर्वतः सदा भवन्तं जगदीश्वरमेवाप्नुमः। यतोऽस्मिन्नेव जन्मनि भवत्कृपयाऽस्माकं निश्चितो मोक्षो भवेदिति नित्यमिच्छामः॥ ८॥
॥ भाषार्थ॥
(अध्वराणां गोपाम्)अध्वर जो अग्निष्टोम आदि यज्ञ और इन यज्ञों के करने वाले जो धर्मात्मा मनुष्य हैं उनकी जो यथावत् रक्षा करनेवाला है। तथा(राजन्तम्)सूर्य आदि जो लोक उनके बीच में और योगियों के आत्मा के बीच में धारण करने वाला और अन्तर्यामी रूप से प्रकाशमान है। तथा(ऋतस्य दीदिविम्)सत्यविद्यास्वरूप जो चारों वेद हैं उनका और मोक्ष का जो प्रकाश करनेवाला है।(वर्धमानं स्वे दमे)स्वे=अपना जो दमे=परमपद है उसमें वर्धमानम्=सब सामर्थ्य से युक्त होके जो सदा विराजमान है, और जो मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होते हैं उनको अपने उस परमपद में विज्ञान और आनन्दादि गुणों से जो सदा बढ़ानेवाला है, उस परमात्मा को मोक्ष आदि सुखों की प्राप्ति के लिये(उपैमसि)हम लोग प्राप्त होते हैं। अर्थात् हे परमेश्वर! सत्य प्रेम भक्ति से हम लोग आपको सदा प्राप्त रहें कि आप और आपकी आज्ञा से विरुद्ध हम लोग कभी न हों। जिससे हम लोगों को आप की प्राप्ति से मोक्ष आदि सुख इसी जन्म में प्राप्त हों॥ ८॥