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Atharvaveda / 2 / 11 / 3

प्रति॒ तम॒भि च॑र॒ यो ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः। आ॑प्नु॒हि श्रेयां॑स॒मति॑ स॒मं क्रा॑म ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 2 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : शुक्रः | देवता : कृत्यादूषणम् | छन्द : त्रिपदापरोष्णिक् | स्वर :

विषय : पुरुषार्थ का उपदेश।

पदपाठ : प्रति॑ । तम् । अ॒भि । च॒र॒ । य: । अ॒स्मान् । द्वेष्टि॑ । यम् । व॒यम् । द्वि॒ष्म: । आ॒प्नु॒हि । श्रेयां॑सम् । अति॑ । स॒मम् । क्रा॒म॒ ॥११.३॥

पदार्थ : [हे राजन् !] (तम् प्रति) उस [दुराचारी पुरुष] की ओर (अभिचर) चढ़ाई कर, (यः) जो (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) वैर करता है और (यम्) जिससे (वयम्) हम (द्विष्मः) अप्रीति करते हैं। (श्रेयांसम्) अधिक गुणी [परमेश्वर वा मनुष्य] को (आप्नुहि) तू प्राप्त कर, (समम्) तुल्यबलवाले [मनुष्य] से (अति=अतीत्य) बढ़कर (क्राम) पद आगे बढ़ा ॥३॥"

भावार्थ : जो छली कपटी धर्मात्माओं से अप्रीति करें और जिन दुष्कर्मियों से धर्मात्मा लोग घृणा करते हों, राजा उन दुष्टों को वश में करके दण्ड देवे ॥ २–सब मनुष्य शारीरिक और मानसिक रोगों को हटाकर सत्य धर्म में प्रवृत्त हों और प्रयत्नपूर्वक सदैव उन्नति करें ॥३॥

टिप्पणी :३–प्रति। अभिलक्ष्य। अभि+चर। अभिभव। नाशय। यः। दुराचारी पुरुषः। अस्मान्। धर्मचारिणः। द्वेष्टि। द्विष अप्रीतौ–अदादित्वात् शपो लुक्। अप्रीत्वा गृह्णाति। जिघांसति। द्विष्मः। अप्रीत्या गृह्णीमः। अन्यद् गतम् ॥