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Rigveda / 10 / 35 / 9

अ॒द्वे॒षो अ॒द्य ब॒र्हिष॒: स्तरी॑मणि॒ ग्राव्णां॒ योगे॒ मन्म॑न॒: साध॑ ईमहे । आ॒दि॒त्यानां॒ शर्म॑णि॒ स्था भु॑रण्यसि स्व॒स्त्य१॒॑ग्निं स॑मिधा॒नमी॑महे ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 10 | Sukta : 35 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : लुशो धानाकः | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराड्जगती | स्वर : निषादः

विषय :

पदपाठ : अ॒द्वे॒षः । अ॒द्य । ब॒र्हिषः॑ । स्तरी॑मणि । ग्राव्णा॑म् । योगे॑ । मन्म॑नः । साधे॑ । ई॒म॒हे॒ । आ॒दि॒त्याना॑म् । शर्म॑णि । स्थाः । भु॒र॒ण्य॒सि॒ । स्व॒स्ति । अ॒ग्निम् । स॒म्ऽइ॒धा॒नम् । ई॒म॒हे॒ ॥ १०.३५.९

पदार्थ : (अद्य) इस जन्म में (अद्वेषः-बर्हिषः स्तरीमणि) द्वेष अर्थात् ग्लानि से रहित अध्यात्मज्ञान के रक्षक वातावरण में (ग्राव्णां योगे) विद्वानों का सम्बन्ध-संयोग होने पर (मन्मनः साधे-ईमहे) मननीय मनोरथ साधने के लिये तुझ परमात्मा को प्रार्थित करते हैं-चाहते हैं (आदित्यानां शर्मणि स्थः-भुरण्यसि) हे परमात्मन् ! तू अखण्ड ब्रह्मचर्यवालों के कल्याण में स्थित होता हुआ उन्हें पालता है, उनकी रक्षा करता है। आगे पूर्ववत् ॥९॥

भावार्थ : मानव के वर्तमान युग में अध्यात्मज्ञान की वृद्धि होनी चाहिए। वेदविद्वानों के संयोग में और ब्रह्मचर्यादि व्रत द्वारा परमात्मा के उपासनारूप शरण में मनोरथों की सिद्धि होती है ॥९॥