Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/873

इन्दुरिन्द्राय पवत इति देवासो अब्रुवन्। वाचस्पतिर्मखस्यते विश्वस्येशान ओजसः॥८७३

Veda : Samveda | Mantra No : 873

In Hindi:

ऋषि : यथातिर्नाहुषः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में ब्रह्मानन्द और ज्ञान दोनों का विषय वर्णित है।

पदपाठ : इन्दुः ।इन्द्रायः। पवते ।इति ।देवासः ।अब्रुवन् ।वाचः ।पतिः ।मखस्यते ।विश्वस्य ।ईशानः ।ओजसः॥

पदार्थ : (इन्दुः) ज्ञानरस वा ब्रह्मानन्द-रस (इन्द्राय) जीवात्मा के लिए (पवते) क्षरित होता है (इति) यह (देवाः) विद्वान लोग (अब्रुवन्) कहते हैं। (वाचः पतिः) वाणी का स्वामी परमेश्वर वा आचार्य (मखस्यते) आनन्दप्रदान-यज्ञ वा अध्यापन-यज्ञ करता है, जो (विश्वस्य ओजसः) सब ब्रह्मबल वा ज्ञानबल का (ईशानः) अधीश्वर है। अतः उसके पास से सबको ब्रह्मबल और ज्ञानबल प्राप्त करना योग्य है, यह आशय है ॥२॥

भावार्थ : आत्मा ही ज्ञान को ग्रहण करनेवाला और सुख को भोगनेवाला है, यह विद्वानों का अनुभव है। परमेश्वर के पास से ब्रह्मानन्द को और आचार्यों के पास से ज्ञान को जो ग्रहण करते हैं, उनका जीवन सफल होता है ॥२॥