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Samveda/978

यो जिनाति न जीयते हन्ति शत्रुमभीत्य। स पवस्व सहस्रजित् (हि)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥९७८

Veda : Samveda | Mantra No : 978

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः काश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में जगदीश्वर की शक्ति का वर्णन करते हुए उसका आह्वान किया गया है।

पदपाठ : यः ।जिनाति ।न ।जीयते ।हन्ति ।शत्रुम् ।अभीस्य ।अभि ।इस्य ।सः ।पवस्व ।सहस्रजित् ।सहस्र ।जित्॥

पदार्थ :  (यः) जो आप (जिनाति) विघ्नों वा विपत्तियों को विनष्ट करते हो, (न जीयते) किसी से पराजित नहीं होते हो, प्रत्युत (अभीत्य) आक्रमण करके (शत्रुम्) शत्रु काम, क्रोध आदि को (हन्ति) मारते हो, (सः) वह आप (सहस्रजित्) हजारों आन्तरिक एवं बाह्य सम्पदाओं के विजेता होते हुए (पवस्व) हे पवमान सोम अर्थात् क्रियाशील जीवात्मन् ! प्रगति करो ॥४॥

भावार्थ : परमेश्वर का उपासक उसकी मित्रता प्राप्त करके प्रचण्ड से प्रचण्ड बाह्य तथा आन्तरिक शत्रुओं को जीत सकता है ॥४॥