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Samveda/1096

स सुन्वे यो वसूनां यो रायामानेता य इडानाम्। सोमो यः सुक्षितीनाम्॥१०९६

Veda : Samveda | Mantra No : 1096

In Hindi:

ऋषि : ऋणंचयो राजर्षिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : यवमध्या गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५८२ पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भी वही विषय वर्णित है।

पदपाठ : सः ।सुन्वे ।यः ।वसूनाम्। यः।रायाम् ।आनेता ।आ। नेता ।यः।इडानाम्। सोमः ।यः ।सुक्षितीनाम् ।सु ।क्षितीनाम्॥

पदार्थ : (सः सोमः) वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर (सुन्वे) सब जगत् को उत्पन्न करता है, (यः) जो (रायाम्) विद्या, आरोग्य, सत्य, अहिंसा, न्याय, वैराग्य आदि धनों का, (यः) जो (इडानाम्) गायों और भूमियों का, (यः) और जो (सुक्षितीनाम्) जिनमें उत्कृष्ट मनुष्य निवास करते हैं, उन राष्ट्रों का (आनेता) लानेवाला है ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कौन चाँदी, सोना, भूमि, अन्तरिक्ष, नदी, समुद्र, अग्नि, वायु, जल, विद्युत्, सूर्य, वृक्ष, वनस्पति, मनुष्य, गाय, घोड़े आदि जड़-चेतन पदार्थों का, वेदविद्या, सत्य, अहिंसा आदि गुणों का और धार्मिक जनों का उत्पन्न करनेवाला हो सकता है ? इस कारण उसकी हमें कृतज्ञतापूर्वक प्रशंसा, वन्दना और पूजा करनी चाहिए ॥१॥