Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1385

उदग्ने भारत द्युमदजस्रेण दविद्युतत्। शोचा वि भाह्यजर (यी)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१३८५

Veda : Samveda | Mantra No : 1385

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : इस प्रकार परमेश्वर से प्रार्थना करके अब फिर जीवात्मा को उद्बोधन देते हैं।

पदपाठ : उत् । अग्ने । भारत । द्युमत् । अजस्रेण । अ । जस्रेण । दविद्युतत् । शोच । वि । भाहि । अजर । अ । जर॥

पदार्थ : हे (भारत) शरीर का भरण-पोषण करनेवाले, (अजर) अविनाशी (अग्ने) जीवात्मन् ! तुम (द्युमत्) शोभनीय रूप से (अजस्रेण) अविच्छिन्न तेज से (दविद्युतत्) अतिशय चमकते हुए (उत् शोच) उत्साहित होओ, (वि भाहि) विशेष यशस्वी होओ ॥३॥

भावार्थ : मनुष्य का आत्मा जागरूक होकर मन, बुद्धि आदि का अधिष्ठातृत्व करता हुआ तेजस्वी, ब्रह्मवर्चस्वी होता हुआ अपनी कीर्ति फैलाये ॥३॥