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Samveda/1578

इन्द्राग्नी तविषाणि वासधस्थानि प्रयासि च। युवोरप्तूर्यहितम् (टा)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१५७८

Veda : Samveda | Mantra No : 1578

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे पुनः जीवात्मा-परमात्मा का ही विषय वर्णित है।

पदपाठ : इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । तविषाणि । वाम् । सधस्थानि । सध । स्थानि । प्रथासि । च । युवोः । अप्तूर्यम् । अप् । तूर्यम् । हितम्॥

पदार्थ : हे (इन्द्राग्नी) जीवात्मन् और परमात्मन् ! (वाम्) तुम दोनों के (तविषाणि) बल (प्रयांसि च) और प्रयत्न (सधस्थानि) साथ-साथ होते हैं। (युवोः) तुम दोनों में (अप्तूर्यम्) कर्म के अनुष्ठान की शीघ्रता (हितम्) निहित है ॥४॥

भावार्थ : जीवात्मा और परमात्मा एक-दूसरे के साथी हैं। परमात्मा की मित्रता में जीव महान् उन्नति कर सकता है ॥४॥