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Samveda/1698

य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय सस्कृतः। यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत् (ही)।।॥१६९८

Veda : Samveda | Mantra No : 1698

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : आगे फिर वही विषय है।

पदपाठ : यः । उग्रः । सन् । अनिष्टृतः । अ । निष्टृतः । स्थिरः । रणाय । सस्कृतः । सम् । कृतः । यदि । स्तोतु । मघवा । शृणवत् । हवम् । न । इन्द्रः । योषति । आ । गमत्॥

पदार्थ : (यः) जो इन्द्र जगदीश्वर (उग्रः सन्) अधार्मिकों के लिए प्रचण्ड होता हुआ (अनिष्टृतः) उनसे अहिंसित रहता है और (स्थिरः) अविचल होता हुआ (रणाय) असुरों के साथ युद्ध के लिए (संस्कृतः) सज्जित हो जाता है, वह (मघवा) ऐश्वर्यवान् (इन्द्रः) जगदीश्वर (यदि) यदि (स्तोतुः) उपासक के (हवम्) आह्वान को (शृणवत्) सुन ले, तो (न योषति) उससे अलग न खड़ा रहे, प्रत्युत (आ गमत्) उसके अन्तःकरण में आ जाए ॥३॥

भावार्थ : उपासक के हृदय से निकली हुई पुकार को जगदीश्वर अवश्य सुनता है और दस्युओं के साथ युद्ध में उसे बल देकर उसकी सहायता करता है ॥३॥इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, उपास्य-उपासक का सम्बन्ध, आत्मा और मन, इन विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥अठारहवें अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥