Samveda/1777
अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र हृदिस्पृशम्। ऋध्यामा त ओहैः॥१७७७
Veda : Samveda | Mantra No : 1777
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : agniH | Metre : pada pa.mktiH | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : agne tamadyaashva.m na stomaiH kratu.m na bhadra.m hRRidispRRiSham . RRidhyaamaa ta ohaiH.1777
Component Words : agne . tam . adya . a . dya . ashvam . na . stomaiH . kratum . na . bhadram . hRRidispRRisham . hRRidi . spRRisham . RRidhyaama . te . ohaiH.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : पद पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : प्रथम ऋचा पूर्वाचिक में ४३४ क्रमाङ्क पर परमेश्वर की अर्चना के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहा जा रहा है।
पदपाठ : अग्ने । तम् । अद्य । अ । द्य । अश्वम् । न । स्तोमैः । क्रतुम् । न । भद्रम् । हृदिस्पृशम् । हृदि । स्पृशम् । ऋध्याम । ते । ओहैः॥
पदार्थ : हे (अग्ने) जीवननायक परमेश्वर ! (अद्य) आज (अश्वं न) व्यापक सूर्य के समान प्रकाशमान और (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म के समान (भद्रम्) भद्र, (हदिस्पृशम्) हृदय में निवास करनेवाले (तम्) उस शरीरवर्ती अपने अन्तरात्मा को (ते ओहैः) तेरे द्वारा प्रेरित (स्तोमैः) वेदमन्त्रों से, हम (ऋध्याम) बढ़ायें, उद्बोधन दें ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थ : जो तेजस्वी और कर्मण्य जीवात्मा सबके ह्रदय में स्थित है,उसे उद्बोधक वेदमन्त्रों से अधिकाधिक उद्बोधन देना चाहिए तथा गुणगरिमा से बढ़ाना चाहिए ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : पद पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ४३४ क्रमाङ्के परमेश्वरार्चनविषये व्याख्याता। अत्र जीवात्मविषय उच्यते।
पदपाठ : अग्ने । तम् । अद्य । अ । द्य । अश्वम् । न । स्तोमैः । क्रतुम् । न । भद्रम् । हृदिस्पृशम् । हृदि । स्पृशम् । ऋध्याम । ते । ओहैः॥
पदार्थ : हे (अग्ने) जीवननायक परमेश ! (अद्य) अस्मिन् दिने (अश्वं न) व्यापकं सूर्यमिव प्रकाशमानम्, (क्रतुं न) यज्ञ-कर्म इव च (भद्रम्) कल्याणकरम्, (हृदिस्पृशम्) हृदयनिवासिनम् (तम्) शरीरवर्तिनं स्वान्तरात्मानम् (ते ओहैः) त्वया प्रेरितैः (स्तोमैः) वेदमन्त्रैः (ऋध्याम) वर्धयेम, उद्बोधयेम। [ऋधु वृद्धौ, दिवादिः स्वादिश्च] ॥१॥२अत्रोपमालङ्कारः ॥१॥
भावार्थ : यस्तेजस्वी कर्मण्यश्च जीवात्मा सर्वेषां हृदि सन्निविष्टः स उद्बोधकैर्वेदमन्त्रैरधिकाधिकमुद्बोधनीयो गुणगरिम्णा वर्धनीयश्च ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ४।१०।१; य० १५।४४, १७।७७ साम० ४३४।२. दयानन्दस्वामी मन्त्रमिमममृग्भाष्ये य० १५।४४ भाष्ये च विद्वद्विषये, य० १७।७७ भाष्ये चाध्यापकाध्येतृविषये व्याचष्टे।