Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1819

इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य। स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि दर्शतं क्रतुम्॥१८१९

Veda : Samveda | Mantra No : 1819

In Hindi:

ऋषि : अग्निः पावकः | देवता : अग्निः | छन्द : सतोबृहती | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में जगदीश्वर की स्तुति तथा उससे प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : इरय्यन् । अग्ने । प्रथयस्व । जन्तुभिः । अस्मेइति । रायः । अर्मत्य । अ । मर्त्य । सः । दर्शतस्य । वपुषः । वि । राजसि । पृणक्षि । दशतम् । क्रतुम्॥

पदार्थ : हे (अमर्त्य) अमर (अग्ने) मार्गदर्शक परमात्मन् ! (इरज्यन्) सबके ईश्वर होते हुए आप (जन्तुभिः) उत्पन्न अभ्यास, वैराग्य, प्रणव-जप, मैत्री, करुणा, मुदिता, उपेक्षा, ज्योतिष्मती प्रज्ञा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, समाधि आदियों से (अस्मे) हमारे लिए (रायः) अभ्युदय-निःश्रेयस रूप ऐश्वर्यों का (प्रथयस्व) विस्तार करो। (सः) वह प्रसिद्ध आप (दर्शतस्य) दर्शनीय वा आपके दर्शन में सहायक (वपुषः) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय रूप पञ्च शरीरों के (वि राजसि) विशिष्ट राजा हो। आप ही हमारे मन में (दर्शतम्) ज्ञान-दर्शन के साधन (क्रतुम्) सङ्कल्प को (पृणक्षि) संयुक्त करते हो ॥४॥

भावार्थ : जगदीश्वर की ही सहायता से योगसाधना में संलग्न उपासक अपने लक्ष्य की पूर्ति में सफल होते हैं ॥४॥