Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1821

ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतमग्नि सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः। श्रुत्कर्ण सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा (दि)।।॥१८२१

Veda : Samveda | Mantra No : 1821

In Hindi:

ऋषि : अग्निः पावकः | देवता : अग्निः | छन्द : उपरिष्टाज्ज्योतिस्त्रिष्टुप | स्वर : धैवतः

विषय : आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

पदपाठ : ऋतावानम् । महिषम् । विश्वदर्शतम् । विश्व । दर्शतम् । अग्निम् । सुम्नाय । दधिरे । पुरः । जनाः । श्रुत्कर्मण । श्रुत । कर्णम् । सप्रथस्तम् । स । प्रथस्तमम् । त्वा । गिरा । दैव्यम् । मानुषा । युगा॥

पदार्थ : (ऋतावानम्) सत्यवान्, (महिषम्) महान् (विश्वदर्शतम्) सबके द्वारा दर्शनीय (अग्निम्) अग्रनायक आप जगदीश्वर को (सुम्नाय) सुख पाने के लिए (जनाः) स्तोता लोग (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं। (श्रुत्कर्णम्) सुननेवाले कानों से युक्त, (सप्रथस्तमम्) अतिशय कीर्तिमान् (दैव्यम्) विद्वान् उपासकों का हित करनेवाले (त्वा) आपको (मानुषा युगा) पति-पत्नी-रूप मनुष्य-युगल भी (गिरा) स्तुति-वाणी से (सुम्नाय) सुखार्थ (पुरः) अपने सम्मुख (दधिरे) धारण करते हैं ॥६॥

भावार्थ : यहाँ निराकार परमेश्वर को भी सुननेवाले कानों से युक्त कहा गया है, इससे उसका श्रोता के समान स्तोताओं के मनोरथों को पूर्ण करने का गुण सूचित होता है। जैसे कानोंवाला कोई मनुष्य कानों से स्तोता के निवेदन को सुन कर उसकी कामना को पूर्ण करता है, वैसे ही परमेश्वर बिना कानों के भी कर देता है, यह अभिप्राय है। कहा भी है, ‘वह बिना आँख के देखता है, बिना कान के सुनता है’ (श्वेता० ३।१९)। सबको चाहिए कि सत्य के प्रेमी, महान्, यशस्वी परमेश्वर को हृदय में धारण करें ॥६॥इस खण्ड में जगदीश्वर और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥बीसवें अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त॥