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Samveda/1844

अप्सु रेतः शिश्रिये विश्वरूपं तेजः पृथिव्यामधि यत्सम्बभूव। अन्तरिक्षे स्वं महिमानं मिमानः कनिक्रन्ति वृष्णो अश्वस्य रेतः॥१८४४

Veda : Samveda | Mantra No : 1844

In Hindi:

ऋषि : सुपर्णः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर की महिमा वर्णित है।

पदपाठ : अप्सु । रेतः । शिश्रिये । विश्वरुपम् । विश्व । रुपम् । तेजः । पृथिव्याम् । अधि । यत् । संवभूव । सम् । बभूव । अन्तरिक्षे । स्वम् । महिमानम् । मिमानः । कनिक्रन्ति । वृष्णः । अश्वस्य । रेतः॥

पदार्थ : (अप्सु) नदियों में जो (विश्वरूपम्) सब रूपोंवाला (रेतः) जल (शिश्रिये) आश्रित है, (यत्) और जो (पृथिव्याम् अधि) भूमि के अन्दर (तेजः) तेज (संबभूव) उत्पन्न हुआ है, उस सबको (ऋज्रः) सर्वव्यापक अग्नि नामक जग्दीश्वर ने ही (जजान) उत्पन्न किया है। [यहाँ ‘ऋज्रः’ और ‘जजान’ ये दोनों पद पूर्व मन्त्र से लाये गये हैं।] वही जगदीश्वर (अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष में (स्वम्) अपनी (महिमानम्) महिमा को (मिमानः) प्रकट कर रहा है। उसी की महिमा से (वृष्णः) वर्षा करनेवाले (अश्वस्य) व्यापक बादल का (रेतः) जल (कनिक्रन्ति) बहुत अधिक गरजता है ॥२॥

भावार्थ : नदियों में, भूमि पर, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, सूर्य में, बादल में सभी जगह जगदीश्वर की ही महिमा दृग्गोचर हो रही है ॥२॥