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Saadhana Paada / Means / 10
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Saadhana Paada / Means / 10

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥१०॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 10

In Hindi:

पदपाठ : ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥

हिंदी में अर्थ : (ते) अविद्यादि पाँच क्लेश (सूक्ष्माः) तप-स्वाध्याय-ईश्वर प्रणिधान रूपी क्रियायोग के अनुष्ठान से सूक्ष्म = निर्बल हुए तथा विवेकख्याति से दग्धबीज भाव को प्राप्त हुए (प्रतिप्रसवहेयाः) अपने आधारभूत चित्त के लय के द्वारा हेय = विलीन किये जाने के योग्य हैं॥

व्यास भाष्य : ते पञ्च क्लेशा दग्धबीजकल्पा योगिनश्चरिताधिकारे चेतसि प्रलीने सह तेनैवास्तं गच्छन्ति॥

हिंदी में अर्थ : (ते) वे (पञ्च क्लेशाः) पाँच क्लेश क्रियायोग के द्वारा सूक्ष्म हुए जब (दग्धबीजकल्पाः) प्रसंख्यान-अग्नि = विवेकख्याति से दग्धबीज के समान स्वकार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं; तब (योगिनः) योगी के (चरिताधिकारे चेतसि) समाप्त अधिकार वाले = कृतकार्य चित्त के (प्रलीने) प्रविलीन हो जाने पर (तेनैव सह) उस चित्त के साथ ही (अस्तम् गच्छन्ति) अस्त = विलीन हो जाते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : अविद्यादि पाँच क्लेशों का विस्तारपूर्वक लक्षण, स्वरूप और भेदों को बताने के पश्चात् महर्षि पतञ्जलि इन क्लेशों के नाश का उपाय बताते हैं। वस्तुतः अविद्या के कारण जीव संसारचक्र में बंधता और अविद्या के नाश के बिना इस संसारचक्र से छूट ही नहीं सकता। अतः अविद्यादि क्लेशों का नाश करना ही पुरुष के लिए परम कर्त्तव्य है। इसके नाश के उपायों को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. सर्वप्रथम क्रियायोग = तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान द्वारा इन क्लेशों को सूक्ष्म = निर्बल करना होता है।

२. इस प्रकार से सूक्ष्म हुए क्लेशों को सत्त्वपुरुषान्यताख्याति = प्रसंख्यान-अग्नि द्वारा दग्धबीज भाव रूपी स्थिति में लाया जाता है। अर्थात् प्रकृति-पुरुष के साक्षात्कार से हुए भेदज्ञान = विवेकख्याति द्वारा क्लेशों को इस अवस्था में पहुँचाया जाता है कि ये क्लेश अपने कार्य को करने में असमर्थ हो जाते हैं। अविद्यादि आदि क्लेशों के कार्यों को महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.३ में इस प्रकार से कहा है —

अ. अविद्या से सत्त्व, रज और तम गुणों के कार्य उत्पादन रूपी अधिकार दृढ होता है। ये क्लेश चित्त को पुरुष के भोग सम्पादन रूपी कार्य को दृढता से लगाए रखते हैं।

आ. अविद्यादि रूपी क्लेश ही गुणों के कार्य रूप परिणाम को = प्रकृति के कार्यों महत्तत्त्व आदि को चलाए रखते हैं। जब तक अविद्या का पुरुष रूपी जीवों के साथ सम्बन्ध रहेगा तब तक यह प्रकृति के परिणाम को प्राप्त होने की प्रक्रिया चालू रहेगी।

इ. ये अविद्या आदि क्लेश कार्यकारण स्रोत को उन्नत करते हैं अर्थात् प्रकृति के कार्य-कारण रूपी प्रवाह — प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अंहकार, अंहकार से तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ तथा तन्मात्राओं से स्थूल भूतों रूपी कार्य कारण प्रवाह को उन्नत करते हैं। और

ई. क्लेश कर्मों के तथा कर्म क्लेशों के परस्पर सहयोगी बन कर पुरुष को कर्मफल = जाति, आयु और भोग रूप फलों को प्राप्त कराते हैं।

दग्धबीज अवस्था में पहुँचने पर अविद्यादि क्लेश उपरोक्त कार्यों को नहीं कर पाते। यहाँ ध्यान रखना चाहिए कि पुरुष धर्ममेघ समाधि को प्राप्त करके ही प्रकृति-पुरुष के भेदज्ञान से युक्त होता है। अर्थात् प्रकृति और पुरुष के शाब्दिक ज्ञान मात्र से विवेकख्याति की प्राप्ति नहीं होती वरन् उसके लिए श्रवण-चतुष्ठय की प्रक्रिया को ही अपनाना होता है। निर्विचार समाधि की अवस्था तक, पुरुष = जीवात्मा को प्रकृति पर्यन्त सभी पदार्थों का साक्षात्कार हो जाता है, और अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चावस्था धर्ममेघ समाधि की अवस्था में आत्मा का साक्षात्कार होने पर ही उसे प्रकृति और अपने स्वरूप का वास्तविक ज्ञान होता और इस साक्षात्कार के बल पर हुई विवेकख्याति से ही क्लेशों को दग्धबीज अवस्था में लाया जाता है। इसी अवस्था के परिणाम को महर्षि पतञ्जलि ने इस प्रकार से कहा है—

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥ योग० ४.३०॥

अर्थात् धर्ममेघ समाधि से पुरुष के अविद्यादि क्लेशों की तथा पुण्यापुण्य और मिश्रित कर्मों की निवृत्ति हो जाती है। इस अवस्था वाले योगी को ही कुशल और चरमदेह = अन्तिम देह वाला कहा जाता है।

३. ऐसा चित्त, जिसमें क्लेशदग्धबीज अवस्था वाले होते हैं, जब प्रतिप्रसव = प्रतिलोम परिणाम द्वारा अपने मूल कारण प्रकृति में लय को प्राप्त होता है, तब उस चित्त के साथ ही ये क्लेश लय हो जाते हैं = विनाश को प्राप्त हो जाते हैं; और चेतन पुरुष, परमात्मा की व्यवस्था में मुक्ति = कैवल्य को प्राप्त कर लेता है।