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Saadhana Paada / Means / 11
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Saadhana Paada / Means / 11

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥११॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 11

In Hindi:

पदपाठ : ध्यानहेयाः तद् वृत्तयः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : स्थितानां तु बीजभावोपगतानाम्—

हिंदी में अर्थ : (बीजभावोपगतानाम्) बीजभाव को प्राप्त हुए = क्रियायोग से तनु = सूक्ष्मावस्था को प्राप्त हुए (तु) परन्तु नष्ट न हुए = दग्धबीजभाव को प्राप्त न हुए (स्थितानाम्) चित्त में वर्त्तमान क्लेशों की —

हिंदी में अर्थ : (तद्वृत्तयः) उन क्लेशों की वृत्तियाँ (ध्यानहेयाः) ध्यान = प्रसंख्यानाग्नि = विवेकख्याति के द्वारा समाप्त करने योग्य हैं॥

व्यास भाष्य : क्लेशानां या वृत्तयः स्थूलास्ताः क्रियायोगेन तनूकृताः सत्यः प्रसंख्यानेन ध्यानेन हातव्या यावत्सूक्ष्मीकृता यावद्दग्धबीजकल्पा इति। यथा च वस्त्राणां स्थूलो मलः पूर्वं निर्धूयते पश्चात् सूक्ष्मो यत्नेनोपायेन चापनीयते तथा स्वल्पप्रतिपक्षाः स्थूला वृत्तयः क्लेशानां सूक्ष्मास्तु महाप्रतिपक्षा इति॥

हिंदी में अर्थ : (क्लेशानाम्) अविद्यादि पाँच क्लेशों की (याः) जो (स्थूलाः) स्थूल = उदारादि अवस्था वाली (वृत्तयः) वृत्तियाँ हैं (ताः) वे (क्रियायोगेन) क्रियायोग के द्वारा (तनूकृताः सत्यः) तनु = सूक्ष्म = निर्बल हो जाने पर (प्रसंख्यानेन ध्यानेन) ध्यानरूपी प्रसंख्यान-अग्नि = विवेकख्याति से (हातव्याः) नाश = समाप्त करने योग्य हैं । कब तक ? (यावत्) जब तक (सूक्ष्मीकृताः) क्लेशों की वृत्तियाँ सूक्ष्मतम हो, और (यावत्) जब तक (दग्धबीजकल्पा इति) दग्धबीज के समान हो जायें। (च) और (यथा) जिस प्रकार (वस्त्राणाम्) वस्त्रों का (स्थूलो मलः) स्थूल मल (पूर्वम्) पहले (निर्धूयते) दूर किया जाता है; (पश्चात्) उस के उपरान्त (सूक्ष्मः) उन वस्त्रों का सूक्ष्म मल (यत्नेन) यत्न से (च) और (उपायेन) विशेष उपाय = साबुन आदि से धोकर (अपनीयते) दूर किया जाता है; (तथा) उसी प्रकार (क्लेशानाम्) अविद्यादि क्लेशों की (स्थूलाः वृत्तयः) स्थूल वृत्तियाँ (स्वल्पप्रतिपक्षाः) स्वल्प प्रयत्न से अर्थात् क्रियायोग द्वारा दूर की जाती हैं; (सूक्ष्माः तु) परन्तु क्लेशों की सूक्ष्म वृत्तियाँ = चित्त में वासना रूप से स्थिति (महाप्रतिपक्षाः इति) महान् प्रयत्न = विवेकख्याति से दूर की जाती हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : क्रियायोग से क्लेशों को सूक्ष्म = निर्बल = तनु किया जाता है। परन्तु जब तक सूक्ष्म हुए-हुए भी ये क्लेश दग्धबीज अवस्था में नहीं पहुँचते, तब तक किसी भी प्रबल आलम्बन के उपस्थित होने पर पुनः उदार अवस्था = कार्यरूप में आ जाते हैं, और पुरुष को क्लिष्ट वृत्ति-क्लिष्ट संस्कार-क्लिष्ट वृत्ति के अनवरत चक्र में डाल देते हैं। अतः मोक्षपथ के साधक को इन क्लेशों को तनु = निर्बल करने के उपरान्त इन्हें दग्धबीज के समान अपने कार्योत्पादन में सर्वथा असक्ष्म कर देना होता है, तभी वह क्लेशों से सर्वथा मुक्त होकर चरमदेह वाला कहलाता है। पूर्वसूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने “ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः” (२.१०) कहा है अर्थात् दग्धबीज भाव को प्राप्त हुए ये क्लेश समाप्त अधिकार वाले चित्त के प्रतिप्रसव द्वारा नाश को प्राप्त हो जाते हैं। इन क्लेशों को दग्धबीजवत् करने की विधि का निर्देश करते हुए कहा है — ध्यान = प्रसंख्यानाग्नि = विवेकख्याति द्वारा उन सूक्ष्म हुए क्लेशों को समाप्त किया जाता है।

यहाँ इस विवेकख्याति को समझना होगा। विवेकख्याति से अभिप्राय है — सत्त्व = प्रकृति और पुरुष का वास्तविक भेदज्ञान, जो योगी को अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चावस्था में प्राप्त होता है। आरम्भ में साधक को वेदादि सत्यशास्त्रों के श्रवण और पठन से इन दोनों के स्वरूप का शाब्दिक ज्ञान प्राप्त कर लेना होता है। परन्तु यह शाब्दिकज्ञान विवेकख्याति का आधार होते हुए भी विवेकख्यातिवत् अपने कार्य को नहीं कर पाता, अर्थात् क्लेशों को दग्धबीज की अवस्था तक नहीं पहुँचा पाता। अब साधक सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधियों में क्रमशः ध्येय विषयों के रूप में प्रकृति और उसके विकारों का साक्षात्कार करता हुआ, चेतन पुरुष के परिज्ञान हेतु अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में पहुँचता है। इस अवस्था में पुरुष रूपी आलम्बन = ध्येय विषय होने से योगी को पुरुष = आत्मा के स्वरूप का साक्षात्कार होता है। इसी की उच्च अवस्था को धर्ममेघ समाधि के नाम से कहा गया है।

इस अवस्था में हुए साक्षात्कार से योगी को जो उत्कृष्ट ज्ञान होता है वही परम प्रसंख्यान = विवेकख्याति है। इस अवस्था में योगी को प्रकृति और पुरुष दोनों का सम्यक् रूप से साक्षात्कार होने पर, प्राप्त हुई विवेकख्याति के बल से पदार्थों का सम्यग्दर्शन होता है, अर्थात् उनका यथार्थ स्वरूप ही प्रकाशित होता है। इसी विवेकख्याति से पुरुष अविद्यादि क्लेशों की सूक्ष्म अवस्थाओं का भी निराकरण कर देता है। अविद्या = विपर्यय ज्ञान = मिथ्याज्ञान तथा अन्यथा ज्ञान का निवारण विद्या = विवेकख्याति द्वारा ही सम्भव होता है। और, अविद्या रूपी माता के निवृत्त हो जाने पर उसकी सन्तान रूप अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश का निवारण भी स्वाभाविक रूप से हो जाता है। अब इस अवस्था वाले ये क्लेश दग्धबीज अवस्था वाले कहे जाते हैं, जो पुनः अङ्कुरित होने में = कार्योत्पादन करने में असमर्थ रहते हैं। (इस अवस्था के बाद संस्कारों की निवृत्ति और सत्त्वादि गुणों के परिणामक्रम की समाप्ति हेतु प्रक्रिया का वर्णन कैवल्यपाद के अन्तिम सूत्रों में किया गया है।)

क्लेशों को इस दग्धबीज वाली अवस्था में लाने के लिए महान् प्रयत्न करना होता है। क्यों ? उदाहरण देते हुए कहा है कि जैसे वस्त्रों में लगे हुए स्थूल मल को हटाने के लिए झाड़ने, पानी में धोने से वह स्थूल मल वस्त्र से दूर हो जाता है; परन्तु वस्त्र में जो सूक्ष्म मल उपस्थित होता है, वह झाड़ने अथवा प्रक्षालन मात्र से दूर नहीं होता। उसे दूर करने के लिए वस्त्रों को तपाना, साबुन आदि का प्रयोग करना पड़ता है जिससे वस्त्रों का सूक्ष्म मल भी दूर हो जाता है। इसी प्रकार क्लेशों को तनु = सूक्ष्म करने के लिए क्रियायोग का विधान है, परन्तु क्रियायोग से सूक्ष्म हुए क्लेश अपने मूल रूप से चित्त में ही विद्यमान रहते हैं और किसी प्रबल आलम्बन के पुनः उपस्थित होने पर पुनः उदारावस्था में आ जाते हैं। अतः इनका पूर्णतया विनाश करने हेतु ध्यान = प्रसंख्यानाग्नि रूपी विवेकख्याति का आश्रय कहा है, जिससे क्लेश दग्धबीजभाव की अवस्था में पहुँचते हैं। इस विवेकख्याति द्वारा ही क्लेशों की निवृत्ति सम्भव होती है। अतः जैसे-जैसे विवेकख्याति सुदृढ़ होगी वैसे-वैसे क्लेशों की सूक्ष्म-वृत्तियाँ भी नष्ट होती जायेंगी। जैसे मात्र श्रवण-पठन से प्रकृति-पुरुष का भेदज्ञान = साक्षात्कार नहीं होता, वैसे ही मात्र क्रियायोग से भी क्लेशों का नाश नहीं होता।