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Saadhana Paada / Means / 12
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Saadhana Paada / Means / 12

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥१२॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 12

In Hindi:

पदपाठ : क्लेशमूलः कर्माशयः दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥

हिंदी में अर्थ : (क्लेशमूलः) अविद्यादि क्लेश जिस के कारण = मूल हैं, ऐसा (कर्माशयः) शुभाशुभ, मिश्रित कर्म समुदाय (दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः) दृष्ट = वर्त्तमान जन्म और अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाला होता है॥

व्यास भाष्य : तत्र पुण्यापुण्यकर्माशयः कामलोभमोहक्रोधप्रभवः। स दृष्टजन्मवेदनीयश्चादृष्टजन्मवेदनीयश्च। तत्र तीव्रसंवेगेन मन्त्रतपःसमाधिभिर्निर्वर्त्तित ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानामाराधनाद्वा यः परिनिष्पन्नः स सद्यः परिपच्यते पुण्यकर्माशय इति। तथा तीव्रक्लेशेन भीतव्याधितकृपणेषु विश्वासोपगतेषु वा महानुभावेषु वा तपस्विषु कृतः पुनः पुनरपकारः स चापि पापकर्माशयः सद्य एव परिपच्यते। यथा नन्दीश्वरः कुमारो मनुष्यपरिणामं हित्वा देवत्वेन परिणतः। तथा नहुषोऽपि देवानामिन्द्रः स्वकं परिणामं हित्वा तिर्यक्त्वेन परिणत इति। तत्र नारकाणां नास्ति दृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशयः। क्षीणक्लेशानामपि नास्त्यदृष्टजन्मवेदनीयः कर्माशय इति॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) इस चित्त में (पुण्यापुण्यकर्माशयः) पुण्य कर्माशय और पाप कर्माशय (कामलोभमोहक्रोधप्रभवः) काम, लोभ, मोह और क्रोध से उत्पन्न होता है। (सः) वह पुण्य और अपुण्य कर्माशय (दृष्टजन्मवेदनीयः च) दृष्टजन्म = वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला और (अदृष्टजन्मवेदनीयः च) अदृष्ट जन्म = भावी जन्मों में फल देने वाला होता है। (तत्र) उन दोनों प्रकार के कर्माशयों में से (तीव्रसंवेगेन) तीव्र संवेग पूर्वक (मन्त्रतपःसमाधिभिः) मन्त्र, तप, समाधि के द्वारा (निर्वर्त्तित) सम्पादित हुआ (वा) अथवा (ईश्वरदेवतामहर्षिमहानुभावानाम्) ईश्वर, देव = विद्वान् = सत्याचरण को करने वाले, महर्षि महानुभावों की (आराधनात्) अराधना = उपासना = सन्निधि से (यः) जो (परिनिष्पन्नः) निष्पन्न = सम्पादित हुआ है (सः) वह (पुण्यकर्माशयः) पुण्य कर्माशय (सद्यः) शीघ्र = वर्त्तमान जन्म में ही (परिपच्यते इति) परिपाक को प्राप्त होता है अर्थात् फल देने वाला होता है। (तथा) उसी प्रकार (तीव्रक्लेशेन) तीव्र क्लेशों = अविद्यादि की प्रबलता से ग्रस्त होकर (भीतव्याधितकृपणेषु) भीत = डरे हुए, व्याधिग्रस्त = रुग्ण तथा कृपण = दयनीय प्राणियों के प्रति; (वा) अथवा (विश्वासोपगतेषु) विश्वास को प्राप्त हुए प्राणियों के प्रति; (वा) अथवा (महानुभावेषु) महानुभाव (तपस्विषु) तपस्वियों के प्रति (पुनः पुनः) बारम्बार (कृतः) किया गया (अपकारः) अपकार = हानि (सः) वह (पापकर्माशयः) पाप कर्माशय (च अपि) भी (सद्यः) शीघ्र (एव) ही (परिपच्यते) फल देने वाला होता है। अर्थात् इस प्रकार का पाप कर्माशय भी वर्त्तमान जन्म में फलदायी होता है। (यथा) जिस प्रकार (नन्दीश्वरः कुमारः) नन्दीश्वर कुमार अपने पुण्य कर्माशय के प्रभाव से (मनुष्यपरिणामम्) मनुष्य परिणाम = मनुष्यत्व को (हित्वा) छोड़कर (देवत्वेन) देव परिणाम = देवत्व को (परिणतः) प्राप्त हुआ। (तथा) उसी प्रकार (नहुषः) नहुष (देवानामिन्द्रः) देवों का राजा इन्द्र (अपि) भी अपने पापकर्माशय के कारण (स्वकम् परिणामम्) अपने उच्च परिणाम देवत्व को (हित्वा) छोड़कर (तिर्यक्त्वेन) तिर्यक् = कुटिल = नीच परिणाम को (परिणतः इति) प्राप्त हुआ।

(तत्र) उन दृष्टजन्मवेदनीय और अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशयों में (नारकाणाम्) नारक = अत्यन्त नीच मानवेतर योनियों को देने वाले, कर्मों को करने वाले मनुष्यों का (कर्माशयः) कर्माशय (दृष्टजन्मवेदनीयः) दृष्ट = वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला (न अस्ति) नहीं होता। और (क्षीणक्लेशानाम्) क्षीण क्लेशों वाले = दग्धबीज क्लेशों वाले जीवन्मुक्त योगियों का (अपि) भी (कर्माशयः) कर्माशय (अदृष्टजन्मवेदनीयः) अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाला (न अस्ति इति) नहीं होता॥

वैदिक योग मीमांसा : महर्षि व्यास सूत्र १.५ के भाष्य में कहते हैं कि अविद्यादि पाँच क्लेशों के कारण से उत्पन्न होने वाली चित्त की वृत्तियाँ, धर्म-अधर्म रूप कर्म सम्बन्धी वासनाओं = कर्म संस्कारों की उत्पत्ति का कारण बनी हुई, क्लिष्ट कहलाती है। इसी प्रकार भोज ने कहा है कि क्लेशों से आक्रान्त हुई वृत्तियाँ क्लिष्ट कहलाती है। चित्त की यही वृत्तियाँ ही वाणी और शरीर के कर्मों में परिवर्तित होती हैं।

अविद्यादि क्लेशों के कारण से बनने वाला कर्माशय मुख्यतया काम, लोभ, मोह और क्रोध रूपी दोषों = विकारों के कारण बनता है। इस प्रकार का कर्माशय, पुण्य और पाप दोनों ही प्रकार का होता है। व्यक्ति इन्हीं भावनाओं से प्रेरित हुआ शुभ, अशुभ और मिश्रित कर्मों को करता है। यथा काम — कामवासना से प्रेरित हुआ मनुष्य ब्रह्मचर्य का नाश, परस्त्रीगमन आदि पाप कर्म करता; कामना से ही प्रेरित हुआ इस लोक और परलोक में, भोग्य पदार्थों की प्राप्ति को ही सुख मान कर, उनकी प्राप्ति हेतु यज्ञ-दानादि पुण्य कर्म भी करता है। लोभवशात् परद्रव्य हरण, चोरी, कपट आदि को करता है। मोह = राग के वश हुआ स्वयं और परिवार के हित पुण्य कर्म भी करता, और अपने परिजनों एवं प्रियजनों को अनाधिकार लाभ पहुँचाने हेतु पाप कर्म भी करता है। इसी प्रकार क्रोध अर्थात् दुष्टों, अधार्मिक प्राणियों पर अधिकारपूर्वक क्रोध करना पुण्य की श्रेणी में, और शेष प्रकार का क्रोध पाप की श्रेणी में आता है।

क्लेशों से आक्रान्त क्लिष्ट वृत्तियों और तदानुसार शरीरिक और वाचिक कर्मों से क्लिष्ट संस्कार और उन्हीं क्लिष्ट संस्कारों से पुनः क्लिष्ट वृत्तियाँ एवं शारीरिक और वाचिक कर्म; और इसी प्रकार से संसारचक्र, जीवमात्र के लिए, चलता रहता है। इसको योगसूत्र १.५ के भाष्य में महर्षि व्यास ने स्पष्ट रूप से कहा है कि क्लिष्ट वृत्तियों से क्लिष्ट संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उन क्लिष्ट संस्कारों द्वारा पुनः उसी प्रकार की क्लिष्ट वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं और इस प्रकार से वृत्ति-संस्कार-वृत्ति रूप च्रक निरन्तर चलता रहता है।

अतः इन काम, लोभ, मोह और क्रोध रूपी विकारों = दोषों के प्रभाव से किये जाने वाले मानसिक-वाचिक-शारीरिक कर्मों से जिस प्रकार का पुण्य-पाप कर्माशय बनता है, उस कर्माशय संस्कारों से प्रभावित व्यक्ति उसी प्रकार की वृत्तियों को पुनः-पुनः अपनाता है; और इस प्रकार से अविद्यादि क्लेशों से प्रभावित वृत्तियों से शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्माशय और उस कर्माशय संस्कारों से पुनः वैसे ही कर्म रूप चक्र की अनवरत गति से पुरुष, जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में लगा हुआ, विभिन्न जातियों = शरीरों, आयु = उन-उन शरीरों में जीवनकाल, और भोगों को प्राप्त करता रहता है।

महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ४.७ में योगियों के अशुक्ल-अकृष्ण कर्म और अन्य मनुष्यों के त्रिविध कर्म कहे हैं। इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास ने — अन्य पुरुषों के कौन से कर्म अशुभ हैं?, कौन से कर्म पूर्णतया शुभ हैं? और कौन से कर्म मिश्रित हैं? इनका स्पष्ट रूप से व्याख्यान किया है। मानव मात्र द्वारा होने वाले इन्हीं कर्मों से ही पुण्य-अपुण्य कर्माशय बनता है, जो कि वर्त्तमान जन्म और भावी जन्मों में फल देने वाला होता है। कौन सा पुण्य अथवा पाप कर्माशय वर्त्तमान जन्म में ही फल देने वाला है ? यह प्रश्न अत्यधिक जटिल है और इसको केवल और केवल मात्र ईश्वर ही जानता है। परन्तु मानव मात्र के कल्याणार्थ कुछ दिशा निर्देश इस सूत्र के भाष्य में महर्षि व्यास ने दिया है।

दृष्ट = वर्त्तमान जन्म में फलदायी होने वाले पुण्य कर्माशय को स्पष्ट करते हुए कहा है —

१. तीव्र संवेग = तीव्र शुभ संस्कारों, अभ्यास और वैराग्य तथा परवैराग्य के प्रभाव से प्रणव, गायत्री आदि मन्त्रों का अनुष्ठान, तप = सत्याचरण तथा समाधि = सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि द्वारा सम्पादित होने वाला कर्माशय; और

२. ईश्वर, देवता और महर्षि महानुभावों की आराधना, सन्निधि से सम्पादित हुआ कर्माशय। यहाँ ईश्वर, देवता और ऋषि से निम्न को लक्षित जानना चाहिए —

— ईश्वर — पूर्वोक्त योगसूत्र १.२४ में कहा गया क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा असम्बद्ध पुरुष विशेष; जोकि वेदादि सत्यशास्त्रों में सच्चिदानन्दादि स्वरूप वाला प्रतिपादित है।

— देवता से अभिप्राय सत्याचरण करने वाला विद्वान् तथा वे विद्वान् हैं जिन्होंने पाप को सर्वथा दूर कर दिया है।

— महर्षि से अभिप्राय मन्त्रार्थ द्रष्टा, तथा दूसरों को मन्त्रार्थ का ज्ञान कराने वाले विद्वानों से है। महर्षि दयानन्द ऋ० १.१.२ की व्याख्या में निरुक्त १.२० का प्रमाण देकर लिखते हैं — यतः साक्षात्कृतधर्माणो धार्मिका आप्ता यैः सर्वा विद्या यथावद्विदिता येऽवरेभ्यो ह्यासाक्षात्कृतवेदेभ्यो मनुष्येभ्य उपदेशेन वेदमन्त्रान् मन्त्रार्थांश्च संप्रादुः = प्रकाशितवन्तस्तस्मात्ते ऋषयो जाताः॥ अर्थात् जिससे साक्षात्कृतधर्मा अर्थात् धार्मिक आप्त लोग जिन्होंने सब विद्याएं यथावत् जान ली हैं और जो अवर अर्थात् जिन्होंने वेदों का साक्षात् नहीं किया है, उन मनुष्यों के लिए उपदेश के द्वारा वेद मन्त्रों और मन्त्रार्थों को प्रकाशित करते थे इसलिए वे ऋषि कहलाए।

उपर्युक्त तीनों में ईश्वर की उपासना तथा देवता और महर्षि महानुभावों की सन्निधि, सत्कार, सेवा से सम्पादित कर्माशय पुण्य कर्माशय कहाता है। इस पुण्य-कर्माशय के दृष्टजन्मवेदनीय होने में उदाहरण देते हुए कहा है कि नन्दीश्वर कुमार ने अपने पुण्य-कर्माशय के प्रभाव से मनुष्यत्व को छोड़कर देवत्व को प्राप्त किया था अर्थात् इसी जन्म में देव संज्ञा को प्राप्त किया था।

वर्त्तमान जन्म में फलदायी होने वाले पाप-कर्माशय को स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं —

१. मनुष्यों द्वारा तीव्र अविद्यादि दोषों के प्रभाव से, भीत = डरे हुए, रोगी, दयनीय, विश्वासपात्र प्राणियों के प्रति किया गया अपकार = हानि; और

२. तपस्वी = धर्म मार्ग पर चलने वाले, सत्याचरण करने वाले महानुभावों के प्रति किया गया बारम्बार अपकार, हानि, पाप कर्म से बना कर्माशय।

इसका उदाहरण देते हुए कहा है कि नहुष जो देवों में श्रेष्ठ = नृप था उसने अपने उपर्युक्त प्रकार के पाप कर्माशय के कारण देवत्व की उपाधि को छोड़कर तिर्यकत्व = नीच = कुटिल मनुष्य वाली संज्ञा को प्राप्त किया था, अर्थात् वह साधारण मनुष्यों से भी नीचे गिर कर विद्वानों के मध्य निन्दा को प्राप्त हुआ।

इस सूत्र की व्याख्या में कुछ भाष्यकारों ने तिर्यक से सर्पादि जाति को लिया है, परन्तु इस प्रकार की जाति परिवर्तन दृष्टजन्म में न होकर अदृष्टजन्म = भावी जन्म में परमात्मा की व्यवस्था में ही सम्भव है। महर्षि व्यास ने भी योगसूत्र २.१३ की व्याख्या में दृष्टजन्म में केवल “द्विविपाकारम्भी वा भोगायुहेतुत्वात्” कहा है अर्थात् दृष्ट जन्म में कर्माशय दो प्रकार के विपाक अर्थात् भोग और आयु को ही प्रदान करने वाला होता है। किसी भी पुरुष की जाति दृष्टजन्म अर्थात् वर्त्तमान जन्म में शरीर छूटने के पश्चात् ही ईश्वर की व्यवस्था में ही बदलती है। महर्षि दयानन्द ने “जाति” की व्याख्या करते हुए कहा है — “जो जन्म से लेकर मरण पर्यन्त बनी रहे, जो अनेक व्यक्तियों में एक रूप से प्राप्त हो, जो ईश्वरकृत अर्थात् मनुष्य, गाय, अश्व और वृक्षादि समूह हैं, जाति शब्दार्थ से लिये जाते हैं।” (आर्योद्देश्यरत्नमाला, ३८)। अतः दृष्टजन्म में जाति परिवर्तन का अभिप्राय मानव शरीर होता हुआ भी मानवेतर प्राणियों के स्वभाव का हो जाना ही मानना चाहिए। इसी तथ्य को महर्षि दयानन्द ने व्यवहारभानु में भी लिखा है “जो मनुष्य होकर भी निर्बलों की रक्षा न कर, पशुवत् उनका हनन करे उसे भी उसी जाति का जानना चाहिए।” अतः उपर्युक्त अर्थ ही उचित है। इस सूत्र पर भोजवृत्ति में प्रक्षेप अथवा सिद्धान्तहानि है; जिसमें दृष्टजन्मवेदनीय में भिन्न जाति की प्राप्ति कही गयी है। यहाँ भी जाति की प्राप्ति को उपरोक्त अर्थों में ही समझना चाहिए। भोजवृत्ति में इस प्रकार का वर्णन देखकर ही सम्भवतः कई भाष्यकारों ने नहुष को दृष्टजन्म में तिर्यक शब्द से सर्पादि जाति की प्राप्ति को कहा है।

जो प्राणी इस मनुष्य शरीर में आकर भी, पाप कर्मों में ही संलग्न रहते, वेदादि सत्यशास्त्रों के सर्वथा प्रतिकूल कर्म करते हुए आत्मा का हनन करते हैं, उनको उनके पापकर्माशय का दुःखरूप फल अन्धकारमय योनियों में, केवल भावी जन्मों में ही मिलता है; क्योंकि जिन योनियों में उस प्रकार के दुःखरूप फलों की प्राप्ति होती है, वह मनुष्य शरीर में सम्भव नहीं होता, अतः उस पापकर्माशय को अदृष्टजन्मवेदनीय कहा है। दूसरी ओर जिन योगियों ने असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक पहुँच कर, अपने क्लेशों को दग्धबीजवत् कर दिया है, उनको अपने कर्माशय का फल इसी जन्म में मिलता है, क्योंकि वे जीवन्मुक्त होने से भावी जन्मों को प्राप्त नहीं करते और वर्त्तमान शरीर छूटने पर मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं।