Donation Appeal Download Our App
Saadhana Paada / Means / 13
Choose Sutra
Saadhana Paada / Means / 13

सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः॥१३॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 13

In Hindi:

पदपाठ : सति मूले तद्विपाकः जात्यायुर्भोगाः॥

हिंदी में अर्थ : (सति मूले) अविद्यादि क्लेश रूप मूल के रहने पर (तद्विपाकः) उस धर्माधर्म रूप कर्माशय का विपाक = फल (जात्यायुर्भोगाः) जाति = जन्म, आयु और भोग होता है॥

व्यास भाष्य : सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः। यथा तुषावनद्धाः शालितण्डुला अदग्धबीजभावाः प्ररोहसमर्था भवन्ति नापनीततुषा दग्धबीजभावा वा, तथा क्लेशावनद्धः कर्माशयो विपाकप्ररोही भवति नापनीतक्लेशो न प्रसंख्यानदग्धक्लेशबीजभावो वेति। स च विपाकस्त्रिविधो जातिरायुर्भोग इति।

तत्रेदं विचार्यते—किमेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणमथैकं कर्मानेकं जन्माऽऽक्षिपतीति? द्वितीया विचारणा—किमनेकं कर्मानेकं जन्म निर्वर्तयत्यथानेकं कर्मैकं जन्म निर्वर्त्तयतीति? न तावदेकं कर्मैकस्य जन्मनः कारणम्। कस्मात्? अनादिकालप्रचितस्यासंख्येयस्यावशिष्टस्य कर्मणः साम्प्रतिकस्य च फलक्रमानियमादनाश्वासो लोकस्य प्रसक्तः, स चानिष्ट इति। न चैकं कर्मानेकस्य जन्मनः कारणम्। कस्मात्? अनेकेषु कर्मस्वेकैकमेव कर्मानेकस्य जन्मनः कारणमित्यवशिष्टस्य विपाककालाभावः प्रसक्तः, स चाप्यनिष्ट इति। न चानेकं कर्मानेकस्य जन्मनः कारणम्। कस्मात्? तदनेकं जन्म युगपन्न संभवतीति क्रमेणैव वाच्यम्। तथा च पूर्वदोषानुषङ्गः।

तस्माज्जन्मप्रायणान्तरे कृतः पुण्यापुण्यकर्माशयप्रचयो विचित्रः प्रधानोपसर्जनभावेनावस्थितः प्रायेणाभिव्यक्त एकप्रघट्टकेन मरणं प्रसाध्य सम्मूर्च्छित एकमेव जन्म करोति। तच्च जन्म तेनैव कर्मणा लब्धायुष्कं भवति। तस्मिन्नायुषि तेनैव कर्मणा भोगः सम्पद्यत इति। असौ कर्माशयो जन्मायुर्भोगहेतुत्वात् त्रिविपाकोऽभिधीयत इति। अत एकभविकः कर्माशय उक्त इति।

दृष्टजन्मवेदनीयस्त्वेकविपाकारम्भी भोगहेतुत्वात् द्विविपाकारम्भी वा भोगायुर्हेतुत्वान्नन्दीश्वरवन्नहुषवद्वेति। क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्वर्तिताभिस्तु वासनाभिरनादिकालसम्मूचि्र्छतमिदं चित्तं विचित्रीकृतमिव सर्वतो मत्स्यजालं ग्रन्थिभिरिवाततमित्येता अनेकभवपूर्विका वासनाः। यस्त्वयं कर्माशय एष एवैकभविक उक्त इति। ये संस्काराः स्मृतिहेतवस्ता वासनास्ताश्चानादिकालीना इति।

यस्त्वसावेकभविकः कर्माशयः स नियतविपाकश्चानियतविपाकश्च। तत्रादृष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्यैवायं नियमो न त्वदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियतविपाकस्य। कस्मात् ? यो ह्यदृष्टजन्मवेदनीयोऽनियतविपाकस्तस्य त्रयी गति:—कृतस्याविपक्वस्य विनाशः, प्रधानकर्मण्यावापगमनं वा, नियतविपाकप्रधानकर्मणाऽभिभूतस्य वा चिरमवस्थानमिति।

तत्र कृतस्याविपक्वस्य नाशो यथा शुक्लकर्मोदयादिहैव नाशः कृष्णस्य। यत्रेदमुक्तम्—“द्वे द्वे ह वै कर्मणी वेदितव्ये पापकस्यैको राशिः पुण्यकृतोऽपहन्ति तदिच्छस्व कर्माणि सुकृतानि कर्त्तुमिहैव ते कर्म कवयो वेदयन्ते”। प्रधानकर्मण्यावापगमनम्। यत्रेदमुक्तम्—“स्यात्स्वल्पः संकरः सपरिहारः सप्रत्यवमर्षः कुशलस्य नापकर्षायालम्। कस्मात्? कुशलं हि मे बह्वन्यदस्ति यत्रायमावापं गतः स्वर्गेप्यपकर्षमल्पं करिष्यति” इति।

नियतविपाकप्रधानकर्मणाऽभिभूतस्य वा चिरमवस्थानम्। कथमिति? अदृष्टजन्मवेदनीयस्यैव नियतविपाकस्य कर्मणः समानं मरणमभिव्यक्तिकारणमुक्तम्, न त्वदृष्टजन्मवेदनीयस्यानियतविपाकस्य। यत्त्वदृष्टजन्मवेदनीयं कर्मानियतविपाकं तन्नश्येदावापं वा गच्छेदभिभूतं वा चिरमप्युपासीत, यावत्समानं कर्माभिव्यञ्जकं निमित्तमस्य न विपाकाभिमुखं करोतीति। तद्विपाकस्यैव देशकालनिमित्तानवधारणादियं कर्मगतिश्चित्रा दुर्विज्ञाना चेति। न चोत्सर्गस्यापवादान्निवृत्तिरित्येकभविकः कर्माशयोऽनुज्ञायत इति॥

हिंदी में अर्थ : (सत्सु क्लेशेषु) उन अविद्यादि क्लेशों के विद्यमान रहने पर ही (कर्माशयः) वह पुण्य-पाप कर्माशय (विपाकारम्भी) फल को प्राप्त कराने वाला (भवति) होता है; (उच्छिन्नक्लेशमूलः) क्लेश रूपी मूल के नष्ट हो जाने पर (न) कर्माशय फल देना आरम्भ नहीं करता। (यथा) जैसे (तुषावनद्धाः) तुष = भूसे से सम्बद्ध = भूसा सहित, और (अदग्धबीजभावाः) जो जले हुए नहीं हैं ऐसे (शालितण्डुला) धान के चावल (प्ररोहसमर्था) उगने = अंकुरित होने में समर्थ (भवन्ति) होते हैं; परन्तु (अपनीततुषा) तुष से रहित (वा) अथवा (दग्धबीजभावा) जले हुए चावल के बीज (न) उगने में समर्थ नहीं होते; (तथा) वैसे ही (क्लेशावनद्धः) अविद्यादि क्लेशों से सम्बद्ध = ढका हुआ (कर्माशयः) कर्माशय (विपाकप्ररोही) फल देने वाला (भवति) होता है; (न अपनीतक्लेशः) न कि क्लेशों से रहित (वा) और (प्रसंख्यानदग्धक्लेशबीजभावः) प्रसंख्यान-अग्नि से दग्धबीजभाव वाला (न इति) कर्माशय फल देने वाला नहीं होता। (च) और (सः) वह = कर्माशय का (विपाकः) फल (जातिरायुर्भोगः) जाति, आयु और भोग रूप (त्रिविधः इति) तीन प्रकार का होता है।

(तत्र) उस कर्मफल के विषय में (इदम्) यह (विचार्यते) विचार किया जाता है — (किम्) क्या (एकम् कर्म) एक कर्म (एकस्य जन्मनः) एक जन्म का (कारणम्) कारण है ? (अथ) अथवा (एकम् कर्म) एक कर्म (अनेकम् जन्म) अनेक जन्मों को (अक्षिपति इति) देता है ? (द्वितीया) दूसरा (विचारणा) विचार यह है — (किम्) क्या (अनेकम् कर्म) अनेक कर्म (अनेकम् जन्म) अनेक जन्मों को (निर्वर्तयति) सिद्ध करते हैं ? (अथ) अथवा (अनेकम् कर्म) अनेक कर्म (एकम् जन्म) एक जन्म को (निर्वर्त्तयति इति) सिद्ध करते हैं = प्राप्त कराते हैं ?

इन चारों पक्षों पर निर्णय करते हैं। पहले पक्ष का निराकरण करते हुए कहते हैं — (तावत्) इस विषय में (एकम् कर्म) एक कर्म (एकस्य जन्मनः) एक जन्म का (न कारणम्) कारण नहीं हो सकता। (कस्मात्) क्यों? क्योंकि (अनादिकालप्रचितस्य) अनादि काल से, अनेक जन्मों से सञ्चित = इकठ्ठे हुए (असंख्येयस्य) असंख्य = अगणित (अवशिष्टस्य) अवशिष्ट = बचे हुए कर्मो का (च) और (साम्प्रतिकस्य) वर्त्तमान = दृष्ट जन्म में किए हुए (कर्मणः) कर्मों के (फलक्रमानियमात्) फल के क्रम का नियम न होने से (लोकस्य) लोक में मनुष्यों को (अनाश्वासः प्रसक्तः) कर्मफल के विषय में अविश्वास हो जायेगा (कि अच्छे कर्म का अच्छा और बुरे कर्म का बुरा फल कब किस काल में मिलेगा, कौन जाने?) (स च) और यह अविश्वास = असन्तोष (अनिष्ट इति) अनिष्टकारक है (शुभकर्मों के होने में अनिष्टकारक है।) अतः यह विचार अभीष्ट नहीं। अब दूसरे पक्ष का निराकरण करते हुए कहते हैं — (न च) और न ही (एकम् कर्म) एक कर्म (अनेकस्य जन्मनः) अनेक जन्मों का (कारणम्) कारण होता है। (कस्मात्) क्यों ? क्योंकि (अनेकेषु कर्मसु) अनेक कर्मों में से (एकैकम् एव कर्म) एक-एक ही कर्म (अनेकस्य जन्मनः) अनेक जन्मों का (कारणम् इति) कारण होने से तो (अवशिष्टस्य) अवशिष्ट = शेष अभुक्त कर्मों का (विपाककालाभावः प्रसक्तः) फल प्रदान के काल का अभाव प्राप्त होगा। (स च) और वह (अपि) भी (अनिष्ट इति) पूर्ववत् अनिष्टकारक है।

अब तृतीय पक्ष का निराकरण करते हुए कहते हैं — (च) और (अनेकम् कर्म) अनेक कर्म (अनेकस्य जन्मनः) अनेक जन्मों के (न कारणम्) कारण नहीं हो सकते। (कस्मात्) क्यों ? क्योंकि अनेक कर्मों से होने वाले (तत्) वे (अनेकम् जन्म) अनेक जन्म (युगपत्) एक साथ (न संभवति) सम्भव नहीं = प्राप्त नहीं हो सकते। (इति) इस कारण (क्रमेण एव) क्रम से ही (वाच्यम्) कहना चाहिए। अर्थात् एक कर्म से एक जन्म; दूसरे से दूसरा जन्म ...... आदि। (तथा च) और इस प्रकार भी (पूर्वदोषानुषङ्गः) पूर्व दोष की प्राप्ति हुई।

अब सिद्धान्त पक्ष का प्रतिपादन = निर्णय करते हैं — (तस्मात्) इसलिए (जन्मप्रायणान्तरे) जन्म और मरण के मध्य में (कृतः) किया हुआ जो (विचित्रः) विचित्र = विभिन्न प्रकार का (पुण्यापुण्यकर्माशयप्रचयः) पुण्य = धर्मरूप, अपुण्य = पापरूप कर्माशय है, वह सब (प्रधानोपसर्जनभावेन) प्रधान = मुख्य भाव से और गौण भाव से (अवस्थितः) अवस्थित = स्थित होता हुआ (प्रायेणाभिव्यक्तः) मरण से = मरण के प्रकार से अभिव्यक्त हुआ (एकप्रघट्टकेन) एक समुदाय के रूप में संघटित होकर (मरणम् प्रसाध्य) मरण को सम्पन्न करके (सम्मूर्च्छित) क्रियाशील = सम्यक् प्रकार से गतिशील हुआ, फल प्राप्ति हेतु जीव = पुरुष को, (एकम् एव) एक ही (जन्म) जन्म को (करोति) प्रदान करता है। (तत् च जन्म) और वह जन्म (तेनैव कर्मणा) उसी कर्म = कर्माशय के द्वारा (लब्धायुष्कम्) प्राप्त आयु वाला = जीवनकाल वाला (भवति) होता है। (तस्मिन् आयुषि) उसी आयु में (तेनैव कर्मणा) उसी कर्म = कर्माशय के द्वारा (भोगः) भोग = सुख-दुःख प्रदान करने वाले साधन एवं सुख-दुःखादि भोग (सम्पद्यते इति) सम्पन्न होता है। (असौ कर्माशयः) वह पुण्य-अपुण्य कर्माशय (जन्मायुर्भोगहेतुत्वात्) जन्म, आयु और भोग का कारण होने से (त्रिविपाकः) तीन प्रकार के फलों वाला (अभिधीयते इति) कहा गया है। (अतः) इसलिए (एकभविकः) एकभविक = “एक जन्म को देने वाला” (कर्माशयः) कर्माशय (उक्तः इति) कहा गया है।

(दृष्टजन्मवेदनीयः) वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला कर्माशय (तु) तो (भोगहेतुत्वात्) भोग का हेतु होने से (एकविपाकारम्भी) एक विपाक = फल को देने वाला होता है; (वा) अथवा (भोगायुर्हेतुत्वात्) भोग और आयु का हेतु होने से (द्विविपाकारम्भी) दो विपाकों = फलों को देने वाला होता है, जैसे कि (नन्दीश्वरवत्) नन्दीश्वर के समान (वा) अथवा (नहुषवत् इति) नहुष के समान।

(क्लेशकर्मविपाकानुभवनिर्वर्तिताभिः तु) अविद्यादि क्लेशों, शुभाशुभ कर्म और उनके फलों के अनुभवों से निष्पादित (वासनाभिः) वासनाओं के द्वारा (अनादिकालसम्मूचि्र्छतम्) अनादि काल से ग्रस्त = सम्बद्ध (इदम् चित्तम्) यह चित्त (सर्वतः) सब ओर से = सर्वथा (विचित्रीकृतम् इव) चित्रित हुआ जैसा रहता है जैसे (मत्स्यजालम्) मछली पकड़ने वाला जाल (ग्रन्थिभिः) ग्रन्थियों से (आततम् इव इति) व्याप्त हुआ जैसा होता है; (अतः) इसी प्रकार (एताः वासनाः) ये वासनाएँ (अनेकभवपूर्विकाः) अनेक जन्मों की सञ्चित हुई हैं। (यः तु) किन्तु जो (अयम् कर्माशयः) यह कर्माशय है (एष एव) वह ही (एकभविकः) एकभविक = एक जन्म वाला (उक्तः इति) कहा गया है। (ये संस्काराः) जो संस्कार (स्मृतिहेतवः) स्मृति के हेतु = उत्पादक हैं (ताः वासनाः) वे वासनाएँ हैं (च) और (ताः) वे वासनाएँ (अनादिकालीनाः इति) अनादि कालीन हैं।

(यः तु असौ) और जो यह (एकभविकः कर्माशयः) एकभविक = एक जन्म को देने वाला कर्माशय है (सः) वह (नियतविपाकः च) नियतविपाक = निश्चित फल वाला और (अनियतविपाकः च) अनियतविपाक = अनिश्चित फल वाला होता है। (तत्र) उन दोनों प्रकार के कर्माशयों में से (अयम् नियमः) यह एकभविक नियम (अदृष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्य एव) अदृष्ट = भावी जन्म में फल देने वाले नियतविपाक वाले कर्माशय का है; (तु) परन्तु (अदृष्टजन्मवेदनीयस्य अनियतविपाकस्य) अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाले अनियतविपाक वाले कर्माशय का (न) नहीं है। (कस्मात् ?) क्यों ? (हि) क्योंकि (यः) जो (अदृष्टजन्मवेदनीयः अनियतविपाकः) अनियतविपाक वाला अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाला कर्माशय है (तस्य) उसकी (त्रयी गतिः) तीन प्रकार की गतियाँ होती हैं — (१) (कृतस्य अविपक्वस्य) किए हुए और अविपक्व = बिना फल दिए कर्माशय का (विनाशः) नाश हो जाना; (अर्थात् बहुत लम्बे काल तक बिना फल दिए सञ्चित रहना — यथा मोक्ष की अवधि तक कर्माशय का दबा रहना।) (२) (वा) अथवा (प्रधानकर्मणि) किसी प्रधान कर्म के विपाक = फल काल में (आवापगमनम्) आवाप रूप = बीजरूप से मिलकर फलोन्मुख होना; (३) (वा) अथवा (नियतविपाकप्रधानकर्मणाः) नियत विपाक वाले प्रधान कर्म से (अभिभूतस्य) अभिभूत हुए = दबे हुए (चिरम्) चिर काल = लम्बे काल तक (अवस्थानम् इति) अवस्थित रहना = बिना फल दिए बना रहना। (तत्र) उन तीन गतियों में —

(१) (कृतस्य) किए हुए और (अविपक्वस्य) बिना फल दिए ही कर्माशय का (नाशः) नाश होना (यथा) जैसे (शुक्लकर्मोदयात्) शुक्ल = पुण्य कर्मों के उदय होने = बढ़ने से (कृष्णस्य) कृष्ण = पाप कर्मों का (इह एव) इस ही जन्म में (नाशः) नाश हो जाना। (यत्र इदम्) जिसके विषय में (उक्तम्) कहा गया है — “(द्वे द्वे ह वै कर्मणि) दो-दो प्रकार के कर्मों को (वेदितव्ये) जानना चाहिए — एक शुक्लरूप पुण्य कर्म और दूसरा कृष्णरूप पाप कर्म। उनमें से (पापकस्य) अपुण्य = पाप रूप कर्मों को, (पुण्यकृतः एकः राशिः) पुण्य कर्मों = तप, वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय और ध्यानादि का समूह = बाहुल्य, (अपहन्ति) नष्ट करता है; (तत्) इसीलिए हे पुरुष! (सुकृतानि कर्माणि) सुकृत = पुण्य कर्मों को (इह एव) इसी वर्त्तमान जन्म में ही (कर्त्तुम् इच्छस्व) करने की इच्छा करो, (कवयः) क्रान्तिदर्शी = ऋषि, मुनि (ते) तुम्हारे लिए (कर्म) पुण्य कर्मों को (वेदयन्ते) बताते हैं॥”

(२) कर्माशय की दूसरी गति — (प्रधानकर्मणि) प्रधान कर्मों में (आवापगमनम्) गौण = अप्रधान कर्मों का सम्मिलित होना। (यत्र इदम्) उसके विषय में इस प्रकार (उक्तम्) कहा है —“पाप कर्मों का पुण्य कर्मों में (स्वल्पः) थोड़ा सा (संकरः) मिश्रण (स्यात्) हो जाए तो उसका दुःखरूप फल (सपरिहारः) परिहार = दूर करने और (सप्रत्यवमर्षः) सहन करने योग्य होने से (कुशलस्य) कुशल = पुण्य कर्मों को करने वाले विद्वान् के शुभ कर्मों को (अपकर्षाय) दबाने में (न अलम्) समर्थ नहीं होता। (कस्मात्) क्यों ? (हि) क्योंकि पुण्य कर्मों को करने वाला विद्वान् यह चिन्तन करता है कि (कुशलम् मे) मेरे पुण्य रूपी कर्म (बहु अन्यद् अस्ति) दूसरे बहुत अधिक हैं (यत्र) जिसमें (आवापम् गतः) मिला हुआ, बीजरूप को प्राप्त हो फलोन्मुख होने वाला (अयम्) यह पाप कर्म (स्वर्गेऽपि) पुण्य कर्माशय के सुखरूप फल में (अल्पम्) बहुत थोड़ी (अपकर्षम्) हानि (करिष्यति इति) करेगा — अर्थात् सुख के साथ-साथ थोड़ा सा दुःख सहनीय होगा।”

(३) जो कर्माशय की तीसरी गति है (नियतविपाकप्रधानकर्मणाः) नियतविपाक वाले प्रधान कर्म से (अभिभूतस्य) दबे हुए (चिरम्) बहुत काल पर्यन्त (अवस्थानम्) स्थित रहना। (कथम् इति) यह किस प्रकार होता है ? (अदृष्टजन्मवेदनीयस्य नियतविपाकस्य) अदृष्टजन्मवेदनीय नियत विपाक = फल वाले (कर्मणः एव) कर्मों की ही (समानम्) एक साथ होने वाली (अभिव्यक्तिकारणम्) अभिव्यक्ति का कारण (मरणम्) मरण = मृत्यु को (उक्तम्) कहा गया है; (अदृष्टजन्मवेदनीयस्य अनियतविपाकस्य) अदृष्टजन्मवेदनीय अनियतविपाक वाले कर्मों की (न तु) अभिव्यक्ति मरण से नहीं होती। (यत् तु) और जो तो (अदृष्टजन्मवेदनीयम् अनियतविपाकम्) अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाले अनियतविपाक वाले (कर्मः) कर्म हैं (तत्) वे (नश्येत्) नष्ट हो जाते हैं, (वा) अथवा (आवापम् गच्छेत्) किसी अन्य प्रधान कर्म के साथ बीजरूप से अङ्कुरित = फलोन्मुख हो जाते हैं, (वा) अथवा (अभिभूतम्) दबे हुए (चिरम् अपि उपासीत्) चिर काल पर्यन्त फलोन्मुख होने हेतु पड़े रहते हैं (यावत्) जब तक कि (अस्य) इसका (अभिव्यञ्जकम्) अभिव्यञ्जक = प्रकाशक (निमित्तम्) निमित्त = कारणभूत (समानम्) समान = अविरुद्ध (कर्म) कर्म इसको (विपाकाभिमुखम्) फल देने को अभिमुख (न करोति इति) नहीं करता। और (तद्विपाकस्य) उस (तीसरे प्रकार के) कर्माशय के फल के (देशकालनिमित्तानवधारणात्) देश, काल, निमित्त के अनिश्चिय से (एव) ही (इयम्) यह (कर्मगतिः) कर्मफल रूपी गति (चित्रा) विचित्र (च) और (दुर्विज्ञानाः इति) कठिनता से जानने योग्य है। परन्तु (अपवदात्) उपरोक्त प्रकार का अपवाद होने से (उत्सर्गस्य) सामान्य नियम = एकभविक नियम की (न च निवृत्तिः) निवृत्ति नहीं होती (इति) इसलिए (एकभविकः) एकभविक = एक जन्म देने वाला (कर्माशयः) कर्माशय (अनुज्ञायते इति) स्वीकार किया जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : जीवात्मा = पुरुष अविद्या के कारण प्रकृति के संयोग को प्राप्त होता, और इसी अविद्या के कारण ही उसके कर्माशय के आधार पर उसको जाति, आयु और भोग रूपी फल ईश्वर की व्यवस्था में मिलते हैं। इसी अविद्या रूपी क्लेश के कारण ही, पुरुष अनन्त काल से अपने पुण्यापुण्य कर्माशय के फलस्वरूप विभिन्न प्रकार की योनियों = शरीरों = जातियों (जन्मों) को प्राप्त करता रहा है, उन जातियों में उन-उन शरीरों के अनुकूल आयु और भोगों को भी प्राप्त करता रहा है, जिसके परिणामस्वरूप वह विभिन्न प्रकार के सुख-दुःखों को प्राप्त करता रहा है। ईश्वरीय व्यवस्था में सभी प्रकार के सुख-दुःख उसके पुण्यापुण्य कर्माशय के आधार पर ही मिलते हैं।

कर्माशय का फल प्राप्त होने में अविद्या की सत्ता का होना अनिवार्य नियम है, जिसको महर्षि व्यास ने इस प्रकार कहा है — सत्सु क्लेशेषु कर्माशयो विपाकारम्भी भवति नोच्छिन्नक्लेशमूलः। अतः जिस योगी ने वर्त्तमान जीवन में अविद्यादि क्लेशों को नष्ट कर दिया है, असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक पहुँच कर इन्हें दग्धबीजवत् कर दिया है, उसका कर्माशय उसे आगे फल प्रदान करने में समर्थ नहीं होता। जैसे कि जिस चावल की भूसी उतर गई हो अथवा अग्नि से जल गया हो, वह पुनः उगने में समर्थ नहीं होता, परन्तु भूसी के साथ और बिना जला हुआ चावल पृथिवी में बोने पर पुनः अङ्कुरित हो जाता है। उसी प्रकार अविद्यादि क्लेशों के रहने पर ही कर्माशय फल को प्राप्त कराता है, अविद्यादि क्लेशों के दग्धबीजवत् होने पर कर्माशय फल प्रदान करने में असमर्थ रहता है। परन्तु जिस कर्माशय का फल मिलना आरम्भ हो चुका है वह फल, अविद्यादि क्लेशों के नष्ट होने = दग्धबीजवत् होने पर भी, मध्य में रुकता नहीं है, अर्थात् उसका जीवनकाल तत्काल समाप्त नहीं होता। यदि ऐसा न माना जाए तो योगी द्वारा क्लेशों को दग्धबीजवत् करते ही उसके वर्त्तमान शरीर का वियोग होकर उसे मुक्ति की प्राप्ति हो जाए। परन्तु जीवन्मुक्तों का होना इस सिद्धान्त को ही सिद्ध करता है।

आगे का व्याख्यान समझने से पूर्व “कर्म” को समझना चाहिए। कर्म की व्याख्या करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं — “जो मन, इन्द्रिय और शरीर में जीव चेष्टा विशेष करता है, सो कर्म कहाता है। वह शुभ, अशुभ और मिश्र भेद से तीन प्रकार का है।” (आर्योद्देश्यरत्नमाला, ४८) अतः मन, वाणी और शरीर से होने वाले कर्म क्रमशः मानसिक कर्म, वाचिक कर्म और शारीरिक कर्म कहाते हैं; धर्म-अधर्म के सन्दर्भ में कर्म शुभ, अशुभ और मिश्रित तीन प्रकार का है।

इस पुण्यापुण्य कर्माशय का फल जाति, आयु और भोग रूप में मिलता है। महर्षि व्यास ने एक कर्म से एक जन्म; एक कर्म से अनेक जन्म; अनेक कर्मों से अनेक जन्मों की प्राप्ति की अवधारणाओं का, दोष दिखला कर निराकरण किया है; और अन्त में अनेक कर्मों से एक जन्म प्राप्ति को सिद्धान्त रूप से स्थापित किया हैं। एक कर्म से एक जन्म मानने पर, एक ही मनुष्य शरीर में असंख्यात मानसिक, वाचिक और शरीर कर्म हो जाने से, अनादि काल से सञ्चित कर्माशय का और वर्त्तमान काल में होने वाले कर्मों की फल प्राप्ति का अवसर ही न जाने कब आयेगा! ऐसे में शुभ कर्मों को करने में बड़ी बाधा होगी क्योंकि मनुष्यों को उस पुण्य कर्माशय की फल प्राप्ति पर ही अविश्वास होगा। इसी प्रकार वर्त्तमान में किये जाने वाले पाप कर्मों के सम्बन्ध में भी यह धारणा बनेगी कि न जाने कब इसका फल मिलेगा, अभी तो इस पापकर्म से अपने स्वार्थ पूर्ण कर लो, लाभों को उठा लो। ऐसे में जब पूर्व में किए असंख्य कर्मों का फल अभी शेष है तो वर्त्तमान के शुभ और अशुभ कर्मों का फल तो उसके बाद ही होगा और फल प्राप्ति का नियम न होने से मानव समाज में अनवस्था और असन्तोष उत्पन्न होगा जो कि अनिष्टकारी माना गया है। इसी प्रकार द्वितीय पक्ष अर्थात् एक कर्म से अनेक जन्मों का सिद्धान्त तो इससे भी अधिक अनिष्टकारक होगा, अर्थात् जब एक कर्म से एक जन्म मानने पर अनवस्था होती है, तो एक कर्म से अनेक जन्म मानने पर तो भंयकर अनवस्था हो जायेगी। तृतीय पक्ष — अनेक कर्मों से अनेक जन्म भी अपेक्षित नहीं क्योंकि अनेक जन्म क्रमशः ही प्राप्त होगें। अतः अर्थापत्ति से यही आयेगा कि एक कर्म से पहला जन्म, दूसरे कर्म से दूसरा जन्म ........ आदि। इस पक्ष में पहले पक्ष के समान दोष होने से यह भी अनिष्टकारक है।

सिद्धान्त पक्ष के रूप में महर्षि व्यास कहते हैं कि जन्म और मृत्यु के मध्य होने वाले मन, वाणी और शरीर से किए हुआ धर्म और अधर्म रूपी कर्माशय, प्रधान और गौण भाव से संग्रहीत होता हुआ, मरण के प्रकार से अभिव्यक्त होकर, संघटित रूप से क्रियाशील होकर पुरुष के लिए अगले जन्म को प्राप्त कराता है। अतः अगले जन्म का निर्धारण उसके बहुसंख्य प्रधान कर्माशय से होता है। उस जन्म में उन्हीं कर्मों के आधार पर ही आयु = जीवनकाल की प्राप्ति होती है, और उस आयु में उन्हीं कर्मों के आधार पर ही भोगों की भी प्राप्ति होती है। इस प्रकार यह कर्माशय तीन प्रकार के फलों को प्रदान करने वाला होता है।

यहाँ यह शंका होती है कि क्या इस जन्म में पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर ही उसकी आयु निश्चित होती है और उसे प्राप्त होने वाले भोग भी निश्चित होते हैं? अर्थात् क्या सभी प्रकार के सुख और दुःख की प्राप्ति उसे पूर्व जन्मों के कर्माशय के आधार पर ही मिलते हैं ? यह भ्रान्ति व्यासभाष्य को पूर्णतया न समझने के कारण से है। महर्षि व्यास ने आगे स्पष्ट रूप से कहा है कि दृष्टजन्मेवदनीय कर्मों से आयु और भोग की प्राप्ति वर्त्तमान जन्म में भी होती है। अतः मात्र पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर ही आयु और भोग निश्चित नहीं होते।

कर्माशय को दृष्टजन्मवेदनीय = वर्त्तमान जन्म में फल देने वाला और अदृष्टजन्मवेदनीय = भावी जन्मों में फल देने वाला कहा है। वर्त्तमान जन्म में कृत कर्माशय से एक फल अर्थात् भोग, अथवा दो फलों आयु और भोग की प्राप्ति होती है। जैसे कि अपने वर्त्तमान जन्म में कृत पुण्य कर्माशय के आधार पर नन्दीश्वर कुमार को आयु और श्रेष्ठ भोगों की प्राप्ति हुई; और वर्त्तमान जन्म में कृत अपुण्य कर्माशय के आधार पर नहुष को निकृष्ट = दुःख प्रदान करने वाले भोगों की प्राप्ति हुई। परन्तु वर्त्तमान जन्म में कर्मफल के रूप में नवीन जाति का मिलना सम्भव नहीं होता, क्योंकि वह तो शरीर वियोग के पश्चात् ही मिलती है।

कर्माशय को एक भविक = एक जन्म देनेवाला कहा है। परन्तु यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि अगला जन्म मिलते ही पूर्व सञ्चित पूरा का पूरा कर्माशय ही भुक्त हो गया। इस विषय में महर्षि व्यास कहते हैं कि अदृष्ट = भावी जन्मों में फल देने वाला कर्माशय नियतविपाक = निश्चित फल और अनियतविपाक = अनिश्चित फल वाला होता है। जो वर्त्तमान जन्म में प्रधानरूप से सञ्चित हुआ नियतविपाक वाला पुण्यापुण्य कर्माशय है, वही पुरुष को अगला जन्म प्राप्त कराता है। परन्तु इस प्रकार से प्राप्त होने वाला जन्म, और उस जन्म में आयु = जीवनकाल के भोग और प्राप्त भोगों से पूर्व सञ्चित हुए कर्माशय में से कौन सा कर्मसमूह भुक्त हो गया और शेष कौन सा अभुक्त रह गया यह जानना किसी भी पुरुष = जीवात्मा के लिए सम्भव नहीं है; इस व्यवस्था को केवल और केवल मात्र परमात्मा ही जानता है। इसप्रकार से प्राप्त हुए अगले जन्म में भी शरीर वियोग होने पर जो अभुक्त कर्माशय की स्थिति होगी, उसके आधार पर ही पुरुष = जीवात्मा को उससे भी अगला जन्म ईश्वर की व्यवस्था में मिलता है; और यही क्रम अनन्त काल से पुरुष = जीवात्मा के साथ चला आ रहा है। इसी क्रम के कारण ही पुरुष संसारचक्र = जन्म-मृत्यु रूपी चक्र में लगा हुआ सुख-दुःखों को प्राप्त कर रहा है। इस प्रकार से प्राप्त होने वाले जन्मों हेतु सामान्य नियम को महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश में इस प्रकार से कहते हैं —

“जब पाप बढ़ जाता, पुण्य न्यून होता है, तब मनुष्य का जीव पश्वादि नीच शरीर और जब धर्म अधिक और अधर्म न्यून होता है, तब देव अर्थात् विद्वानों का शरीर मिलता है। और जब पुण्य-पाप बराबर होता है तब साधारण मनुष्य जन्म होता है। इसमें भी पुण्य-पाप के उत्तम, मध्यम और निकृष्ट होने से मनुष्यादि में भी उत्तम, मध्यम और निकृष्ट शरीरादि सामग्री वाले होते हैं। और अधिक पाप का फल पश्वादि शरीर में भोग लिया है, पुनः पुण्य-पाप के तुल्य रहने से मनुष्य शरीर में आता, और पुण्य के फल भोगकर फिर भी मध्यस्थ मनुष्य के शरीर में आता है।” (सत्यार्थप्रकाश नवम् समुल्लास)

दूसरा जो अदृष्टजन्मवेदनीय अनियतविपाक वाला कर्माशय है, उसकी तीन प्रकार की गति बतायी गयी है —

१. किये हुए कर्मों का बिना फल दिये ही नाश हो जाना। यह नियम सामान्य नहीं है। वस्तुतः वे योगी जिन्होंने वर्त्तमान जीवन में, प्रकृति-पुरुष भेद = सत्वपुरुषान्यताख्याति को प्राप्त कर और असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार कर अपने क्लेशों को दग्धबीजवत् कर दिया है, वे ही जीवन्मुक्त कहलाते हैं और शरीर-वियोग के पश्चात् मोक्ष के अधिकारी होते हैं। वे वर्त्तमान शरीर को छोड़ने के पश्चात् देवयान् मार्ग का अनुसरण करते हुए मोक्ष को प्राप्त होते हैं। अतः ऐसे पुरुषों का अभुक्त कर्माशय मोक्ष की अवधि में फल देने में समर्थ नहीं होता। ऐसे योगी के लिए ही अनियतविपाक वाले कर्माशय का नाश होना कहा गया है।

कर्माशय के नाश से यहाँ सर्वथा नाश = बिना फल दिए ही नष्ट होने का अभिप्राय नहीं है। क्यों? क्योंकि ईश्वरीय व्यवस्था में किसी भी जीवात्मा का कर्माशय फल को प्रदान किए बिना नष्ट नहीं होता। “नश्यति” पद “णश् अदर्शने” (दिवादिगण) धातु (४.८२) से सिद्ध होता है जिसका अर्थ — दिखाई न देना है। अतः कर्मों का अदर्शन ही उसका नाश है। अतः मोक्ष काल में कर्माशय का अदर्शन होने से उस कर्माशय का उस अवधि के लिए नाश कहा गया है। परन्तु मोक्ष की अवधि समाप्त होने पर पुरुष को इसी अभुक्त कर्माशय के आधार पर पुनः जाति, आयु और भोग की प्राप्ति ईश्वरीय व्यवस्था में होती है। ऋग्वेद में इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है —

अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थमस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ ना॑म।

स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात्पित॒रं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥ ऋ० १.२४.२॥

अर्थ — हम लोग जिस ज्ञान स्वरूप विनाश धर्म रहित पदार्थ वा मोक्ष प्राप्त जीवों में अनादि विस्तृत अद्वितीय स्वरूप सब जगत् के प्रकाश करने वा संसार में सब पदार्थों के देने वाले परमेश्वर का पवित्र गुणों का गान करना जानते हैं वही हमकों बड़े-बड़े गुण वाली पृथिवी के बीच में फिर जन्म देता है जिससे हम लोग फिर पिता और माता और स्त्री पुत्र बन्धु आदि को देखते हैं।

भावार्थ — हे मनुष्यों ! हम लोग जिस अनादि स्वरूप सदा अमर रहने वा जो हम सब लोगों के किए हुए पाप और पुण्यों के अनुसार यथायोग्य सुखदुःख फल देने वाले जगदीश्वर देव को निश्चय करते और जिसकी न्याययुक्त व्यवस्था से पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं तुम लोग भी उसी देव को जानो किन्तु इससे और कोई उक्त कर्म करने वाला नहीं है ऐसा निश्चय हम लोगों को है कि वही मोक्ष पदवी को पहुँचे हुए जीवों का भी महाकल्प के अन्त में फिर पाप-पुण्य की तुल्यता से पिता माता और स्त्री आदि के बीच में मनुष्य जन्म धारण कराता है। (महर्षि दयानन्द सरस्वती)

शास्त्रकारों ने कर्मों को प्रवाह से अनादि कहा है, अतः मोक्ष काल में अदर्शन ही उनका नाश है। महर्षि व्यास द्वारा दिया गया उदाहरण भी इसको और पुष्ट करता है कि वर्त्तमान जन्म में पुण्य कर्माशय के उदय से = बढ़ने से पाप कर्माशय क्षीण होकर नष्ट हो जाता है, और कहा भी है कि पुण्य कर्मों का बाहुल्य = प्रधानता, पाप और मिश्रित कर्माशय को नष्ट करता है। अतः वर्त्तमान जन्म में निष्काम होकर पुण्य कर्मों को करने की इच्छा करो यही वेद का, ऋषियों का उपदेश मानव मात्र के लिए है। इस प्रकार से नष्ट हुआ पाप कर्माशय पुण्य कर्मों और उसके सुखरूप फल को रोकने में असमर्थ रहता है।

२. अनियतविपाक वाले कर्माशय की दूसरी गति यह है कि इस कर्माशय का किसी अन्य प्रधान कर्म के साथ मिलकर अङ्कुरित होना = फल प्रदान करना। इस प्रकार से प्राप्त होने वाला अपुण्य = पाप और मिश्रित कर्मों का दुःखरूप फल, प्रधान पुण्य कर्माशय के साथ मिलकर प्राप्त होने से, पुण्य कर्त्ता विद्वान् को न तो अधिक दुःखदायी होता और न ही वह फल उसे धर्म-मार्ग से विचलित करने में समर्थ होता हैं। पुण्य करने वाला विद्वान् यह चिन्तन करता है कि मेरे पुण्य कर्माशय के सुखफलों की, पाप कर्माशय का यह दुःखरूप फल, थोड़ी ही हानि करेगा और इसप्रकार वह ऐसे कर्मों को आगे भी पुनः करने से बचता है। इस प्रकार से पुण्य कर्माशय के फल के साथ पाप कर्माशय का फल भी थोड़ा-थोड़ा होकर भोग लिया जाता है और पुण्य कर्त्ता विद्वान् धर्म मार्ग से भी च्युत नहीं होता। और यदि यह स्थिति विपरीत हो, अर्थात् थोड़ा सा पुण्य कर्माशय बहुसंख्य प्रधान अपुण्य कर्माशय के दुःख रूपी फलों के मध्य में थोड़े से सुखफल को प्राप्त कराए तो वह सुख, दुःखों के मध्य सम्यक् प्रकार से अनुभूत भी नहीं हो पायेगा और पुण्य-कर्माशय भोग भी लिया जायेगा, यह स्थिति किसी प्रकार भी लाभदायक नहीं होगी।

३. कर्माशय की तीसरी गति यह है कि ऐसा कर्माशय नियतविपाक वाले प्रधान कर्माशय से दबा हुआ बहुत काल पर्यन्त स्थित रहता है। ऐसा कर्माशय या तो उपर्युक्त दोनों प्रकार में से किसी एक गति को प्राप्त होता है, अथवा जब तक कोई तत्काल प्रभाव वाला अथवा कोई समान कर्म प्रकाशक = निमित्त उपस्थित होकर, उसको फलोन्मुख नहीं करता, तब तक ऐसा कर्माशय चिरकाल पर्यन्त स्थित रहता है। इस अनियतविपाक वाले अदृष्टजन्मवेदनीय कर्माशय के फल के देश, काल और निमित्त के अनिश्चय के कारण ही कर्म गति को विचित्र और कठिनता से जानने योग्य माना गया है। इसको निश्चित रूपेण केवल और केवल मात्र ईश्वर ही जानता और वह ही सभी जीवों को अपनी व्यवस्था में उनके कृत कर्माशय के फल को यथायोग्य भुगवाता है।

परन्तु उपर्युक्त प्रकार के अनिश्चय के बाद भी कर्माशय का सामान्य नियम स्थिर है अर्थात् जाति, आयु और भोग रूप में कर्माशय एकभविक ही है अर्थात् कोई भी कर्म अथवा कर्म-समूह फलप्रदान हेतु एक ही बार प्रयुक्त होता है। किस प्रकार के कर्माशय का किस-किस प्रकार का सम्भावित फल होता है, इसका विस्तार से वर्णन मनुस्मृति के १२वें अध्याय में उपलब्ध होता है, इसके विशेष ज्ञान हेतु इसे वहीं देखें।

साधक को कर्माशय और क्लेश, कर्म और उसके विपाक से बनने वाले संस्कारों में अन्तर को समझ लेना चाहिए अन्यथा वृत्ति निरोध सम्भव ही नहीं हो पायेगा। पुरुष का शुभ-अशुभ कर्माशय एक बार फल देकर समाप्त हो जाता है। यह कर्माशय कभी भी अनन्त फलों को देने वाला नहीं होता। अतः इसे एक भविक = एक जन्म को देने वाला कहा गया है। दूसरी ओर अविद्यादि क्लेशों, शुभ-अशुभ मिश्रित कर्मों और उनके फलों के भोग से बने वासना रूपी संस्कार अनादि काल से चित्त में उपस्थित रहते हैं। इसी कारण महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.५ की व्याख्या में वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को कहा है। चाहे कर्माशय एक बार फल प्रदान करके नष्ट हो जाता हो परन्तु इसी वृत्ति-संस्कार-वृत्ति के अनादि चक्र के कारण ही हिंसादि वितर्कों का दुःख-अज्ञान रूपी अनन्त फल कहा है।