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Saadhana Paada / Means / 14
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Saadhana Paada / Means / 14

ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥१४॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 14

In Hindi:

पदपाठ : ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥

हिंदी में अर्थ : (ते) वे जाति, आयु और भोग (पुण्यापुण्यहेतुत्वात्) पुण्य और अपुण्य कर्मों के कारण उत्पन्न होने से (ह्लादपरितापफलाः) ह्लाद = सुख और परिताप = दुःख रूप फल वाले होते हैं॥

व्यास भाष्य : ते जन्मायुर्भोगाः पुण्यहेतुकाः सुखफला अपुण्यहेतुका दुःखफला इति। यथा चेदं दुःखं प्रतिकूलात्मकमेवं विषयसुखकालेऽपि दुःखमस्त्येव प्रतिकूलात्मकं योगिनः॥

हिंदी में अर्थ : (ते) वे (जन्मायुर्भोगाः) जन्म, आयु = जीवन काल और भोग = भोग्य पदार्थ जो (पुण्यहेतुकाः) पुण्य कर्मों के कारण से होने वाले हैं वे (सुखफलाः) सुखरूप फल वाले हैं; और जो (अपुण्यहेतुकाः) अपुण्य कर्मों के कारण से होने वाले हैं वे (दुःखफलाः इति) दुःख रूप फल वाले हैं। (यथा च) और जैसे (इदम्) यह (दुःखम्) दुःख (प्रतिकूलात्मकम्) प्रतिकूल = अप्रिय होता है (एवम्) वैसे ही (विषयसुखकालेऽपि) पुण्य कर्म जन्य प्राप्त विषय-भोगों से सुख का अनुभव करते हुए भी (योगिनः) योगी को सुख भी (प्रतिकूलात्मकम्) प्रतिकूल = अप्रिय होने से (दुःखम्) दुःख रूप (अस्ति एव) ही होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : पुरुष को मिलने वाले जाति, आयु और भोग उसके सञ्चित पुण्यापुण्य कर्माशय के आधार पर होते हैं। मनुष्य द्वारा सञ्चित पुण्य कर्माशय से मिलने वाले जाति, आयु और भोग, सुख रूपी फल को प्राप्त कराते हैं, और उसके द्वारा सञ्चित पाप कर्माशय के आधार पर मिलने वाले जाति, आयु और भोग, दुःखों को प्राप्त कराते हैं। पुण्य कर्माशय, ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल, वेदादि सत्यशास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों के अनुकूल, सृष्टि क्रम के अनुकूल एवं सत्यानुकूल कर्मों को करने से सञ्चित होता है; और इनसे विपरीत कर्मों से अपुण्य कर्माशय सञ्चित होता है। पुण्य कर्मों से सुखप्राप्ति और अपुण्य कर्मों से दुःखप्राप्ति रूपी सिद्धान्त सामान्य मनुष्यों को पुण्य कर्मों की ओर प्रेरित करने के लिए परमावश्यक है।

परन्तु योगी को तो यह सिद्धान्त भी अभीष्ट नहीं है। क्यों ? क्योंकि महर्षि गौतम न्याय दर्शन में दुःख का कारण जन्म को कहते हैं —

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः॥ न्याय० १.१.२॥

जन्म हेतु तो जीव को गर्भवास के दुःखों को सहना ही होता है, चाहे फिर प्राप्त होने वाला जन्म पुण्य कर्मों के कारण से विद्वान्, ऋषिकुल में ही क्यों न हो! सात्त्विक, पुण्य कर्माशय से श्रेष्ठ कुलों में जन्म लेकर, भोग सम्पन्न होकर सब प्रकार के सुखों को भोगना, उस भोग काल में, चाहे सुखप्रद प्रतीत हो रहा हो, परन्तु उस सुख भोग में भी परिणाम दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख तो मिश्रित ही हैं। और फिर पुण्य कर्माशय से सुख भोग के बाद पुण्य कर्माशय के क्षीण होने पर पुनः दुःख की प्राप्ति होगी ही; पुण्य लोकों में शुभ कर्मों को भोगने के बाद पुनः मनुष्य शरीर की प्राप्ति तो सभी शास्त्रों में मानी गई है। फिर इस जीवन में भी क्या सभी सुख साधनों से भी युक्त = सम्पन्न प्राणी पूर्णतया सुखी ही हैं? अतः महर्षि कपिल ने कहा है —

कुत्रापि कोऽपि सुखी न॥ सांख्य ६.७॥

किसी भी स्थान पर, कोई भी मनुष्य सुखी नहीं है। और —

तदपि दुःखशबलमिति दुःखपक्षे निःक्षिपन्ते विवेचकाः॥ सांख्य ६.८॥

इस जीवन में प्राप्त होने वाला सुख भी दुःखमिश्रित है, ऐसा जानकर विवेकी = योगी उस सुख को भी दुःखकोटि में रखते हैं यथा विषमिश्रित अन्न ग्रहण करने योग्य नहीं होता उसी प्रकार दुःखमिश्रित सुख भी योगियों के लिए त्याज्य रहता है।

उस पुण्य कर्माशय से प्राप्त होने वाले सुखों में भी कौन-कौन सा दुःख किस-किस प्रकार से मिश्रित = सम्मिलित है, इसकी व्याख्या अगले सूत्र में की गई है।