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Saadhana Paada / Means / 15
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Saadhana Paada / Means / 15

परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः॥१५॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 15

In Hindi:

पदपाठ : परिणामतापसंस्कारदुःखैः गुणवृत्तिविरोधात् च दुःखम् एव सर्वम् विवेकिनः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : कथं तदुपपद्यते —

हिंदी में अर्थ : (तत्) सुख भोग काल में भी योगी द्वारा दुःख की प्रतीति (कथम्) कैसे (उपपद्यते) सिद्ध होती है ?—

हिंदी में अर्थ : (परिणामतापसंस्कारदुःखैः) परिणाम दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख से (च) और (गुणवृत्तिविरोधात्) सत्त्व, रज और तम गुणों की वृत्तियों में परस्पर विरोध होने से (विवेकिनः) योगी के लिए (सर्वम्) सभी लौकिक सुख भी (दुःखम् एव) दुःखमय ही हैं॥

व्यास भाष्य : सर्वस्यायं रागानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनः सुखानुभव इति तत्रास्ति रागजः कर्माशयः। तथा च द्वेष्टि दुःखसाधनानि मुह्यति चेति द्वेषमोहकृतोऽप्यस्ति कर्माशयः। तथा चोक्तम् — “नानुपहत्य भूतान्युपभोगः सम्भवतीति हिंसाकृतोऽप्यस्ति शारीरः कर्माशय” इति। विषयसुखञ्चाविद्येत्युक्तम्।

या भोगेष्विन्द्रियाणां तृप्तेरुपशान्तिस्तत्सुखम्। या लौल्यादनुपशान्तिस्तद् दुःखम्। न चेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्ण्यं कर्तुं शक्यम्। कस्मात्? यतो भोगाभ्यासमनु विवर्धन्ते रागाः कौशलानि चेन्द्रियाणामिति। तस्मादनुपायः सुखस्य भोगाभ्यास इति। स खल्वयं वृश्चिकविषभीत इवाशीविषेण दष्टो यः सुखार्थी विषयानुवासितो महति दुःखपङ्के निमग्न इति। एषा परिणामदुःखता नाम प्रतिकूला सुखावस्थायामपि योगिनमेव क्लिश्नाति।

अथ का तापदुःखता? सर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानुभव इति। तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः। सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते। ततः परमनुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचिनोति। स कर्माशयो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते।

का पुनः संस्कारदुःखता? सुखानुभवात्सुखसंस्काराशयो दुःखानुभवादपि दुःखसंस्काराशय इति। एवं कर्मभ्यो विपाकेनुभूयमाने सुखे दुःखे वा पुनः कर्माशयप्रचय इति।

एवमिदमनादि दुःखस्रोतो विप्रसृतं योगिनमेव प्रतिकूलात्मकत्वादुद्वेजयति। कस्मात्? अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानिति। यथोर्णातन्तुरक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति न चान्येषु गात्रावयवेषु। एवमेतानि दुःखान्यक्षिपात्रकल्पं योगिनमेव क्लिश्नन्ति नेतरं प्रतिपत्तारम्। इतरं तु स्वकर्मोपहृतं दुःखमुपात्तमुपात्तं त्यजन्तं त्यक्तं त्यक्तमुपाददानमनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या समन्ततोऽनुविद्धमिवा-विद्यया हातव्या एवाहंकारममकारानुपातिनं जातं जातं बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्तास्त्रिपर्वाणस्तापा अनुप्लवन्ते। तदेवमनादिना दुःखस्रोतसा व्युह्यमानमात्मानं भूतग्रामं च दृष्ट्वा योगी सर्वदुःखक्षयकारणं सम्यग्दर्शनं शरणं प्रपद्यत इति।

गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः। प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपा बुद्धिगुणाः परस्परानुग्रहतन्त्री भूत्वा शान्तं घोरं मूढं वा प्रत्ययं त्रिगुणमेवारभन्ते। ‘चलञ्च गुणवृत्त’-मिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम्। रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुध्यन्ते। सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्त्तन्ते। एवमेते गुणा इतरेतराश्रयेणोपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्ययाः सर्वे सर्वरूपा भवन्तीति। गुणप्रधानभावकृतस्त्वेषां विशेष इति। तस्माद् दुःखमेव सर्वं विवेकिन इति।

तदस्य महतो दुःखसमुदायस्य प्रभवबीजमविद्या। तस्याश्च सम्यग्दर्शनमभावहेतुः। यथा चिकित्सा- शास्त्रं चतुर्व्यूहम् — रोगो रोगहेतुरारोग्यं भैषज्यमिति। एवमिदमपि शास्त्रं चतुर्व्यूहमेव। तद्यथा — संसारः संसारहेतुर्मोक्षो मोक्षोपाय इति। तत्र दुःखबहुलः संसारो हेयः। प्रधानपुरुषयोः संयोगो हेयहेतुः। संयोगस्याऽऽत्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम्। हानोपायः सम्यग्दर्शनम्। तत्र हातुः स्वरूपमुपादेयं वा हेयं वा न भवितुमर्हतीति। हाने तस्योच्छेदवादप्रसङ्गः, उपादाने च हेतुवादः। उभयप्रत्याख्याने शाश्वतवाद इत्येतत्सम्यग्दर्शनम्॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वस्य) सभी प्राणियों को (अयम्) यह जो (चेतनाचेतनसाधनाधीनः) चेतन = स्त्री, पुत्र, बन्धु, मित्र, पशु आदि और अचेतन = गृह, सम्पत्ति आदि साधनों के अधीन होने वाले (सुखानुभवः) सुख का अनुभव है, वह (रागानुविद्धः इति) राग से परिपूर्ण = युक्त है; अतः (तत्र) वहाँ = उस सुखानुभूति में (रागजः) राग जनित (कर्माशयः) कर्माशय (अस्ति) होता = बनता है। (तथा च) और उसी प्रकार (दुःखसाधनानि) दुःख साधनों, सुख के विरोधी साधनों के प्रति (द्वेष्टि) द्वेष करता है (च) और (मुह्यति) सुख साधनों के प्रति अविद्यावशात् मोह करता है, (इति) इस प्रकार (द्वेषमोहकृतः) द्वेष और मोह जन्य (अपि) भी (कर्माशयः) कर्माशय (अस्ति) बनता है। (तथा च) और जैसे कि (उक्तम्) कहा है — (भूतानि) भतों = प्राणियों को (अनुपहत्य) पीड़ा दिए बिना (उपभोगः) सुख का उपभोग (न सम्भवति) सम्भव नहीं होता (इति) इसलिए (हिंसाकृतः) हिंसा जन्य = हिंसा से होने वाला (अपि) भी (शारीरः) शरीर कर्म जन्य = शरीर से सम्बद्ध (कर्माशयः इति) कर्माशय (अस्ति) होता = बनता है। (च) और (विषयसुखम्) विषयों से होने वाले सुख को (अविद्या इति उक्तम्) अविद्या कहा गया है।

(या) जो (भोगेषु) भोगों = लौकिक सुखों में (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों की (तृप्तेः) तृप्ति से, तृष्णा की (उपशान्तिः) उपशान्ति = उसका बुझ जाना है (तत्) वह (सुखम्) सुख है। और (या) जो (लौल्यात्) इन्द्रियों की चञ्चलता के कारण (अनुपशान्तिः) तृप्ति न होना = शान्ति न होना है (तत्) वह (दुःखम्) दुःख है। (च) और (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों को (भोगाभ्यासेन) विषय भोगों के अभ्यास = निरन्तर सेवन से (वैतृष्ण्यम्) तृष्णा रहित (कर्तुम्) करना (न शक्यम्) सम्भव नहीं है। (कस्मात्) क्यों ? (यतः) क्योंकि (भोगाभ्यासम् अनु) भोगों को भोगने के पश्चात् (रागाः) उन भोगों के प्रति राग (च) और (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों की (कौशलानि) कुशलता (विवर्धन्ते इति) बढ़ती जाती है। (तस्मात्) इसलिए (भोगाभ्यासः) भोगों का अभ्यास = निरन्तर सेवन (सुखस्य) सुख का (अनुपायः इति) उपाय नहीं है। (यः) जो (विषयानुवासितः) विषयों की वासना से युक्त हुआ (सुखार्थी) सुख चाहने वाला है (सः) वह (खलु अयम्) निश्चय रूपेण मानों (वृश्चिकविषभीतः) बिच्छु के विष से भयभीत हुआ (आशीविषेण) सर्प से (दष्टः) डसे हुए पुरुष के (इव) समान (महति) महान् (दुःखपङ्केः) दुःख रूपी कीचड़ में (निमग्नः इति) निमग्न हो जाता है। (एषा) यह (परिणामदुःखता नाम) परिणामदुःखता (सुखावस्थायाम्) विषय सुख के भोग काल की अवस्था में (अपि) भी (प्रतिकूलाः) प्रतिकूल = दुःखरूप होती हुई (योगिनम् एव) योगी = विवेकी को ही (क्लिश्नाति) कष्ट, क्लेश देती है।

(अथ) अब (तापदुःखता) तापदुःखता (का) क्या है? (सर्वस्य) सब प्राणियों को (चेतनाचेतनसाधनाधीनः) चेतन = स्त्री, पुत्र, बन्धु आदि और अचेतन = गृह, सम्पत्ति आदि साधनों से प्राप्त होने वाला (तापानुभवः) ताप = दुःख का अनुभव (द्वेषानुविद्धः) द्वेष रूपी क्लेश से युक्त रहता है। (इति) इसलिए (तत्र) उससे (द्वेषजः) द्वेषजन्य = द्वेष से उत्पन्न (कर्माशयः) कर्माशय (अस्ति) होता = बनता है। (च) और (सुखसाधनानि) सुख के साधनों की (प्रार्थयमानः) कामना करता हुआ पुरुष (कायेन वाचा मनसा च) शरीर, वाणी और मन से (परिस्पन्दते) चेष्टा = प्रयत्न करता है, (ततः) उस चेष्टा के फलस्वरूप (परम्) अन्य किसी प्राणी को (अनुगृह्णाति) अनुगृहीत करता है, (च) और अन्य किसी प्राणी को (उपहन्ति) पीडि़त करता है = मारता है; (इति) इस प्रकार (परानुग्रहपीडाभ्याम्) दूसरे प्राणियों की अनुग्रह और पीड़ा रूपी चेष्टाओं = कर्मों से (धर्माधर्मौ) धर्म और अधर्म का (उपचिनोति) सञ्चय = संग्रह करता है। (च) और (सः) वह (कर्माशयः) कर्माशय (लोभात्) लोभ के कारण (च) और (मोहात्) मोह के कारण (भवति) होता = बनता है। (इति) इस प्रकार (एषा) यह (तापदुःखता) तापदुःखता (उच्यते) कही जाती है।

(पुनः) और फिर (संस्कारदुःखता) संस्कारदुःखता (का) क्या है ? (सुखानुभवात्) सुख के अनुभव से (सुखसंस्काराशयः) सुखसंस्कारों की वासना और (दुःखानुभवात्) दुःख के अनुभव से (अपि) भी (दुःखसंस्काराशयः) दुःख-संस्कारों की वासना (इति) बनती है। (एवम्) इस प्रकार (कर्मभ्यः) कर्मों के (विपाके) फल = जाति, आयु और भोग रूप फलों के (अनुभूयमाने) अनुभव किये जाने पर (सुखे दुःखे वा) सुख अथवा दुःख से (पुनः) फिर (कर्माशयप्रचयः) कर्माशय संस्कारों का सञ्चय = संग्रह होता है (इति) यह संस्कारदुःखता है।

(एवम्) इस प्रकार (इदम्) यह (अनादि) अनादि काल से चल रहा (विप्रसृतम्) विस्तृत हुआ (दुःखस्रोतः) दुःख का प्रवाह (योगिनम्) योगी को (एव) ही (प्रतिकूलात्मकत्वात्) प्रतिकूल होने से (उद्वेजयति) उद्विग्न = संतप्त करता है। (कस्मात्) क्यों, किस प्रकार योगी को ही संतप्त करता है ? (हि) क्योंकि (विद्वान्) विवेकी पुरुष = योगी (अक्षिपात्रकल्पः इति) नेत्र गोलक के समान होते हैं। (यथाः) जैसे (ऊर्णातन्तुः) ऊन का पतला रेशा भी (अक्षिपात्रे) नेत्र गोलक में (न्यस्तः) पड़ा हुआ = डाला हुआ (स्पर्शेन) स्पर्श मात्र से ही (दुःखयति) दुःख देता है; (च) और (अन्येषु गात्रावयवेषु) शरीर के अन्य अवयवों में डाला = पड़ा हुआ (न) दुःख नहीं देता। (एवम्) इस प्रकार (एतानि दुःखानि) ये पूर्वोक्त प्रकार के दुःख (अक्षिपात्रकल्पम्) अक्षिपात्र = नेत्र गोलक के समान (योगिनम् एव) योगी को ही, सुख भोग काल में भी, (क्लिश्नन्ति) क्लेश = दुःख देते हैं। (इतरम्) अन्य सामान्य (प्रतिपत्तारम्) ज्ञाताओं, भोक्ताओं को (न) नहीं। (इतरम्) अन्य मनुष्यों को (तु) तो (उपात्तम् उपात्तम्) बार-बार प्राप्त होने वाले (स्वकर्मोपहृतम् दुःखम्) अपने कर्मों के फलस्वरूप से उपार्जित दुःख को भोगकर (त्यजन्तम्) छोड़ते हुए और (त्यक्तम् त्यक्तम्) बार-बार त्यागे हुए उन्हीं दुःखों को फिर (उपाददानम्) ग्रहण करते हुए (अनादिवासनाविचित्रया चित्तवृत्त्या) अनादि काल से संग्रहीत हुए वासना संस्कारों से चित्रित चित्त वृत्ति के द्वारा, (समन्ततः अनुविद्धम् इव) सब ओर से मानों बिंधे हुए, (हातव्या एव) त्याग करने योग्य पदार्थों में ही (अविद्यया) अविद्या के कारण (अहंकारममकारानुपातिनम्) अहंकार और ममता से ग्रस्त हुए = अनुगत हुए और (जातम् जातम्) बार-बार जन्म लेने वाले जीवों को (बाह्याध्यात्मिकोभयनिमित्ताः) बाह्य और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के कारणों से उत्पन्न होने वाले (त्रिपर्वाणः) तीन पर्वों = भेदों वाले (तापाः) ताप = दुःख अर्थात् परिणाम, ताप और संस्कार दुःख (अनुप्लवन्ते) प्राप्त होते रहते हैं। (तदेवम्) इस कारण से (अनादिना) प्रवाह से अनादि (दुःखस्रोतसा) दुःख स्रोत से (आत्मानम्) अपने आप को (च) और (भूतग्रामम्) समस्त प्राणियों को (व्युह्यमानम्) घिरे हुए (दृष्ट्वा) देखकर (योगी) योगी पुरुष (सर्वदुःखक्षयकारणम्) सब दुःखों के नाश के कारण = उपाय (सम्यग्दर्शनम्) सम्यग्दर्शन = सम्यग्ज्ञान = तत्त्वज्ञान अर्थात् प्रकृति-पुरुष साक्षात्कार की (शरणम्) शरण को (प्रपद्यते इति) प्राप्त होता है।

(च) और (गुणवृत्तिविरोधात्) सत्त्व, रज और तम गुणों की वृत्तियों = स्वभावों के परस्पर विरोधी होने से भी (विवेकिनः) विवेकी पुरुष = योगी पुरुष के लिए (सर्वम् दुःखम् एव) सब जगत् = प्रकृति जन्य दृश्य, अदृश्य जगत् दुःखरूप ही है। क्योंकि (प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिरूपाः) प्रख्या = प्रकाश = ज्ञान, प्रवृत्ति = क्रिया और स्थिति रूपी स्वभाव वाले (बुद्धिगुणाः) बुद्धि (चित्त) के अवभूत तीन सत्त्च, रज और तम गुण (परस्परानुग्रहतन्त्रीभूत्वा) परस्पर मिलकर = सहायक होकर (शान्तम्) सुखमय, (घोरम्) दुःखमय (वा) तथा (मूढम्) मोह, विषाद रूप (त्रिगुणम् एव) तीन गुणों वाले (प्रत्ययम्) ज्ञान को (आरभन्ते) आरम्भ = उत्पन्न करते हैं। (च) और यह ज्ञान स्थिर नहीं रहता क्योंकि (गुणवृत्तम्) गुणों का कार्य (चलम् इति) चञ्चल = अस्थिर होता है। अतः (चित्तम्) चित्त को (क्षिप्रपरिणामि) शीघ्र ही परिणाम को प्राप्त होने वाला (उक्तम्) कहा गया है। चित्त के (रूपातिशयाः) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य अथवा अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य गुणों का आधिक्य (च) और (वृत्त्यतिशयाः) शान्त, घोर और मूढ रूपी वृत्तियों का आधिक्य (परस्परेण) परस्पर एक दूसरे से (विरुध्यन्ते) विरुद्ध होता है।(अर्थात् धर्म की अतिशयता में अतिशय अधर्म नहीं रहेगा, ज्ञान की अतिशयता में अतिशय अज्ञान नहीं रहेगा, आदि) (तु) किन्तु (सामान्यानि) इन गुणों की सामान्य दशाएँ एक दूसरे की (अतिशयैः) उत्कृष्ट दशाओं के (सह) साथ (प्रवर्त्तन्ते) प्रवृत्त = वर्त्तमान रहती हैं। (एवम्) इस प्रकार (एते) ये (गुणाः) सत्त्वादि गुण (इतरेतराश्रयेण) एक दूसरे के आश्रय से (उपार्जितसुखदुःखमोहप्रत्ययाः) सुख, दुःख और मोह की अनुभूति = प्राप्ति कराने वाले होते हैं। (इति) इस लिए (सर्वे) सभी प्रकृति के पदार्थ (सर्वरूपाः) सुख, दुःख और मोह रूपों वाले (भवन्ति) होते हैं। इन पदार्थों के सुखात्मक, दुःखात्मक और मोहात्मक होने का बोध पृथक् रूप से कैसे होता है ? इस पर कहते हैं — (तु) किन्तु (एषाम्) इन गुणों की (विशेषः) विशेष = भेदरूप प्रतीति (गुणप्रधानभावकृतः इति) उन गुणों के गौण भाव तथा प्रधान भाव के कारण होती है। (तस्मात्) इसलिए (विवेकिनः) विवेकी = योगी के लिए (सर्वम्) सभी प्राकृतिक पदार्थ (दुःखम् एव इति) दुःखमय ही हैं।

(तत् अस्य) तो इस (महतः) महान् (दुःखसमुदायस्य) दुःख समूह का (प्रभवबीजम्) मूलकारण = उत्पत्ति कारण (अविद्या) अविद्या है। (च) और (तस्याः) उस अविद्या को (अभावहेतुः) दूर करने का साधन = उपाय (सम्यग्दर्शनम्) पदार्थों के साक्षात्कार से हुआ यथार्थ ज्ञान = यथार्थ बोध है। (यथा) जैसे (चिकित्साशास्त्रम्) चिकित्साशास्त्र (रोगः) रोग, (रोगहेतुः) रोग का कारण, (आरोग्यम्) रोग की निवृत्ति और (भैषज्यम्) औषध (इति) इन (चतुर्व्यूहम्) चार अंगों वाला है। (एवम्) वैसे ही (इदम् अपि शास्त्रम्) यह योग शास्त्र भी (चतुर्व्यूहम् एव) चार अंगों वाला ही है। (तद्यथा) वह जैसे (संसारः) संसार, (संसारहेतुः) संसार का कारण, (मोक्षः) मोक्ष = कैवल्य, और (मोक्षोपायः इति) मोक्ष का उपाय। (तत्र) इन चारों में से (दुःखबहुलः) दुःखबहुल (संसारः) संसार (हेयः) हेय है। (प्रधानपुरुषयोः) प्रकृति और पुरुष का (संयोगः) संयोग (हेयहेतुः) हेयहेतु = संसार का कारण है। (संयोगस्य) इस प्रकृति-पुरुष संयोग की (आत्यन्तिकी निवृत्तिः) अत्यन्त = पूर्णरूपेण निवृत्ति (हानम्) मोक्ष है। और (सम्यग्दर्शनम्) सम्यक्दर्शन = पदार्थों के साक्षात्कार से हुआ यथार्थ ज्ञान = विवेकख्याति (हानोपायः) हान = मोक्ष का उपाय है।

(तत्र) उनमें से (हातुः) हान करने वाले = संसार का त्याग करने वाले पुरुष का (स्वरूपम्) अपना स्वरूप (उपादेयम् वा हेयम् वा) उपादेय = ग्रहण करने योग्य और हेय = त्याग करने योग्य (न) नहीं (भवितुम् अर्हति इति) हो सकता। (हाने) पुरुष के स्वरूप का हान = त्याग मानने में (तस्य) पुरुष के (उच्छेदवादप्रसङ्गः) उच्छेद = नाश का प्रसंङ्ग आता है, (च) और (उपादाने) इसके स्वरूप की प्राप्ति को मोक्ष मानने में (हेतुवादः) हेतुवाद = कारणवाद का प्रसङ्ग होगा (अर्थात् आत्मा का स्वरूप किसी कारण से प्राप्त होने वाला होने से आत्मा कार्य होगा, फलस्वरूप आत्मा अनित्य सिद्ध होगा)। और (उभयप्रत्याख्याने) इन दोनों पक्षों = हान और उपादान का अस्वीकार करने पर (शाश्वतवादः) पुरुष का नित्यत्व सिद्ध होगा (इति एतत्) इस पुरुष के शाश्वत स्वरूप को जानना ही (सम्यग्दर्शनम्) पुरुष का सम्यग्दर्शन = यथार्थ ज्ञान है॥

वैदिक योग मीमांसा : जीवात्मा = पुरुष को पुण्य कर्माशय के आधार पर सुखदायक कर्मफल के रूप में श्रेष्ठ जाति, आयु और भोग की प्राप्ति होती है; और पुरुष इस श्रेष्ठ जन्म में आकर, सर्वथा भोगसम्पन्न होकर ईश्वरीय व्यवस्था में सुख का भोग भी अपने जीवन काल में करता है। परन्तु इन सुखों में छिपे हुए दुःखों को वह अनुभव नहीं कर पा रहा होता। दूसरी ओर योगी पुरुष = विवेकी पुरुष को संसार में प्राप्त होने वाले सुखों में विभिन्न प्रकार के दुःखों का मिश्रण स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा होता है। अतः वह इन दुःख मिश्रित सुखों को विषमिश्रित अन्न के समान त्याज्य जानता है।

जो प्राणी अपने कर्मानुसार दुःखों को भोग रहे हैं, उनके लिए तो दुःख है ही; परन्तु सुख काल में भी दुःखों की प्रतीति सामान्य मनुष्य को न होकर योगी को ही क्यों होती है ? क्योंकि योगी को “अक्षिपात्रकल्प” = नेत्रगोलक के समान कहा है। ऊन का पतला मुलायम रेशा, अथवा मकड़ी के जाले का एक सूत्र अथवा मिट्टी का एक कण, शरीर के किसी भी अङ्ग को स्पर्श से = रगड़ से दुःख नहीं देता; परन्तु जब वह नेत्र में पड़ जाए तो स्पर्श मात्र से दुःख दायी होता है। और जब तक उसे नेत्र गोलक से बाहर न निकाला जाए तब तक पुरुष को चैन नहीं होता, उसे कष्ट बना रहता है। इसी प्रकार योगी पुरुष भी सभी प्रकार के लौकिक सुखों में तीन प्रकार के दुःखों को देखता = जानता है। ये तीन प्रकार के दुःख, परिणाम दुःख, ताप दुःख और संस्कार दुःख है तथा गुणवृत्ति विरोध से तो सभी पदार्थ ही दुःखमय है।

परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों को समझने हेतु कुछ मूलभूत स्थितियों को समझना आवश्यक है, जिनको महर्षि व्यास ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है —

१. रागज कर्माशय :— पुरुष को चेतन प्राणियों यथा स्त्री, पुत्र, मित्र, बन्धु और पशु आदि और अचेतन पदार्थों गृह, सम्पत्ति आदि के सम्बन्ध से विभिन्न प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है; अतः वह इनमें राग रखता है। इस राग के कारण किए जाने वाले मानसिक, वाचिक और शरीरिक कर्मों के कारण से बनने वाला कर्माशय रागज-कर्माशय कहाता है। इस राग के ही कारण वह शुभ, अशुभ और मिश्रित भेद से तीनों प्रकार के कर्मों को करता है। यथा राग के कारण ही धर्मानुष्ठान करता; राग के कारण ही उपर्युक्त चेतन-अचेतन साधनों की अन्यायपूर्वक वृद्धि और समृद्धि हेतु अधर्म का भी अनुष्ठान करता है।

२. द्वेषज कर्माशय :— उपर्युक्त चेतन-अचेतन साधनों के उपभोग में बाधकों, विरोधी साधनों से, सुख भोग में व्यवधान होने अथवा दुःख होने की सम्भावना में अथवा स्थिति में, द्वेष करता है। इस द्वेष के कारण उन बाधकों और विरोधी साधनों / प्राणियों के प्रति अधर्म करता हैै। इस द्वेष के कारण बनने वाला कर्माशय द्वेषज-कर्माशय कहाता है।

३. मोहजन्य कर्माशय :— उपर्युक्त चेतन-अचेतन साधनों में अविद्यावशात् इनकी वृद्धि को अपनी वृद्धि और इनके क्षय को अपना क्षय मानता हुआ, इनसे मोह भी करता है। इस मोह के कारण बनने वाला कर्माशय मोहज = मोहजन्य-कर्माशय कहाता है।

४. हिंसाजन्य कर्माशय :— महर्षि व्यास कहते हैं कि दूसरे प्राणियों को पीड़ा = कष्ट दिए बिना सुखों का उपभोग सम्भव नहीं होता। अतः सुखभोग हेतु दूसरे प्राणियों को किसी भी प्रकार से पीड़ा = कष्ट पहुँचने से बनने वाला कर्माशय हिंसाजन्य-कर्माशय कहाता है। दूसरे प्राणियों को यह पीड़ा मुख्यता शरीरिक कर्म जन्य होती है अर्थात् शरीर से दूसरे प्राणियों को कष्ट, पीड़ा, हिंसा, वध आदि से यह हिंसाजन्य-कर्माशय बनता है।

यथा मनुस्मृति में कहा है —

पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः।

कण्डनी चोदकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन्॥ मनु॰ ३.६८॥

अर्थात् चूल्हा, चक्की, झाडू, ओखली तथा पानी का घड़ा गृहस्थियों के ये पाँच हिंसा के स्थान हैं जिनको प्रयोग में लाते हुए गृहस्थी व्यक्ति हिंसा के पापों से बंध जाता है।

जब सामान्य जीवन में अनिवार्य उपभोग हेतु भी हिंसा हो जाती है, तो विशेष सुखों की प्राप्ति में और भी अधिक हिंसा का अनुमान किया जा सकता है।

५. सुख-दुःख :— लौकिक सुख क्या है ? पुरुष की तृष्णा का = इच्छा का, इन्द्रियों की तृप्ति से शान्त हो जाना सुख है; और इन्द्रियों की चञ्चलता के कारण तृप्ति का न होना दुःख है।

अब उपर्युक्त परिभाषाओं के सन्दर्भ में तीन प्रकार दुःखों को समझेंगे —

१. परिणामदुःख :— जो विषय वर्त्तमान काल में, भोग के समय सुख को प्राप्त कराते हैं, वे ही परिणामस्वरूप दुःख को प्राप्त कराते हैं। क्योंकि इस सुखभोग काल में रागजन्य, द्वेषजन्य, मोहजन्य, हिंसाजन्य कर्माशय किसी न किसी रूप में बनता ही है, और इस प्रकार से बने हुए कर्माशयों का सुख परिणाम किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं होता। अतः सभी सुखों में परिणामतः दुःख ही छिपा है, और इसकी प्राप्ति सभी सुख भोग करने वाले प्राणियों को कालान्तर में होती है।

पुनः विषय-भोगों के अभ्यास = निरन्तर सेवन से भी तृष्णा की शान्ति होना सम्भव नहीं होता। क्योंकि इस प्रकार से विषय-भोगों के निरन्तर सेवन से इन्द्रियों की भोगों के प्रति कुशलता बढ़ती जाती है, और साथ ही साथ इन भोगों के प्रति राग की भी वृद्धि होती जाती है। इस प्रकार इन भोगों के प्रति राग वृद्धि से पुनः भोगों की प्राप्ति की कामना होती है, और यह क्रम भी निरन्तर चलता रहता है। और इस प्रकार रागज-कर्माशय बढ़ता रहता है। भर्तृहरि ने इस विषय में बहुत सुन्दर कहा है —

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।

कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः। (वैराग्यशतक, ७)

अर्थात् भोगों का भोग पूरा नहीं हुआ, किन्तु हम भी भुग गए; तपश्चरण तो किया नहीं, किन्तु आध्यात्मिक आदि त्रिविध दुःखों से हम ही तप्त हुए; सदाचरण, धर्माचरण में समय व्यतीत नहीं हुआ किन्तु सांसारिक चिन्ताओं में हम ही बूढ़े हो गए; और आशा-तृष्णा जीर्ण नहीं हुई किन्तु हम ही जीर्ण-शीर्ण हो गए।

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ मनु॰ २.६९॥

अर्थात् यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में ईन्धन और घी डालने से अग्नि बढ़ता जाता है वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है। इसलिए मनुष्य को विषयासक्त कभी नहीं होना चाहिए।

अतः विषय भोगों से सुख चाहने वाले व्यक्ति के बारे में कहा है कि वह बिच्छु के विष से भयभीत होकर भागता हुआ, सर्प से डसा जाकर अधिक दुःखों को प्राप्त हुआ। जैसे बिच्छु का विष कुछ काल तक ही पीड़ा देता है, परन्तु सर्प का विष तो प्राण तक हरण कर लेता है; उसी प्रकार विषयों की कामना करते हुए पुरुष को लौकिक विषयों को भोगने पर अधिक दुःखों की प्राप्ति होती है। क्यों ? यदि वह पुरुष उन विषयों की तृष्णा को दबा कर इन्द्रियों की अतृप्ति को सह लेता, तो कुछ समय बाद उस अतृप्ति का दुःख धीरे-धीरे शान्त हो जाता। परन्तु विषयभोग द्वारा उस तृष्णा को शान्त करने में उसने राग, द्वेष, मोह, हिंसा जन्य कर्माशय को और अधिक प्रबल कर लिया जिसका परिणाम उसे महान् दुःख सागर में निमग्न होकर भोगना होगा।

२. तापदुःख :— पुरुष जिस चेतन = स्त्री, पुत्र आदि तथा अचेतन = गृह, सम्पत्ति आदि से सुख का अनुभव करता है; उन सुख-साधनों के बाधक, विरोधी साधनों के कारण दुःख का भी अनुभव करता है। इन विरोधी साधनों के प्रति द्वेषजन्य-कर्माशय भी संग्रहीत करता है। वस्तुतः वह उन सुख-साधनों की प्राप्ति में, प्राप्त हुओं की रक्षा में, उनकी वृद्धि में, उनके क्षय एवम् व्यय में बहुसंख्य दुःखों को ही प्राप्त करता है। इनकी प्राप्ति की कामना से अन्य प्राणियों में से, किन्हीं प्राणियों को न्याय अथवा अन्याय पर्वूक अनुगृहीत करता और किन्हीं अन्यों को पीडि़त भी करता है। यह पर-अनुग्रह और पर-पीड़ा केवल सुखसाधनों की प्राप्ति तक ही सीमित नहीं रहते वरन् इन साधनों की रक्षा, वृद्धि, क्षय आदि में भी समान रूप से होते हैं (यथा इनकी वृद्धि, अथवा क्षय को रोकने हेतु अनेक प्रकार के शास्त्रविरुद्ध कार्यों = अधर्मों का सम्पादन करना, यथा अन्य समर्थ अधिकारियों को अन्यायपूर्वक उत्कोच आदि देता)। इस प्रकार दूसरों के प्रति अनुग्रह और पीड़ा से धर्म-अधर्म रूपी कर्माशय का सञ्चय होता है। ऐसा कर्माशय इन साधनों के प्रति लोभ अथवा मोह के कारण होता है। इस प्रकार यह अधर्माचरण आदि से सञ्चित कर्माशय दुःखप्रद ही होता है। इसे ही ताप दुःख कहते हैं।

३. संस्कारदुःख :— पुरुष के चित्त में सुखों के अनुभव से सुख के संस्कार तथा दुःखों के अनुभव से दुःख के संस्कार बनते हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण व्यक्ति उन-उन प्रकार के कर्मों को पुनः करता है, और उन कर्मों से पुनः सुख-दुःख की प्राप्ति और फिर उनसे वैसे ही संस्कार बनते; और यह क्रम जीवात्मा = पुरुष के साथ अनन्त काल से, जन्म-जन्मान्तर से, चल रहा है। इन्हीं संस्कारों के कारण सुख-साधनों के प्रति राग और राग से वैसे ही पुण्य-अपुण्य कर्म और तदानुकूल कर्माशय; इसी प्रकार दुःख साधनों के प्रति द्वेष और द्वेष से वैसे ही अपुण्य कर्म और तदानुकूल अपुण्य कर्माशय बनता रहता है। इसी कारण जीवात्मा = पुरुष संसारचक्र में अनवरत रूप से लगा हुआ है। इन सुख और दुःखों के संस्कारों से रागज, द्वेषज कर्माशय इतना घुलमिल जाते हैं कि जीव का क्लिष्ट कर्माशय ही मुख्य = प्रधान रूप से बनता है, और वही क्लिष्ट कर्माशय उसके वर्त्तमान जन्म और भावी जन्मों को भी प्रभावित करता है। अतः भोज ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि इस प्रकार से असंख्य संस्कारों की उत्पत्ति होने से संसार का कभी भी उच्छेद न होने से, सभी पदार्थ एवं भोग दुःखरूप है। अर्थात् अविद्यादि क्लेशों, शुभाशुभ कर्म, और उस कर्माशय का फल तथा उनके संस्कारों का अभाव न होने के कारण सभी विषय दुःख रूप ही है।

ये तीन प्रकार के दुःख योगी को ही मुख्य रूप से आक्रान्त करते हैं, अन्य सामान्य मनुष्यों को नहीं। अन्य मनुष्य तो अपने शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों (राग, द्वेष, मोह और हिंसाजन्य कर्माशय) के फलस्वरूप बार-बार प्राप्त होने वाले जन्मों और उन जन्मों में प्राप्त हुए दुःखों को भोगते हुए और फिर वैसे ही संस्कारों के कारण उन्हीं प्रकार के कर्मों को करते हुए, परिणामस्वरूप उसी प्रकार के दुःखों को पुनः प्राप्त करते हुए अनादि काल से क्लिष्टवृत्ति-क्लिष्टसंस्कार-क्लिष्टवृत्ति से पूर्णतया प्रभावित = चित्रित चित्त की वृत्तियों के कारण से त्याग करने योग्य संसार और सांसारिक पदार्थों एवम् भोगों में, अविद्या के कारण, अहम् भावना और ममता रखते हुए, सभी प्रकार के दुःखों को प्राप्त होते हैं।

४. गुणवृत्तिविरोध :— प्रकृति — सत्त्व, रज और तम गुणों वाली और इसके सभी विकार भी त्रिगुणात्मक हैं। परन्तु ये तीनों गुण परस्पर एक दूसरे से भिन्न स्वभाव वाले हैं। इन तीनों गुणों में सत्त्वगुण को प्रख्या अर्थात् ज्ञान, प्रकाश रूप वाला कहा है; रजोगुण को प्रवृत्ति अर्थात् क्रिया रूप वाला कहा है; और तमोगुण को स्थिति रूप वाला कहा है। पुरुष का चित्त भी त्रिगुणात्मक है। अतः चित्त में जब सत्त्व गुण प्रधान तथा रजोगुण और तमोगुण गौण होते हैं तो सुख का अनुभव होता है; जब रजोगुण प्रधान तथा सत्त्वगुण और तमोगुण गौण होते हैं तो दुःख का अनुभव होता है; और जब तमोगुण प्रधान तथा सत्त्वगुण और रजोगुण गौण होते हैं तो मूढ़ता, मोह का अनुभव होता है। ये तीनों गुण कभी स्थिरवृत्ति वाले नहीं रहते अर्थात् इनमें से कभी कोई गुण प्रधान होता, और कभी कोई अन्य गुण। इसी कारण चित्त को शीघ्र ही परिणाम को प्राप्त होने वाला कहा है। चित्त में कोई भी दो विरोधी स्वभाव एक साथ प्रधान नहीं होते, एक के प्रधान होने पर दूसरा सामान्य = गौण रूप से स्थित होता है। इस व्यवस्था को इस प्रकार से समझना चाहिए — जब धर्म अधिकता में होता है तो अधर्म सामान्य रूप से रहता; जब ज्ञान अधिकता में होता है तो अज्ञान सामान्य रूप से रहता; जब वैराग्य अधिकता में होता है तो अवैराग्य सामान्य रूप से रहता; जब ऐश्वर्य अधिकता में होता है तो अनैश्वर्य सामान्य रूप से रहता; और इसी प्रकार विपरीत स्थितियों को भी जानना चाहिए अर्थात् जब अधर्म आदि अधिकता में होते हैं तो धर्म आदि सामान्य रूप से रहते हैं। इसी प्रकार चित्त की सुखमय, दुःखमय और मोहरूप स्थितियों में एक की अधिकता में अन्य दोनों स्थितियाँ सामान्य रूप से रहती हैं। अर्थात् सुख की प्रबलता में दुःख और मोह सामान्य रूप से रहते हैं; दुख की प्रबलता में सुख और मोह सामान्य रूप से रहते हैं; तथा मोह की प्रबलता में सुख और दुःख सामान्य रूप से रहते हैं। अतः कभी भी किसी भी स्थिति में पुरुष के लिए दुःख का अत्यन्त नाश नहीं होता; या तो वह प्रधान रूप से रहता है अथवा सामान्य रूप से रहता है। यही गुणवृत्ति विरोध दुःख है। अतः योगी के लिए सभी पदार्थ, सभी विषय ही दुःखमय ही हैं।

इन दुःखों का मूल कारण अविद्या है। और अविद्या को दूर करने का उपाय सम्यग्दर्शन कहा है। इस दुःख बहुल त्याज्य = त्यागने योग्य संसार के साथ पुरुष के संयोग का कारण अविद्या है; इस संयोग के नाश से ही सर्वथा दुःख निवृत्ति सम्भव है और इसका उपाय सम्यग्दर्शन है। सम्यग्दर्शन से अभिप्राय केवल प्रकृति और पुरुष के शाब्दिक यथार्थ ज्ञान से नहीं है, वरन् प्रकृति और उसके विकारों तथा पुरुष = जीवात्मा और परमात्मा का समाधि की अवस्था में साक्षात्कार से उनके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होना ही सम्यग्दर्शन है। इस स्थिति से पूर्व अर्थात् शास्त्रों से पढ़े हुए इन सभी पदार्थों के शाब्दिक ज्ञान मात्र से दुःख की अत्यन्त निवृत्ति सम्भव नहीं है।

महर्षि व्यास ने — पुरुष का यथार्थ ज्ञान किस प्रकार का होता है?, इसके विषय में कहा है कि पुरुष = जीवात्मा का स्वरूप न तो हेय अर्थात् त्याग करने योग्य है, क्योंकि ऐसा मानने पर उसका नाश अभीष्ट होगा; और न ही उसका स्वरूप उपादेय अर्थात् ग्राह्य है, क्योंकि ऐसा मानने से उसके स्वरूप के ग्रहण करने का कारण बताना होगा अर्थात् जीवात्मा किसी कारण के होने से, अनित्य सिद्ध होगा। अतः पुरुष हेय और उपादेय से रहित शाश्वतरूप = नित्य सत्ता हैै, और इस रूप में पुरुष का समाधिनिष्ठ साक्षात्कार होना पुरुष का सम्यग्दर्शन है।

विषय सुखों में तीन प्रकार के दुःखों का मिश्रण जानकर तथा गुण-वृत्ति विरोध से सभी कुछ दुःखमय जानकर ही साधक = योगी संसार के प्रति वैराग्य को प्राप्त होता है, और तभी इनको छोड़ने हेतु उपायों का सम्पादन कर पाता है; अन्यथा नहीं।