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Saadhana Paada / Means / 16
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Saadhana Paada / Means / 16

हेयं दुःखमनागतम्॥१६॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 16

In Hindi:

पदपाठ : हेयम् दुःखम् अनागतम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तदेतच्छास्त्रं चतुर्व्यूहमित्यभिधीयते—

हिंदी में अर्थ : (तत्) वह (एतत् शास्त्रम्) योगशास्त्र (चतुर्व्यूहम्) चार विभागों वाला है (इति) यह (अभिधीयते) आगे वर्णन किया जा रहा है —

हिंदी में अर्थ : (अनागतम्) भविष्य में आने वाला, जो (दुःखम्) दुःख है, वह (हेयम्) त्याग = दूर करने योग्य है॥

व्यास भाष्य : दुःखमतीतमुपभोगेनातिवाहितं न हेयपक्षे वर्त्तते। वर्त्तमानं च स्वक्षणे भोगारूढमिति न तत्क्षणान्तरे हेयतामापद्यते। तस्माद्यदेवानागतं दुःखं तदेवाक्षिपात्रकल्पं योगिनं क्लिश्नाति नेतरं प्रतिपत्तारम्। तदेव हेयतामापद्यते॥

हिंदी में अर्थ : (अतीतम्) बीता हुआ = पूर्व काल में प्राप्त हुआ (दुःखम्) दुःख (उपभोगेन) उपभोग के द्वारा (अतिवाहितम्) अतिक्रान्त = नष्ट हो चुका है; इसलिए वह (हेयपक्षे) त्याग करने की कोटि में (न वर्त्तते) नहीं है। (च) और (वर्त्तमानम्) वर्त्तमान काल में जो दुःख प्राप्त है वह (स्वक्षणे) अपनी स्थिति के काल में (भोगारूढम्) भोग की प्रक्रिया में चालू है = भोगा जा रहा है (इति) इसलिए (तत्) वह दुःख भी (क्षणान्तरे) आने वाले काल में (हेयताम्) हेयता = त्याज्य कोटि को (न आपद्यते) प्राप्त नहीं हो सकता। (तस्मात्) इसलिए (यत् एव) जो ही (अनागतम्) भविष्यत् काल में प्राप्त होने वाला (दुःखम्) दुःख है (तत् एव) वह दुःख ही (अक्षिपात्रकल्पम्) नेत्र गोलक के समान (योगिनम्) योगी को (क्लिश्नाति) क्लेश देता है = पीडि़त करता है; (इतरम् प्रतिपत्तारम्) अन्य सामान्य ज्ञाताओं = अनुभव करने वाले प्राणियों को (न) नहीं करता। (तत् एव) वही अनागत दुःख ही (हेयताम्) हेयता = त्याज्य कोटि को (आपद्यते) प्राप्त होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : संसार में सभी सुख-भोगों में दुःख का मिश्रण है, और यह दुःख परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों के रूप में तथा गुणवृत्ति विरोध के कारण है; अतः इस प्रकृतिजन्य संसार के सभी भोग तथा पदार्थ अन्ततः दुःखदायी हैं। महर्षि पतञ्जलि ने दुःखों को त्यागने योग्य कहा है। परन्तु सभी दुःख त्याज्य कोटि में नहीं आते। अतीत काल में पुरुष ने जिन दुःखों को भोग लिया है, वे दुःख भोग के उपरान्त न रहने से त्याज्य नहीं रहे। वर्त्तमान काल में पुरुष जिन दुःखों को भोग रहा है, वे दुःख भी भोग के उपरान्त आगे नहीं रहेंगे। अतः आने वाले काल में उस दुःख की सत्ता न रहने से उस दुःख का त्याग भी सम्भव नहीं माना गया।

इसलिए जो दुःख भविष्यत् काल में आने वाला है उसका त्याग करना ही सम्भव है। यही भविष्यत् कालिक दुःख ही योगी को क्लेश पहुँचाता है; अन्य सामान्य व्यक्तियों को नहीं। कोई प्रश्न करे कि जो दुःख आया ही नहीं है, तो उसके लिए दुःखी क्यों होना, उसको छोड़ने का उपाय क्यों करना ? उसका उत्तर यह है कि जिस प्रकार एक सामान्य मनुष्य भी अपने जीवन काल में, सामाजिक व्यवस्था में उन अपराधों को करने से बचता है जिसके फलस्वरूप उसे मानवीय दण्ड व्यवस्था में कारावास रूपी दुःखों को भोगने की सम्भावना होती है। यतः कारावास का दुःख अभी आया नहीं है, परन्तु उसकी सम्भावना में वह ऐसे कृत्यों को करने से दूर रह कर उस सम्भावित कारावास के दुःखों का परिहार करता है; उसी प्रकार योगी पुरुष भी सांसारिक सुखों की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ नहीं करता, क्योंकि उन लौकिक सुखों में परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों का भी मिश्रण है।

महर्षि गौतम ने न्यायसूत्र १.१.२ में दुःख का कारण जन्म कहा है। क्योंकि जन्म के लिए गर्भवास का अनिवार्य दुःख तो भोगना ही होगा; और फिर जन्म के उपरान्त मृत्यु का अनिवार्य दुःख भी प्राप्त होगा ही। पूर्व में प्राप्त हुए जन्मों में गर्भवास के दुःखों का परिहार सम्भव नहीं और न ही उन जन्मों के पश्चात् हुई मृत्यु रूपी दुःखों का परिहार ही सम्भव है। इसी प्रकार वर्त्तमान जन्म में भी गर्भवास का दुःख तो भुक्त हो गया और आगे आने वाली मृत्यु के दुःख का परिहार भी किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं है; क्योंकि जब शरीर का संयोग हुआ है, तो शरीर का वियोग भी होगा ही, उसे कोई भी रोक नहीं सकता। अतः आगे जन्म ही न हो ऐसा उपाय करने से ही, गर्भवास का दुःख, अन्य भोगों से प्राप्त होने वाला परिणाम, ताप और संस्कार दुःख तथा मृत्यु का दुःख नहीं होगा; यह सम्भव है।

अतः अनागत दुःख ही त्याग करने योग्य है। इन्हीं अनागत दुःखों के कारणों को जानकर, उनको दूर करने के उपायों को जानकर, तदानुकूल आचरण करने से ही उन अनागत दुःखों को दूर किया जा सकता है; अन्यथा कोई अन्य मार्ग नहीं है। शास्त्रकारों ने सभी दुःखों का मूलकारण अविद्या ही कहा है, और इसी तथ्य को महर्षि पतञ्जलि ने भी योगशास्त्र में प्रतिपादित किया है।